Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

मयंक सक्सेना का स्मृति पोस्ट और उनकी याद में एक आयोजन की सूचना

राजेश चंद्र-

दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में वर्ष 2011 और 2012 में लगातार दो वर्षों तक देश के सुप्रसिद्ध रंग-निर्देशक भानु भारती के निर्देशन में करोड़ों के ख़र्च से ‘अंधायुग’ और ‘तुगलक’ नाटकों का मंचन हुआ था, जिसने इस फ़िज़ूलख़र्ची के औचित्य और समकालीन रंगकर्म की दशा-दिशा को लेकर रंगकर्मियों के बीच एक गर्मागर्म बहस छेड़ दी थी। तुगलक नाटक के सन्दर्भ में मेरे विशेष आग्रह पर समकालीन रंगमंच पत्रिका के लिये यह समीक्षात्मक आलेख 20 नवंबर, 2012 को साथी मयंक सक्सेना ने लिखा था। यह समीक्षा नाटक, रंगमंच और समय-समाज को लेकर उनकी गहरी समझ से परिचित कराती है। मयंक भाई की स्मृति में यहां पोस्ट कर रहा हूं।

मयंक सक्सेना की याद में कार्यक्रम की सूचना अंत में….


मयंक सक्सेना-

तुगलक – सत्ता और कला की नूरा-कुश्ती

दिल्ली के ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला के ध्वंसावशेषों के बीच वो तेज़ और मद्धम होती महंगी विदेशी एमडी जैसी लाइट्स का प्रकाश संयोजन था, दर्शकदीर्घा में प्रवेश करते वक्त जब दो दरबान आपके रास्ते में भाला लिए खड़े थे, तो लगता था कि आप वाकई मध्ययुग में वापस प्रवेश कर रहे हैं। दरअसल कई मायनों में हम अभी भी मध्ययुग में ही हैं, ये नाटक खुद ब खुद ही स्थापित करने वाला था। कोटला के खंडहरों के बीच चार बड़े-बड़े सेट्स पर महंगी प्रकाश और ध्वनि संयोजन के साथ गिरीश कर्नाड के तुगलक का मंचन हो रहा था, लगभग एक साल पहले इसी जगह ऐसे ही बड़े बजट के साथ धर्मवीर भारती के अंधा युग का मंचन हुआ था। संयोग ये भी था कि दोनों का ही निर्देशन भानु भारती ने ही किया था और दोनो को ही दिल्ली सरकार ने प्रायोजित किया था, यानी कि सत्ता की सनक की कहानी मंच पर खेली जा रही थी, सत्ता के ही बजट से, लेकिन ये सिर्फ एक पहलू था।

नाटक की शुरुआत निस्संदेह ही बांध लेने वाली थी, बायीं ओर के पहले सेट पर जब जनता दिखती है तो बिना मंच पर आए मुहम्मद बिन तुगलक और उसकी सनक का अनौपचारिक परिचय हो जाता है और फिर बीच के मंच पर तेज़ रोशनी में अवतरित होते हैं यशपाल शर्मा यानी कि तुगलक। थिएटर के ही नहीं फिल्म के मशहूर सितारों से सजा नाटक शुरुआत में ही आपको चमत्कृत करता है और फिर हतप्रभ करता है, यकीनन भव्यता देख कर गिरीश कर्नाड और नाटक का अनुवाद करने वाले कारंत दादा भी हैरान हो जाते कि हिंदी रंगमंच भी ऐसे होता है क्या? लेकिन दरअसल इस जादूगरी के नज़ारे के साथ ही अचानक से सवालों के बादल भी घुमड आए। लगा कि आखिर एक नाटक पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं जबकि बाकी रंगमंच के पृष्ठ पर भी नेपथ्य सा अंधेरा है….

एक बादशाह की सनक, सत्ता के अहंकार, शासक के दोगलेपन, राजसत्ता की चालाकी और अवाम के अंतहीन दुख की गाथा कहता है तुगलक…कुल मिला कर प्रतिरोध का ही नाटक है तुगलक भी लेकिन मेरे ठीक आगे बैठे एक साहब को अपनी पत्नी को एक-एक शब्द का तर्जुमा कर के अंग्रेज़ी में समझाना पड़ रहा था, ज़ाहिर था कि नाटक से ज़्यादा आह और वाह दृश्य-प्रकाश संयोजन और मंच व्यवस्था को लेकर निकल रही थी। विडम्बना ही ये थी कि नाटक देखने वाले ज़्यादातर दर्शक उसी सत्ता वर्ग का हिस्सा थे, जिसकी सनक और ग़ैरज़िम्मेदारी की कहानी नाटक कहता है। मेरे आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, न जाने कितने तुगलक और उसके वज़ीर बैठे थे। लेकिन नाटक चल रहा था सभी ओर…मंच पर, मंच के पीछे, मंच के आगे, दर्शक दीर्घा में और ज़ाहिर है वहां भी जहां से ऐसे खेल सत्ता के पैसे के करोड़ों के बजट से रचाने की साज़िशें होती हैं।

नाटक के एक अंक में बादशाह ए दिल्ली मुहम्मद बिन तुगलक की सार्वजनिक निंदा करने और तीखे आरोप लगाने वाले इमाम को दिल्ली बुलाने, उसकी सार्वजनिक तकरीर करवाने और फिर उसे ही धोखे से मरवा कर खुद को दरियादिल और आज़ाद ख्याल साबित करने का नाटक, जब तुगलक के मंचन के पीछे की सरकारी मंशा के बरक्स रखा जाता है तो नाटककार जो कह रहा होता है, वो खुद उस नाटक का एक किरदार बन चुका होता है, तुगलक नाम का पूरा नाटक बन जाता है एक अंक उस बहुत बड़े नाटक का जो सत्ता असलियत में रचती है। गिरीश कर्नाड ने लिखते वक्त शायद ही सोचा होगा कि एक दिन उनका नाटक उसी षड्यंत्र के लिए इस्तेमाल होगा, जिसका वो फ़ाश कर रहे हैं। ये समझना बेहद आसान है, बस इसको परत दर परत उसी चश्मे से देखना होगा जिस चश्मे से आप तुगलक देख कर आए, और साथ ही एक लेंस वो भी जो सत्ता औऱ सरकार के रवैये को पैनी नज़र से देखता है। पहला सवाल सिर्फ इतना है कि कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर साधारण व्यवस्था तक भ्रष्टाचार के आऱोपों से घिरी दिल्ली सरकार आखिर क्यों रचाती है तुगलक नाम का ये नाटक? क्यों आखिर आम आदमी की समस्याओं पर खर्च होने वाला करोड़ों का बजट शहर के रईसों के लिए निरुद्देश्य साबित होने वाले एक नाटक के लिए खर्च होता है? सत्ता के ही खिलाफ प्रतिरोध का नाटक मंचित करवा कर सत्ता आखिर क्या करना चाहती है? और फिर ये कि प्रतिरोध का रंगमंच क्या सत्ता से साथ शयन कर के होगा, एक ही बिस्तर में सोकर आप सत्ता को छलेंगे या सत्ता आपको? यानी कि आप आग बुझाने के लिए उसी से पानी ले रहे हैं, जिसने आग लगाने वालों को माचिस बेची थी?

दरअसल ये सब कुछ सुनियोजित औऱ सोची समझी रणनीति के तहत होता है, एक नेक्सस जिसे अंजाम देने के लिए ही शायद एनएसडी जैसे संस्थान की नींव डाली गई, ठीक वैसे ही जैसे सत्ता आपको लोकतंत्र का रंगीन सपना दिखाती आई है, रचती आई है एक यूटोपिया जो तभी भग्न होता है, जब आप कभी गलती से किसी नंगे भूखों के गांव में पहुंच जाते हैं, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के आदिवासियों से टकराते हैं या फिर कभी किसी अरुंधती का कोई लेख पढ़ लेते हैं। लेकिन टूटे हुए यूटोपिया को सत्ता लगातार रचने में लगी रहती है, उसके लिए किसी भी विकास और जनहित से ज़रूरी ये ढोंग है क्योंकि इसके बिना सत्ता ही नहीं है। ऐसा ही कुछ होता रहा कई दिनों तक दिल्ली के कोटला के खंडहरों में, तुगलकी सत्ता के अहंकार की कहानी खुद वो ही सत्ता कह रही थी, तुगलक पर लगे आरोपों पर तुगलकी सरकार तंज कस रही थी और उसके भानु भारती जैसे वज़ीर उसकी मदद मे हाजिर थे।

दरअसल कथ्य की बात की जाए, तो गिरीश कर्नाड के नाटक का जिस तरह का अनुवाद कारंत साहब ने किया है, वो अपने आप में मिसाल है कि दूसरी भाषाओं से हिंदी में अनुवाद कैसे होना चाहिए, ये भी समझना ज़रूरी है कि नाटक में अभिनेता भी अपने काम के साथ पूरा न्याय कर रहे थे। यशपाल शर्मा हों या हिमानी शिवपुरी…रवि खानविलकर हों या फिर जीतू शास्त्री, इनमें से किसी के भी अभिनय पर सवाल उठाना नाजायज़ होगा। हर किरदार में अभिनेता डूबा हुआ था, और इसलिए मंचन का कसाव बेजोड़ था। मंच सज्जा पिछले साल हुए अंधा युग की ही याद दिला रही थी, भव्य सेट और अभूतपूर्व लाइटिंग। संगीत का संयोजन भी बेहद प्रोफेश्नल और माहौल को नाटक के साथ मिला कर आपके ज़ेहन में उतारता। ज़ाहिर है भानु भारती की क़ाबिलियत पर किसी को कोई शक़ नहीं होना चाहिए लेकिन नाटक का एक और महत्वपूर्ण तत्व होता है, जिसे दर्शक कहते हैं। तुग़लक का दर्शक वो नहीं था, जो इस नाटक को पूरा करे। ज़ाहिर है अंग्रेज़ी बोलने और समझने वालों की भीड़ में कुछ लोग ऐसे ज़रूर थे, जो हिंदी रंगमंच औऱ नाटक की बारीकियों से वाकिफ़ थे, लेकिन वहां आई बड़ी भीड़ पेज 3 पर आने वाले या आने की तमन्ना रखने वालों की थी। ज़ाहिर है ज़्यादातर आमंत्रण और पास, सत्ता, सत्ता प्रतिष्ठान से जुडे लोगों या फिर रईसों के लिए थे। वैसे भी गरीबों या मिडिल क्लास के लिए करोड़ों का नाटक नहीं खेला जाता है, उनके लिए नुक्कड़ नाटक और प्रोसीनियम है।

तुगलक देखते वक्त अनजाने में ही ये याद आ रहा था कि पिछले साल किस तरह से धर्मवीर भारती के अंधा युग का भी ऐसा ही मंचन हुआ था, वो भी एक ऐसा ही नाटक है जो कहता है कहानी सत्ता की अकड़ और जनता की तड़प के अंधे युग की कहानी। दिल्ली में 50 से ज़्यादा थिएटर ग्रुप हैं, जो जनवादी थिएटर करते हैं। लेकिन दिल्ली सरकार के पास उनके लिए कोई फंडिंग नहीं है, तिस पर एक नाटककार को साल में एक नाटक करने के लिए करोड़ों रुपए की फंडिंग देना जिनको न्यायसंगत लगता है, उनसे में खुली बहस चाहता हूं। दरअसल तुगलक की ही तरह अंधा युग भी इस सत्ता और उसके प्यादों के किरदारों से सजे नाटक का अहम हिस्सा बन गया था, नाटक की शुरुआत में ही पार्श्व से एक ध्वनि आती है, संवादों पर ग़ौर करेंगे तो सारी कहानी खुल जाएगी, संवाद ऐसा है :

युद्धोपरांत वह अंधा युग अवतरित हुआ
जिसमें स्थितियां, मनोवृत्तियां, आत्माएं सब विकृत हैं
उस भविष्य में
धर्म-अर्थ ह्रासोन्मुख होंगे
क्षय होगा धीरे-धीरे सारी धरती का
सत्ता होगी उनकी
जिनकी पूंजी होगी
जिनके नकली चेहरे होंगे
केवल उन्हें महत्त्व मिलेगा
राज्यशक्तियां लोलुप होंगी
जनता उनसे पीड़ित होकर
गहन गुफ़ाओं में छिप-छिप कर दिन काटेगी.’

अंधा युग देखते वक्त भी लगातार अंधा युग मंच के बाहर भी दिखता रहा, नाटक खुद बड़े सच का छोटा हिस्सा लगा। तुगलक भी वैसा ही कथ्य कहता है लेकिन खुद सत्ता के नाटक का हिस्सा बन जाता और फिर एक महान नाटक का भव्य मंचन तारीफ की जगह सवालों के केंद्र में आ जाता है। क्या रंगमंच समाज को बदलने का माध्यम है या फिर सिर्फ उसके मनोरंजन का? क्या एलीट क्लास के मनोरंजन के लिए किए जाने वाला रंगमंच सत्ता की उस पूंजी से होगा, जिस पर न जाने कितने संघर्षरत रंगकर्मियों का हक है? एक ओर जब तमाम रंगकर्मी आर्थिक तंगी के चलते थिएटर से तौबा कर रहे हैं, तब ऐसे में 3 करोड़ रुपए से एक नाटक खेला जाएगा, जिसका टेंडर हर साल एक ही निर्देशक के नाम खुलेगा? ऐसे में रंगमंच के बड़े नामों की चुप्पी का क्या मतलब निकाला जाना चाहिए? क्या सत्ता के भ्रष्ट आचरण के खिलाफ प्रतिरोध तैयार करने वाले रंगमंच का भविष्य सत्ता की गलबहियां कर के ही तय होगा? सवाल इतने हैं कि तुगलक से बड़ा नाटक लिखा जा सकता है लेकिन क्या इनके जवाब भी देगा और देगा तो किसकी जवाबदेही होनी चाहिए?

अपनी किताब ‘थ्री यूज़ेस ऑफ नाइफ़’ में डेविड मैमे लिखते हैं, “अगर आप थिएटर के अंदर एक नाटक देखने घुसते हैं, तो मतलब ये कि आप जानने जा रहे हैं कि आप के आस पास की दुनिया में क्या और क्यों चल रहा है…क्या विद्रूपता है..लेकिन आप अगर बाहर कुछ लेकर नहीं आते, तो ये सिर्फ मनोरंजन है और वो भी घटिया मनोरंजन” सवाल ये है कि जो दर्शक वर्ग कोटला में पिछले साल अंधा युग देख कर वापस निकला था…वो ही तुगलक देख कर बाहर आता है और पुरानी मनोवृत्ति के साथ ही तो क्या मतलब है रंगमंच का? सवाल कि आखिर किस के लिए होगा रंगमंच, सत्ता के मठों की नौटंकी के लिए, कुंठित समीक्षकों के विधवा विलाप के लिए या फिर कुछ एक रंगकर्मियों के लिए फ्लैट और गाड़ी बनाने के मौके के तौर पर? कितनी बार हमारे करोड़ों के नाटक रचने वाले निर्देशक कोशिश करते हैं कि प्रोसीनियम में आम जनता के लिए कोई नाटक करें, और स्वदेश दीपक जैसों को याद करें, जिनका कोई अता पता नहीं? क्या हम दर्शक को नाटक का अहम घटक नहीं मानते, फिर क्यों केवल एलीट क्लास देखेगा करोड़ों से खेला गया एक नाटक?

मेरे आप पास दो लोग बैठे थी, थोड़ा सा ही पीछे प्रख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह और थोड़ा सा ही आगे प्रख्यात पत्रकार और लेखक सईद नक़वी, मैं हैरान नहीं था कि मध्यवर्गीय मैं इन दोनों को देख उत्साहित था और बाकी पूरे दर्शक वर्ग में एक आध लोगों को छोड़ कर इन दोनों को कोई पहचानता तक नहीं था। क्या इस दर्शक वर्ग और इस सुरुचिपूर्ण क्लास के लिए मंचित हो रहा था ये नाटक, क्या ये सब खुद में एक नाटक नहीं? दरअसल सत्ता चाहती भी नहीं कि आम आदमी या कहें कि अवाम तुगलक या अंधा युग देखे, और इसीलिए तुगलक या अंधा युग का इस तरह का मंचन भले ही अच्छा लगे, भले ही अभिनय और कला को अलग ऊंचाईयों पर ले जाए, लेकिन वो वह काम नहीं करता जो उसे करना चाहिए। वो कला के सबसे अहम उद्देश्य को पीछे छोड़ देता है, उसके सरोकारों को, उसके जनवाद को और उसकी संवेदना को। वहां बैठे न जाने कितने दर्शकों को तुगलक के पहले अंक के पहले सीन में त्रस्त जनता देख कर हंसी छूट जाती है, न जाने कितने लोग ठहाके लगाते हैं, गोद में मरता हुआ शिशु लिए स्त्री और लेखपाल के संवादों पर और किसी भी समझदार और संवेदनशील दर्शक का सिर शर्म से झुक रहा होता है।

हम तुगलक और अंधा य़ुग को लेकर लेख लिख सकते हैं, प्रशस्ति गान गा सकते हैं और तीखी आलोचना भी कर सकते हैं। लेकिन मुद्दा दरअसल तुगलक नहीं है, विमर्श तुगलक पर नहीं परंतु तुगलक के बहाने इस व्यवस्था पर है और जिनसे उम्मीद की जानी चाहिए, उनके सत्ता का प्यादा बन जाने से है। सत्ता हमेशा चाहती है कि जनता उतनी ही मूर्ख और अक्रिय बनी रहे, जितनी कि वो हमेशा रही है और उसके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि तुगलकी सत्ता के अमीर उसके साथ रहें, ठीक वैसे ही जैसे यूरोपीय राजा अपने नाइट्स और लॉर्ड्स को खुश रखने के लिए कुछ भी करते थे। शोषक तंत्र की सफलता निर्भर करती है उसके साथ खड़े पूंजीपतियों और नौकरशाहों पर, नौकरशाहों के धूर्त दिमागों और पूंजीपतियों की ताकत से ही सत्ता की तुगलकी मानसिकता और दमन का चक्र चलता है। तुगलक का मंचन इस का सिर्फ एक और गवाह है कि कैसे प्रतिरोध की ताकत सत्ता के साथ खड़ी होकर बदसूरत हो जाती है और फिर उसे भव्यता का मेकअप कर के खुद को खूबसूरत दिखाना पड़ता है। गिरीश कर्नाड ने ये नाटक प्रोसीनियम के लिए लिखा था, यानी कि आम आदमी के लिए दिल्ली सरकार ने इसे एक कॉंसर्ट की तरह करवाया, ज़रूरतमंद और बीमार रंगमंच की मदद के लिए खर्च करने की बजाय महान नाटक को बाज़ारू बना कर उसको करोड़ों की मदद दी। एक प्रतिरोध और समझ के नाटक को कैसे बदल कर सत्ता का चेहरा संवारने में इस्तेमाल किया जाता है, इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता है। दिल्ली सरकार तो वो ही कर रही है, जो उसका यानी कि सत्ता का चरित्र है, लेकिन भानु भारती साहब आप तो रंगकर्मी हैं, आप से सिर्फ वही कहूंगा जो तुगलक ने शहाबुद्दीन से कहा था…और जूलियस सीज़र ने ब्रूटस से…एट टू ब्रूटस…तुम भी शहाबुद्दीन…भानु भारती आप भी…?

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन