
संजय कुमार सिंह
देश की न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी नई नहीं है। इस बारे में कई किताबें हैं, अक्सर चर्चा होती रहती है और जजों को ईनाम और पक्षपात व पूर्वग्रह के कई उदाहरण हैं। भाजपा शासन में 1984 के मामले में कांग्रेस नेता के खिलाफ फैसला और भाजपा के पक्ष में फैसले का उदाहरण कल मैंने दिया था। आज इंडियन एक्सप्रेस के मामले में 1987 के एक नोटिस को हाईकोर्ट द्वारा खारिज कर दिये जाने की खबर है। यहां फैसला महत्वपूर्ण नहीं है उसका समय महत्वपूर्ण है। जब गुजरात मामले में 20 साल पुराने मामले को खरिज कर दिया गया तो उससे पुराने ऐसे मामलों में फैसला क्यों जरूरी है। यथास्थिति बनाये रखने में क्या दिक्कत थी खासकर उन मामलों में जो व्यक्ति विशेष की परेशानी से संबंधित हैं या व्यक्ति विशेष की संपत्ति से संबंधित नहीं हैं। प्रेस की स्वतंत्रता का हाल हम देख रहे हैं। ऐसे समय में इंडियन एक्सप्रेस की पहले की और भविष्य की स्वतंत्रता मुद्दा कहां है? मीडिया की स्वतंत्रता अगर मुद्दा है तो बहुत सारे मामलों में फैसला नहीं आया है और जो आया है उनमें कई मीडिया के पक्ष में नहीं है और सरकार के खिलाफ नहीं है। मैं किसी एक फैसले की बात नहीं कर रहा हूं मैं जो फैसले आ रहे हैं उन सबकी बात कर रहा हूं। फैसलों के खिलाफ टिप्पणी तो सुप्रीम कोर्ट ने भी की है। वह मेरा काम नहीं है।
खबर यह है कि 1987 में जब एक्सप्रेस कांग्रेस के खिलाफ था तब उसके खिलाफ जो कार्रवाई की गई थी उसे हाईकोर्ट ने अब खारिज कर दिया है और कहा है कि यह इमरजेंसी के दौरान उसकी स्वतंत्र भूमिका के कारण था। इस राय या फैसले से किसी को क्या एतराज हो सकता है और यह फैसला 2014 में आया होता तो मैं संदिग्ध नहीं कहता पर अब आया है तो बाकी सब के आलोक में मुझे यह संदिग्ध लग रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने अभी लग-भिड़ कर अपना फैसला जल्दी या देरी से कराया हो तो भी। कहने की जरूरत नहीं है कि हर कोई चाहता है कि मामला जल्दी निपटे। यह जानते हुए कि अदालतें स्वतंत्र रूप से काम करती हैं और भिन्न मामले में फैसला होने में कम या ज्यादा समय लगने के कई कारण होते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऐक्ट ऑफ गॉ़ड और ऐक्ट ऑफ फ्रॉ़ड तथा संयोग और प्रयोग की बात कर चुके हैं। इसलिये यह संयोग भी हो तो चर्चा करने योग्य है और मेरा मकसद इतना ही है। जहां तक इंडियन एक्सप्रेस को परेशान किये जाने की बात है 1987 की हड़ताल में ‘हड़ताली कांग्रेसियों’से पिटने वाला मैं भी हूं और कोई 15 दिन अस्पताल में रहा था। कंपनी ने ईनाम भी दिये थे, पहले पन्ने पर खबर, फोटो छपी थी सो अलग।
अब सोशल मीडिया से अलग तरह की खबरें फैलाई जाती हैं। पांञ्चजन्य ने 30 अगस्त को रात 830 बजे की एक पोस्ट में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के हवाले से उनकी फोटो और रेल दुर्घटना की फोटो के साथ एक्सपर एक पोस्ट में कहा है, भारत में जितनी भी ट्रेनें पटरी से उतरी हैं, वो एक खास समुदाय के लोगों ने किया है। ये स्लीपर सेल आतंकवादियों का है और राजनीतिक स्लीपर सेल राहुल गांधी की जुबान चुप क्यों हो गई है। देश को सोचना होगा कि लाखों किलोमीटर से ज्यादा लंबी रेलवे लाइन पर, जहां मुस्लिम आबादी है, वहां ये समुदाय इतना कुछ क्यों कर रहा है। अब बातें सामने आ रही हैं कि ये कोई रेल दुर्घटना नहीं है, ये संयोग नहीं है, ये भारतीय रेल और भारत को अव्यवस्थित करने का एक प्रयोग है। इस समय न राहुल गांधी की जुबान खुलेगी, न लालू यादव की जुबान खुलेगी, न तेजस्वी की जुबान खुलेगी, न ही किसी टुकड़े-टुकड़े गैंग की जुबान खुलेगी,ये तभी खुलेगी जब पॉलिटिकल टूरिज्म होगा। मुझे लगता है कि कार्रवाई इस पत्रकारिता के खिलाफ अभी होनी चाहिये और 35 साल बाद होगी तो मैं न रहूं, कोई और बोलेगा।
कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा है तो सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती है? राहुल गांधी तो तब बोलें जब उन्हें पता हो, जिसे पता है वह सरकार को क्यों नहीं बताता और सरकार को पता कैसे-क्यों नहीं है। और है तो कार्रवाई सरकार को करनी है, राहुल गांधी को नहीं। नरेन्द्र मोदी अगर तीसरी बार प्रधानमंत्री बन पाये हैं तो ऐसे प्रचारकों और इसपर मुख्यधारा की मीडिया की चुप्पी बहुत कुछ कहती है। आज द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर एक खबर है, निचली अदालतों को डर से आजाद करने की अपील। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने मांग की है कि जिला न्यायालयों को इतना मजबूत बनाया जाये कि वे डर या पक्षपात के बिना फैसला दे सकें। सिबल सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित दो दिन के सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर बोल रहे थे। उद्घाटन प्रधानमंत्री ने किया और जब वे बोल रहे थे तो प्रधानमंत्री मौजूद थे। सम्मेलन अखिल भारतीय जिला न्यायपालिका पर था। इसमें उन्होंने कहा कि कमजोर बुनियाद पर बनी कोई भी संरचना प्रासाद को प्रभावित करेगी और अंततः ढह जायेगी।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस मौके पर प्रधानमंत्री ने जो कहा उसे लीड बनाया है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने अदालतों से कहा (यह आज की खबर है, संयोग हो या प्रयोग) महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में ट्रायल तेज करें। अमर उजाला ने भी इस खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, “महिलाओं के खिलाफ अत्याचार चिन्ताजनक जल्द फैसलों से पढ़ेगा सुरक्षा का भरोसा : मोदी”। इसके साथ और भी बातें हैं जो निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं और बेशक लीड बन सकती है लेकिन उसके साथ जुड़े प्रचार के मकसद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। आप जानते हैं कि कोलकाता में रात की ड्यूटी में तैनात एक डॉक्टर के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में एक पुलिस वाले को गिरफ्तार किया गया है और भाजपा इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की यह अपील मौके पर चौका की कोशिश है वरना इसकी चिन्ता तब (भी) की जानी चाहिये थी जब देश के मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगा था और पहलवान बेटियों ने सांसद पर आरोप लगाये थे। अगर पांञ्चजन्य गिरिराज सिंह के कहे को प्रचारित कर रहा है तो हिन्दुस्तान टाइम्स प्रधनमंत्री के कहे को। दोनों सिर्फ कहने और प्रचार पाने के लिए हैं खबर (कम से कम पहले पन्ने की) जो थी वह द टेलीग्राफ में है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में भी आज लीड के साथ एक और खबर है, इसके अनुसार मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि जिला न्यायपालिका कानून के शासन की रीढ़ है। लेकिन सरकार के प्रचार का आलम यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया में जिस खबर का शीर्षक है, “गोमांस की आशंका में लिन्चिंग के आरोप में गिरफ्तार सात लोगों में दो अवयस्क भी” उसका शीर्षक हिन्दुस्तान टाइम्स में इस तरह है, लिन्चिंग के लिए हरियाणा में सात गिरफ्तार। मुख्यमंत्री ने कहा गाय के प्रति श्रद्धा का सम्मान किया जाना चाहिये। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सम्मान में किसी की हत्या नहीं होनी चाहिये और हत्यारे अगर अव्यस्क हैं तो चिन्ता और बढ़ जाती है। इससे पता चलता है कि समाज में यह चिन्ता कितनी गहरी (या नुकसानदेह) स्थित में है। ऐसे में मुख्यमंत्री का काम था कि वे कहते, गाय की रक्षा के लिए सरकार है, पूरा समाज है। किसी पर शक हो तो शिकायत करें, पुलिस सख्त कार्रवाई करेगी। आरोपी को लोग न मारें – यह क्यों नहीं कहा जाना चाहिये और नहीं कहा जायेगा तो कानून का शासन कैसे लागू होगा और मुख्यमंत्री के कहे से लगता है कि उन्हें इसकी परवाह ही नहीं है। खबर और शीर्षक तो आप कह सकते हैं कि बताने के लिए है। बात इतनी ही नहीं है, गो हत्या जब प्रतिबंधित है, बिक्री के मांस के लिए भी लिए भी जानवर बूचड़खाने में काटे जाते हैं तब लोगों को गोमांस का शक क्यों होता है? सरकार पर भरोसा क्यों नहीं है और सरकार अपना भरोसा बनाने के लिए काम क्यों नहीं कर रही है। वैसे भी चुनाव के समय ऐसा होना, चुनाव की तारीख बढ़ना और मुख्यमंत्री का बयान सब एक दूसरे से जुड़ा लगता है और भाजपा के जरिये जुड़ा ही हुआ है।
आज ही यह खबर है कि हरियाणा के चुनाव टाल दिये गये हैं और अब 5 अक्तूबर को होंगे। नवोदय टाइम्स में आज यह खबर लीड है। चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चत करना ही नहीं है लेवल प्लेइंग फील्ड भी सुनिश्चित करना है। सत्तारूढ़ दल की मांग पर फैसले बदलकर उसने उसे मजबूत बताने का काम तो किया ही है। इसके अलावा, मतदान की तारीख सोच-समझ कर घोषित की जानी चाहिये थी। बदलनी पड़ी तो साफ है कि पहले गलती हुई। कोई तो दोषी / जिम्मेदार और लाभार्थी होगा। कार्रवाई नहीं होनी चाहिये? हो या नहीं, मांग नहीं होनी चाहिये, मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है। यही स्थिति सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच की है। उनके खिलाफ कार्रवाई तो नहीं ही हुई है। और मुख्य धारा की मीडिया में मांग भी नहीं है। हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट का फॉलोअप रायटर ने किया। इमरजेंसी का विरोध करने वाले इंडियन एक्सप्रेस के रुख अघोषित इमरजेंसी में वैसे ही हैं क्या? इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड किसी और अखबार में लीड नहीं है। किसी क्षेत्र या विषय का विशेषज्ञ संवाददाता हो तो अखबारों में ऐसा होता है। हाल में चीन की खबर लीड थी आज फिर है और बाइलाइन वाली खबर नहीं है। इसलिए विशेषज्ञ संवाददाता का मामला नहीं लगता है। शीर्षक विदेश मंत्री जयशंकर का बयान है। उन्होंने कहा है, “भारत को चीन से विशेष समस्या है जो दुनिया की चीन समस्या से अलग है।” आप इसका मतलब जो लगाइये मोटे तौर पर यह ना कोई घुसा है ना कोई घुसा हुआ है को उचित ठहराने के काम तो आयेगा ही।
आइये बताऊं। द हिन्दू की आज की लीड मणिपुर में फिर से हिंसा शुरू होने की खबर है। भाजपा नेता के घर में आग लगा दी गई है और मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह ने कहा है कि जिन अधिकारियों की नाकामी से सुरक्षा मुहैया नहीं हुई उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगे। आप समझ सकते हैं कि स्थिति क्या है और सरकार या भाजपा ने किस हाल में पहुंचा दिया है और अभी भी मामले की जड़ में जाकर उसे ठीक करने की बजाय कानून व्यवस्था के सामान्य मामले की तरह कार्रवाई करने की कसम खाई जा रही है। कार्रवाई सफल होती तो एक साल से ज्यादा समय तक हिन्सा कैसे चलती। तथ्य है कि भाजपा अपने लोगों की सुरक्षा नहीं कर पा रही है और अलग प्रशासन की मांग पर सुनवाई ही नहीं है। हालत ऐसी है कि हिंसा में मारे गये लोगों की याद में बनाये गये वाल ऑफ रिमेम्बरेंस पर मुख्यमंत्री के नाम के साथ लिखकर लगा है, हिन्सा की शुरुआत मैंने की थी। फिर भी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के पास मुख्यमंत्री का विकल्प नहीं है। प्रधानमंत्री का तो नहीं ही है। इसके बावजूद,आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड प्रधानमंत्री का प्रचार करने वाली है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा, सुधार का सरकार का निर्णय और मजबूत हुआ है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री के दावे हमेशा ऐसे ही होते हैं उनमें आंकड़ों और तथ्यों का सर्वथा अभाव रहता है।
खबरों की पहेली हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने से पहले के पन्ने के पीछे पिछले सप्ताह की खबरों पर आधारित कुछ पहेलियां हैं। उनके क्लू (जवाब के लिए संकेत, जैसे उनका उपनाम मालिनी नहीं हैं उनका नाम क्या है, इस खबर की चर्चा मैंने नहीं की है), दिये गये हैं और कहा गया है कि इनके आधार पर संभावित जवाब तलाशेंगे तो आप जान सकेंगे कि इस हफ्ते की खबरें क्या थीं। इनमें खेल की खबरें भी हैं और खबरों से जुड़े लोगों के लिए अच्छे सवाल हैं।


