
संजय कुमार सिंह-
‘सबका साथ, सबका विकास’ के बावजूद रहीम अली जैसों के लिए ना कानून है, ना खबर और ना गिनती
आज के अखबारों में ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे की पोल खोलने वाली कई खबरें हैं। वैसे तो यह नारा भाजपा की नीतियों और कार्यशैली को ढंकने की कोशिश ही है। आग लगाने वाले अगर कपड़ों से पहचाने जा सकते हैं तो कपड़े देखकर कार्रवाई होगी (बुलडोजर चलेंगे) उसमें न्याय कहां है? पर आज मुद्दा वह नहीं है। मैं जानता हूं कि बुलडोजर न्याय जब जनता को पसंद है तो मेरे लिखने से क्या होगा। मुझे तो खबरें बतानी हैं और इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर असम के नलबरी डेटलाइन से है। यह बताती है कि सुप्रीम कोर्ट ने गये हफ्ते रहीम अली को नागरिक घोषित किया पर वह विदेशी करार दिये जाने का ‘तगमा’ लिये, दो साल पहले ही मर चुका है। पुलिस ने जब उसे अवैध (नागरिक) या विदेशी घुसपैठिया करार दिया तो असम के इस नागरिक के परिवार के लोग वर्षों अदालत से लेकर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के चक्कर लगाते रहे और न्याय की आस में भटकते रहे। अंततः सुप्रीम कोर्ट से न्याय तो मिला पर उसके निधन के दो साल बाद। कहने की जरूरत नहीं है कि विदेशी करार दिये जाने के बाद वह जिस डर में रहता था वह उसकी मृत्यु तक साथ रहा।
‘सबका साथ, सबका विकास’ से संबंधित दूसरी खबर पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष सुवेन्दु अधिकारी की है। उन्होंने कहा है, सबका साथ सबका विकास बंद करो। इसपर विचार किये जाने की जरूरत है। इसकी जगह उन्होंने, ‘जो हमारे साथ, हम उनके साथ का नारा दिया है’। जो भी हो, यह चुनाव जीतने वाली पार्टी का नारा नहीं हो सकता है। लेकिन इसका मतलब है कि भाजपा को वापस अपने हिन्दू-मुसलमान में फायदा दिख रहा है और ऐसा कहना अब उसकी मजबूरी है। हिन्दू मुसलमान का सच हम जानते हैं कि यह देश में अघोषित इमरजेंसी जैसी स्थिति है और न सिर्फ विपक्षी नेताओं बल्कि छोटे बड़े हर तरह के विरोधी को परेशान और नियंत्रित करने के हर संभव उपाय किये गये हैं। इसमें चुनाव के समय लेवल प्लेइंग फील्ड की जरूरत नहीं समझना औऱ खुलकर झूठ बोलना, चुनाव आयोग की बेशर्म चुप्पी और फिर ईवीएम जिन्दा है या मर गया जैसे कटाक्ष शामिल हैं। पर वह सब मेरा मुद्दा नहीं है।
मेरा मुद्दा यह है कि अरविन्द केजरीवाल की घोषणा के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के खिलाफ पार्टी के प्रयास जारी हैं ताकि उन्हें सत्ता से हटाया जा सके। ऐसा इस तथ्य के बावजूद है कि योगी आदित्य नाथ हिन्दू मुसलमान करने में भाजपा के दूसरे नेताओं और नरेन्द्र मोदी से बहुत आगे हैं। इंडियन एक्सप्रेस में ही आज एक खबर है, उत्तर प्रदेश में शोर बढ़ा तो प्रदेश इकाई के प्रमुख ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की। उधर, योगी आदित्यनाथ की राज्यपाल से शिष्टाचार भेंट की भी खबर है। इन सबके बीच उच्च प्रदेश में कांवड़ यात्रा की तैयारी चल रही है और इसके लिए मुजफ्फरनगर के एसएसपी ने आदेश दिया है कि यात्रा मार्ग में खाने-पीने की चीजें बेचने वाली दुकानों, ठेलों और रेस्त्रां आदि में उनके मालिकों या स्वत्वाधिकारी के नाम प्रदर्शित करने के लिए कहा गया है। इसका मकसद यात्रियों में किसी तरह के भ्रम से बचना है। भले इसका मतलब यह भी हो कि यात्रियों को धर्म के आधार पर भेद-भाव करने की छूट रहेगी। भले यह धार्मिक कारणों से हो पर तथ्य यही है कि सड़क पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है लेकिन कांवड यात्रा के लिए ऐसी तैयारी की जा रही है। सड़क पर यातायात बंद रहेगा वह अपनी जगह है ही। फिर भी मुद्दा और खबर यह है कि हिन्दुओं की सरकार, योगी आदित्यनाथ को हटाने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक पुलिस बल
द टेलीग्राफ में योगी आदित्यनाथ को अस्थिर करने की कोशिशों की खबर लीड है लेकिन सिंगल कॉलम की खबर बताती है कि जम्मू और कश्मीर पुलिस के एडीजीपी लॉ एंड ऑर्डर विजय कुमार ने कहा है कि राज्य की पुलिस अराजनैतिक और निष्पक्ष है। अखबार ने बताया है कि विजय कुमार ने बुधवार को अपने बल को मुहर्रम के जुलूस में शामिल लोगों को पेय मुहैया कराने के काम में लगाया था। पुलिस ने इसके लिए अपना स्टॉल लगाया था। उन्होंने कहा कि यह अच्छा काम है, किया जाना चाहिये तथा इसमें पुलिस की भूमिका है। इस खबर की शुरुआत इस सूचना से हुई है कि राजनेताओं के खिलाफ जम्मू और कश्मीर पुलिस के डीजी रश्मिरंजन स्वैन के अभियान को अंदर से ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उनके डिप्टी ने पुलिस को अराजनैतिक कहा है। आप जानते हैं कि राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद इसे दो केंद्र शासित प्रेशों में बाट दिया गया था। राज्य में चुनाव नहीं हुए हैं और सरकार उपराज्यपाल के भरोसे चलती है। यहां पुलिस मुहर्रम की यात्रा में भाग लेने वालों की सेवा कर रही है जबकि उत्तर प्रदेश में पुलिस कांवड़ यात्री की सेवा में लगी हुई है। यही नहीं, सरकार अगर कश्मीर में आतंकी वारदात नहीं रोक पा रही है (इसका कारण मैंने कल यहीं लिखा था) तो माओवादियों से मुठभेड़ और उनकी हत्या के मामले भी निर्बाध जारी हैं। इंडियन एक्सप्रेस में आज महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में 12 माओवादियों को मुठभेड़ में मार दिये जाने की भी खबर है।
पुलिस ऐसे काम करती रही है
इन और ऐसी खबरों के बीच आज यह बताना बनता है कि नागरिक रहीम अली का मामला कई कारणों से 1994 के इसरो जासूसी कांड से मिलता जुलता है। हालांकि, असम में किसी को विदेशी करार देना ज्यादा आम है। जहां तक इसरो जासूसी कांड की बात है, यह मामला कथित तौर पर भारत में मालदीव की एक महिला को अवैध रूप से हिरासत में रखने और इसे उचित ठहराने के लिए रचा गया था। यह केरल पुलिस के तत्कालीन विशेष शाखा अधिकारी की कार्रवाई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक नंबी नारायणन को झूठा फंसाया गया। बाद में सीबीआई की जांच में इसका खुलासा हुआ तो केरल सरकार ने उन्हें 1.3 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया। भारत सरकार ने 2019 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया पर उन्हें फंसाने वाले संबंधित पुलिस अफसरों को सजा का मामला टलता रहा। बहुत बाद में इस मामले में दो पूर्व डीजीपी, केरल के सीबी मैथ्यूज और गुजरात के आरबी श्रीकुमार तथा तीन अन्य रिटायर पुलिस अफसरों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया है।
सीएए का हाल और जरूरत
आप जानते हैं, मैंने यहां लिखा भी था, दो दिन पहले खबर थी, असम सरकार ने अपनी सीमा पुलिस इकाई से कहा है कि वह 2015 से पहले राज्य में प्रवेश करने वाले गैर-मुस्लिम प्रवासियों के मामलों को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में न भेजें। उन्हें सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने की सलाह दें। जागरण डॉट कॉम की एक खबर के अनुसार, विशेष पुलिस महानिदेशक (सीमा) को लिखे एक पत्र में, गृह और राजनीतिक सचिव पार्थ प्रतिम मजूमदार ने सीएए का उल्लेख करते हुए कहा कि वे सभी गैर-मुस्लिम अप्रवासी, जो अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 2014 तक भारत में प्रवेश कर चुके हैं, भारतीय नागरिकता दिए जाने के पात्र हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह रहीम अली जैसों के लिए नहीं है। उनकी खबर आज किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं है। उन्हें मृत्यु के तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट से ‘न्याय’ मिला। हिंसा, अपराध और आतंकवाद के तमाम मामलों में ऊपरी अदालत में अपील नहीं की जाती है और अपराधी कथित क्लीन चिट पा जाते हैं।
मरने वाले पुल से कूद गये थे!
हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर है, लिंचिंग का आरोप पत्र कहता है, पीड़ित पुल से कूद गये। पशुधन लेकर जा रहे तीन मुस्लिम युवकों को एक पुल के नीचे मृत पाने के महीने भर बाद दाखिल पुलिस चार्जशीट में कहा गया है कि इनकी मौत पुल से कूदने के कारण लगे जख्मों से हुई थी। कहा गया है कि 54 किलोमीटर तक पीछा किये जाने से डरकर वे नदी में कूद गये थे। इनके वकील ने कहा है कि इन्हें पीट कर मार दिया गया। दरअसल इन तीनों ने अपने मित्रों और रिश्तेदारों को फोन करके कहा था कि एक भीड़ उनका पीछा कर रही है। द हिन्दू ने इस खबर को इसी शीर्षक से छापा है और सेकेंड लीड बनाया है, पशुधन के परिवहन संचालक पुल से कूद गये थे उनके साथ हिन्सा नहीं हुई।
कश्मीर में आतंकवादी हरकतें
इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार डोडा हमले की कहानी यह है कि जैश के संदिग्धों ने छह महीने पहले घुसपैठ कर ली थी और जम्मू में ठहरे। इससे संबंधित द हिन्दू की खबर है, आतंकी हमलों में वृद्धि की खबरों के बीच पाया गया है क 12 आतंकवादी समूह जम्मू क्षेत्र में सक्रिय हैं।
चरणरज लेकर जाने के लिए कहने वाले बाबा
हाथरस में सत्संग के लिए इकट्ठा लोगों से चरणरज लेकर जाने के लिए कहने और इससे मची भगदड़ में 121 लोगों की मौत के बाद संबंधित बाबा ने कहा है, जो होना है, होकर रहेगा। हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज इसे तीन कॉलम में बॉटम लगाया है और यह खबर नवोदय टाइम्स में भी है। यह बात उन्होंने एक वीडियो में कही है जो घटना के बाद की है और अब सामने आई है। अभी तक पुलिस ने इन्हें आरोपी नीं बनाया है।
उपचुनाव की तैयारी
अमर उजाला में उत्तर प्रदेश भाजपा या मुख्यमंत्री योगी नाथ की विधानसभा उपचुनाव की तैयारियों का विवरण और प्रचार है। इसके अनुसार, 10 सीटों के लिए 30 मंत्री तैनात किये गये हैं।
नीट का मामला
नीट का मामला धीरे-धीर ठंडा पड़ जायेगा। उससे पहले आज द हिन्दू में खबर है, आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों ने नीट यूजी 2024 के नतीजों में कुछ असामान्य नहीं के आईआईटी मद्रास के दावे पर सवाल उठाये हैं। आप जानते हैं कि परीक्षा रद्द नहीं करने के समर्थन में इस रिपोर्ट का हवाला दिया गया था और तभी से इसपर सवाल है। अब इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी है।
अदालतों से न्याय
दूसरी ओर नागरिकता जैसे मामले में निचली अदालतों (व्यवस्था) से न्याय नहीं मिलता और सुप्रीम कोर्ट से जब न्याय मिलता है तो देरी हो चुकी होती है। और ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ कथित विदेशियों के लिए है, हिन्दुओं, जैनियों के लिए भी है। हम मनीष सिसोदिया, सत्येन्द्र जैन के मामले जानते हैं। पीएमएलए जानते हैं। उसके प्रावधानों में संशोधन और उसपर पुनर्विचार याचिका का हश्र और सरकार का रुख जानते हैं पर वह सब अभी मुद्दा नहीं है। अभी मुद्दा सिर्फ इतना सा है कि रहीम अली न्याय तो छोड़िये उसकी खबर भी दो साल बाद छपी – यह नहीं छपी (या हीं छपी भी हो तो व्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ा) कि वह न्याय का इंतजार करता हुआ इस दुनिया से चला गया। अरविन्द केजरीवाल के मामले में जमानत रुकवाने के लिए हाईकोर्ट में ईडी ने जिस जल्दबाजी में अपील की और उनकी जमानत पर स्टे हो गया। इससे बहुत पुराने मामले में दिल्ली के उपराज्यपाल को स्टे मिला हुआ है (सुनवाई नहीं हो रही है) क्योंकि वे संवैधानिक पद पर हैं और बात सिर्फ संवैधानिक पद पर नहीं हैं। भाजपा समर्थकों के खिलाफ मामलों पर सुनवाई वर्षों चलती रहती है और विरोधियों को जमानत मिल जाये तो स्पेशल ट्रीटमेंट हो जाता है। सरकार समर्थक मीडिया भी (और पत्रकार) भी उसके खिलाफ खबर करते हैं। ट्रोल तो जज पर टिप्पणी भी करते हैं। इन सबके बावजूद अरविन्द केजरीवाल ने अदालत से कहा है कि सीबीआई मामले में उनकी गिरफ्तारी रिहाई को बाधित करने के लिए है। हाईकोर्ट ने केजरीवाल की जमानत की अर्जी पर सुनवाई कर आदेश सुरक्षित रख लिया है। सीबीआई ने केजरीवाल के इस आरोप से इनकार किया है


