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पिछले 10 साल में दिलीप मंडल जी ने किसका प्रचार नहीं किया, जिसका किया जोरशोर से किया!

रंगनाथ सिंह-

श्रीमान जी, आपको प्रसाद वितरण से किसने रोका था?इसे दिलीप मंडल की महिमा समझनी चाहिए कि आज सुबह उठकर फोन उठाया तो पहला मैसेज यह दिखा कि दिलीप जी ने डीपी बदल दी है! सुनकर अच्छा लगा, दिन आगे बढ़ा। थोड़ी देर बाद जब लैपटॉप ऑन करके सोशलमीडिया पर आया तो पहला ट्वीट दिलीप जी पर दिखा। दिलीप जी आदतन टॉप ट्रेंड में थे मगर उस ट्वीट का एक टुकड़ा मुझे चुभ गया इसलिए यह पोस्ट लिख रहा हूँ। ट्वीटजीवी का कहना है कि दिलीप जी को “….प्रचार का प्रसाद मिल गया!” आगे बढ़ने से पहले कह दूँ कि मेरा दिलीप जी से किसी तरह का कोई निजी परिचय नहीं रहा है। कुल जमा दो बार सार्वजनिक कार्यक्रम में संयोगवश आमने-सामने होने पर कुछ सेकेंड का परिचय प्राप्तिकरण हुआ है।

संस्कृत साहित्य की प्रसिद्ध उक्ति है- मौनं स्वीकृति: लक्षणम्! तीन दिन से टॉप ट्रेंड में रहने के बावजूद भी दिलीप जी चुप हैं तो इसका अर्थ है कि केवल डीपी नहीं बदली है। उन्होंने नई नौकरी का संकेत दे दिया है मगर वह क्या है, इसका पक्का पता नहीं चला है। जिसने भी थोड़ी इंग्लिश पढ़ी है वह मानता है कि जब तक घोड़ा अपने मुख से न बोल दे तबतक पूरा यकीन नहीं करना चाहिए। क्या प्रसाद मिला है, यह जब पता चलेगा तब चलेगा मगर प्रसाद चर्चा पर मैं सुधी जन को याद दिलाना चाहूँगा कि प्रसाद वितरण के कार्यक्रम पर किसी का एकाधिकार नहीं है और प्रसाद एक साहित्यिक शब्द है इसलिए इसका प्रयोग सोच समझकर करना चाहिए।

सुधी समाज से मुझे बस यह जानना है कि पिछले 10 साल में दिलीप जी ने किसका प्रचार नहीं किया? जिसका किया जोरशोर से किया। मगर प्रसाद वितरण की बारी आने पर प्रसाद उन्हीं लोगों को मिला जिन्हें मिलने की आशंका थी। लम्बे समय तक दिलीप जी को लोग “यादव” बताते रहे क्योंकि उन्होंने यूपी-बिहार के यादव नेताओं के लिए सोशल मीडिया को हिलाए रखा था। भाजपा का पूरा आईटी सेल मिलकर दिलीप जी की जाति को पुष्ट तरीके से नहीं उजागर कर सका मगर तीन महीने पहले उनके सुर बदले तो कई स्वनामधन्य लोगों ने यह उजागर करने में तनिक देर न लगायी कि दिलीप जी यादव नहीं हैं! इन लोगों ने दिलीप जी की कास्ट लोकेशन भी चिह्नित करा दी! जाहिर है कि ऐसे सुधी जन से पूछा जाएगा तो वह यही कहेंगे कि प्रसंग वश ऐसा लिखा मगर वो यह कभी न बता सकेंगि कि दिलीप जी 10 साल से जाति-जाति खेल रहे थे तो आपके मन में यह प्रसंग क्यों नहीं उमड़ा! खैर, मूल सवाल ये है कि यूपी-बिहार के दो प्रमुख दलों ने दिलीप जी को यथोचित प्रसाद क्यों नहीं दिया!

जहाँ तक मुझे याद है, दिलीप जी मोतीलाल नेहरू परिवार के वारिसों के ईकोसिस्टम के भी सम्पर्क में आए थे। मगर वहाँ तो पहले से लम्बी लाइन है और वहाँ लायल्टी टेस्ट की प्रक्रिया भी लम्बी है तो वहाँ से प्रसाद न मिलना हैरानी की बात नहीं है, मगर नहीं मिला होगा तभी दिलीप जी अगले स्टेशन पर गये!

उत्तर में कुछ न हुआ तो दिलीप जी दक्षिण हो आए। पेरियार नामक चरस का बीज हिन्दी पट्टी में जितना दिलीप जी ने छींटा उतना पिछले 50 साल में कोई न छींट सका था। केंद्रीय विश्वविद्यालयों से पीएचडी कर चुके अनपढ़ों ने दिलीप जी के प्रभाव में पेरियार को सगा दादा बताना शुरू कर दिया! उनको ध्यान नहीं रहा कि पेरियार केवल ब्राह्मण हेटर नहीं थे, बल्कि वह हिन्दू हेटर, उत्तर भारत हेटर, आर्य हेटर, हिन्दी हेटर, कांग्रेस हेटर, गांधी हेटर, तमिल हेटर और अंत में आम्बेडकर हेटर भी बन गये थे! वे कौन से यादव हैं जिनकी गणना आर्य के बजाय कथित द्रविड़ में होने वाली है! दादा जी हैं! बाप का नाम करुणा निधि और बेटा स्टालिन! फिर भी दिलीप जी ने हिन्दी समाज में स्टालिन का जितना प्रचार किया उतना किसी इंग्लिश या हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार ने नहीं किया होगा मगर प्रसाद बंटा तो क्या हुआ? नहीं पता।

मेरे ख्याल से दिलीप जी ने सभी विकल्पों पर पर्याप्त समय देने के बाद इस साल के आम चुनाव से एक-दो महीने पहले नई लाइन पकड़नी शुरू की थी। चुनाव के दौरान ही उनपर लाइन बदलने का आरोप गम्भीरता से लगना शुरू हुआ। अगर उन्हें प्रसाद प्राप्त हुआ तो यह कुल छह महीने की पूजा का परिणाम है।

करीब दो साल पहले वे न्यायपालिका में आरक्षण के मुद्दे पर पहली बार प्रत्यक्षतः सरकार के हित में जाने वाली लाइन पर चलते दिखे मगर आरक्षण का मुद्दा ऐसा है कि देश की एक बड़ी आबादी प्रतियोगिता के बजाय आरक्षण से ही हर जगह पहुँचना चाहती है! इसलिए वह मुद्दा दिलीप जी के अन्ध आरक्षणवाद का स्वाभाविक विस्तार था। उस मुद्दे से किसी भी अन्ध आरक्षणवादी दल को कोई आपत्ति नहीं है और अब तो अन्ध आरक्षणवाद का सबसे मुखर विरोधी रहा नेहरू परिवार ने भी इसपर अपनी लाइन बदल चुका है। हो सकता है कि उस मुद्दे से दिलीप जी के लिए कुछ नए दरवाजे खुले हों, मगर वह वह मुद्दा सभी राजनीतिक दलों का हित साधने वाला था।

सुधी समाज से मैं यह पूछना चाहता हूँ कि जब वह प्रसाद नहीं दे सकता तो राजनीतिक हित साधने के बाद दूसरों के सिर पर त्याग और बलिदान का दो पहाड़ जितना बोझ क्यों डालता है! पूजा कोई करे, घण्टी कोई बजाए, आरती कोई गाए मगर जब प्रसाद वितरण की बारी आए तो वह पहले खानदान में बंटेगा, फिर आपके गाँव में बंटेगा फिर…जहाँ मन वहाँ बँटे। जहाँ पूजा कोई और करता है मगर प्रसाद कोई खाता है, वहाँ लोग भगवान तक बदल देते हैं, किसी ने पोलिटिकल लाइन बदल ली तो यह मामूली बात है! आप पहले उसका गिरेबान पकड़िये जिसने प्रसाद वितरण की ऐसी व्यवस्था बनायी है! छद्म नैतिकता से पेट नहीं भरता! आपकी तो नैतिकता भी दोगली है। आप से बेहतर वे लोग हैं जिनकी क्लीयर लाइन है कि जहाँ पूजा के बाद प्रसाद मिलेगा हम वहाँ के भजन गाएँगे!

और यह बात केवल उन लोगों पर नहीं लागू होती जो भूखमरी के शिकार हैं। एक प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक के बारे में किस्सा प्रचलित हैं कि जब विदेश गमन के कुछ साल बाद जब उन्हें नोबेल मिला तो हमारे देश के प्रधानमंत्री ने वापस आने का न्योता दिया। लोग कहत हैं कि उन्होंने जवाब दिया कि जब मुझे सख्त जरूरत थी तो सरकार में 55 रुपये की नौकरी नहीं मिली थी! अब नोबेल मिल गया है तो आप देश वापस बुला रहे हैं! नहीं आना है। जब एक महान आदमी इस तरह सोच सकता है तो दिलीप जी तो हमेशा खुद को “मामूली आदमी” कहते रहे हैं। उनकी सिर पर अपने पाखण्डपूर्ण नैतिकता का हथौड़ा बरसाने से बेहतर है कि पता कीजिए कि जिन देवालयों से दिलीप जी आगे बढ़ गये या बढ़ा दिये गये, वहाँ प्रसाद वितरण का सिस्टम किसके हाथ में है!

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