
राजू सजवान-
साल 2000 के बाद की बात होगी। तब मैं दैनिक जागरण में फरीदाबाद ब्यूरो में था। मेरे संपादक थे राजेंद्र त्यागी। बेहतरीन पत्रकार के साथ एक उम्दा व्यंग्यकार। जागरण में उनका एक व्यंग्य स्तंभ भी था, आलाप। किशोरावस्था से ही मुझे व्यंग्य पढ़ना और लिखना पसंद था।
इसी इच्छा के चलते मैंने त्यागी जी से निवेदन किया कि क्यों न फरीदाबाद के ताजा हालातों पर एक साप्ताहिक व्यंग्य स्तंभ लिखा जाए। उन्हें मेरा प्रस्ताव पसंद आया, लेकिन उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि मैं पहले उन्हें कुछ लिख कर दिखाऊं। शायद वह मेरे व्यंग्य विधा के बारे में तसल्ली करना चाहते थे। यह तो नहीं पता कि उन्हें पसंद आया या नहीं, लेकिन उन्होंने लिखने की मंजूरी दे दी।
हम दोनों के बीच तय हुआ कि कॉलम का नाम “फकीर फरीदाबादी/राजू सजवान” रखा जाए और इस तरह मैंने कई महीनों तक वह कॉलम लिखा। फरीदाबाद का सबसे ज्यादा बिकने वाले दैनिक जागरण में इस कॉलम ने एक रिपोर्टर से इतर एक नई पहचान दी। बहुत से लोगों ने खूब पसंद किया।
व्यंग्य का मुख्य पात्र बाबा फरीद होते थे, जो शहर के हालातों से रुबरु होते और फिर एक किस्से के माध्यम से उन हालातों-व्यवस्थाओं पर चोट की जाती। तब क्या लिखा था, यह तो याद नहीं और अब कटिंग भी न जानें कहां रखी हैं।
आज लगता है कि तब शायद Facebook होता तो कम से कम हर साल मेमोरी में जरूर मिल जाता।
अब भी कभी मन करता है कि अपने इस शहर के बारे में कुछ लिखूं। पता नहीं, कौन पढ़ेगा, पता नहीं आपका रिएक्शन क्या होगा? पहले तो जागरण फिर हिंदुस्तान में लगभग 14 साल तक इस शहर के लगभग हर मुद्दे पर रिपोर्ट की। लगभग हर समस्या को उठाया। मेरी रिपोर्ट्स को वाहवाही भी मिली। कभी-कभी अधिकारी जागरण इंपैक्ट दिखाने के लिए कार्रवाई भी कर देते थे, लेकिन कुछ दिन बाद ढाक के तीन पात। वजह, जनता की उदासी।
रोजी रोटी की भागदौड़ में शामिल लोगों के पास उस समय तक अखबार पढ़ने का समय तो मिल जाता था, अब तो वो समय भी नहीं रहा।
समाजसेवा के नाम पर कुछ संपन्न लोग जरूर सक्रिय थे और अभी भी हैं, लेकिन उनकी भी ‘आस्थाएं’ कहीं न कहीं जुड़ी हुई हैं, इसलिए समस्याओं का समाधान ढूंढने की बजाय वे भी कहीं बिछ जाते हैं।
खैर, तुर्रा यह है कि एक बार फिर से मन अपने शहर के बारे में इसी मंच पर, यहां फेसबुक पर लिखने का है। देखना यह है कि यहां कितने लोग पढ़ते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं। तो कल मिलते हैं एक मुद्दे के साथ..इस मंच पर भी नाम वही रहेगा “फकीर फरीदाबादी”.


