
संजय कुमार सिंह
वैसे तो आज के अखबारों की लीड राष्ट्रपति का संबोधन होना चाहिये था। नवोदय टाइम्स के दूसरे पहले पन्ने की लीड है भी। प्रधानमंत्री अपनी पूर्ण घोषणा के अनुसार आज 15 अगस्त को लाल किले पर झंडा फहरायेंगे, 11वीं बार फहरा रहे हैं भी लीड हो सकती थी। अमर उजाला में दूसरे पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है भी। बांग्लादेश-भारत संबंध और बांग्लादेश का यह कहना कि मिलकर काम करना चाहते हैं, शेख हसीना के बयान से इसमें कोई सहायता नहीं मिल रही है – भी लीड हो सकती थी। इंडियन एक्सप्रेस में है। कोलकाता में डॉक्टर की मौत की जांच को लेकर चल रहा हंगामा भी लीड हो सकता था। द टेलीग्राफ में आज है भी। बाकी दो अखबारों, हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू में डोडा में कैप्टन की मौत लीड है तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने खनन कंपनियों को राज्यों को रॉयल्टी का भुगतान करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर को लीड बनाया है।
आज स्वतंत्रता दिवस पर, पांच साल पहले अनुच्छेद 370 हटाने की घोषणा और तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के दावे और प्रचार के बीच खबर तो यही है पर यह सभी अखबारों में लीड नहीं है क्योंकि व्यवस्था नहीं है, नियम नहीं है। पूर्व में मैंने लिखा है कि जनसत्ता में हमलोग अखबार देखकर बता देते थे कि किसने बनाया होगा। यह इसलिए था कि हम अपने साथियों को जानते थे और हमें आजादी थी कि हम अपनी पसंद की खबरों को लीड बनायें या सिंगल कॉलम। मीडिया के लिए यह आजादी या व्यवस्था जरूरी है तभी सभी अखबार अलग होंगे और एक से ज्यादा अखबार देखने का फायदा होगा वरना खबरों के लिए आप किसी वायर सर्विस की सेवा ले सकते हैं, दिन भर खबरें आती रहती हैं। महत्वपूर्ण खबरें दोहराई जाती रहती हैं। जहां तक अखबारों और टीवी चैनल की बात है वे दबाव बनाते हैं, सरकार के लिए मुद्दे बनाते और छिपाते हैं। सरकार, भाजपा या नरेन्द्र मोदी कहना चाहिये के पास ट्रोल सेना है जो यह सब करती, करवाती और नहीं करने वालों को ट्रोल करती है।
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से मीडिया का जो हिस्सा प्रचारक बन गया है वह एक जगह से निर्देश लेता लगता था और अक्सर अखबार एक जैसे होते थे। इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कहा जाता रहा है। कल मैंने बताया था कि लीड और सेकेंड लीड दोनों भाजपा के फायदे वाली खबरें थीं पर आज कैप्टन के शहीद होने की खबर के बाद हेडलाइन मैनेजमेंट गड़बड़ा गया और अब की स्थिति वैसी नहीं है जैसी तब थी जब सरकार को बहुमत था पर वह मुद्दा नहीं है। आज मुद्दा यह है कि अपराध की एक वारदात के बाद जब पुलिस पूरी ईमानदारी से सामान्य जांच कर रही थी तब उसपर दबाव बनाया गया, बंगाल सरकार को बदनाम करने की कोशिश की गई और जांच सीबीआई को सौंप दी गई।
इस तथ्य के बावजूद कि सीबीआई का रिकार्ड भी कोई अच्छा नहीं है और हम हत्या का मामला सुलझने से ज्यादा हत्या के लिए स्थानीय प्रशासन को बदनाम करना चाहते हैं। यह सब जगह नहीं होता है, पश्चिम बंगाल इसके लिए पसंदीदा राज्य है। और ऐसा दूसरे राज्यों में नहीं होता है। बुलडोजर न्याय, न्याय नहीं है, मुठभेड़ में हत्या सामान्य नहीं है, बलात्कारियों की सजा माफ होना अनुचित है पर सब चल रहा है। मीडिया के लिए ये सब मुद्दे नहीं हैं। यही नहीं, मीडिया के लिए, रिपोर्टिंग के लिए संसद में जगह कम हो रही है, संसद में पत्रकारों को शीशे में बंद कर दिया गया था। नये भवन में ऐसी कोई जगह ही नहीं है जहां पत्रकार नेता के साथ मिल बैठ कर बतिया सके। खबर निकालने, लेने, देने का अपना काम कर सकें। ऐसे में जो हो रहा है, मीडिया के साथ भी, वह सब कुछ मीडिया भी नहीं बता रहा है। पीआईबी खबरें देने की जगह फैक्ट चेक कर रहा है।

कोलकाता में डॉक्टर की हत्या के मामले की जांच हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई को दे दी गई। हाईकोर्ट का फैसला कानूनी मामला है लेकिन पुलिस के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील और पांच दिन में आदेश – व्यवस्था का मामला है। उसी व्यवस्था का जिसमें सुप्रीम कोर्ट कहती है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद तथा सुप्रीम कोर्ट ही एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को जमानत नहीं दे रही है जबकि मामला स्वास्थ्य का भी है। मैं नहीं जानता इलाज के लिए जमानत देने से कौन सा कानून टूट जायेगा या डर है कि मुख्यमंत्री भाग जायेंगे। या सुप्रीम कोर्ट ने कारण क्या बताये हैं पर मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने जब एक उचित व्यवस्था बहाल करने की कोशिश में अरविन्द केजरीवाल को चुनाव प्रचार के लिए जमानत दी तो कहा गया कि उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट मिला है। मुझे लगता है कि आम जनता ने कहा हो तो कहा हो, गृहमंत्री को दोहराना नहीं चाहिये था।
इसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि वे कहने वालों का समर्थन कर रहे हैं और दूसरा उनके कहने को लोग सच मान लेंगे। सुप्रीम कोर्ट कार्रवाई करती तो मुश्किल नहीं करती तो मुश्किल है ही। और यह मामला व्यवस्था का है जो भिन्न कारणों से बनी है। इसमें मीडिया की भूमिका भी है। मीडिया अरविन्द केजरीवाल (मुख्यमंत्री) को जमानत नहीं मिलने को तो मुद्दा नहीं ही बनाता है तमाम आरोपियों को वाशिंग मशीन पार्टी में ले लिये जाने और फिर जांच ठंडे बस्ते में डाल दिये जाने को भी मुद्दा नहीं बनाता है और बनाता भी है तो उसे विदेशी साजिश कह दिया जाता है। जैसा सेबी प्रमुख के मामले में हुआ है। उनकी शेल कंपनी खबर नहीं बनी। उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं हो रही है जैसे बलात्कारी और हत्यारे के खिलाफ कार्रवाई की मांग हुई। अपराधी तो वो भी हैं, न्यायालय ने नहीं कहा हो या सफेदपोश ही सही।
इसमें कोई शक नहीं है कि मीडिया के बड़े वर्ग की भूमिका सकारात्मक नहीं रह गई है और वह राजनीति कर रहा है। जो नहीं कर रहा है उसपर निष्पक्ष रहने, राजनीति नहीं करने और आलोचना करते हो तो प्रशंसा भी करो जैसा दबाव है और यह दबाव भी मीडिया का वही बड़ा वर्ग बनाता है। दूसरी ओर, जज चुनाव लड़ रहे हैं। ईनाम पा रहे हैं और भले ही पहले होता रहा हो, अब बहुत बढ़ गया है। ऐसे में हत्या का कोई मामला जल्द निपटाने के लिये पुलिस पर दबाव होगा तो वह किसी को पकड़ कर बंद कर देगी और एक कहानी सुना देगी। लोगों का गुस्सा शांत हो जायेगा। पर हर कोई ऐसा नहीं कर सकता है और इसकी अपेक्षा करनी भी नहीं चाहिये। पुलिस पर भरोसा किया जाना चाहिये उसे समय दिया जाना चाहिये। पुलिस की जांच के बाद जो साधन, तरीके हैं उसका उपयोग उसके बाद किया जाना चाहिये और यह समझना होगा कि यह बिल्कुल संभव नहीं है कि कोई भी अपराध किसी निश्चित समय में सुलझा लिया जाये और जब हत्यारों-बलात्कारियों की सजा माफ हो जा रही है, तमाम मामले में पकड़े ही नहीं गये हैं तो एक मामले में क्यों जरूरी या जल्दी हो। जहां तक मीडिया का मामला है, मीडिया ने सामूहिक रूप से रिया चटर्जी को लिन्च कर दिया था।
कहने की जरूरत नहीं है कि कोलकाता के इस मामले में सब हुआ और यह सब राजनीति है। सीबीआई जांच करेगी तो जरूरी नहीं है कि अपराध सुलझ ही जाये या पुलिस जिसे अपराधी बताये वही अपराधी हो। इसका पता इस बात से चलता है कि अदालतों में पुलिस (जांच एजेंसी) अपनी कहानी साबित नहीं कर पाती है। यह भी व्यवस्था है। हमें इसके साथ रहना-जीना सीखना चाहिये या फिर व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए काम करना चाहिये। व्यवस्था ठीक होगी तो किसी भी हत्यारे और किसी भी बलात्कारी के खिलाफ कार्रवाई होगी उसे उचित सजा मिलेगी। व्यवस्था ठीक नहीं होगी तो आप चाहेंगे कि उन मामलों में तो सजा मिले ही जिनमें आप चाहते हैं। और अभी यही स्थिति है। मुझे लगता है कि कोलकाता पुलिस को समय दिया जाना चाहिये था। मुख्यमंत्री ने घोषणा भी की थी पर मीडिया का दबाव था, हाईकोर्ट का आदेश आ गया। कोई जरूरी नहीं है कि इससे अपराध सुलझ जाये और अपराधी को सजा हो ही जाये। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिये कि हर अपराधी को पता हो और डर हो कि वह बचेगा नहीं।
अभी ऐसा नहीं है। निर्भया के बाद भी, मीडिया के हंगामे और शोर के बाद भी। द टेलीग्राफ की आज की लीड से लगता है कि डॉक्टर की हत्या की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के बाद भी बलात्कार और हत्या का विरोध हुआ। उसकी रिपोर्टिंग बिल्कुल अगल है और कुल मिलाकर कोलकाता जैसे शहर में मामला वैसा नहीं था जैसा हिन्दी पट्टी में होता है। लेकिन राजनीति और मीडिया ने उसे वैसा ही बना दिया और यह गुस्सा उसका भी है। गुस्सा तो कोलकाता के पुलिस प्रमुख को भी है पर उसे समझना आसान नहीं है और राजनीति उसे समझने नहीं देगी। अभिनेता सुशांत सिंह के मामले में मीडिया ने अभिनेत्री रिया चटर्जी को लिन्च कर ही दिया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना था कि मीडिया ट्रायल गलत है। पर हुआ क्या? बॉम्बे हाई कोर्ट ने तब कहा था कि मीडिया ट्रायल किसी आपराधिक मामले की निष्पक्ष जांच में बाधा पैदा करता है।
मीडिया के आत्म नियमन की बात में कोई पवित्रता नहीं है। मीडिया चैनलों द्वारा मुंबई पुलिस की आलोचना को गलत माना गया था पर हमने, हमारे समाज और हमारी व्यवस्था ने क्या किया? आज तक डॉट इन की एक खबर के अनुसार तब हाईकोर्ट ने कहा था, ‘हमने मौत और आत्महत्या के मामलों की रिपोर्टिंग के बारे में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को लेकर प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया की ओर से दिशा निर्देश तैयार किये गये हैं। इस मामले में यह सब कहां है। कोलकाता के पुलिस प्रमुख ने हत्या पर हंगामे का कारण संदिग्ध मीडिया अभियान को ठहराया है। आप जानते हैं कि घटना नौ अगस्त को हुई थी, 10 को बंगाल पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। 12 को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद पीड़ित परिवार से मिलीं। सबों ने घटना की निंदा की और यह दूसरे राज्यों की तरह नहीं था। कोई मुंह सिल कर नहीं बैठा था। कार्रवाई चल रही थी। पर खबरें और उनका तेवर देखिये।
मुद्दा यह है कि अनुच्छेद 370 हटाने के भारी प्रचार के बावजूद कश्मीर में स्थिति नहीं सुधरी, नोटबंदी से आतंकवाद भी खत्म हो जायेगा के बावजूद आतंकवाद जारी है, तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना बहुत बड़ी योग्यता हो तो भी घाटी का आतंकवाद बाहर तक फैल गया है। प्रशासन और व्यवस्था नाम की चीज नहीं है। सीबीआई और ई़डी के अफसर भी रिश्वत लेते पकड़े गये हैं, भ्रष्टाचार के आरोपियों को खरीदकर, पटा कर ब्लैक मेल करके सरकारें बनाई और गिराई गई हैं। मीडिया इस पर बात नहीं करता, यू ट्यूब वाले करते हैं तो उन्हें ट्रोल किया जाता है वो भी दबाव में हैं। और अब यह दिख रहा है। कोलकाता की एक हत्या पर वीडियो नहीं बनाने की तुलना मणिपुर पर बनाये गये वीडियो से की जा रही है। बांग्लादेश के हिन्दुओं की चिन्ता मणिपुर के नागरिकों से ज्यादा दिख रही है। और ऐसे में मीडिया अपना काम निष्पक्ष होकर करने लगे तो क्या होगा? होगा तो यू-ट्यूब के वीडियो से भी पर सबको नियंत्रित रखने के लिए ट्रोल सेना लगा दी गई है।
इंडियन एक्सप्रेस में आज एक खबर है, “सीएएस ने अपील खारिज की, विनेश को मेडल नहीं मिलेगा; भारतीय ओलंपिक संघ ‘आगे के विकल्प’ तलाश रहा है” – मुझे लगता है कि जो कुछ किया जाना था वह समय पर नहीं हुआ, जो हुआ वह ठीक नहीं हुआ या गलत था तो अब ओलंपिक एसोसिएशन अपने ऊपर लगे दाग धोने की कोशिश में है। इस क्रम में विनेश को पूरी तरह दोषी ठहराया जा सकेगा, जिसकी जरूरत नहीं है या जिसमें कामयाबी नहीं मिलेगी। देश में सरकारी एजेंसियों और मीडिया के काम का आलम यह हो गया है कि कोलकाता पुलिस प्रमुख ने मीडिया वालों से साफ-साफ कहा है कि आपने हमें बदनाम किया। इसका यह असर हुआ कि लोगों का हमपर भरोसा कम हुआ है। हम बिना सबूत किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकते, पर दबाव था। हम वही करेंगे, किया है जो हमें ठीक लगा। सीबीआई के काम से कौन परिचित नहीं है। खासकर बंगाल में। उधर, बिहार में भी एक बलात्कार और हत्या हुई है। क्या इस मामले में मीडिया की भूमिका वैसी ही रहेगी? देखते रहिये, पढ़ते रहिये। और याद रखिये कि बलात्कार और हत्या से नाराज आधी रात की रैली का नारा था, “आमार घर, तोमार घर / आरजी कार, आरजी कार”। इसका मतलब है आर जी कार अस्पताल हमारा घर है, तुम्हारा भी घर है (वहां बलात्कार और हत्या का क्या काम)। कोलकाता से बाहर के मध्यम वर्गीय नागरिकों (और मीडिया वालों) को अगर यह चिन्ता थी या यह दिखाने का प्रयास किया गया कि अस्पताल में डॉक्टर के साथ बलात्कार किया उसकी हत्या की गई तो उसपर बंगाल को लोगों का नजरिया ऐसा है। हिन्दी पट्टी वालों की सोच को वहां पहुंचने में अभी बहुत देर है। मुझे नहीं लगता है कि जब वे इस राजनीति को नहीं समझ रहे हैं तो उनकी सोच कभी ऐसी होगी।


