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प्रसारण विधेयक को वापस लिया जाना सरकार की दूसरी बड़ी हार, सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड है!

संजय कुमार सिंह

आज की सबसे बड़ी और कम से कम मेरे लिये चौंकाने वाली खबर इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। इस खबर के अनुसार सरकार ने ब्रॉडकास्ट बिल के नए मसौदे को वापस ले लिया है। जरूरत से ज्यादा घुसने की कोशिश के लिए बदनाम ब्रॉडकास्ट बिल की भरपूर आलोचना हो रही थी। खबर है कि अब सरकार ने इसे वापस ले लिया है और निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है। यह नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल या तीसरी सरकार की दूसरी बड़ी हार है। आप जानते हैं कि इससे पहले वक्फ विधेयक को जेपीसी को भेजा जा चुका है। ऐसा नरेन्द्र मोदी के पिछले दो कार्यकाल या 10 साल में नहीं हुआ। ऐसे में ज्यादातर अखबार मुद्दे से अलग हैं और भाजपा तो विपक्ष पर निराधार आरोप लगाने का महान कार्य भी कर रही है। दिलचस्प यह है कि अखबारों ने भी इसे महत्व दिया है। आलम यह है कि सेबी प्रमुख का बचाव सरकार कर रही है लेकिन कोलकाता में एक बलात्कार और हत्या के मामले पर देशव्यापी आंदोलन चल रहा है। कहने के लिए आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के सहायक पार्टी की ही राज्यसभा सांसद और एक महिला से हाथा-पाई या मारपीट (खरोंच के निशान पाये गये थे) के आरोप में महीनों से जेल में हैं पर यह राजनीतिक मामला है वरना सैकड़ों मौतों के लिए कोई जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जाता है। पर वह मुद्दा नहीं है।    

ब्रॉडकास्ट बिल की खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में भी सेकेंड लीड है। इसके अनुसार सरकार सलाह-मश्विरे के बाद इसका नया मसौदा पेश करेगी और सुझावों के लिय अंतिम तिथि बढ़ाकर 5 अक्तूबर कर दी गई है। पर मामला इतना ही नहीं है। आप जानते हैं कि संसद सत्र को अचानक पहले खत्म कर दिया गया है। उसके बाद हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट आई और अब यह वापसी। एक देश के रूप में हम अपने मुकाबले बांग्लादेश की चिन्ता ज्यादा कर रहे लगते हैं और बांग्लादेश को जो सीख दे रहे हैं वह हमें दी जाये तो हम देश के आंतरिक मामलों में दखल का शोर मचाते रहे हैं। विश्व गुरू बनने के लिए यह सब जरूरी हो सकता है लेकिन मणिपुर के मुकाबले बांग्लादेश की खबर दिल्ली के अखबारों में ज्यादा छप रही हैं। अमर उजाला की आज की लीड बांग्लादेश की है। शीर्षक है, बांग्लादेश सरकार ने हिन्दुओं से माफी मांगी, माना सुरक्षा देने में विफल रहे। उधर बिहार के एक मंदिर में भगदड़ मचने से सात लोगों की मौत की खबर नवोदय टाइम्स के पहले पन्ने में टॉप पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। खबर के अनुसार 16 लोग घायल है, मरने वालों में ज्यादातर कांवरिये हैं। हिन्डबर्ग की रिपोर्ट, सेबी प्रमुख पर आरोप और अदाणी की कंपनियों में 20,000 करोड़ रुपये का निवेश किसका है, पता नहीं होना मुद्दा नहीं है। विपक्ष जेपीसी की मांग कर रहा है, भाजपा बोली ढकोसला, नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है। कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्डबर्ग की रिपोर्ट सेबी प्रमुख के खिलाफ है। सेबी और उसकी प्रमुख को अपना बचाव करने में सक्षम होना चाहिये और नहीं हों तो सरकार को कार्रवाई करनी चाहिये।

सरकार इसे ढकोसला कह रही है, अखबारों में खबर छप रही और इस बात का जवाब नहीं है कि अदाणी की कंपनियों में निवेश करने वाले का पता नहीं चला तो आगे कार्रवाई क्यों नहीं हुई। हिन्डनबर्ग ने इसका कारण बताया है कि सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच के संबंध अदाणी से हैं। राजनीतिक कारणों से इसी को मुद्दा बना दिया गया है। और  विदेशी हमले से शेयर बाजार को अस्थिर करने का आरोप लगाया जा रहा है और पूर्व मंत्री तथा जनता के पैसे से वेतन पाने वाले भाजपा सांसद दलील दे रहे हैं कि निवेशक हिन्डनबर्ग को जान गये हैं इसलिए बाजार नहीं गिरा। वास्तविकता यह है कि निवेशकों के वश का नहीं है कि वे हिन्डन बर्ग को नहीं जानें और बाजार नहीं गिरा क्यों निवेशकों को पता है (या यकीन है) कि सरकार कार्रवाई नहीं करेगी। सरकारी लापरवाही या नालायकी का बचाव सत्तारूढ़ दल के सांसद और नेता करें तो समझ में आता है। अखबार क्यों कर रहे हैं, राम जानें। अखबारों में ना तो ब्रॉडकास्ट बिल को लेकर सरकार की हार की खबर को प्राथमिकता दी गई है और ना शेयर बाजार में निवेश का मुद्दा है। ऐसे में अनपढ़ समर्थकों को यह समझा दिया गया है कि विदेशी निवेश आया है तो उसका विरोध कैसा या जांच किसलिये।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज कोलकाता में बलात्कार और हत्या के खिलाफ देश भर के सरकारी अस्पतालों में आंदोलन की खबर को आज लीड बनाया है। खबर के अनुसार, ओपी़डी, सर्जरी प्रभावित हुई क्योंकि चिकित्सक सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। यह स्थिति तब है जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि पुलिस इतवार तक हत्यारे का पता नहीं लगा पायेगी तो सीबीआई जांच कराई जायेगी। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज इसी शीर्षक के साथ यह खबर पहले पन्ने पर है। हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड बताती है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए जमानत के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपील की है। सेबी से संबंधित खबर यहां पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, “सेबी प्रमुख पर आरोपों की बौछार : कांग्रेस जेपीसी चाहती है, भाजपा इसे बाजार को पटरी से उतारने की साजिश बता रही है।?” सेबी की यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। शीर्षक है, कांग्रेस भाजपा जब लड़ रहे हैं तो बाजार ने सेबी विवाद को किनारे कर दिया है। इंट्रो है, अदाणी समूह के स्टॉक मोटे तौर पर अप्रभावित हैं।

द हिन्दू में सेबी की खबर लीड है। शीर्षक है, सेबी विवाद : भाजपा ने जेपीसी की मांग खारिज की। उपशीर्षक है, भाजपा ने कांग्रेस, हिन्डनबर्ग रिसर्च के बीच विस्तृत साजिश का आरोप लगाया; विपक्षी दल ने मांग पूरी नहीं होने पर देशव्यापी विरोध की चेतवानी दी है। कोलकाता के द टेलीग्राफ में आज आधे पन्ने से ज्यादा विज्ञापन है। ऐसे में रोज के कॉलम कोट के अलावा चार ही खबरें हैं। लीड तो स्थानीय खबर है और इसका शीर्षक है, “छह दिन में परिणाम दीजिये या सीबीआई कार्यभार संभाल लेगी : मुख्य मंत्री पुलिस वालों से”। कहने की जरूरत नहीं है कि आम तौर पर राज्य सरकारें इस तरह काम नहीं करती हैं और महिला के प्रति अपराध के इस मामले में मुख्यमंत्री का स्पष्ट रुख प्रशंसनीय है पर जनता संतुष्ट नहीं है। देश भर में इसका विरोध हो रहा है और इसके खिलाफ देश व्यापी आंदोलन चल रहा है। खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है।  

दूसरी ओर, सरकार और सरकारी पार्टी हिन्डनबर्ग ही नहीं  देश के विपक्षी दलों पर भी निराधार आरोप लगा रही है और देशभक्ति की आड़ ले रही है जबकि अभी हाल में ओलंपिक मेडल के मामले में साजिश का संतोषजनक जवाब नहीं है। जो हुआ उसका बचाव करने वाले तो हैं ही। दिलचस्प यह है कि यह सब जांच से बचने के लिए किया जा रहा है जबकि आरोपों की जांच कराना सेबी का काम है और जांच नहीं हुई तो अपराध हो गया फिर भी कार्रवाई से बचने के लिए हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट में खोट खोजी जा रही है। आइये, पहले यह समझ लें कि जांच क्यों जरूरी है। आप जानते हैं कि बैंक में खाता खोलने के लिए भी आधार औऱ पैन कार्ड जरूरी है। बैंक में रखे गये पैसे के बारे में आपसे पूछा जा सकता है कि कहां से आये। नकद जमा कराने पर सख्ती है और पहचान देनी पड़ती है। यह सब इसलिए भी है कि लोग गलत तरीके से ज्यादा न कमायें और कमायें तो कहीं ना कहीं पकड़े जायें। 20,000 करोड़ के मामले में भी ऐसा ही है। इस बात की भी पूरी संभावना है कि देश का पैसा घूम कर आया है या यहां इलेक्टोरल बांड नहीं था तो किसी ने विदेश में पैसा लिया हो और अदाणी के यहां पहुंच गया हो।

यह पैसा जिसका भी हो, पता होना जरूरी है ताकि यह पता चले कि कैसे कमाया गया है। सेबी का काम यह सुनिश्चित करना है कि पूंजी बाजार में निवेश पाक-साफ हो। नियमों का उलंल्घन करके ना पैसे कमाये जायें ना लगाये जायें। इसलिए सेबी को इस मामले में जांच करानी चाहिये थी। किसका है, यह पता नहीं चला या चल रहा है कहकर हाथ-पर हाथ धरकर नहीं बैठा जा सकता है। यह वैसे ही है जैसे पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री को बैठने नहीं दिया जा रहा है या वे नहीं बैठ रही हैं। पर दबाव जारी है। सेबी पर ऐसा कोई दबाव नहीं है। बचाव जाहिर है। जब निर्वाचित नेता को छूट नहीं है तो नौकरी करने वाले किसी नौकरशाह को क्यों? अवैध और गलत तरीकों से कमाये पैसे अगर इस तरह निवेश किये जा सकेंगे तो न सिर्फ कमाई पर टैक्स नहीं मिलेगा बल्कि उसपर होने वाली कमाई पर भी टैक्स नहीं मिलेगा और सरकार को जो टैक्स चाहिये वह आपसे वसूले जायेंगे। वही हो रहा है। और यह कॉरपोरेट टैक्स में छूट और राहत के अलावा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह पैसा आपका-हमारा होता तो पहले निवेश ही नहीं किया जा सकता और निवेश हो जाता तो जब्त कर लिया जाता। पर अदाणी, सेबी या 20,000 करोड़ रुपये के मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ है। सेबी प्रमुख का यह अपराध साबित है। सजा के लिए अदाणी से संबंध होने की जरूरत ही नहीं है पर उसे साबित करने के लिए कहा जा रहा है जबकि मुद्दा वह है ही नहीं। मुद्दा यह है कि सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है और अपने समर्थकों से इसका बचाव करवा रही है और ऐसा करने वालों में कइयों को सरकारी खजाने से वेतन मिलता है। दसरी ओर, समझा जा रहा है कि सेबी प्रमुख के रूप में मादवी पुरी बुच को इसीलिए बैठाया गया है। उनकी यह नियुक्ति अपनी तरह की पहले ही। देश में जब यह सब चल रहा है तो अखबारों की प्राथमिकता और खबरों की समझ बदल गई लगती है। ऐसा लग रहा है कि अखबारों के लिए अब बांग्लादेश मणिपुर से महत्वपूर्ण है, वहां के हिन्दू देश से ज्यादा जरूरी हैं और शेख हसीना को सुरक्षा देना सामान्य है।  

बांग्लादेश से संबंध और रीति-नीति

ऐसे में बांग्लादेश ने कहा है और टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने पर तीन कॉलम में छापा है कि हसीना के लंबे समय तक भारत में बने रहने से दिल्ली (यानी भारत) के साथ हमारे संबंध खराब नहीं होंगे। द टेलीग्राफ का आज का कोट इसी से संबंधित है, “द्विपक्षीय संबंध एक बड़ा मसला है …. अगर कोई किसी खास देश में ज्यादा रहता है तो इससे संबंध को क्यों प्रभावित होना चाहिये – मोहम्मद तौहीद हुसैन”, शेख हसीना का भारत में रहना लंबा हुआ तो द्विपक्षीय संबंधों के बारे में यह पूछे जाने पर। बांग्ला देश से संबंधित एक खबर आज नवोदय टाइम्स में है, कुड़ल में रोहिंग्या व बांग्लादेशियों की एंट्री बैन। भिवानी (सीमा पर होगा) डेटलाइन से इस खबर के अनुसार, जिले के गांव कुड़ल में रोहिंग्या औऱ बांग्लादेशी मुस्लिमों की एंट्री बैन कर दी गई है। इसे लेकर गांव के बाहर बोर्ड लगाया गया है। इसकी जिम्मेदारी बजरंग दल के जिला सुरक्षा प्रमुख प्रदीप उर्फ जोनी ने ली है। इसमें जो लिखा है वह ऊपर कतरन में पढ़ा जा सकता है। इसकी खास बात है, भाईचारे वाले लोग अपना ज्ञान अपने पास रखें। इससे आपको बांग्लादेश सीमा की हालत का अंदाजा लग जायेगा और यह तब है जब घुसपैठियों से प्रधानमंत्री उनकी पार्टी और समर्थकों की नाराजगी सार्वविदित है और नरेन्द्र मोदी को सत्ता में बैठे 10 साल वे चुके हैं और अब उनका तीसरा कार्यकाल चल रहा है।

दिलचस्प यह भी है कि नोटिस हिन्दी में है जबकि उस इलाके में बांग्ला ज्यादा चलता है। बांग्लादेश से लगने वाली सीमा की ऱखवाली का काम सीमा सुरक्षा बल का है और उसके डीजी का पद काफी समय से खाली था। उसके बाद जिन्हें डीजी बनाया गया उन्हें अदालत के आदेश पर वापस उनके मूल कैडर में भेज दिया गया और यह पद फिर खाली है। खबरों के अनुसार, इसी तीन अगस्त को (5 अगस्त को तख्ता पलट हुआ था) सशस्त्र सीमा बल के निदेशक को सीमा सुरक्षा बल के निदेशक का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है। पूर्णकालिक निदेशक की खबर मुझे आज नहीं मिली। इससे पहले मुझे सीमा पर लगे बाड़ को फांद कर भारत में घुसते लोगों का एक वीडियो मिला था और कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे बाड़ का कोई मतलब नहीं है जब लोग बगैर किसी साधन और बचाव के उसपर चढ़कर आराम से पार कर जायें। टहलते हुए भारतीय नागरिक या घुसपैठिये बन जायें। खासकर किसानों को दिल्ली में घुसने से रोकने के लिए किये गये उपायों के मद्देनजर। संक्षेप में कहा जा सकता है कि सीमा पर बाड़ के मुकाबले दिल्ली की व्यवस्था कई गुना मजबूत थी। आज ही अखबारों में खबर है कि शंभू सीमा अभी तक बंद है और इसे खोलने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह में सुझाव मांगे हैं अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, जरूरी सेवाओं और दैनिक यात्रियों के लिए खोलने का निकालें रास्ता।

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