
संजय कुमार सिंह
आज इतवार का दिन और अंग्रेजी अखबारों का विज्ञापन से भरा पन्ना तथा उसमें क्रिकेट की तस्वीर के बाद खबरें नहीं के बराबर हैं। पर एक ही खबर दहला देने वाली है। नदी में टैंक डूबने और पांच सैनिकों की मौत की खबर न सिर्फ दुखद है, चौंकाने वाली भी है। मैं इस मामले में कुछ नहीं जानता और आजकल की खबरों में जो होता है उससे कुछ जाना भी नहीं जा सकता है पर मेरी समझ से यस सर वाली मानसिकता का नतीजा है। भारतीय समाज में सवाल करना पहले से मना रहा है अब तो लगभग प्रतिबंधित है। मुझे लगता है कि इसलिए यह हादसा हो गया। वरना कोई कारण नहीं है कि टैंक से नदी पार की जाये अचानक तेज बहाव आ जाये और पांच सैनिक मारे जायें।
नदी में जब 50-60 किलो का आदमी / बच्चा धंस / फंस जाता है तो टैंक भी धंस सकता था। नदी में अचानक पानी छोड़े जाने से हादसे पहले भी हुए हैं और जाहिर है कि यह सीख ली जानी चाहिये कि नदी पार करने के समय सावधानी बरती जानी चाहिये। आगे-पीछे का सोचा जाना चाहिये था और अगर आदेश मानने की जगह सवाल करने का रिवाज होता तो शायद यह हादसा नहीं होता। फौज में आदेश मानने और सवाल करने पर सजा का कुछ अलग ही मामला है इसलिए जिम्मेदारी तो अफसरों की बनती है और देश के कानून में जब आत्महत्या अपराध है तो यह हादसा अफसरों की लापरवाही है और इसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिये।
खबर यह है कि बर्फ पिघलने से पानी बढ़ गया और टैंक बह गया। टैंक से नदी पार करना एक ड्रिल का भाग था। मुझे लगता है कि पार करने से पहले इसपर विचार ही नहीं किया गया और यह संभावना तो थी ही कि टैंक फंस सकता है। अगर टैंक फंस जाये तथा पानी का बहाव तेज हो जाये तो हादसा हो सकता है इसका ख्याल पार करने वालों के साथ पार करने का आदेश या इजाजत देने वालों को भी रखना चाहिये था और जाहिर है कहीं ना कहीं कोई चूक हुई है। संभव है, इसमें भारतीय सेना की ताकत का भी योगदान हो और ‘घुस कर मारूंगा’ की मानसिकता में यह सोचा ही नहीं गया हो कि हमें अपने इलाके में परिस्थितियां मार सकती हैं। मजबूत होने और हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा जैसी सोच कई बार खतरे का अनुमान नहीं लगाने देती है। संभव है, इस हादसे में भी ऐसा हुआ हो। इसलिए आगे के खतरे से बचने की तैयारी जरूरी है।
अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, लद्दाख में युद्धाभ्यास में शामिल टैंक बहा, जेसीओ समेत पांच जवान बलिदान। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, तीन लोगों की जगह, पर 5 जवान थे सवार। यहां मुझे सुरक्षा नियमों के मामले में हवाई जहाज के लिए बनाये गये नियमों और उनके पालन की याद आती है। इसमें हर यात्री को हर बार सीट बेल्ट लगाना और खोलना भी सिखाया जाता है। यह दीगर है कि जानकार विमान यात्रा में भी सुरक्षा नियमों की अनेदखी का आरोप लगाते हैं पर हर बार सील्ट बेल्ट बांधने का नियम सुनकर मुझे लगता है कि नियम ऐसे ही होने चाहिये और यह नहीं कि बस पास तक जा रहा हूं इसलिए हेलमेट नहीं लगाया है या दिल्ली से गाजियाबाद की सीमा में घुसते ही सीट बेल्ट खोल दी जाये हेलमेट उतार लिये जाये हैं क्योंकि यहां सड़कों पर कैमरे नहीं हैं। ट्रैफिक सिपाही तो छोड़िये, लाइट भी दिल्ली की तरह नहीं चलती है ना मानी जाती है। ऐसा इसलिए कि दिल्ली में सिपाही और लाइट दोनों पर्याप्त हैं और गाजियाबाद में दोनों अपर्याप्त। हालांकि यह अलग मुद्दा है। पर मामला सुरक्षा और सुरक्षा व्यवस्था में अंतर का तो है ही।
मुझे लगता है कि बगैर युद्ध के इन वीरों की मौत शर्मनाक है और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिये। पर नवोदय टाइम्स में एक शीर्षक है, “शर्मनाक : अंडरपास में दो बच्चे डूबे”। अब देश की राजधानी में भारी गर्मी के बाद एक-दो दिन की बारिश से यह हाल हो जाये तो वह भी शर्मनाक ही है लेकिन मुझे बिना बात पांच फौजियों की मौत ज्यादा शर्मनाक लगती है। नवोदय टाइम्स में ही इस खबर के नीचे पानी में बहती या तैरती कारों की तस्वीर है। इसके नीचे खबर का शीर्षक है, “हरिद्वार: भीमगोड़ा नदीं में कई वाहन बहे।” लद्दाख की खबर को अखबार ने दुर्घटना माना है और जवानों को शहीद। मुझे लगता है कि देश भर में जब पानी भरने से जनजीवन अस्तव्यस्त होता रहा है और हम उस ठीक करने की बजाय संरचना विकास में लगे हैं जो धंसने की हैट्रिक बना रहे हैं तब सैन्य अभ्यास में पांच मौतें बहुत ज्यादा नहीं है। आम आदमी जब टैक्सी चलाने का रोजगार करते हुए, ट्रेन में यात्रा करते हुए मर जा रहा है तो जोखिम वाले काम में जोखिम होता ही है। आप यह भी मान सकते हैं कि कुछ नहीं किया जा सकता है। हमें अपनी बारी का इंतजार करना चाहिये। यह इसलिए भी कि एक-दो दिन के रिकार्ड बारिश से दिल्ली में मरनों वालों की संख्या 11 हो गई है। यह कोई पहली बार नहीं है और ना आखिरी बार। रिकार्ड ही बनना है तो रिकार्ड नरेन्द्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री बनने का बनाया है। पर सवाल है कि जनता या देश को उससे क्या फायदा हुआ? या हम यह मान लें कि रिकार्ड बारिश में रिकार्ड मौतें कोई खास बात नहीं है। जो भी हो, शीर्षक लगाने का काम करने वालों को यह तो तय करना ही पड़ेगा कि कौन सा हादसा वाकई शर्मनाक है।
मुख्यमंत्री का लगातार जेल में होना
इसमें केजरीवाल को फिर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेद दिया जाना शामिल है। भारी बहुमत और जनसमर्थन से निर्वाचित एक मुख्यमंत्री महीनों से जेल में है, ना उसे पद से हटाया जा सकता है ना उसे इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जा सकता है ना जमानत मिल रही है ना जांच पूरी हो रही है और ना सबूत मिल रहे हैं। चोर कहने के लिए सजा हो सकती है अनुभवी चोर कहना कोई बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले इस गिरफ्तारी में राजनीति देखी, चुनाव प्रचार के लिए जमानत दे दी तो उसे स्पेशल ट्रीटमेंट कहा गया, इस दबाव में स्वास्थ्य कारणों से भी जमानत का विस्तार नहीं हुआ और जब जमानत मिल गई तो जज को ट्रोल किया गया। हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में अपील से जब लगा कि जमानत हो जाएगी तो सीबीआई को लगा दिया गया और फिर 14 दिन की न्यायिक हिरासत हो गई। आखिर सरकार कैसे चलेगी? इसे कौन देखेगा?
अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री की पॉस्को मामले में गिरफ्तारी रोकने के लिए एक हाईकोर्ट कहता है कि वह ऐरा गैरा नहीं है तो दूसरे मुख्यमंत्री के मामले में ऐसा क्या है कि उसे छोड़ा ही नहीं जा सकता है। खासकर तब जब उसी की पार्टी के और भी कई लोग पहले से जेल में हैं। एक अन्य मुख्यमंत्री के मामले में एक और हाईकोर्ट ने कहा है कि उन्हें गिरफ्तार करने के पर्याप्त आधार नहीं है और जमानत दी है। मुझे लगता है इसे देखना वाला सुप्रीम कोर्ट ही है। मुख्य न्यायाधीश का ही यह काम है और वे दबाव में हैं। आपको याद होगा कि लोकसभा चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट में केजरीवाल की जमानत पर जोरदार बहस हुई थी और फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। तब मैंने लिखा था कि ऐसा फैसले का प्रभाव चुनाव पर नहीं पड़े इस उद्देश्य से किया गया हो सकता है। इस तरह आप कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने तो इस बात का ख्याल रखा है लेकिन सरकार की तरफ से दबाव और उसका असर होने के कई कारण नजर आ रहे हैं। पता नहीं यह मामला कितना शर्मनाक है और इसमें किसकी भूमिका कितनी शर्मनाक कही जा सकती है।
क्रिकेट के बावजूद आज द हिन्दू में नीट लीड है खबर के अनुसार सीबीआई ने इस मामले में गुजरात में तलाशी ली है। एक और गिरफ्तारी की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी नीट पर यह खबर है। यहां गुजरात और गोधरा नहीं है बल्कि झारखंड बिहार लिंक और एक पत्रकार को गिरफ्तार किये जाने की सूचना है। यही सूचना हिन्दू में भी है। लेकिन मु्दा यह है कि इस मामले में शिक्षा मंत्री का झूठ रोज खुल रहा है। आप जानते हैं और उन्होंने कहा था कि यह मामला एक ही जगह सीमित है। इसके साथ तथ्य यह भी है कि बिहार पुलिस ने शुरू में एनटीए पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया, एनटीए के चेयरपर्सन संघ के करीबी और अखिल भारतीय विद्याथी परिषद से जुड़े रहे हैं। पर कार्रवाई आईएएस अफसर के खिलाफ हुई है। एनटीए के सहयोग नहीं करने के मामले में पूरा सन्नाटा है।


