
इस सरकार की नीतियों के कारण खबर यह भी है कि “मौजूदा रफ्तार से अमेरिका के चौथाई जीडीपी तक पहुंचने में भारत को 75 साल लगेंगे”। लेकिन यह खबर कहीं किसी कोने में होगी और अखबार ‘सावन की हरियाली’ से भरे पड़े हैं। सरकार को अगर शिक्षा और उसकी व्यवस्था से मतलब नहीं है तो अखबारों की खबरें बता रही हैं कि समाज कैसा हो गया है। इससे दोनों की प्राथमिकताओं का पता चलता है और मैं उसी को रेखांकित करना चाहता हूं।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों की खबरों से पता चल रहा है कि हमारा समाज कैसा हो गया है। पहली खबर पंजाब के एक पुलिस अधिकारी की है। उन्होंने अपने दामाद को गोली मार दी। खबरों के अनुसार, उनकी बेटी (डॉक्टर अमितोज कौर) का पति के साथ वैवाहिक विवाद चल रहा था और तलाक की याचिका लंबित है। एक अखबार (नवोदय टाइम्स) की खबर के अनुसार दामाद ने ससुर को गाली दी तो गुस्से में ससुर ने गोली मार दी। जाहिर है, बात इतनी ही नहीं होगी और इसपर उस मानसिक पीड़ा का असर हो सकता है जो वे झेल रहे होंगे और उसी के कारण 58 साल की उम्र में एक नया विवाद मोल लेने का निर्णय किया होगा। दूसरे परिवार की पीड़ा को भी समझा जा सकता है और अगर इसका चरम भारत सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ससुर या पिता तुल्य व्यक्ति को गाली देना देखा जाये तो आम परिवारों में माता-पिता को गाली देने और संपत्ति से बेदखल कर देने वालों की कमी नहीं है। संभव है यह सब आर्थिक कारणों और संकटों की वजह से हो और इसके मूल में बुढ़ापे में सामाजिक सुरक्षा तो है ही। मुझे लगता है कि हमारा यह समाज एक दिन में ऐसा नहीं बन गया है। समस्या यह है कि इसका इतना आदी हो गया है कि इस बात की चिन्ता ही नहीं रह गई है कि इसे ठीक भी करना है या इसके कुछ कारण होंगे, उसे दूर करके बेहतर स्थिति लाई जा सकती है। मीडिया यह काम कर सकता है पर उसके अपने स्वार्थ हैं और बहुमत जब स्वार्थ से आगे नहीं सोचे तो यही होता है। इसमें आम आदमी का मानसिक तनाव मुद्दा ही नहीं है।
एक खबर संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलने पर पिता की हत्या की है तो दूसरी झारखंड में सब इंस्पेक्टर की गोली मारकर हत्या कर दिये जाने की है। अमृतसर में एक महिला एसएचओ पर तलवारों से हमले की खबर है। वे झगड़ा सुलझाने गई थीं। पहले पन्ने पर छपी आज की इन खबरों में मामला सिर्फ हत्या का नहीं है। आत्महत्या का भी है। पढ़ाई के लिए माता-पिता का दबाव अब पुराना मामला हो गया। अब छात्र खुद अच्छा करने के दबाव में हैं क्योंकि उन्हें इसके बिना जीवन मुश्किल लगने लगा है और रोजगार की समस्या सबके लिए चिन्ता का विषय है। इसमें कोचिंग इंस्टीट्यूट की जरूरत भी है। मुद्दा यह होना चाहिये था कि (प्राइवेट) कोचिंग की जरूरत ही क्यों पर मुद्दा यह हो गया है कि कोचिंग वाले पैसे कमाते हैं। सुविधायें नहीं देते हैं आदि। इस क्रम में पहले की घटनाओं से आप वाकिफ हैं, आज अमर उजाला में टॉप की खबर बताती है कि पीजी हॉस्टल वाले छात्रों को लूट रहे हैं। और इस तकलीफ में एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली। मुद्दा यह होना चाहिये था कि छात्रों, अविवाहित नौकरी पेशा, प्रशिक्षुओं के लिए हॉस्टल नहीं है पर मुद्दा यह है कि निजी पीजी वाले ‘ज्यादा’ पैसे लेते हैं।
बेरोजगारी, महंगाई, संविधान आदि के कारण सरकार को जब चुनाव जीतना मुश्किल लगा तो सरकार ने इस बार बजट में कौशल विकास को बड़ा मुद्दा बनाया है। आरोप है कि यह कांग्रेस के घोषणापत्र से लिया गया है और चूंकि सरकार की योजना सोच समझकर नहीं बनाई गई है इसलिए उसमें प्रचार ज्यादा है, उसकी कामयाबी की संभावना कम। पर मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि कौशल विकास की यह योजना बिना हॉस्टल की सुविधा के कितनी कामयाब होगी। मैं पहले लिख चुका हूं कि जमशेदपुर में टाटा ट्रक के डीलर के यहां अप्रेंटिसशिप की ट्रेनिंग के लिए आने वालों के लिए 1970 के जमाने में अच्छे हॉस्टल थे। ऊपर उसकी एक फाइल फोटो यह रही। प्रशिक्षण और कौशल विकास के लिए बिहार जैसे राज्य में तब योजनाएं थी और आईटीआई किये लोग वहां नौकरी कर रहे थे। बाद के समय में नई तकनालाजी के काम और प्रशिक्षण के लिये सरकारी आईटीआई ने विभिन्न कॉरपोरेट से गठजोड़ किये हैं। कंपनियों के पास अपनी जरूरत के लिए प्रशिक्षण और कौशल विकास की व्यवस्था पहले से है। उसमें कितने नये लोगों को प्रशिक्षण मिल पायेगा वह अपनी जगह है और उन्हें रोजगार कहां मिलेगा यह पता नहीं है। रोजगार नहीं होने के कई कारण हैं और उसमें एनजीओ तथा शेल कंपनियों को बंद कराना शामिल है। अगली खबर उसकी।

एफसीआरए की बाधा और उसका परिणाम
द हिन्दू में आज प्रकाशित सुहासिनी हैदर की एक बाइलाइन वाली खबर के अनुसार, गांधी-किंग (मार्टिन लूथर किंग जूनियर) फाउंडेशन योजना एफसीआरए बाधाओं में फंस गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चार साल पहले गांधी-किंग स्कॉलरली एक्सचेंज इनिशिएटिव एक्ट पर हस्ताक्षर किए थे। अभी भी अमेरिकी और भारतीय अधिकारी विदेशी एफसीआरए के कारण होने वाली बाधाओं को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। इसने लगभग 40 मिलियन डॉलर (₹335 करोड़) की पहल और विशेष रूप से गांधी-किंग डेवलपमेंट फाउंडेशन के लिए फंडिंग को रोक दिया है।
महात्मा गांधी और डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के “इतिहास और विरासत” का अध्ययन करके भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने के लिए स्थापित इस अधिनियम के तहत तीन संस्थाओं की स्थापना होनी है। इनमें से दो अमेरिका में 2021 में ही स्थापित कर दिये गए थे। इसके तहत, हर साल 20 विद्वानों के लिए एक एक्सचेंज प्रोग्राम और वाशिंगटन में यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस द्वारा एक “वैश्विक अकादमी” की स्थापना की जानी थी। लेकिन तीसरी संस्था, गांधी-किंग डेवलपमेंट फाउंडेशन पर काम बहुत कम हुआ है। इसका कारण यह है कि भारत में अध्ययन के लिए अमेरिकी पैसे के स्कोप और व्यवस्था को लेकर अत्यधिक जांच पड़ताल है। मैं लिखता रहा हूं कि सरकार अपने विरोध को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए ऐसे उपाय कर रही है। इस मामले में विदेशी पैसे से विरोध होगा कि नहीं यह तो बाद की बात है पर अध्ययन इसीलिए रुका हुआ है। संभव है, महात्मा गांधी से संबंधित है इसलिए सरकार की दिलचस्पी ही न हो। पर एफसीआरए का मामला तो अपनी जगह है ही। और यह नियमों को मुश्किल तथा अव्यावहारिक बनाने का है।
इससे कई तरह के नुकसान हैं और सबको छोड़ भी दिया जाये तो रोजगार की कमी एक महत्वपूर्ण कारण है। खबर में बताया गया है 17 जून 2024 को दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और उनके अमेरिकी समकक्ष जेक सुलिवन की मौजूदगी में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद, अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि फाउंडेशन पर काम अब चल रहा है। हालाँकि, विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि अभी तक केवल “प्रारंभिक चर्चा” हुई है और अमेरिका ने अभी तक फाउंडेशन की संरचना पर स्पष्टता नहीं दी है। “एक बार जब अमेरिका यह तय कर लेता है कि वे फाउंडेशन के लिए किस तरह की फंड संरचना चाहते हैं और किस तरह की गतिविधियों के लिए, तभी वे भारत सरकार को प्रस्ताव भेज सकते हैं। एक अधिकारी ने द हिंदू को बताया, “प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद संबंधित विभाग/मंत्रालय द्वारा इसकी जांच की जाएगी।” उन्होंने आगे कहा कि गांधी-किंग पहल की स्थापना में शुरू में भारत से परामर्श नहीं किया गया था।
कोचिंग का बाजार और जीएसटी
दूसरी ओर, द टेलीग्राफ में एक खबर है जो बताती है कि कोचिंग पैसे कमाने का एक बढ़िया जरिया है और खबर के अनुसार सरकार ने राज्यसभा में जानकारी दी है कि इसपर 18 प्रतिशत जीएसटी लगता है। इन आंकड़ों से अनुमान है कि 2020-21 में यह उद्योग 12000 करोड़ रुपये का था जो 2023-24 में 30653 करोड़ रुपये का हो गया और इसमें ढाई गुना वद्धि हुई है। इसका मतलब यह भी हुआ कि सरकार ने इस साल के बजट में 47620 करोड़ रुपये का जो आवंटन उच्च शिक्षा के लिए किया है उसका लगभग दो तिहाई छात्र सिर्फ कोचिंग पर खर्च करते हैं। कुल मिलाकर, शिक्षा और अध्ययन के लिए एक तरफ अगर सरकार विदेशी पैसे नहीं ले रही है तो दूसरी तरफ फीस पर जीएसटी है और कोचिंग का बाजार इतना बड़ा है फिर भी सरकार जो कुछ कर रही है वह नहीं के बराबर है। नियमन भी नहीं।
पीएचडी सेप्टिक कैंट साफ करता है
समाज का हाल बताने वाली आज की दूसरी खबरों में प्रमुख है, तमिलनाडु में सेप्टिक टैंक साफ करने वाला एक युवक, रविचंद्रण बथरन पीएचडी धारक है। इनकी थीसिस का विषय था, “एक अवधारणा में कई चूक : अनुसूचित जातियों में भेदभाव”। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी इस खबर से बताया है कि यह तथ्य सुप्रीम कोर्ट के एक अगस्त के फैसले के ढेरों फुटनोट में एक है पर इसमें यह नहीं बताया जा सकता था कि जाति व्यवस्था की बेड़ियों को तोड़ने के लिए उनका संघर्ष, कैसा है और क्यों उनका मानना है कि आरक्षण के लिए दलितों का उपवर्गीकरण महत्वपूर्ण है।
मौसम की भविष्यवाणी पर राजनीति
केरल के मुख्यमंत्री ने पिनयारी विजन ने कहा है (द हिन्दू) कि मौसम की भविष्यवाणी को आधुनिक, स्थान विशेष के लिए और सटीक बनाने की जरूरत है ताकि आपदा से निपटने की कार्रवाई जल्द शुरू की जा सके। आप जानते हैं कि वायनाड के हाल के हादसे के मद्देनजर केंद्रीय गृहमंत्री ने क्या कहा था और उसपर क्या विवाद चल रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री का यह कहना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। एक प्रेस कांफ्रेंस में विजयन ने एलान किया कि आपदा से विस्थापित लोगों के लिए एक आधुनिक टाउनशिप बनाया जायेगा। इसकी तुलना आप मणिपुर से कर सकते हैं।
गंभीर चर्चा के विषय
आज बेकरी पर बुलडोजर चलाने की खबर भी है पर उसमें कहा गया है कि वह अवैध निर्माण था और इसलिए गिरा दिया गया। इसलिए मैं उसे गंभीर चर्चा का विषय नहीं मानता हूं पर मुद्दा असल में क्या है, सबको पता है। इसलिए उसे रहने देता हूं। दूसरा मामला जम्मू कश्मीर में पांच पुलिस वालों को उनपर आरोपों के क्रम में विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए नौकरी से बर्खास्त करने का है। यह भी नियमानुसार किया गया है इसलिए विवाद नहीं हो सकता है पर कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद और पांच साल में भी चुनाव नहीं करा पाने तथा लोकसभा चुनाव में भाजपा के शामिल न हो जाने की स्थितियों में ऐसा किया गया है यह गंभीर चर्चा का विषय है। ऐसी कार्रवाई को कश्मीर का समाज, प्रभावितों का परिवार कैसे देखेगा और देश व सरकार के प्रति उसका नजरिया कैसा होगा यह भी गंभीर चिन्ता का विषय है।
इन खबरों और चिन्ता के इन मुद्दों के बाद आज के अखबारों की लीड में दिलचस्प है, प्रधानमंत्री का यह दावा कि देश में 90 फीसदी छोटे किसान खाद्य सुरक्षा की सबसे बड़ी ताकत हैं (अमर उजाला और नवोदय टाइम्स)। मेरे अंग्रेजी अखबारों में किसानों से संबंधित यह खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड ओलंपिक की खबर है पर सेकेंड लीड यही है। द हिन्दू ने जम्मू और कश्मीर के पुलिसवालों की बर्खास्तगी की खबर को लीड बनाया है तो टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड बता रही है कि सरकार संपत्ति के मामले में वक्फ बोर्ड के अधिकार कम करने के लिए विधेयक लाने वाली है। द टेलीग्राफ ने वायनाड की खबर को लीड बनाया है। इन खबरों से सरकार की प्राथमिकता का पता चलता है तो उनकी प्रस्तुति से अखबारों की प्राथमिकता का। मुझे लगता है कि आज की खबर यह है कि देश में कोचिंग एक बड़ा उद्योग है जो सरकार के साथ-साथ कुछ लोगों की कमाई का बढ़िया साधन है जबकि शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में बहुत पीछे है। बजट तो कम है ही, सरकार विदेशी सहायता की भी उपेक्षा कर रही है और इसका कारण उसका डर है कि इस अध्ययन के लिए पैसे पाने वाले लोग उसके विरोधी न हो जायें। गांधी पर अध्ययन की उपेक्षा भी अपनी जगह है जो रेखांकित की जा सकती थी।
राज्यपाल की भूमिका भी …
मामला सिर्फ आम आदमी और उसके समाज से संबंधित नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति बीवी नागरथ ने कहा है कि कुछ राज्यपाल ऐसी भूमिका निभा रहे हैं जो उन्हें नहीं निभानी चाहिये और बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। वे ऐसे समय में निष्क्रिय थे जब उन्हें सक्रिय भूमिका निभाना चाहिये था। आप जानते हैं कि ऐसे लोग राज्यपाल बना दिये गये हैं कि राज्यपालों को आपराधिक सुरक्षा से संबंधित मामले को सुप्रीम कोर्ट ने विचार के लिए स्वीकार किया है। एक राज्यपाल पर राजभवन की महिला कर्मचारी के यौन शोषण का आरोप है। न्यायमूर्ति बीवी नागरथ बैंगलोर में आयोजित एनएलएसआईयू पैक्ट कांफ्रेंस में बोल रही थीं।
लोग न्यायिक प्रक्रिया से त्रस्त हैं
अमर उजाला में प्रकाशित एक खबर के अनुसार मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि लोग न्यायिक प्रक्रिया से त्रस्त हैं और बस समझौता चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के विशेष लोक अदालत सप्ताह के मौके पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि, लंबी न्यायिक प्रक्रिया ही सजा है। यह हम सभी जजों के लिए चिन्ता का विषय है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में अंदर के पन्ने पर छपी खबर
डाक टिकट के पीछे लिखने बराबर अर्थशास्त्र
आज की इन सभी खबरों में जो मुझे सबसे दिलचस्प और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण लगी वह टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। 10 लाइन की खबर और दो लाइन के शीर्षक के जरिये बताया गया है कि खबर अंदर के पन्ने पर है। शीर्षक से यह इतनी दिलचस्प है कि आज मैंने सबसे पहले इसी खबर को पढ़ा और इसे पढ़कर याद आया कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले किसी मामले में उस समय के वित्त मंत्री पी चिदंबरम से उलझ गये थे। तब चिदंबरम ने कहा था कि अर्थशास्त्र का प्रधानमंत्री का ज्ञान डाक टिकट के पीछे लिखने के बराबर है। तब मोदी ने कहा था कि प्रधानमंत्री बने तो वे योग्य और जानकार व्यक्ति को काम रखेंगे और हम देख चुके हैं कि उनके योग्य और जानकार वित्त मंत्री अरुण जेटली थे जो पेशे से अधिवक्ता थे और जिनके रहते किसी अन्य की सलाह पर नोटबंदी कर दी गई थी और उसका बचाव करने के लिए रोज गोल पोस्ट बदलने पड़े। सरकार समर्थक चाहते हैं कि इमरजेंसी पर बात हो 2016 की नोटबंदी पर बात नहीं की जाये। वही प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था की अच्छी हालत, पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और दुनिया भर में तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था की बात करते करते हुए अब 2047 की बात करने लगे हैं। पहले 50 दिन में सपनों का भारत बन रहा था, 100 दिन में विदेश में रखा काला धन आने वाला था और नोटबंदी से आतंकवाद खत्म होने वाला था। बाद में एक ज्ञानी मंत्री ने कहा था कि वेश्यावृत्ति भी रुक जायेगी। पर अब इस खबर के अनुसार डर है कि मौजूदा प्रवृत्तियों के लिहाज से भारत को अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय के एक चौथाई तक पहुंचने में अभी 75 वर्ष लगेंगे। पत्रकार साथी सत्येन्द्र पीएस के सौजन्य से हिन्दी में इस खबर की कतरन देखिये। शीर्षक, “मौजूदा रफ्तार से अमेरिका के चौथाई जीडीपी तक पहुंचने में भारत को लगेंगे 75 साल” ही सब कुछ कह देता है। पर यह मेरे किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। आज के अखबारों की लीड खासतौर से याद करने लायक है।


