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नीट मामले में साफ है कि सरकार निर्णय लेने में अक्षम है और चाहती है परीक्षा दोबारा नहीं करानी पड़े

संजय कुमार सिंह

आज हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया दोनों ने पहले पन्ने से पहले के अपने अधपन्ने पर नीट की खबर को लीड बनाया है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि नीट में बड़े पैमाने पर कोई गड़बड़ी नहीं हुई। इसी के साथ बॉक्स में छपी खबर का शीर्षक है, छात्रों ने सर्वोच्च अदालत से कहा, व्यवस्थागत धोखाधड़ी, बड़े पैमाने पर लीक। इस मामले में अखबारों का काम था कि छात्रों की शिकायत को ज्यादा महत्व दिया जाता और सरकार के बचाव को कम। इसके दो कारण है, पहला तो यह कि अखबारों को कमजोर के साथ दिखना चाहिये। सरकार के साथ नहीं। अखबार को छात्रों के आरोप के साथ सरकार का पक्ष छापना था या दोनों को बराबर में रखना था। छात्रों का आरोप सरकार की सफाई (या दावे) का जवाब नहीं है। इसलिए खबर तो वही है। सरकार का जवाब (या सुप्रीम कोर्ट में बयान) छात्रों के आरोप के रहते मूल खबर नहीं है। दूसरा कारण, यह है कि नीट घोटाले की सीबीआई जांच चल रही है, कई लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसलिए, यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि बड़े पैमाने पर घोटाला नहीं हुआ है। 

आप जानते हैं कि मामले की शुरुआत बिहार से हुई थी। बिहार पुलिस ने आरोप लगाया था एनटीए जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। फिर इसके तार गुजरात और महाराष्ट्र से भी जुड़े पाये गये। झारखंड से भी गिरफ्तारियां हुई हैं और तीन लोगों के ‘मास्टर माइंड’ को धर्म विशेष से जुड़ा बताया गया है और इसलिए एक यू ट्यूबर ने इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ साजिश बताया है। दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी केरल की राजनीति में पांव जमाने की कोशिश कर रहे हैं और वहां के एक कोचिंग संस्थान ने अपने जिन छात्रों को नीट में कामयाब दिखाया-बताया है वह इस यू ट्यूबर के अनुसार धर्म विशेष के लोग हैं। कई और कारणों से यह मामला इतना सीधा नहीं है और सिर्फ सरकार के कहने से बात नहीं बनती है। जो खबरें छपी हैं वे मामले को संदिग्ध बनाती हैं। कम से कम इतना तो तय है कि परीक्षा की पवित्रता भंग हुई है और सरकार किन्हीं कारणों से इसे रद्द करने के पक्ष में नहीं है। इसमें बिहार, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में चुनाव और भाजपा की स्थिति ही नहीं चुनाव जीतने के लिए किये गये उसके प्रयास और उपाय भी गौर करने लायक है।

इसके बावजूद मीडिया सरकार का समर्थन कर रहा है जबकि उसे छात्रों के साथ होना चाहिये। छात्रों के आरोप समर्थन के लायक हैं तो उनका समर्थन करना चाहिये और अगर गलत होते तो कोई कारण नहीं है कि सरकार ने उसका विरोध नहीं किया होता या अभी तक सच उजागर नहीं किया गया होता। ऐसे में जब छात्रों का आरोप दमदार लग रहा है तब मीडिया सरकार के साथ दिखाई दे रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तो आज सरकार का ही पक्ष छापा है। छात्रों का जो आरोप हिन्दुस्तान टाइम्स में सरकारी बयान पर प्रतिक्रिया की तरह छपा है और जो मूल आरोप है उसके बिना टीओआई ने सरकारी पक्ष को लीड बना दिया है। शीर्षक है, आईआईटीएम-मद्रास को नीट के नतीजों के विश्लेषण में कोई असामान्यता नहीं मिली। इंट्रो है, असमर्थित आशंकाओं के आधार पर रीटेस्ट नहीं होंगे। पर 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें अभ्यर्थी भी हैं। धर्म विशेष के लोगों पर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ साजिश का आरोप लगाने वाला वीडियो व्हाट्सऐप्प पर घूम रहा है। इसपर रोक तो छोड़िये, चर्चा तक नहीं है। बहुत संभावना है कि इस पूरे मामले का उपयोग राजनीति के लिए किया जा रहा हो या करने की योजना हो।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार एनटीए ने कहा है कि पटना में कोई लीक नहीं हुआ। दूसरी ओर, बिहार पुलिस ने एनटीए पर जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया है और सोशल मीडिया पर गिरफ्तार लोगों के संबंध तेजस्वी यादव और लालू यादव के करीबी लोगों से जोड़े जा रहे हैं। इसके बावजूद एनटीए अगर 67 छात्रों के टॉप करने पर चुप है तो ज्यादा नंबर पाने को उचित और सामान्य कह रहा है। ये सब सही भी हों तो इनकी प्रस्तुति में सरकार का समर्थन दिख रहा है क्योंकि छात्रों के आरोप को वो महत्व नहीं दिया गया है। आज यह खबर इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला में भी है। यहां भी छात्रों का पक्ष नहीं है और सिर्फ सरकारी पक्ष से यह माहौल बनाने की कोशिश हो रही है कि नीट में कुछ गड़बड़ी नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो आये, बाद की बात है। हालांकि, खबरों का दबाव अपनी जगह रहता ही है। इस लिहाज से इंडियन एक्सप्रेस में आज एक दिलचस्प खबर है। इसके अनुसार, सीबीआई जांच से पता चला है कि यूजीसी नेट (नीट नहीं) पेपर लीक का सबूत गढ़ा हुआ था। केंद्र सरकार ने इसी 19 जून को यह परीक्षा रद्द कर दी थी। एक दिन पहले ही, 18 जून को देश भर के 317 केंद्रों में नौ लाख से ज्यादा लोगों ने यह परीक्षा रद्द कर दी थी।

खबर के अनुसार शिक्षा मंत्रालय ने गृहमंत्रालय से इनपुट के आधार पर जो परीक्षा रद्द की वह हो चुकी थी और उस इनपुट अब कहा जा रहा है कि फर्जी निकला। ऐसी सरकार और ऐसी व्यवस्था में नीट के प्रश्नपत्र लीक हुए कि नहीं और हुए तो कम थे या इतने नहीं थे कि 23 लाख परीक्षार्थियों को महीने भर परेशान तो रखा जा सकता है पर दुबारा परीक्षा देने का बोझ नहीं डाला जा सकता है तो इसका एक मतलब यह भी है सरकार को परीक्षा ठीक से करा पाने का भरोसा नहीं है। सिस्टम में नकली सबूत बनाने और पेश करने वाले ही नहीं है उनपर यकीन करने वाले भी हैं जो 20 दिन बाद गलत साबित हो जाता है। जाहिर है, कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ भारी गड़बड़ है और वह सरकार चलाने की नालायकी या निकम्मापन भी हो सकती है जिसे खबरें छपवा कर और नहीं छपने देकर (या नहीं प्रसारित करके) सरकार की छवि बचाई जा रही है। संभव है, नीट मामले में सरकार इसी कारण निर्णय़ नहीं ले पा रही है और किंकर्तव्यविमूढ़ लग रही है। पहले नीट की परीक्षा रद्द नहीं की, फिर कौनसेलिंग को टाला नहीं गया। लेकिन ऐन शुरुआत वाले दिन कौनसेलिंग स्थगति कर दिया गया और आज अमर उजाला की खबर के अनुसार केंद्र सरकार ने कहा है कि कौनसेलिंग अगले हफ्ते से होगी। हलफनामा दायर कर कहा गया है कि चार चरणों में होगी कौनसेलिंग। इतने समय तक छात्रों को असमंजस में क्यों रखा – इसपर ना कोई सवाल है ना जवाब। यह जरूर कहा है कि 23 लाख छात्रों पर बोझ नहीं डाल सकते हैं। लेकिन छात्र कह रहे हैं और टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर छप चुकी है कि नीट में गड़बड़ी होती है।

अमर उजाला में एक और खबर है, एनटीए ने कहा किसी बॉक्स का ताला नहीं टूटा लेकिन सीबीआई ने झारखंड से तीन लोगों को प्रश्नपत्र लीक का मास्टर माइंड होने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इसमें एक स्कूल के प्रधानाचार्य भी हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इसपर एनटीए और अमर उजाला वैसे ही शांत हैं जैसे एनटीए पर जांच में सहयोग नहीं करने के बिहार पुलिस के आरोप पर खुद एनटीए, सीबीआई और सरकार शांत है। यह बहुत सामान्य बात है कि जिनका चयन हो गया है वो कहेंगे कि दोबारा परीक्षा कराने की जरूरत नहीं है और जिनका चयन नहीं हुआ है वो कहेंगे कि दोबारा जांच हो। पर सरकार क्या कर रही है उसका निष्पक्षता और प्रशासनिक योग्यता क्या कहती है। अखबार क्यों छात्रों के साथ नहीं हैं, पूरी बात नहीं बता रहे हैं और सरकार के समर्थन में नजर आ रहे हैं। यह प्रश्न अगर परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नहीं है तो सरकार और राजनीति के लिए है और अगर ऐसा है तो देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।    

हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया दोनों में आज मुसलिम महिला को गुजारा भत्ता का अधिकार होने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला लीड है। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका मेनटेनेबल माना है – यह भी बड़ी खबर है। द हिन्दू ने इसे लीड बनाया है। इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ में प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा की खबर है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक बताता है कि पुतिन से मिलने के बाद प्रधानमंत्री ने निर्दोष लोगों की जान का नुकसान अस्वीकार्य है को रेखांकित किया है। इससे याद आया कि आज कश्मीर में आतंकी हमले की खबर नहीं है। द टेलीग्राफ में सिंगल कॉलम की खबर है, जम्मू में पुलिस पोस्ट के पास गोलीबारी। खबर के अनुसार, कठुआ जिले के पास उधमपुर में एक पुलिस चौकी के बाहर कुछ संदिग्ध लगा तो संतरी ने गोली चलाई। किसी निर्दोष की जान जाने की खबर नहीं है। जहां तक राजनीतिक खबरों की बात है आज की सबसे दिलचस्प खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में है। दो कॉलम की फोटो के साथ चार कॉलम में अधपन्ने की बॉटम खबर है। इसके अनुसार उत्तराखंड राज्य लाइसेंसिंग विभाग द्वारा प्रतिबंधित 14 के 14 उत्पाद पतंजलि स्टोर्स में बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद से इस बात के सबूत मांगे थे कि प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री और उनका विज्ञापन बंद हो गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि मंगलवार और बुधवार को उसकी जांच में देश के चार प्रमुख शहरों – दिल्ली, लखनऊ, पटना और देहरादून के पतंजलि स्टोर्स में ये सार चीजें उपलब्ध थीं और ज्यादातर को प्राप्त किया जा सका। कुछ दुकानों में जहां सभी 14 उत्पाद नहीं थे, वहां काउंटर पर मौजूद लोगों ने बताया कि कुछ दिन में उपलब्ध होंगे। कम से कम एक दुकान में सभी 14 उत्पाद उपलब्ध थे और रसीद देकर बेचे जा रहे थे। अखबार ने पटना की उस दुकान की तस्वीर साइनबोर्ड और पते के साथ छापी है जहां प्रतिबंधित 14 में से 13 सामान उपलब्ध थे। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि देश में जो व्यवस्था है वह कैसी है और उसपर किसकी पकड़ है या नहीं है।

आप जानते हैं कि मैं रोज सात अखबारों के पहले पन्ने की खास बातें आपके लिए हिन्दी में पेश करता हूं। इनमें पांच अखबार हिन्दी में हैं और दो अंग्रेजी में। दिल्ली के अंग्रेजी के अखबारों का चुनाव उनकी लोकप्रियता (और मेरी पसंद) के आधार पर है। इनमें पांचवां, द टेलीग्राफ कोलकाता का है और मेरा पुराना पसंदीदा। मैं शुरू से पढ़ रहा हूं। अमूमन संपादक बदलने से अखबार बदल जाते हैं। टेलीग्राफ के साथ लंबे समय तक ऐसा नहीं हुआ और इसलिए मेरा प्रिय बना रहा। इधर संपादक बदलने पर हालात बदले हैं पर वह अलग मुद्दा है।  हिन्दी के अखबारों के चुनाव का आधार मेरी यह सूचना है कि यहां पेशेवर संपादक हैं और व्यावहारिक तौर पर फैसले वही लेते हैं। बेशक इनके अलावा भी अखबार देखता हूं, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहता हूं और अनुवाद ही मेरा पेशा है और खबरों से जुड़ा रहा हूं तो कई बार छपने से पहले और छपने के बाद खबरों का अनुवाद भी करता हूं। कुल मिलाकर, पेशा पत्रकारिता नहीं है पर काम खबरों का ही करता हूं।

ऐसे में मैं यह बता चुका हूं कि नीट 2024 को रद्द करने की मांग करने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई इसकी खबर मुझे नहीं लगी और यह खबर मिल गई कि एक याचिका दायर हुई है जो यह मांग कर रही है कि याचिका रद्द नहीं की जाये। आप जानते हैं कि सरकार बनने से पहले से कहती रही है कि नीट को रद्द करने की जरूरत नहीं है। इसलिए रद्द करने की मांग करने वाली याचिका को प्रचार नहीं (कम) मिला और नीट को रद्द नहीं करने की मांग करने वाली याचिका को प्रचार मिला या दिया गया। कायदे से बाद वाली याचिका (नीट रद्द नहीं करने) की जरूरत ही नहीं थी और पहले वाली दायर इसलिए की गई होगी कि लोगों को सरकार या एनटीए की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं था, जबकि जरूरत इसकी थी। जहां तक नीट को रद्द नहीं करने की बात है, जब सरकार ऐसा नहीं करना चाहती है तो कौन नीट को रद्द कर देगा और सुप्रीम कोर्ट के संभावित फैसले के मद्देनजर दूसरी याचिका सरकार का पक्ष प्रचार तो कर ही रही थी। इसे खबर बनाकर भी किया गया।

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