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दैनिक जागरण, मेरठ के संपादक मनोज झा ज्योतिषी भी हैं!

Vikas Mishra : मेरठ में एक मुहल्ला है, उमेश नगर। 2000 में अमर उजाला में काम करने के दौरान वहां कमरा लिया था। पड़ोस में आसपास ही पुराने दोस्त मुकेश सिंह, सतीश सिंह, संजय श्रीवास्तव, दीपक सती, संजीव सिंह पुंडीर, दिनेश उप्रैती रहते थे। सभी अमर उजाला में काम करते थे। एक परिवार की तरह रहते थे। सुबह हो या शाम या दोपहर..कोई किसी के घर चला जाता था, चाय नाश्ता या भोजन कौन कहां करेगा, तय नहीं होता था। जहां पहुंच गए, वहीं धूनी रम गई। मनोज झा हम लोगों के खास मेहमान होते थे, वो रहते थोड़ी दूर थे, लेकिन आते रोज थे, शादी हुई नहीं थी तब उनकी। झा साहब पत्रकारिता के पुरुषार्थी तो थे ही, ज्योतिष और आयुर्वेद पर भी उनकी गहरी पकड़ है। आप पता नहीं कितना यकीन करें, लेकिन झा साहब हाथ देखकर गजब की चीजें बता देते थे।

Vikas Mishra : मेरठ में एक मुहल्ला है, उमेश नगर। 2000 में अमर उजाला में काम करने के दौरान वहां कमरा लिया था। पड़ोस में आसपास ही पुराने दोस्त मुकेश सिंह, सतीश सिंह, संजय श्रीवास्तव, दीपक सती, संजीव सिंह पुंडीर, दिनेश उप्रैती रहते थे। सभी अमर उजाला में काम करते थे। एक परिवार की तरह रहते थे। सुबह हो या शाम या दोपहर..कोई किसी के घर चला जाता था, चाय नाश्ता या भोजन कौन कहां करेगा, तय नहीं होता था। जहां पहुंच गए, वहीं धूनी रम गई। मनोज झा हम लोगों के खास मेहमान होते थे, वो रहते थोड़ी दूर थे, लेकिन आते रोज थे, शादी हुई नहीं थी तब उनकी। झा साहब पत्रकारिता के पुरुषार्थी तो थे ही, ज्योतिष और आयुर्वेद पर भी उनकी गहरी पकड़ है। आप पता नहीं कितना यकीन करें, लेकिन झा साहब हाथ देखकर गजब की चीजें बता देते थे।

कई बार मेरे ही घर पर लोगों का हाथ देखा, जोर से बोलने की उनकी आदत, आवाज चारों तरफ जाती थी। मकान मालिक के बड़े बेटे राजेश उर्फ पिंकू ने एक दिन पकड़ लिया, बोला धंधा अच्छा नहीं चल रहा, झा साहब कल्याण कर दो। पिंकू क्रिकेट बॉल बनाने के बिजनेस में था, मेरे बगल वाले कमरे में रहता था। झा साहब ने हाथ देखा, बोले- अरे तुम्हारा मंगल तो पुत्तू हो गया है, धंधा क्या तुम भी डूब जाओगे। पिंकू डरा, उपाय पूछा। झा साहब ने कहा- अभिमंत्रित करके सात रत्ती का मूंगा पहन लो। खैर इसे संयोग कहें या झा साहब का हुनर, उसने मूंगा पहना और दो महीने के भीतर उसका धंधा चमक गया। धंधा चमका तो वो सातवें आसमान पर था। एक दिन पिंकू अपनी गर्लफ्रेंड को लेकर घर आया। वो उसके साथ ही कमरे में रुकी। रुकी क्या, रहने ही लगी। मकान मालिक ने बेटे को समझाने की कोशिशें कीं, लेकिन मां ने पिंकू की बजाय बहू को समझाना शुरू किया-अरे तू क्यों परेशान है, तू तो मेहनती है, जहां भी काम करेगी, वहीं खाने और पहनने को मिलेगा। हां बताना भूल गया था कि पिंकू शादीशुदा था, एक प्यारे से बच्चे का बाप था। बीवी बेहद सीधी, थोड़ी कम पढ़ी लिखी, लेकिन दिन भर काम में खटती रहती थी। दो गायों को चारा खिलाने से लेकर दूध दुहने तक की जिम्मेदारी उसी की थी। बस ससुर उसकी थोड़ी सी मदद कर देता था। बाकी वक्त भाभी का किचेन में खाना बनाने में जाता था। सबका ख्याल रखती थी। सितम की हद ये थी कि वो पिंकू और उसकी गर्लफ्रेंड को बेड टी पहुंचाने ऊपर आती थी। सलवार कुर्ता और सिर पर घूंघट सा बना दुपट्टा, यही उनकी हमेशा से पहचान थी। उस घूंघट के पीछे वो कितनी सुलग रही होगी, इसका तो बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है। किराएदार की हैसियत में रहते हुए मैंने एक दिन कड़ाई दिखाई। गर्लफ्रेंड घर से बाहर हो गई, लेकिन पिंकू का अपनी पत्नी से रिश्ता कभी मियां बीवी का नहीं रहा।

एक दिन पिंकू की बीवी ने मेरी पत्नी से बात की, अपना दर्द बयान किया। कहा कि किसी तरह से झा साहब को बुलवाकर उसका हाथ दिखवा दें। बीवी ने मुझसे सिफारिश की। मैंने भाभी को समझाने की कोशिश की कि उससे कुछ फायदा नहीं होने वाला, लेकिन झा साहब पर भाभी को अटूट विश्वास था, उन्होंने अपने पति का धंधा चमकते हुए देखा था। ये काम मुश्किल नहीं था, मुश्किल ये थी कि ये मिशन बेहद गुप्त तरीके से निपटाना था। झा साहब ने हाथ देखा- बोले, अरे ये तो मुझसे गड़बड़ हो गई। जब तक उसके हाथ में मूंगा है, तब तक तो कुछ नहीं हो सकता। झा साहब ने भाभी को फिरोजा पहनने की सलाह दी। भाभी पैसे भी छिपाकर लाई थी, झा साहब को दिए, बोली- मैं कहां जाऊंगी, आप ही बनवा दिए। हुआ भी यही, खैर भाभी ने अंगूठी पहनी इस अटूट विश्वास के साथ कि अब उसका कल्याण हो जाएगा। अब झा साहब पिंकू की तलाश में थे, क्योंकि पिंकू अक्सर घर से गायब रहता था। एक दिन मिल गया, झा साहब बोले-अरे मैं तुम्हीं को खोज रहा था। तुमने मूंगा उतारा नहीं अभी तक..। पिंकू सकपकाया, पूछा- क्यों। झा साहब बोले- अरे जल्दी मूंगा उतारो नहीं तो एक्सीडेंट में मर जाओगे, इसे बस दो ही महीने पहनना था। आगे पहनना भी मत। डरके मारे पिंकू ने अंगूठी उतारकर रख दी।
संयोगों की कहानी विधाता लिख रहा था, झा साहब और अंगूठी का भी उस कहानी में किरदार था। हुआ ये कि पिंकू का अपनी गर्लफ्रेंड से झगड़ा हो गया। हाथापाई हुई। किसी का हाथ पैर या मुंह नहीं टूटा, वो रिश्ता टूट गया। मैंने और मुकेश जी ने मिलकर उस टूटे हुए मजनूं को दो घंटे तक ‘पत्नी और बच्चा ही तुम्हारी जिंदगी का सच है’ इस विषय पर लंबा ज्ञान दिया। मियां बीवी का मिलन करवाया। हैप्पी एंडिंग हुई। इसमें ज्योतिष की कितनी भूमिका थी, भगवान जाने, लेकिन एक सच्चे दिल की महिला की साधना और भरोसे का मामला था, उसके खिलाफ तो भगवान भी नहीं जा सकते थे। उसके उस भरोसे की जीत हुई थी।

इसके बाद भाभी की नजरों में मैं और मेरी पत्नी देवी देवता थे तो झा साहब भगवान बन गए थे। वो मौका ढूंढती रहती थी कि कुछ अच्छा बनाकर खिला दे, वो भी सास से छिपाकर। मेरे बेटे को बेइंतहा प्यार करती थी। कुछ महीने बाद वो मकान मुझे छोड़ना पड़ा, क्योंकि मैंने दैनिक जागरण ज्वाइन कर लिया था, मकान उसके आसपास ही लेना था। उमेश विहार से नया दफ्तर दूर था। मैं गया तो उसके बाद जाने वालों का सिलसिला बन गया। किसी का ट्रांसफर हुआ तो किसी ने नौकरी बदली। 13-14 साल बीत गए, बहुत कुछ बदल गया। मनोज झा दैनिक जागरण मेरठ के संपादक हैं तो मुकेश सिंह दैनिक जागरण अलीगढ़ के संपादक। सतीश जयपुर भास्कर में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं। बाकी साथी भी इधर-उधर हैं। सोच रहा हूं, इस बार मेरठ जाऊं तो उमेश विहार भी जाऊं, जहां हम लोगों की न जाने कितनी कहानियां बिखरी पड़ी हैं।

आजतक चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.

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