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आज की दोनों बड़ी खबरें भाजपा के फायदे की हैं तो जानिये तीसरी और उसके बाद की खबरें

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में कोलकाता में डॉक्टर की हत्या की जांच सीबीआई को दिये जाने या बांग्लादेश के हिन्दुओं को युनूस का भरोसा ही दो बड़ी खबरें हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों खबरें अपनी वहज से नहीं, भाजपाई प्रचार हैं और भाजपा के खिलाफ हो सकने वाली खबरों को महत्व नहीं दिया गया है। इसीलिए मेरे सभी अखबारों में यही दो खबरें लीड या सेकेंड लीड हैं। सीबीआई की योग्यता आरुषि हत्याकांड के समय ही सामने आ गई थी। और निर्भया हत्या कांड के समय ऐसा प्रचारित किया गया था कि आरोपियों को सजा हो जाये तो फिर कोई अपराध करेगा ही नहीं। पर ऐसा हुआ नहीं। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में भाजपा नेत और उन्हें संरक्षण देने के मामले में भाजपा और संघ परिवार का जवाब नहीं है। ऐसे में ये दोनों खबरें ऐसी हैं नहीं जैसी बनाई गई हैं। अफसोस यह कि संतुलित दिखने की कोशिश में भाजपा विरोधी भी ऐसी खबरों को तवज्जो दे रहे हैं। हत्या अपनी जगह है, वह प्यार से नहीं की जाती है और निर्ममता के बिना संभव नहीं है और हत्यारों से कोई सहानुभूति नहीं हो तब भी खबर को खबर ही रहने देना चाहिये।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मेरे सातों अखबारों में लीड इन्हीं दो खबरों में से एक है। इसलिये, आज मैं सेकेंड लीड के बाद की बात करता हूं। ऊपर बताई गई दो खबरें क्यों भाजपाई हैं उसपर अलग से चर्चा हो सकती है और वह अलग मुद्दा है। मैं यहां उन खबरों की बात करूंगा जो आज अलग-अलग अखबारों में हैं जनहित से संबंधित हैं लेकिन प्रमुखता से नहीं छपी हैं या कम छपी हैं। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में अस्थिरता के मद्देनजर वहां से घुसपैठ हो सकती है। रोकने का काम सीमा सुरक्षा बल का है लेकिन सीमा सुरक्षा बल पूर्णकालिक डीजी के बिना काम कर रहा है। सीमा पर बाड़ की जो स्थिति है उसका जिक्र भी मैंने कल यहां किया था। कश्मीर में चुनाव होने हैं, आतंकवादी वारदातें बढ़ गई हैं और नरेन्द्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद की घटनाओं में 15 सैनिक शहीद हुए हैं। 57 दिन में 18 रेल हादसे हुए हैं, राज्यसभा के 12 मनोनीत सदस्यों में चार की जगह खाली है, सेबी प्रमुख का अपराध और कार्रवाई नहीं होना सर्वविदित है। आज एक नया मामला भी है। उसपर आगे।

टाइम्स ऑफ इंडिया में आज खबर है कि जम्मू और कश्मीर में सुरक्षा की स्थिति पर चुनाव आयोग आज केंद्रीय गृहसचिव से बात करेगा। खबर है कि राज्य में चुनाव की घोषणा होने वाली है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव कराने की अंतिम तिथि तय कर दी थी वह भी करीब है। इसी में बताया गया है कि असर, डोडा में कल गोलियां चलीं और इससे संकेत मिलता है कि अप्रभावित क्षेत्रों में भी आतंकवाद फैल गया है। यह 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाने के बाद की स्थिति है और लोकसभा चुनाव के समय ऐसी थी कि भाजपा ने घाटी में चुनाव लड़ने की भी जरूरत नहीं समझी।

नवोदय टाइम्स में लीड के बराबर छपी खबर के अनुसार, सेबी प्रमुख की कंपनी और उनके ऑडिटर का पता एक ही है। यह साधारण मामला नहीं है। भ्रष्टाचार दूर करने के नाम पर 10 साल में भारत सरकार ने लाखों शेल कंपनियां बंद करवाई हैं। ऐसा नहीं किया जाता तो हरेक का बैंक में कम से कम एक चालू खाता होता, सबमें न्यूनतम राशि रखने की बाध्यता रहती, एक कमरे में कई कंपनियां चलती हों तब भी हजारों कमरे किराये पर होते और कई कमरों के लिए एक सिक्यूरिटी गार्ड लगता हो और 24 घंटे के लिए कम से कम दो तो भी कुछ हजार सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी खत्म हो गई है। इसका लाभ पता नहीं है और जो बंद कराई गई उनकी क्या बात की जाये जब सेबी प्रमुख की कंपनी भी वैसी ही थी। दूसरी ओर, एनजीओ, लोकोपकारी संस्थाओं और दान व चंदे से काम करने वालों भी हजारों संस्थानों के एफसीआएए लाइसेंस रद्द किये गये हैं जिससे रोजगर की कमी के इस समय में नौकरियां गई हैं पर खबर नहीं है। खबर हो भी कैसे जब बीबीसी को रिपोर्टिंग की अपनी व्यवस्था बदलने के लिए बाध्य होना पड़ा है, विदेशी पत्रकारों को देश निकाला दिया जा चुका है और बाकी के लिए बन रहा प्रसारण विधेयक भले टल गया पर खबर कल सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड थी

द हिन्दू की सेकेंड लीड के अनुसार जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र देने वाले पोर्टल में गड़बड़ी के कारण प्रमाणपत्र जारी करने में देरी हो रही है और यह चार महीने से चल रहा है। खबर के अनुसार सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) केंद्र सरकार का केंद्रीयकृत पोर्टल है जो जन्म और मृत्यु के मामले दर्ज करता है। जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2023 के तहत एक अक्तूबर 2023 से रिपोर्ट किये जाने वाले जन्म और मृत्यु के सभी मामले crsorgi.gov.in पर दर्ज किये जाने हैं। यहां से डिजिटल जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। यह इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है। द हिन्दू ने इस संबंध में बिहार की एक चिट्ठी का जिक्र किया है जिसमें समस्याओं का जिक्र कर कहा गया है कि इनकी वजह से वहां विभाग के लोगों को जनता की नाराजगी झेलनी पड़ती है। डिजिटल इंडिया में पोर्टल खराब होना आम बात है। अभी, आयकर रिटर्न दाखिल करने की आंतिम तिथि 31 जुलाई से पहले ऐसी खबरें भी आई थीं। हैक कर लिया जाना और उससे नुकसान को मुद्दा ही नहीं है।   

हिन्दुस्तान टाइम्स में अधपन्ने की लीड है, उपराज्यपाल ने कहा गृहमंत्री कैलाश गहलोत 15 अगस्त को झंडा फहरायेंगे, मुख्यमंत्री की पसंद अतिशी नहीं। इसके साथ झंडोत्तोलन पर राजनीति में बताया गया है कि 6 अगस्त को मुख्यमंत्री ने एलजी को लिखा कि उनके बदले इस बार 15 अगस्त को आतिशी झंडा फरायेंगी। 9 अगस्त को तिहाड़ जेल ने केजरीवाल से कहा कि एलजी को उनकी चिट्ठी विशेषाधिकारों का दुरुपयोग है। 12 अगस्त को गोपाल राय ने कहा कि आतिशी द्वारा झंडा फहराये जाने की तैयारी की जाये 13 अगस्त को अधिकारियों ने कहा कि यह निर्देश कानूनन अवैध है। इसके बाद आज की खबर है जो शीर्षक है।

पिछले दरवाजे से शासन

यहां गौरतलब है कि मुख्यमंत्री जेल में हैं और लाट साब मनमानी कर रहे हैं। वह भी तब जब देश में लोकतंत्र है,  इमरजेंसी नहीं लगी है और चुनी हुई सरकार काम कर रही है। विधानसभा में जो बहुमत है वह अपनी जगह पर लोकसभा की सातों सीटें भाजपा को मिली है और प्रधानमंत्री पूछ चुके हैं …. ईवीएम जिन्दा है कि मर गया और ईवीएम के ‘जिन्दा’ होने के उदाहरणों पर संतोषजनक जवाब नहीं है और भाजपा की चले तो (मीडिया के एक बड़े वर्ग के सहयोग से) वह लोगों को यकीन दिला दे कि ईवीएम के खिलाफ बातें चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करने के लिए की जाती हैं। आप जानते हैं कि भाजपा को संविधान हत्या दिवस मनाने की याद 10 साल बाद आई! और जो हालात हैं उसमें सरकार समर्थक कह सकते हैं कि राज्यपाल खुद झंडा नहीं फहरा रहे हैं ये क्या कम है? या यही तो लोकतंत्र हैं।

आतिशी क्यों नहीं

यहां मैं यह बताना चाहूंगा कि झंडा फहराने के लिए कैलाश गहलोत के चुनाव का कारण जो भी हो, आम आदमी पार्टी ने इसका स्वागत किया है और कहा है कि इससे लोकतंत्र के सिद्धांतों का सम्मान हुआ है और झंडा फहराने के लिए नामांकित उपराज्यपाल की जगह निर्वाचित प्रतिनिधि को चुना गया है। आप जानते हैं कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान जब संजय सिंह और मनीष सिसोदिया भी जेल में थे और आम आदमी पार्टी के तमाम नेता केंद्र सरकार के खिलाफ सामने नहीं आ रहे थे, स्वाति मालीवाल ने अपनी ही पार्टी पर हमला कर दिया तब लगभग अकेले आतिशी ने मोर्चा संभाला और भाजपा से लोहा लिया। बेशक जो भाजपा में नहीं गये वे आम आदमी पार्टी के साथ हैं और जाने वाले चले ही गये। स्वाति मालीवाल का भी क्या बिगड़ गया, कुछ खरोंच के बदले ‘अपराधी’ कई महीने से जेल में है। ऐसे में स्वाति मालीवाल को भी चुन लिया जाता तो कोई क्या करता। कैलाश गहलोत तो फिर भी वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी विरोधी हरकत के लिए नहीं जाने जाते हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स में 11 जुलाई को प्रकाशित खबर

बाबा रामदेव का माफीनामा कुबूल

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की एक खबर है। इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने बाबा रामदेव और उनकी कंपनी पतंजलि के प्रबंध निदेशक बालकृष्ण की बिना शर्त माफी को स्वीकार कर लिया है और अवमानना का मामला बंद कर दिया है। कंपनी ने यह भी स्वीकार किया है कि वह भ्रम फैलाने और उत्पादों के बारे में गलत दावा करने वाले विज्ञापन नहीं देगी। अदालत ने उन्हें सख्त चेतावनी दी है कि भविष्य में किसी भी उल्लंघन के द्रुत और गंभीर परिणाम होंगे। यहां मुझे याद आता है कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने ही अपने पहले पन्ने पर छपी एक खबर में बताया था कि पतंजलि के तमाम प्रतिबंधित उत्पाद बाजार में मिल रहे थे और बाकायदा रसीद जारी कर बेचे जा रहे थे। जो उपलब्ध नहीं थे उन्हें मंगा देने का आश्वासन भी दिया जा रहा था। समझना मुश्किल नहीं है कि इस खबर के बावजूद माफी मिलने और मुकदमा खत्म होने का क्या मतलब है।

समझने की जरूरत यह है कि जिनकी खबर ही नहीं छपती उनका क्या हाल होगा और जब खबर विदेश में छपती है या विदेशी संस्था खुलासा करती है तो क्यों भाजपा पूरी ताकत से उसे बदनाम करने में लग जाती है। ताजा उदाहरण, हिन्डनबर्ग रिपोर्ट का है। सरकारी तंत्र और व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी ने ऐसी सूचना फैला दी है कि एक भाई ने फेसबुक पर पोस्ट किया है, “हिन्डनबर्ग की नेकनीयती पर भी सवालिया निशान हैं। ये भी साम्राज्यवादी टूल है जिसका लक्ष्य शेयर मार्केट से लाभ कमाना है।” यह तथ्य होते हुए भी गलतबयानी है क्योंकि हिन्डनबर्ग ने कभी अपने लक्ष्य से इनकार नहीं किया।

इसपर किसी ने आदित्य ठाकरे का बयान याद दिलाया है जिसमें कहा गया है कि असली देशद्रोही वह है जो सेबी मामले की जेपीसी जांच का विरोध कर रहा है। लेकिन इतने भर से ना वो समझने वाले हैं और ना कोई मानने वाला है। पर यह अलग मुद्दा है।

रोबोट की लिखी खबर

अमर उजाला में आज प्रचार वाली एक खबर प्रमुखता से छपी है। विज्ञापन ज्यादा होने के कारण अखबार में दो पहले पन्ने हैं। एक में कोलकाता में हुई हत्या की जांच सीबीआई को सौंपने और दूसरे में बांग्लादेश के हिन्दुओं की खबर लीड है। तीसरी प्रमुख खबर दूसरे पहले पन्ने की सेकेंड लीड का शीर्षक है, अनचाही कॉल करने वाली कंपनियों का कटेगा कनेक्शन। उपशीर्षक है, ट्राई का आदेश, ऐसी कंपनियां काली सूची में डाली जायेंगी। पर खबर में यह नहीं बताया गया है कि ऐसी कंपनियों की पहचान कैसे होगी। खबर के अनुसार ट्राई ने दूरसंचार कंपनियों को निर्देश दिया है कि अनचाही यानी स्पैम कॉल करने वाली गैर पंजीकृत टेलीमार्केटिंग कंपनियों के सभी दूरसंचार कनेक्शन काट दिये जायें। साथ ही उन्हें दो साल के लिए काली सूची में डाल दिया जाये। ट्राई से कहा गया है कि इसका पालन कर तत्काल ब्यौरा दिया जाये। खबर में लिखा है, इससे ग्राहकों को राहत मिलेगी।

खेल यहीं है और इसीलिए इस खबर को प्रमुखता मिली है और मैं इसकी चर्चा कर रहा हूं। मुझे लगता है कि आजकल अखबारों में सारी जिम्मेदारी बच्चों और नवसिखुओं को दे दी गई है और उसमें अस्पष्ट निर्देश होगा कि सरकार के खिलाफ खबरें नहीं छापनी है और प्रचार वाली को तान देना है। वही हो रहा है। इससे सस्ते में अखबार निकल जायेगा। इस खबर या आदेश का मतलब तब होता जब जनता से कहा जाता कि आप शिकायत कीजिये और बताइये कि कौन परेशान कर रहा है। लेकिन परेशान तो प्रधानमंत्री स्वयं कर रहे हैं और फोन करना मुश्किल कर दिया है। फोन करने पर वे हर घर तिरंगा अभियान का प्रचार करते सुनाई दे रहे हैं और यह कम परेशान नहीं करता है। पर मुद्दा वह नहीं है। खबर से लगता है कि सरकार को जनता की चिन्ता है लेकिन पढ़ने से समझ में आ जाता है कि गैर पंजीकृत यानी छोटी टेली मार्केटिंग कंपनियों को रोकने और बड़ी कंपनियों को निर्बाध कमाने का मौका देने का उपाय है।

आपके पास गैर पंजीकृत कंपनी के छोटे या सामान्य ग्राहकों के फोन नहीं आयें और उनकी बजाय तथाकथित पंजीकृत कंपनियों के हाई-फाई ग्राहकों के फोन आयें या प्रधानमंत्री की आवाज में प्रचार सुनाई पड़े फर्क क्या पड़ता है? सरकार की कोशिश अनचाहे कॉल रोकने या ऐसे विज्ञापनों को प्रतिबंधित करने की नहीं है बल्कि सरकार चाहती है कि जो करे वह राजकीय सेठ हो और राजकोष में दान (टैक्स) दे। आप जानते हैं कि छोटा कारोबारी शुरू में जब काम कम हो, बिना पंजीकरण कारोबार शुरू कर सकता है और उसके लिए टैक्स लेना जरूरी नहीं है। यह पुरानी सुविधा है। जीएसटी लागू होने के बाद सबके लिए शुरू में ही जीएसटी पंजीकरण आवश्यक कर दिया गया था और कुछ मामलों में गैर पंजीकृत सेवा प्रदाता से लोगों ने काम कराना बंद कर दिया। ऐसी छोटी कंपनियां या संस्थाएं जब मर गईं तो इसमें ढील दे दी गई।

टेलीमार्केटिंग में नई कंपनी यह सुविधा सस्ते में दे सकती हैं पर पंजीकरण कराने गये औऱ फंसे। जो नहीं करायेगा वह काम नहीं कर पायेगा पर राजकीय सेठ तो करेगा ही। ना आपको राहत ना सेवा लेने वाले को राहत, सरकार को टैक्स और जनता की चिन्ता करने वाला होने का प्रचार मुफ्त में। मैंने कल यहां लिखा था कि देश के कई अखबारों की खबरों को देखकर लगता है कि बांगलादेश भारत में है और मणिपुर बांग्लादेश में है। आज पद से हटने के बाद शेख हसीना का पहला बयान अखबारों में पहले पन्ने पर है। इसके अनुसार, उन्होंने कहा है कि आतंकवादी कृत्यों में शामिल लोगों को सजा मिले। यह दिलचस्प है क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री ने मणिपुर की बात अभी तक नहीं की है मजबूरी में जब किया था तो दूसरे राज्यों के मामलों का जिक्र ऐसे किया था जैसे सब बराबर हों।

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