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तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से 11 सैनिक शहीद, इनमें एक कैप्टन भी

अनुच्छेद 370 के तहत विशेष राज्य का दर्जा हटाए जाने के बाद से कश्मीर में 2021 से अब तक अकेले जम्मू संभाग में 52 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों के लिए एक शीर्षक यह भी हो सकता था। पर मुझे कहीं नहीं दिखा। आपको दिखा हो तो बताइयेगा। आज के सभी अखबारो में कैप्टन समेत चार जवानों के शहीद होने की खबर लीड है। यह डोडा का मामला है और सोमवार रात हुए हमले में ये लोग पहले घायल हुए थे पर इन्हें बचाया नहीं जा सका। टाइम्स ऑफ इंडिया में कल यह खबर सिंगल कॉलम में थी और उसमें इन लोगों को घायल बताया गया था। कल मैंने यहां लिखा था कि खबर देर से आई होगी इसलिए दूसरे अखबारों में नहीं है। आज यह पुरानी खबर सभी अखबारों में लीड है पर बहुत कम में यह बताया गया है कि कश्मीर में आतंकी वारदातें बढ़ गई हैं। क्यों बढ़ी हैं इसकी चर्चा इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और द टेलीग्राफ में है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में ऐसा कुछ पहले पन्ने पर नहीं है। यहां गौर करने वाली बात है कि बिहार में विपक्ष के नेता के पिता की हत्या हो गई है। नवोदय टाइम्स के साथ कई और अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर है। द हिन्दू में सेकेंड लीड है।

खबरों के अनुसार विकासशील इनसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश सहनी के पिता जीतन सहनी की बिहार के दरभंगा जिला स्थित उनके पैतृक आवास पर चाकू मारकर हत्या कर दी गई। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खराब कानून व्यवस्था और खुफिया जानकारी नहीं मिलने या मिलने पर भी आवश्यक व्यवस्था नहीं किये जा सकने का ही नतीजा है। डोडा की खबर पुरानी है। इस लिहाज से आज यह खबर भी लीड हो सकती थी। इससे देश को पता चलता कि नरेन्द्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से देश को क्या नफा-नुकसान हुआ है। जाहिर है, पाठकों को भी पता चलता कि तीसरी बार मोदी सरकार बनने और उनकी डबल इंजन की सरकार होने से भी ना तो आतंकवाद पर नियंत्रण हुआ है और ना ही डबल इंजन वाले राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक है। विपक्ष के शासन को ‘जंगल राज’ कहने वालों को बताया जाना चाहिये था कि राम राज्य में नोटबंदी से लेकर तमाम उपायों और दावों के बावजूद ना आतंकवाद पर नियंत्रण हुआ है और ना कानून व्यवस्था की स्थिति काबू में है। अखबारों का काम यही है। पर वह अलग मुद्दा है। 

डोडा की घटना पर इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार आतंकवादी वारदातों में वृद्धि का कारण सैनिकों के साथ खुफिया नेटवर्क में कमी है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि सेना का परिचालन जमीन पर चुनौतियों के नये समूह के कारण है। द टेलीग्राफ की खबर कहती है कि इस क्षेत्र में खुफिया जानकारी न होना प्रमुख कमी है। अब इसके लिए 56 ईंची सरकार कितनी जिम्मेदार है और ना खाउंगा ना खाने दूंगा तथा नोटबंदी का क्या फायदा हुआ यह समझना जानना आपका काम है। वैसे तो 2019 में ही नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान को घुस कर मारने का दावा किया था और जीतकर पांच साल सत्ता में रहे भी। जो किया-नहीं किया उसके बावजूद तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गये हैं पर अखबारों को खबरें छापने या उनका कमजोरी दिखाने में शर्म आती है। उदाहरण के लिए, अखबारों ने यह तो लिखा है कि आतंकवादी वारदातें बढ़ गई हैं पर यह नहीं बताया है कि इसकी शुरुआत शपथग्रहण वाले दिन से ही हो गई थी। अब तक कितनी हुई हैं और कितने जवान शहीद हुए हैं यह विवरण नवोदय टाइम्स में है।

इसके अनुसार दो माह में 12 जवान शहीद हुए हैं। इनमें एक मामला 4 मई का है। इसमें एक वायुसेना कर्मी शहीद हुआ था। बाकी वारदात 11/12 जून से शुरू होते हैं। 04 जून को लोकसभा चुनाव में सीटें कम होने के बावजूद नरेन्द्र मोदी ने 9 जून को तीसरी बार शपथ ली थी। ऐसे में इस सूचना का शीर्षक, नरेन्द्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से 11 जवान शहीद हुए – भी हो सकता था और यह तथ्य है। 11/12 जून से 15 जुलाई तक एक महीना ही कहा जायेगा और इस एक महीने में 11 जवान शहीद भी लिखा जा सकता था पर दो महीने में 12 लिखकर क्या बताया जा रहा है आप समझ सकते हैं। द टेलीग्राफ में नई दिल्ली डेटलाइन से इमरान अहमद सिद्दीकी (गूगल अनुवाद संपादित) ने लिखा है, “कार्रवाई योग्य मानव खुफिया जानकारी” की कमी और चीन का मुकाबला करने के लिए पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनाती के लिए जम्मू से सेना की कंपनियों की वापसी के कारण जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी हमलों की बाढ़ आ गई है। सुरक्षा प्रतिष्ठान के अधिकारियों ने यह जानकारी दी है।

370 हटने के बाद से 52 शहीद

केंद्रीय गृह मंत्रालय से जुड़े एक सुरक्षा अधिकारी ने द टेलीग्राफ को बताया, “जम्मू में आतंकवादी हमलों में अचानक वृद्धि स्पष्ट रूप से पूरी तरह से खुफिया विफलता का संकेत देती है। इसके अलावा, इस क्षेत्र में सेना की कम तैनाती को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है क्योंकि मई 2020 में सीमा पर भिड़ंत के बाद से कई कंपनियों को पूर्वी लद्दाख में चीन सीमा पर तैनात करने के लिए वापस बुलाया लिया गया था।” इस रीलोकेशन ने जम्मू के प्रमुख क्षेत्रों को बेहद असुरक्षित बना दिया है।” कश्मीर में अगर पत्रकार रहते औऱ कायदे से रिपोर्टिंग हो रही होती तो यह कोई नई बात नहीं होती और पहले छपी होती तथा अचानक आतंकवादी वारदातें बढ़ने का कारण सबको पता होता या समझ में आता। जम्मू क्षेत्र में 10 जिले हैं और 2021 तक दो दशकों से अधिक समय से यह अपेक्षाकृत आतंक-मुक्त था। आतंकवादी हमलों में वृद्धि को केंद्र के सामान्य स्थिति तथा जम्मू और कश्मीर में “सब कुछ ठीक-ठाक” होने के दावे के लिए एक झटके के रूप में देखा जा रहा है। अनुच्छेद 370 के तहत विशेष राज्य का दर्जा हटाए जाने के बाद से कश्मीर में 2021 से अब तक अकेले जम्मू संभाग में 52 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं। खुफिया ब्यूरो के एक पूर्व प्रमुख ने इस अखबार को बताया कि सेना पर बार-बार हो रहे हमलों के बावजूद, अधिकारी आवश्यक कदम उठाने में विफल रहे हैं क्योंकि आतंकवादियों ने अपना अभियान कश्मीर से जम्मू स्थानांतरित कर दिया है, जहां “उग्रवाद विरोधी उपाय पर्याप्त नहीं हैं”।

राजनीतिक रणनीतिक कमजोरी?

आप समझ सकते हैं कि जम्मू क्षेत्र में आतंकी वारदात बढ़ने का कारण राजनीतिक और रणनीतिक है। कार्रवाई योग्य खुफिया सूचना नहीं होना तीसरी बड़ी कमजोरी है। ऐसे में अमर उजाला की खबरें सरकार से सवाल नहीं करतीं, उसका सच भी नहीं बतातीं लेकिन देश भक्ति की भावना का विकास करने में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। कुछ शीर्षक हैं, 1) ऐसा है कैप्टन थापा की मां का साहस…. बेटे को सीमा पर नहीं भेजेंगे, तो देश के लिए कौन लड़ेगा। 2) पिता बोले बेटे की शहादत पर गर्व 3) बलिदानियों में …. सिपाही बिजेन्द्र व अजय राजस्थान के लाल। 4) घात लगाकर हमला … कश्मीर टाइगर्स ने ली जिम्मेदारी और 5) देर रात डोडा के जंगल में फिर मुठभेड़ शुरू। टाइम्स ऑफ इंडिया तथा अमर उजाला में एक और खास खबर पहले पन्ने पर है। टाइम्स का शीर्षक है, “मालीवाल पर ‘हमले’ के मामले में बिभव के खिलाफ चार्जशीट में 50 गवाह हैं”। दूसरा शीर्षक है, “मालीवाल से मारपीट में बिभव के खिलाफ 500 पेज का आरोपपत्र”।

बिभव को भी जमानत नहीं

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार की दिलचस्पी के बगैर ऐसे मामलों में एफआईआर भी नहीं होती। यह मामला इतना बड़ा हो ही नहीं सकता था और अगर है तो क्यों है, समझना मुश्किल नहीं है पर वह मुद्दा नहीं है। एक तरफ सैनिकों के मारे जाने की कहानी है तो दूसरी ओर आम आदमी पार्टी की नेता तथा राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल का मुख्यमंत्री के घर बिना पूर्व समय लिये जाने का मामला और उसमें उनके साथ कथित रूप से मारपीट किये जाने की शिकायत का मामला है जिसमें उन्हें खरोंच आ गई थी। इसके लिए मुख्यमंत्री के सहायक बिभव की गिरफ्तारी मई के मध्य में हुई थी और सिर्फ खरोंच आने पर उनके खिलाफ न सिर्फ हत्या की कोशिश का मामला है बल्कि गैर इरादतन हत्या का मामला भी है। मुख्यमंत्री अलग मामले में खुद जेल में हैं और यह मामला चुनाव प्रचार के लिए जमानत मिलने का शुल्क जैसा हो गया है। इसमें उनके सहायक दो महीने से जेल में हैं और कई सहयोगी इमरजेंसी के बराबर अवधि तक जेल में रहने का रिकार्ड बनाने जा रहे हैं। अघोषित इमरजेंसी में उन्हें जमानत नहीं मिली है। पुलिस ने 500 पेज की चार्जशीट दायर की है जिसमें गैर इरादतन हत्या की कोशिश का मामला भी है।

वैक्सीन मैत्री का प्रचार और टीके का सच

अमर उजाला में पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है। नवोदय टाइम्स में विज्ञापन उससे कम है और ऐसे में जो खबरें नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर हैं उनमें चिन्ताजनक बताकर छापी गई एक खबर है, देश में 16 लाख बच्चों को नहीं मिली टीके की एक भी खुराक। इसका फ्लैग शीर्षक है, यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में नाईजीरिया के बाद भारत दूसरे स्थान पर है। एक और खबर का शीर्षक है, खसरा टीके में भी पिछड़े। खबर के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन की क्षेत्रीय निदेशक, साइमा वाजेद ने कहा है, किसी भी बच्चे को ऐसी किसी भी जानलेवा या घातक बीमारी की चपेट में नहीं आना चाहिये जब उनके बचने के लिए सुरक्षित और प्रभावी टीके मौजूद हैं। आपको याद होगा, कोविड के समय सरकार ने वैक्सीन मैत्री का प्रचार किया था। असल में, भारत सरकार ने दुनिया भर के देशों को कोविड-19 टीके उपलब्ध कराने के लिए एक मानवीय पहल शुरू की थी। सरकार ने 20 जनवरी 2021 से टीके उपलब्ध कराना शुरू किया। 21 तक फरवरी 2022 तक, भारत ने 96 देशों को टीकों की लगभग 16.29 करोड़ (162.9 मिलियन) खुराकें वितरित की थीं। इसके बाद पता चल रहा है कि भारत में ही बच्चों को टीके नहीं लगे हैं। संभव है ये बाद में पैदा हुए हों। पर खबर तो खबर है। आप समझ सकते हैं कि सरकारी सुविधा को रेवड़ी कहकर मुफ्त अनाज को कितनी बड़ी चीज बनाया गया है और टीके इतने बच्चे वंचित नहीं रहते।

योगी के खिलाफ चालें

एक खबर का शीर्षक है, लोकसभा में हार के बाद यूपी भाजपा में सबकुछ ठीक नहीं। उपशीर्षक है, डिप्टी से खुश नहीं केशव, चाह रहे हैं उत्तर प्रदेश की कप्तानी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भाजपा की अपनी राजनीति है और तमाम पुराने पर मजबूत नेताओं को विधिवत किनारे लगाया जा चुका है और अब योगी की बारी है। यह बहुत पहले से सबको पता है। चुनाव प्रचार के लिए जमानत पर छूटे अरविन्द केजरीवाल ने भी कहा था कि नरेन्द्र मोदी चुनाव जीत गये तो योगी की बारी है। इस खबर को इसी आलोक में देखना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार रोहिणी सिंह ने कल देर रात एक्स पर लिखा है, नोएडा के एक विशेष बंगले में लगातार बैठकें चल रही हैं, हर महत्वपूर्ण व्यक्ति तक यह संदेश पहुँचाया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ अब बस कुछ दिन के मेहमान हैं।

यही नहीं, इसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के लिए एक पीआर एजेंसी भी हायर की गई है, कुछ जाने माने बिल्डर्स बाक़ायदा इस कार्यक्रम की फंडिंग कर रहे हैं। उत्तरप्रदेश जहां अपराध चरम पर है, बेरोजगारी से युवा त्रस्त हैं वहां ऐसी हाई टेंशन नौटंकी चल रही है। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक अपनी अपनी स्क्रिप्ट लिख रहा है और जनता को बिना टिकट यह तमाशा देखना पड़ रहा है।

भविष्य में ब्लैकमेल की जा सकने वाली टीम

इसके अलावा आज की कुछ खबरें ऐसी हैं जो बताती हैं कि व्यवस्था ऐसी हो गई लगती है जिसमें आगे बढ़ने वालों में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें कभी भी किसी भी मामले में फंसाया जा सकता है या फंसाकर ब्लैकमेल किया जा सकता है। नरेन्द्र मोदी की सरकार में लोगों को ब्लैकमेल करने के कई किस्से सामने आये। नीट 2024 मामले में परीक्षा रद्द नहीं हुई है और कहा गया है कि बाद में जब कभी पता चलेगा कि किसी ने गड़बड़ी का लाभ उठाया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। पहले भी घपलों की जानकारी मिलने पर कार्रवाई होती रही है और यह स्पष्ट है कि कुछ लोगों को बचा लिया गया है या बचा लिया जाता रहा है। इस बार नीट के मामले में शिक्षा मंत्री शुरू से कह रहे हैं कि प्रश्नपत्र लीक नहीं हुआ है लेकिन इस मामले में गिरफ्तार लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आज एनटीके ट्रंक से प्रश्नपत्र चुराने वाले की गिरफ्तारी की खबर है। दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। एक ने चोरी की दूसरे ने सहयोग किया। पर परीक्षा रद्द नहीं होगी तो सैकड़ों लोगों पर कार्रवाई की तलवार लटकती रहेगी। सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी इन्हें समय पर ब्लैक मेल कर सकेगी। इसका मतलब यह नहीं है कि अभी नहीं किया जा रहा होगा पर वह अलग मुद्दा है।

पूजा खेदकर ने इतने ‘अपराध’ कर कैसे लिये  

आज की दूसरी प्रमुख खबर विवादास्पद आईएएस प्रोबेशनर पूजा खेदकर को वापस मसूरी ऐकेडमी भेजे जाने की है।  पूजा पर अपने अधिकारों और विशेषाधिकारों के दुरुपयोग का मामला है। वह इस समय महाराष्ट्र के वाशिम में प्रशिक्षण पर थी उसे ठंडे बस्ते में रख दिया गया है। उसपर फर्जी विकलांगता सर्टिफिकेट के साथ ओबीसी सर्टिफिकेट देने के भी आरोप हैं। जब प्रशिक्षु  आईएस अफसर ने अपनी गाड़ी पर लाल बत्ती लगा ली (जो ओबीसी के लिए अभी भी देश में मुश्किल ही है और ऊंची जाति के नेताओं के बिगड़ैलों के लिए बेहद आसान) तो पुराने मामले भी निकल कर आने लगे जिसमें पिछले साल का एक वीडियो क्लिप भी है जिसमें उसकी मां किसी किसान को आग्नेयास्त्र से धमका रही हैं। मेरा मानना है कि पूजा के खिलाफ मामले सही भी हों तो वे अकेली नहीं हैं और कार्रवाई उसी के खिलाफ होती है जिसे सरकार चुनती है। संबंधित व्यक्ति पिछड़ी जाति का हो तो कोई बात ही नहीं है और न हो तो उसके प्रमाणपत्र और दुरुपयोग के मामले सामने आते हैं जिसका वास्तविक लाभ पिछड़ी जाति के लोगों को नहीं होता है और व्यवस्था ऐसे ही चल रही है. जमाने से। पूजा का सारा मामल तो उसी अवधि का है जब भ्रष्ाचार दूर होने थे, नामुमकिन मुमकिन होने थे। पकड़ा अब गया जब मनमानी की छूट कम हुई।

नीति आयोग में भाजपाई वंशवाद का पौधा

अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक और खबर है, नीति आयोग में शिवराज, नड्डा और चिराग शामिल। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वंशवाद के विरोधी है। आधा नेहरू-गांधी परिवार उनके साथ है फिर भी वे नेहरू-गांधी को कोसते हैं और आधा वंश चुपचाप सहता है या कम से कम विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाता है। ऐसे वंशवाद विरोधी नरेन्द्र मोदी ने अपने समय के ‘मशहूर मौसम विज्ञानी’ राम विलास पासवान के बेटे और नीतिश नायडू डिपेंडेंट अलायंस कहे जाने वाले राजग के सहयोगी, चिराग को नीति आयोग में शामिल किया है। आप जानते हैं कि नीति आयोग पुराना योजना आयोग है और पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष कैबिनट मंत्री के बराबर होते थे। आज इसके पुनर्गठन की खबर के साथ ढूंढ़ने पर पता चला कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसके अध्यक्ष हैं। उपाध्यक्ष श्री सुमन बेरी हैं जो एक मई 2022 से इस पद पर हैं। नीति आयोग का हिन्दी की नीति से संबंध अज्ञात है और असल में यह नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) है और हिन्दी में इसे इसी निति लिखा जाना चाहिए। पर वह भी अलग मुद्दा है।

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