
संजय कुमार सिंह-
तीन लाख पर टैक्स मतलब (स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद) 25,000 रुपये महीने पर टैक्स। स्टैंडर्ड डिडक्शन ऑफिस जाने-आने जैसे उन खर्चों पर मिलता है जो नौकरी करने या यह धनराशि कमाने के लिए जरूरी है। उसके बाद 25,000 रुपये महीने का मतलब रोज एक हजार रुपये भी नहीं है। मकान किराया भत्ता या कर्ज और ईएमआई सबको टैक्स मुक्त और आय से पूरी तरह अलग मान लेंगें तब भी आठ सौ रुपये में पति-पत्नी और दो बच्चों का परिवार क्या खायेगा, क्या स्वास्थ्य देखेगा और बचत करेगा उसका हिसाब देख लीजिये। अब रोज के जरूरी खर्चे (न्यूनतम) देख लीजिये…
- एक लीटर दूध 55 रुपये का
- पूजा, प्रसाद, दान, दक्षिणा, फल-फूल 50 रुपये
- आधी ब्रेड/अंडा / विटामिन 25 रुपये की
- फोन, इंटरनेट (दो होने चाहिये) 30 रुपये
- मेडिक्लेम / बचत 50 रुपये रोज
- दोनों शाम खाना 100 रुपये
- दफ्तर आने जाने का खर्च 100 रुपये
- बिजली/उपकरण 100 रुपये
- साबुन, तेल, पानी, शौंचालय 100 रुपये
- मेहमान, रिश्तेदारी, आना-जाना उपहार आदि 100 रुपये
- बच्चों की स्कूल फीस, आने-जाने का खर्च 100 रुपये रोज
810 रुपये रोज, इसमें जीएसटी शामिल मानिये तो भी तीन लाख से ऊपर की आय पर आयकर अलग से लगेगा कम से कम 5 प्रतिशत। इसमें रिटर्न दाखिल करने के खर्च, बैंक खाता मेनटेन करने के खर्च, न्यूनतम बचत, उसके खर्चे, बैंक शुल्क कैसे पूरे होंगे आप जानिये। इसमें कर्ज और ब्याज शामिल नहीं है जबकि सरकार की आयकर से आय ब्याज के उसके खर्चे से कम है और सरकार ज्यादा कमाने वालों पर टैक्स लगाने के लिए तैयार नहीं है पर कम कमाने वालों को छोड़ नहीं सकती।
इसमें दिलचस्प है कि अगर आय तीन लाख का पांच गुना यानी 15 लाख हो तो टैक्स पांच गुना यानी 25 प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा 30 प्रतिशत होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि तीन लाख से ऊपर कमाने वाला तो अपने जरूरी खर्च काटकर आयकर (और जीएसटी देगा) लेकिन 15 लाख से ऊपर कमाने वालों को उतना ही टैक्स देना है। कहने की जरूरत नहीं है कि जो 15 लाख से बहुत ज्यादा कमाते हैं उन्हें भी टैक्स इतना ही देना है। उनका टैक्स नहीं बढ़ेगा भले वैसा आदमी बहुत कम हो। एक परिवार में सब हों।
होना उल्टा चाहिये कि ज्यादा कमाने वालों से ज्यादा टैक्स लिया जाये पर हिन्दू खतरे में है और सरकार उनका बचाव कर रही है जो ज्यादा जरूरी है। इसमें यह कहने की जरूरत नहीं है कि स्थिति लगभग वही है जो भ्रष्ट सरकार के समय में था और सरकार की ईमानदारी का आम कमाने-खाने वाले को कोई लाभ नहीं है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


