
संजय कुमार सिंह-
आज के अखबारों में सबसे दिलचस्प खबर द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर लीड के साथ सिंगल कॉलम में छपी है। खबर का शीर्षक है, हाथरस मामले की जांच करने वाले पुलिस अफसर ही आरजी कार बलात्कार और हत्या के मामले की जांच करेंगे। खबर के अनुसार, सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक संपत मीणा आरजी कार में एक जूनियर डॉक्टर के कथित बलात्कार और हत्या की जांच कर रहे सीबीआई के 24 सदस्यीय दल का नेतृत्व कर रहे हैं। एजेंसी के एक अधिकारी ने कहा कि झारखंड कैडर के आईपीएस अधिकारी मीणा ने इससे पहले, 2020 में हाथरस में 19 वर्षीय दलित लड़की के बलात्कार और हत्या तथा 2017 में उन्नाव में 17 वर्षीय दलित लड़की के बलात्कार की जांच का नेतृत्व किया था। दोनों अत्याचार उत्तर प्रदेश में हुए थे। हाथरस मामले में पीड़िता के शव को उत्तर प्रदेश पुलिस ने एम्स, दिल्ली से लेकर आगे की कोई जांच किए जाने से पहले ही पुलिस की निगरानी में अंतिम संस्कार कर दिया था। अगड़ी जातियों के स्थानीय गांव के दबंग लोगों ने खुले तौर पर प्रशासन और कानून को कथित अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने की चुनौती दी थी। रिपोर्टिंग के लिए हाथरस जा रहे केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को गिरफ्तार कर लिया गया था और उन्हें जेल से छूटने में दो साल चार महीने लग गये थे। आप जानते हैं कि कोलकाता के आरजी कार मामले में स्थानीय पुलिस की जांच से असंतुष्ट लोगों की शिकायत पर जांच का काम सीबीआई को सौंप दिया गया है। सीबीआई जांच में किसी प्रगति की सूचना से पहले आज यह खबर अपने आप में महत्वपूर्ण है।
इस हत्याकांड का उपयोग मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए भी किये जाने की आशंका है। यह अलग बात है कि डॉक्टर रेप-हत्याकांड के विरोध में ममता बनर्जी सड़क पर आंदोलन कर चुकी हैं। अभियक्तों के लिए मृत्युदंड की माग कर चुकी हैं। झूठे आरोपों के साथ निराधार आशंकाओं के बावजूद अब तक न तो सरकार के खिलाफ कुछ मिला है और ना जांच में ढिलाई के आरोपों में दम साबित हुआ है। सीबीआई भी कुछ नया नहीं ढूंढ़ पाई है और तमाम प्रचारकों के प्रचार का सच मुंह के बल गिर चुका है। आज खबर है (हिन्दुस्तान टाइम्स), पीड़िता के परिवार ने पश्चिम बंगाल प्रशासन पर गवाहों को प्रभावित करने का आरोप लगाया है। खबर के अनुसार यह ऐसा आरोप है जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ गुस्सा बढ़ा सकता है। अभी ही वे इस मामले में ठीक से कार्रवाई नहीं करने के लिए लोगों की नाराजगी का सामना कर रही हैं। सरकार के खिलाफ राज्यपाल ने भी मोर्चा खोला है और अमर उजाला ने उसे लीड बनाया है। शीर्षक है, “पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का पतन … सभी सांविधानिक विकल्प खुले : राज्यपाल”। उपशीर्षक है, राज्यपाल बोस का बड़ा आरोप कानून व्यवस्था पर उठाये सवाल कहा-प्रदेश महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं …. गृहमंत्री अमितशाह से करेंगे आज मुलाकात।
यहां आपको याद दिला दूं कि, चार जुलाई की एक खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस पर छेड़खानी और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली पीड़ित महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। राजभवन में संविदा पर तैनात रही कर्मचारी ने राज्यपाल के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। राजभवन ने इस मामले को झूठा करार दिया था। 19 जुलाई की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्र को एक साथ नोटिस भेजा है। शीर्ष अदालत ने इस मामले से निपटने में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से सहायता करने को कहा। उसने पश्चिम बंगाल राजभवन की महिला कर्मचारी से कहा कि वह अपनी याचिका में केंद्र को भी पक्षकार बनाए। आप जानते हैं कि राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पद के तहत प्राप्त शक्तियों के इस्तेमाल और कर्तव्यों के लिए किसी भी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। ऐसे में चर्चा इस बात पर भी होनी चाहिये कि मौजूदा स्थिति में राज्यपालों की यह सुरक्षा कितनी जरूरी और जायज है। जहां तक राज्यपाल के अधिकारों की बात है, आपने पढ़ा होगा कि कर्नाटक के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी है। राज्य सरकार ने इसका विरोध किया है और आज खबर है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने सिद्धरमैया को अस्थायी राहत दी है।
दूसरी ओर, कोलकाता में बलात्कार और हत्या के इस मामले का विरोध अभी भी जारी है। द टेलीग्राफ में आज भी इस विरोध की खबर लीड है और उसका शीर्षक है, ऐसा विरोध जैसा पहले कभी नहीं हुआ। यही नहीं, दो और खबरें मिलाकर इस कांड से संबंधित कुल चार खबरें आठ कॉलम के एक फ्लैग शीर्षक के तहत छपी है। सीबीआई जांच की खबर के बाद यह लीड है। इसमें कहा गया है, कई कलकत्तावासियों का मानना है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने करियर में पहली बार आम नाराजगी को इस हद तक गलत पढ़ा है कि उन्हें पहले से कहीं अधिक गंभीर प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले का स्वत: संज्ञान लेने के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए हैं। नौ अगस्त के बाद से विरोध प्रदर्शन का पैमाना अद्वितीय रहा है। कई लोगों ने पुलिस और राज्य प्रशासन की ओर से पारदर्शिता की कमी और इससे भी महत्वपूर्ण, सहानुभूति की कमी का आरोप लगाया है। जब महिलाएं ज़ोर-शोर से मांग कर रही हैं कि रातें और दिन के सभी समय उनके लिए सुरक्षित बनाए जाएं, तो सरकार ने यथासंभव महिलाओं को रात की पाली से दूर रखने के इरादे से प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
इससे अलग, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड में बलात्कार और हत्या की वारदातें होती रहती हैं। देहरादून के अंतरराज्यीय बस अड्डे पर 12-13 अगस्त की रात एक नाबालिक से बलात्कार के मामले में अभी तक विवरण भी ठीक से उपलब्ध नहीं हैं। आज तक डॉट इन की खबर के अनुसार, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की ओर से 17 अगस्त को दी गई तहरीर के बाद पुलिस ने पटेल नगर थाने में मामला दर्ज किया और जांच शुरू कर दी है। पीड़िता मुरादाबाद की रहने वाली है। उसकी मानसिक स्थिति भी खराब बताई जा रही है। इस मामले में पांच आरोपी गिरफ्तार किये गये हैं। इसमें दो ड्राइवर, क्लीनर, सफाई कर्मचारी और एक कैशियर शामिल है। इस मामले में कोलकाता जैसा कोई हंगामा नहीं है। खबर भी पहले पन्ने की नहीं है क्योंकि पीड़िता आम आदमी है और उसकी मानसिक स्थिति भी खराब बताई जा रही है। जो भी हो, इसे आप हिन्दी पट्टी और बंगाल के समाज का अंतर मान सकते हैं हालांकि, कोलकाता मामले को गंभीर बनाने में भाजपाई प्रयासों का भी योगदान है और इनमें झूठे तथ्य शामिल हैं। इनकी भी जांच चल रही है। उधर, महिला डॉक्टर से बलात्कार और हत्या के बाद के आंदोलनों तथा आईएमए की मांग का असर यह हुआ है कि केंद्र सरकार के अस्पतालों में सुरक्षाकर्मियों की संख्या 25 प्रतिशत बढ़ाई जायेगी (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार, सोशल मीडिया पर हमलों की शिकार कोलकाता पुलिस ने सोशल मीडिया वालों के खिलाफ कारवाई शुरू की है और एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने के साथ 280 अन्य को नोटिस भेजे गये हैं। इनमें छात्र, डॉक्टर, यूट्यूबर्स और बीजेपी तथा तृणमूल कांग्रेस के नेता भी शामिल हैं। कुल मिलाकर 280 लोगों को यह नोटिस कथित तौर पर “गलत सूचना” फैलाने या “तस्वीरें डालने या पहचान उजागर करने” के लिए है। ये नोटिस, दरअसल, सिर्फ पश्चिम बंगाल के लोगों को ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई सोशल मीडिया प्रोफाइल वालों को भी भेजा गया है। पुलिस सूत्रों ने कहा कि इनमें फर्जी या गुमनाम प्रोफाइल शामिल हैं, कुछ का इरादा मामले को सांप्रदायिक रंग देने का लगता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ “भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट” साझा करने के आरोप में सोमवार को पश्चिम बंगाल पुलिस ने 23 वर्षीय बीकॉम द्वितीय वर्ष के छात्र को गिरफ्तार किया है। इससे संबंधित खबर यह भी है (पहले पन्ने पर नहीं) कि सरकार नया ब्रॉडकास्ट विधेयक लाने पर विचार कर सकती है। खबर के अनुसार सरकार का इरादा कंटेंट तैयार करने वालों की अर्थव्यवस्था का समर्थन करना है और संबंधित विधेयक लाने से पहले सघन सलाह-मश्विरा करेगी।
तमाम मनमानियों और तानाशाही पूर्ण कार्रवाई के बाद नरेन्द्र मोदी की तीसरी सरकार के प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार कहा है, हम बेहद लचीले हैं। हम खुले दिमाग वाले हैं और हम चाहते हैं कि यह पूरा नया माध्यम फले-फूले। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सरकार के बने रहने के लिए आवश्यक समर्थन को बनाये रखने की मजबूरी है। आज ही हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर है कि सरकार ने लैटरल एंट्री की अपनी योजना को पीछे कर दिया है और सहयोगी दलों के नेताओं में एक, चिराग पासवान ने इसका विरोध किया है। राहुल गांधी ने रविवार को कहा था कि ‘लेटरल एंट्री’ के जरिये भर्ती ‘राष्ट्र विरोधी कदम’है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि इस तरह की कार्रवाई से आरक्षण का हक छीना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूपीएससी के बजाय आरएसएस के माध्यम से लोक सेवकों की भर्ती करके संविधान पर हमला कर रहे हैं। राहुल गांधी के अनुसार, मैंने हमेशा कहा है कि शीर्ष नौकरशाहों समेत देश के सभी शीर्ष पदों पर वंचितों का प्रतिनिधित्व नहीं है। उसे सुधारने के बजाय ‘लैटरल एंट्री’ से उन्हें शीर्ष पदों से और दूर किया जा रहा है। यह यूपीएससी की तैयारी कर रहे प्रतिभाशाली युवाओं के हक पर डाका और वंचितों के आरक्षण समेत सामाजिक न्याय की परिकल्पना पर चोट है।
केंद्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इसपर तथाकथित पलटवार किया था और कहा था, लेटरल एंट्री की शुरुआत तो कांग्रेस ने ही की थी। 1976 में मनमोहन सिंह को लेटरल एंट्री के जरिए फाइनेंस सेक्रेट्री बनाया गया था। बाद में कांग्रेस ने मोंटेक अहलूवालिया को प्लानिंग कमीशन का डिप्टी चेयरमैन लेटरल एंट्री के जरिए ही बनाया था। केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि राहुल गांधी बिना सोचे समझे कुछ भी बोल रहे हैं। उन्होंने राहुल गांधी के इस आरोप को भी निराधार बताया कि आरएसएस के लोगों को लोकसेवक के रूप में नियुक्त किया जाएगा। आप समझ सकते हैं कि इस पलटवार में कितना दम है और उदाहरण कितने मजबूत हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस ने 1976 में अगर कुछ किया था तो वही काम 2024 में भाजपा या आरएसएस के करने से सही कैसे हो जायेगा। 1976 में गलत था और कांग्रेस ने किसी मजबूरी या स्वार्थ में किया हो तो भाजपा बताये कि अभी कौन सी मजबूरी या स्वार्थ है। वैसे भी, 1976 में आरक्षण नहीं था और तब जिसकी जैसी हिस्सेदारी उसकी वैसी भागीदारी नहीं हो पा रही थी। और अभी तक नहीं हुई है तो अब करना जरूरी है। हिन्दुओं की रक्षा और भलाई के लिए भी!
भाजपा के 10 साल के शासन का हासिल यह है कि कश्मीर से न सिर्फ अनुच्छेद 370 हटा दिया गया बल्कि उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया। इसका ऐसा विरोध रहा कि भाजपा ने घाटी में लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा और राज्य विधानसभा तो छोड़िये स्थानीय निकाय के चुनाव भी नहीं हो पाये। सुप्रीम कोर्ट में अब चुनाव की घोषणा की गई है तो आतंकवाद बढ़ा हुआ है, घाटी से जमीन तक आ चुका है और आज भी एक इंस्पेक्टर के शहीद होने की खबर है। ऐसे में नेशनल कांफ्रेंस ने राज्य का दर्जा और 370 वापस लाने का प्रण किया है। आपको याद होगा, 2019 में 370 हटाने से पहले 2016 में नोटबंदी के फायदों में बताया गया था कि इससे आतंकवाद कम होगा और नकली नोट की समस्या भी खत्म हो जायेगी। अब तीसरी बार शपथग्रहण के दिन से ही वारदातें हो रही हैं और खबर थी कि बाजार में 500 के नोट दो तरह के हैं। मैं इसपर पहले लिख चुका हूं आज एक एटीएम से मिले 500 के चार नोट दूसरे बैंक की मशीन में जमा नहीं हुआ। तीन बार की कोशिश में जब मशीन ने नोट लैटा दिये तो मैने जोखिम नहीं लिया। पहले कम पढ़े लिखे औऱ कमजोर लोगों के पास नकली नोट हो तो धमका कर भगा दिया जाता था नोट पर निशान लगा दिया जाता था और भले देने वाले ने ठगा हो, पाने वाला आगे नहीं चला सकता था औऱ यह गरीबों के साथ ही होता था। अच्छे दिन में मशीन ‘नकली’ नोट नहीं लेगी, बाजार में कोई दिक्कत नहीं है, दो तरह के चल ही रहे हैं।


