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आज के अख़बार: सिसोदिया को जमानत और भाजपाई प्रचार!

संजय कुमार सिंह-

कुश्ती में अमन सेहरावत को कांस्य पदक मिलने और ओलंपिक की दूसरी खबरों के साथ आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं मानने की दो बड़ी खबरों के साथ आज की तीसरी सबसे बड़ी खबर आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को जमानत मिलना है। आज मेरे ज्यादातर अखबारों ने इसे लीड बनाया है। नवोदय टाइम्स में चौथी खबर लीड है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नीट-पीजी स्थगित नहीं होगी। मनीष सिसोदिया की खबर के साथ यहां भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ का बयान भी है, जमानत का मतलब दोषमुक्त नहीं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भाजपाई प्रचार को, आम आदमी पार्टी ने फैसले पर खुशी जताई, भाजपा ने कहा : अभी भी आरोपी हैं, शीर्षक से छापा है। अब कहा जा सकता है कि भाजपा की राजनीति में अपने प्रमुख नेताओं को बेदाग, क्लिन चिट मिल गया है आदि साबित करने की रहती है और दूसरे जमानत पर हैं, बरी नहीं हुए हैं जैसे आरोप लगाना शामिल है।

यह अलग बात है कि क्लिन चिट कैसे मिली, आरोप क्या है या क्यों है, जमानत क्यों नहीं मिली और जब मिली तो यह कह देना कि विशेष ट्रीटमेंट मिला है तथा निराधार आरोप लगाने के इतने मामले हैं कि इस पर किताब लिखी जा सकती है। फिर भी, भ्रष्ट और दागी नेताओं को साथ लेकर सरकार बनती हो तो भाजपा को गुरेज नहीं है और इसके कई उदाहरण हैं। अपनी पार्टी के नेताओं पर आरोप की जांच नहीं कराना और दूसरों पर झूठे निराधार आरोप लगाना तथा किसी भी तरह सत्ता में बने रहना ही एकमात्र लक्ष्य है पर वह अलग मुद्दा है। आज मैं यह बताना चाहता हूं कि मीडिया को सब पता है, उसपर लिखना चाहिये तो आज भी मेरे सात में से दो अखबारों ने भाजपा के आरोप को प्रचार दिया है जबकि उसका कोई मतलब नहीं है या वह भाजपा की घटिया राजनीति का भाग है। आइये देखें कैसे।

असल में आम आदमी पार्टी के खिलाफ मामला इतना ही भर है और इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया गया है। केंद्र सरकार तमाम आरोपियों को अपने साथ रखकर ऐसा करने की हिमाकत कर रही है और प्रमुख विपक्षी दलों में एक, आम आदमी पार्टी अपने बचाव में व्यस्त है। दूसरी का खात बंद करने जैसी कर्रवाई करके उसे अलग घेर रखा गया है। आम लोगों को नौकरी, रोजगार व्यवसाय जैसे मुद्दों में फंसाकर रखने वाले नियम बनाये हैं और वैसी ही कार्रवाई की है ताकि विरोध कर सकने वाला कोई स्वतंत्र रूप से काम ही नहीं कर पाये। जहां तक टाइम्स ऑफ इंडिया में जमानत पर भाजपा की प्रतिक्रिया का मामला है, 17 महीने बाद जमानत मिली है तो पार्टी को खुश होना ही था और जब पार्टी की प्रतिक्रिया है तो विरोधी दल की प्रतिक्रिया होनी ही चाहिये। इसलिए, भले ही यह संतुलित पत्रकारिता है, इसे रेखांकित करने की जरूरत है।

आप जानते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने दावों और प्रचार के बावजूद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सत्ता में बने रहने के लिए वाशिंग मशीन पार्टी बन गई लगती है। लेकिन वोट बटोरू, भ्रष्टाचार दूर करने वाला दिखने के लिए आम आदमी पार्टी के नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले चला रही है। हालांकि, असल में मामला पीएमएलए का है और यह भ्रष्टाचार के मुकाबले काफी नया है। यह आतंकवाद और नशे का व्यापार  करने वालों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाये गये कानून का भाग है और भ्रष्टाचार के मामले अगर सामान्य अपराध की तरह दर्ज किये जाते तो जमानत मिलना मुश्किल नहीं होता। तब भाजपा की यह राजनीति भी नहीं चलती। इसलिए आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ पीएमएलए के मामले बनाये गये हैं जो साबित न भी हों तो अभी जेल में रखना संभव कर रहे हैं। यह सर्वविदित है कि आरोपी को जमानत न मिले इसके लिए इसमें असामान्य प्रावधान या शर्तें हैं और इन्हें लागू करने के लिए सरकार ने तमाम उपाय किये हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट के संबंधित जज को ईनाम देना और स्वीकार करना शामिल है।

मनीष सिसोदिया के इस मामले में अदालत ने ट्रायल में देरी से लेकर निचली अदालतों को फटकार तक लगाई है। अदालत ने कहा है कि सिसोदिया को तेजी से ट्रायल  के अधिकार से भी वंचित किया गया और यह महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही कोर्ट ने एक बार फिर निचली अदालतों को उनका असली काम याद दिलाया और कहा है, अदालतों को ये महसूस करना होगा कि जमानत नियम है और जेल एक अपवाद। द टेलीग्राफ ने इसे आज अपना कोट बनाया है। अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि निकट भविष्य में ट्रायल पूरी होने की दूर-दूर तक संभावना नहीं है। केस को गंभीर दिखाने के लिए इसमें 495 गवाह और हजारों दस्तावेज हैं जो लाखों पन्नों में हैं उन्हें देखा जाना है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भ्रष्टाचार या पीएमएलए का सीधा-साफ मामला नहीं है। भले गवाहों औऱ दस्तावेजों से साबित हो जाये पर तब भी यह साबित करना मुश्किल होगा कि पैसे लिये और दिये गये हैं। अभी उसका कोई सबूत नहीं है। बाद में अगर साबित हो भी जाये तो बरामदगी  के बिना मामला कितना मजबूत होगा यह तो समय बतायेगा

अभी तो यह बदनाम करने का ही काम लगता है। सरकार के काम से किसी को फायदा हो जाये यह सामान्य बात है। भाजपा के ऐसे सैकड़ों काम और निर्णय हैं। लेकिन निर्वाचित और सक्षम सरकार ने नियमानुसार किया है इसलिए इसे भ्रष्टाचार नहीं कहा जाता है। यही रिवाज रहा है। इसलिए दिल्ली सरकार की आबकारी नीति को भ्रष्टाचार नहीं कहा जा सकता है और ना ही यह दलील दी जा सकती है कि ऐसा पैसे के लिए किया गया है। पैसे बरामद हुए होते तो निश्चित रूप से यह साबित हो जाता कि काम के बदले पैसे लिये गया। यह भ्रष्टाचार का सामान्य मामला होता। दूसरी ओर भाजपा सरकार के बहुचर्चित इलेक्टोरल बांड का मामला है जो भले दूसरे दलों को भी मिला हो, भाजपा के मामले में, “चंदा दो, धंधा लो” जैसे मामले साबित करता है लेकिन भारतीय कानून के अनुसार उसकी जांच की जरूरत नहीं है। इसलिए संभावना लगती है कि आम आदमी पार्टी को फंसाया गया है। देखना है आम आदमी पार्टी इस मामले में आगे क्या कर पाती है। 

ऐसे में तथ्य यह है कि अभी ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ है और कितना समय लगेगा पता नहीं है। जल्दी ट्रायल पूरा करने के आश्वासनों का पालन नहीं किया गया है। पर वह सब अलग विषय है। मोटे तौर पर यह कि आम आदमी पार्टी के नेताओं को किसी भी तरह जेल में रखकर उनका दोहरा नुकसान किया जा रहा है और खुद सत्ता में बने रहने के लिए हर संभव उपाय किये जा रहे हैं। सबके बावजूद जब जमानत मिल गई तो यह प्रचार कि अभी बरी नहीं हुए हैं, सिर्फ जमानत मिली है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि जमानत नहीं मिल रही थी तो यह प्रचारित किया जा रहा था कि आरोप गंभीर हैं, तभी तो जमानत भी नहीं मिल रही है। यह भाजपा की राजनीति है और सबको पता है कि वह खुद को टक्कर दे सकने वाले सभी लोगों से कैस निपटती रही है। उसपर मैं लिखता भी रह हूं पर भाजपा की कोशिश तो यह है कि उसका पंजीकरण ही रद्द करवा दिया जाये। दिल्ली सरकार द्वारा गणेश चतुर्थी के आयोजन के खिलाफ अधिवक्ता एमएल शर्मा ने याचिका दायर की थी। इसमें  सार्वजनिक रूप से आयोजन करने पर आम आदमी पार्टी (आप) की मान्यता रद्द करने की मांग की गई है।

प्रधानमंत्री के धार्मिक आयोजनों, भाषणों  और भागीदारी के मामलों की गिनती नहीं हो सकती है। कार्रवाई तो छोड़िये लेकिन आम आदमी पार्टी के खिलाफ मामला है तो स्थिति को समझना मुश्किल नहीं है पर वह मुद्दा नहीं है। मुद्दा भाजपा का रवैया और अखबारों में उसकी प्रस्तुति है। इसके अलावा, आज की प्रमुख खबरों में एक, द हिन्दू और अमर उजाला में है। इसके अनुसार बांग्लादेश में भारतीयों की सुरक्षा की निगरानी के लिए गृहमंत्रालय ने समिति बनाई है। यह संयोग ही है कि आज जब 17 महीने बाद एक उपमुख्यमंत्री को जमानत मिलने की खबर है तभी भारत में बांग्लादेश के भारतीयों की रक्षा के लिए समिति बनाई जा रही है। इसी अखबार में इसी खबर के साथ एक खबर मणिपुर की है। इसके अनुसार, मणिपुर की हिंसा में तीन ग्रामीण स्वयंसेवक मारे गये। आप जानते हैं कि वहां 15 महीने से ज्यादा से हिंसा चल रही है, सैकड़ों लोग मारे गये हैं, कई घर और चर्च जला दिये गये हैं।

जया बच्चन का संघर्ष

आज की खबरों में एक खबर राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ और सपा सांसद जय बच्चन के बीच विवाद की भी है हालांकि, यह द टेलीग्राफ और हिन्दी के अखबारों में ही इतनी प्रमुखता से है। अमर उजाला में फ्लैग शीर्षक है, जया बच्चन ने कहा, हमसे स्कूली बच्चों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। यही नहीं, यह भी बताया गया है कि राज्यसभा में सभापति के लहजे पर सवाल उठाने पर सभापति नाराज हुए। मुझे लगता है कि धनखड़ और जया बच्चन दोनों सदन के पुराने सदस्य हैं और अब अगर लहजे पर सवाल है और नाराजगी इसपर है तो मुद्दा यह होना चाहिये कि लहजा बदला है क्या और अगर बदला है तो क्यों? यह भी संभव है कि जया बच्चन की अपेक्षाएं बदल गई हों। पर खबर से यह सब पता नहीं चलता है। मैंने वीडियो देखा है मुझे लगता है कि जया बच्चन की नाराजगी एतराज के बावजूद बार-बार उन्हें जया अमिताभ बच्चन कहने से होगी पर खबर में इसकी चर्चा भी नहीं है।

अगर मैंने ठीक सुना है तो जया बच्चन ने इसे ‘नया ड्रामा’ कहा है। मुझे नहीं लगता है कि उपराष्ट्रपति को यह कहने की कोई जरूरत थी कि, आपने ख्याति हासिल की है। आप जानती हैं कि कलाकार निर्देशक के अनुसार काम करता है। यह उन्होंने जया बच्चन के इस दावे पर कहा कि, मैं कलाकार हूं, भाव भंगिमा समझती हूं। आगे उपराष्ट्रपति ने कहा, आप वह नहीं देखतीं जो मैं यहां से देखता हूं। हर दिन, मैं दोहराना नहीं चाहता …. आप भले सेलिब्रिटी हों मगर सदन की मर्यादा से बड़ी नहीं हैं। आपको नियम समझने होंगे। मुझे नहीं लगता कि जया बच्चन ने जो कहा उसमें सदन की मर्यादा का मुद्दा था या नाम जो लिखा है वही पढ़ने की बाध्यता नियम में है। पर जगदीप धनखड़ यहीं नहीं रुके। उन्होंने यहां तक कहा कि … कभी ऐसा दिखाने की कोशिश न करें कि आप ही ने ख्याति अर्जित की है। हम सभी यहां ख्याति अर्जित करके आये हैं। मुझे लगता है कि उपराष्ट्रपति का यह कहना भी गैर जरूरी था और तथ्यात्मक तो नहीं ही है। उपराष्ट्रपति बनाये जाने से पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में या उससे भी पहले जगदीप धनखड़ की ख्याति जया बच्चन की ख्याति से बहुत अलग है और मिलती जुलती तो नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने कहा कि कलाकार निर्देशक के अनुसार काम करता है जबकि निर्देशक सलाह देता है, आदेश नहीं देता है। निर्देशक की सलाह को मानना और उसके अनुसार काम करना कलाकार और आदेशपाल के मामले में बिल्कुल अलग होता है और इसकी तुलना नहीं की जा सकती है। फिर भी यह खबर अमर उजाला में है। हालांकि पूरा मामला काफी बड़ा है और कोई  खबर इससे ज्यादा नहीं छप सकती थी। नवोदय टाइम्स में शीर्षक है, जया बच्चन ने सभापति के लहजे पर आपत्ति जताई धनखड़ बोले सेलिब्रिटी को भी शिष्टाचार समझना होगा।

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