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मोदी के PM बनने के बाद भारत में इन अवैध मामलों की रिपोर्टिंग में मारे गए 28 पत्रकार!

रेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में मारे गए 28 पत्रकारों में लगभग आधे पत्रकार पर्यावरण से जुड़ी रिपोर्टिंग पर काम कर रहे थे. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि पत्रकारों की सुरक्षा और उनके खिलाफ हिंसा के अपराधों के लिए सजा, मोदी के तीसरे कार्यकाल के केंद्र में होना चाहिए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि, “2014 के बाद से 28 पत्रकारों में 13 पत्रकार पर्यावरण से रिलेटेड विषयों पर काम कर रहे थे. जिनमें अवैध कब्जा, व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अवैध खनन इत्यादि शामिल है. भारत के तथाकथित रेत माफिया एक संगठित क्राइम नेटवर्क के रूप में काम करता है. इसकी रिपोर्टिंग करने पर पत्रकारों की हत्या तक कर दी गई. ये माफिया अक्सर राजनेताओं द्वारा संरक्षित होते हैं जो बेखौफ होकर पत्रकारों को चुप कराने के लिए तत्पर रहते हैं.”

आरएसएफ की साउथ एशिया हेड सेलिया मर्सिएर कहती हैं कि, “यह देखना बेहद चिंताजनक कि पिछले दस वर्षों में मारे गए पत्रकारों में से आधे पर्यावरणीय मुद्दों की जांच कर रहे थे, जो अक्सर आपराधिक समूहों, माफियाओं की गतिविधियों से जुड़े होते हैं. ये माफिया स्थानीय अधिकारियों से सांठगांठ बनाए रखते हैं और अपराधों के लिए पूरी छूट का लाभ उठाते हैं. यह भयावह है. मारे गए पत्रकारों और हत्या के प्रयासों के शिकार लोगों के मामलों की गहन और स्वतंत्र जांच तत्काल की जानी चाहिए.”

रेत माफियाओं या खनन में शामिल अन्य नेटवर्क द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की जांच करने वाले पत्रकार पिछले दस वर्षों के दौरान अक्सर हिंसक बदले का शिकार हुए हैं. साल 2015 में फ्रीलांसर जगेंद्र सिंह, जिनकी पुलिस छापे के दौरान गंभीर रूप से जलने से मौत हो गई थी. जगेंद्र यूपी के एक बड़े सत्ताधारी नेता से जुड़े अवैध रेत खनन मामलों की रिपोर्टिंग कर रहे थे.

वर्ष 2016 में जनसंदेश टाइम्स के रिपोर्टर करूण मिश्रा की यूपी में हत्या कर दी गई थी. रंजन राजदेव की बिहार में हत्या कर दी गई. इन दोनों पत्रकारों की गोली मारकर हत्या की गई थी. मध्य प्रदेश में स्थानीय टीवी चैनल न्यूज वर्ल्ड के रिपोर्टर संदीप शर्मा की हत्या कर दी गई थी. रेत माफियाओं से जुड़ी रिपोर्टिंग का शिकार संदीप को मार्च 2018 में डंपर से कुचल दिया गया था.

मोदी के दूसरे कार्यकाल (2019) में नहीं रुकी पत्रकारों की हत्या
जून 2020 में कंपू मेल के स्थानीय रिपोर्टर शुभम मणि त्रिपाठी की यूपी के उन्नाव में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. साल 2022 में बिहार में स्वतंत्र पत्रकार सुभाष कुमार महतो को घर के बाहर चार हमलावरों ने सिर पर गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था. महतो रेत माफियाओं के खिलाफ लिख रहे थे.

महाराष्ट्र में खोजी पत्रकार शशिकांत वारिश को 6 फरवरी 2023 को एसयूवी से कुचल दिया गया था. वारिश एक भूमि पर अवैध कब्जे की रिपोर्टिंग कर रहे थे.

2014 के बाद पत्रकारिता के सिलसिले में जिन 15 पत्रकारों की हत्या की गई, उन्हें भ्रष्टाचार, संगठित अपराध, चुनाव और माओवादी विद्रोह से जुड़ी खबरों पर काम करने के लिए निशाना बनाया गया था. 28 पीड़ितों में से एक महिला पत्रकार थी. जिनका नाम गौरी लंकेश था. उन्होंने दुष्प्रचार पर रिपोर्टिंग की थी.

सत्ताधारी पार्टी से जुड़े धुर दक्षिणपंथी नेटवर्क द्वारा बेहद हिंसक ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होने के बाद सितंबर 2017 में हिंदु दक्षिणपंथी सदस्यों द्वारा बेंगलुरु में गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के 2023 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में से 161वें स्थान पर है.

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