
समरेंद्र सिंह-
खबर है कि दिलीप मंडल साहब को सूचना और प्रसारण मंत्रालय में मीडिया एडवाइजर के तौर पर नियुक्त किया जा रहा है। हालांकि अभी इसकी आधिकारिक घोषणा होनी है। लेकिन खबर में दम है। इस खबर का जोरदार स्वागत होना चाहिए। दिलीप मंडल जी एक संवेदनशील इंसान हैं। इस दौर के सर्वाधिक प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक हैं। मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। बड़े मीडिया संस्थानों में संपादक रहे हैं।
दिलीप मंडल साहब के साथ आने से सिस्टम ज्यादा उदार, समावेशी और प्रभावी बनेगा। साथ ही इस एक फैसले से तमाम अन्य गंभीर बुद्धिजीवियों के लिए सिस्टम में शामिल होने के दरवाजे खुलेंगे, जो सिस्टम में शामिल होकर देश के निर्माण में अपना योगदान देना चाहते हैं।


विरोधी नेताओं के लिए बीजेपी के दरवाजे खुले तो पार्टी का विस्तार हुआ। ये और बात है कि बाद में अति हो गई। अति खतरनाक होती है। लेकिन संघ और बीजेपी के बौद्धिक धड़े में जड़ता कुछ ज्यादा ही रही है। इसी वजह से यदा कदा मौकों पर विरोधी राय रखने वाले पब्लिक इंटलेक्चुअल्स को भी ये बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। उनके लिए इस सिस्टम के दरवाजे बंद थे।
कुछ समय पहले मेरे एक मित्र की नियुक्ति एक प्रदेश में मीडिया एडवाइजर के पद पर हुई। संघ से जुड़े कुछ लोगों ने इतना विरोध किया कि उन्होंने खुद ही मना कर दिया। मेरी जान पहचान में ऐसे कई मामले हैं। ऐसी कई नियुक्तियां हैं जो बाद में रद्द की गईं या फिर सम्मानित और संवेदनशील लोगों ने विवाद में उलझने की जगह खुद ही मना कर दिया। ये सही नहीं हुआ।
बहुत से बुद्धिजीवी और अपने-अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट उम्र के ऐसे पड़ाव में हैं जहां वो अपने अनुभव का इस्तेमाल करके नीतियों के स्तर पर सुधार लाना चाहते हैं। देश की व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। बाहर बैठ कर हर रोज रोने की जगह व्यवस्था में भीतर से बदलाव लाना चाहते हैं। काम करना चाहते हैं। ऐसे लोगों का स्वागत होना चाहिए। उन्हें अवसर देना चाहिए।
हालांकि दिलीप मंडल साहब की नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा होनी है। और जब तक आधिकारिक घोषणा नहीं हो, तब तक कुछ भी होने की गुंजाइश बनी रहती है। फिर भी मैं ये खबर सुन कर उत्साहित हूं। मुझे ऐसा लग रहा है कि बीजेपी और संघ में आंतरिक सिस्टम को अधिक समावेशी और उदार बनाने की समझ विकसित हो रही है। ये खुद उनके लिए तो अच्छी खबर है ही देश के लिए भी अच्छी खबर है। मैं ऐसी हर खबर का स्वागत करता हूं।
किसी भी देश की सरकार को सबको साथ लेकर चलना होता है। और सबको साथ लेकर चलने का फ्रेमवर्क तैयार करना होता है। संविधान और कानून बनाए जाते हैं। उनमें संशोधन होता है। वक्त की जरूरत के हिसाब से बदलाव होता है। जो भी फ्रेमवर्क जितना मानवीय है, वहां की व्यवस्था उतनी ही अच्छी है।
डॉ आंबेडकर इसे अच्छे से समझते थे। डॉ आंबेडकर के महात्मा गांधी और नेहरू से मतभेद जग जाहिर थे। कांग्रेस और उसके नेतृत्व से गहरे मतभेद के बाद भी डॉ आंबेडकर ने संविधान बनाने की प्रक्रिया में शामिल होना स्वीकार किया तो उनका उद्देश्य साफ था। वो देश के वंचित तबकों के अधिकार को ताकतवर लोगों के रहमोकरम पर नहीं छोड़ना चाहते थे। वो उनका अधिकार सुरक्षित करना चाहते थे। वो चाहते थे कि संविधान के जरिए दलितों और आदिवासियों की, वंचित और बहिष्कृत तबकों की भागीदारी तय की जाए। बिना पद और पॉवर के ऐसा करना संभव नहीं था। इसलिए उन्होंने गांधी का प्रस्ताव मंजूर किया, समझौता किया और संविधान बनाना मंजूर किया।
आज दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को जो भी अधिकार मिले हैं, उनमें डॉ आंबेडकर का वो समझौता शामिल है। उन्होंने अपने आप से समझौता किया, नेहरू और पटेल से हाथ मिलाया और संविधान में ऐसे प्रावधान किए, जिनसे व्यवस्था में दलितों, आदिवासियों की भागीदारी, हिस्सेदारी सुनिश्चित हुई। गांधी के दबाव देने पर समझौता नेहरू और पटेल ने भी किया। इस धरती पर बिना समझौता किए कोई बड़ा बन गया हो ऐसा नहीं हुआ है। कुकुरमुत्तों और चिल्लरों को ये भ्रम हो सकता है। लेकिन उनकी कभी कोई हैसियत नहीं होती।
डॉ आंबेडकर आज के ज्यादातर मूर्ख बहुजन बुद्धिजीवियों की तरह सोचते तो हिस्सेदारी और भागीदारी की लड़ाई का वो हथियार – जिसे हम संविधान के तौर पर जानते हैं, हासिल नहीं होता। कम से कम उस रूप में तो हासिल नहीं ही होता जिस रूप में हासिल है।
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