
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार जवाहर सरकार ने यह भी कहा है कि तत्काल सुधार किये जाने की आवश्यकता है वरना सामप्रदायिक ताकतें राज्य पर कब्जा कर लेंगी। इससे स्पष्ट है कि जवाहर सरकार की चिन्ता ममता बनर्जी का विरोध तो है ही सांप्रदायिक ताकतों द्वारा राज्य पर कब्जा किये जाने की आशंका को रोकना भी है। जहां तक बंगाल के समाज की बात है, कुछ दिनों पहले आपने मेडिकल कालेज के पूर्व छात्रों की अपील पढ़ी थी आज द हिन्दू में काले गुब्बारों की तस्वीर छपी है। कैप्शन है – “न्याय के लिए सब कुछ : अभया के लिए न्याय लिखे गुब्बारों के साथ रविवार को कोलकाता में डॉक्टर। शहर के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में स्नातकोत्तर प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में शहर में प्रदर्शन अब भी जारी है।”
संजय कुमार सिंह
अमर उजाला में आज टॉप पर छह कॉलम की खबर का शीर्षक है, कोलकाता कांड से नाराज तृणमूल सांसद जवाहर सरकार का इस्तीफा। डॉक्टर से दुष्कर्म (आरोप तो सामूहिक बलात्कार का है) व हत्या मामले में सीएम ममता की भूमिका पर उठाई अंगुली, कहा – सीधे हस्तक्षेप नहीं किया, जो कदम उठाये वह नाकाफी। यह खबर आज और अखबारों में है, लीड भी है। असल में जवाहर सरकार ने ममता बनर्जी को पत्र लिखकर राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने की बात कही है। औपचारिक इस्तीफा बाद में राज्यसभा अध्यक्ष को देंगे। ममता बनर्जी को संबोधित इस आशय का पत्र कल उन्होंने एक्स पर जारी किया था। संबंधित खबर पर आने आने से पहले बता दूं कि द टेलीग्राफ ने इसे कैसे पेश किया है। मेघदीप भट्टाचार्या की बाईलाइन वाली खबर है (अमर उजाला में ब्यूरो के हवाले से खबर है जबकि जिसने लिखा होगा अनुवाद भी किया होगा। फिर भी), खबर इस प्रकार है, आरजी कर आंदोलन पर ममता बनर्जी सरकार की प्रतिक्रिया ने तृणमूल सांसद जवाहर सरकार में जूनियर डॉक्टर के बलात्कार और हत्या से कहीं ज़्यादा नाराज़गी पैदा कर दी है। उन्होंने बंगाल की सत्तारूढ़ व्यवस्था में व्याप्त “भ्रष्टाचार” की संस्कृति के खिलाफ़ नाराजगी में रविवार को राज्यसभा और राजनीति छोड़ने की पेशकश की। 72 साल के सरकार का कार्यकाल 2026 में समाप्त होना है। सरकार, एक पूर्व आईएएस अधिकारी और एक मुखर वक्ता हैं, जिन्होंने संसद के अंदर और बाहर नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी।
तृणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी को दो पन्नों में अपने इस्तीफे की पेशकश और उसका कारण बताने के कुछ घंटों बाद सरकार ने टेलीग्राफ़ को बताया कि उनका उद्देश्य आरजी कर विरोध प्रदर्शनों से “बेढंगे” तरीके से निपटने के बाद सर्वोच्च नेतृत्व को एक बहुत ज़रूरी चेतावनी देना था। वे जुलाई 2021 में तृणमूल में शामिल हुए थे। उन्होंने कहा, “मेरा पूरा इरादा राजनीतिक आत्महत्या करना है, राजनीतिक आत्मदाह करना है, ताकि लोग जागें…. मैंने आपसे (ममता) जो कहा है, उसे कीजिये, मुझे दुश्मन न समझें”। अपने पत्र में उन्होंने लिखा है, “मैं आरजी कर अस्पताल में बलात्कार-हत्या के भयानक मामले के बाद सबसे सहज रूप से शुरु हुए सार्वजनिक आंदोलन को संभालने में पश्चिम बंगाल सरकार के दोषपूर्ण तरीके के कारण मुख्यरूप से सांसद के पद से इस्तीफा दे रहा हूं। न्याय के लिए उनके संघर्ष में लोगों का साथ देने के लिए राजनीति छोड़ रहा हूं। मूल्यों के प्रति मेरी प्रतिबद्धता अपरिवर्तित है।” आप समझ सकते हैं कि आंदोलन के प्रति सरकारी रुख से वे नाराज हैं। आंदोलन में राजनीति घुसेड़ने से नहीं। संभव है उन्हें भाजपा का आंदोलन पसंद हो पर वह अलग मुद्दा है। मूल मुद्दा यह है कि एक पूर्व आईएएस ने रिटायर होने के बाद राजनीति ज्वायन की, जो करना चाहा वह नहीं कर पाये या होता नहीं दिखा तो छह साल राज्यसभा की सदस्यता नहीं भोगी, इस्तीफा दे दिया। अभी मुझे याद नहीं आ रहा है कि हिन्दी पट्टी में कभी किसी ने ऐसा किया हो।
ऐसा नहीं है कि भाजपा का विरोध नहीं हो रहा है पर जो हो रहा है वह अब (जब सरकार बैसाखी पर है) और वह भी चुनावी है इसलिए यह इस्तीफा अन्य इस्तीफों से बहुत अलग है। बलात्कार और हत्या ही नहीं उसपर सरकारी रुख के खिलाफ है। दूसरी ओर, बृजभूषण सिंह और अन्य आरोपी हैं। बीबीसी की एक खबर के अनुसार, विनेश फोगाट के कांग्रेस में जाने पर बृजभूषण शरण सिंह से लेकर कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष ने अपनी राय रखी है और वह विरोध के काबिल न भी हो तो प्रशंसनीय बिल्कुल नहीं है। बृजभूषण शरण सिंह ने कहा है कि ‘अब ये साफ़ हो गया है कि खिलाड़ियों के आंदोलन के पीछे कांग्रेस थी।’ ऐसे जैसे भाजपा में शामिल होने की संभावना थी और हो जाती तो भाजपा को जिम्मेदार मान लेते और कहते कि उनका टिकट काटने के लिए ऐसा किया गया। उनकी यह और दूसरी दलील भाजपा को पसंद नहीं आई इसलिए भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उन्हें सलाह दी है कि मीडिया से बात न करें। कहने की जरूरत नहीं है कि यह अभी की स्थिति में कहा गया है वरना पुलवामा के बाद हुए पिछले चुनाव में भाजपा ने साधवी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को टिकट दिया था और वो जीत भी गईं। इस बार भोपाल से उनकी जगह आलोक शर्मा को टिकट दिया गया और वो इस बार तो जीते ही, पहले भी जीत सकते थे।
भाजपा के 10 साल के शासन से पार्टी के सांसदों समर्थकों में खास बदलाव नहीं है और अब जो दल छोड़ रहे हैं वह ज्यादातर चुनावी मामला है। सांसद जवाहर सरकार जैसे लोग हिन्दी पट्टी में बिरले हैं। यह अलग बात है कि आईएएस छोड़कर राजनीति में जाने वाले हिन्दी पट्टी के रिटायर अफसरों को वह उम्मीद नहीं होगी जो जवाहर सरकार को थी लेकिन उम्मीद पूरी न हो तो वे इस्तीफा भी नहीं देते हैं। मैं शुरू से कह रहा हूं कि यौन शोषण, महिला अधिकार और बलात्कार पर प्रतिक्रिया के मामले में बंगाल का समाज हिन्दी पट्टी वालों से अलग है। कोलकाता में डॉक्टर से बलात्कार और हत्या के मामले में राजनीति घुसेड़ कर भाजपा ने अपनी पोल पट्टी खुलवा ली है भले हिन्दी पट्टी के अखबार न बतायें या खुद ही न समझें। अपने पत्र में जवाहर सरकार ने लिखा है, “…पश्चिम बंगाल इस जोरदार भ्रष्टाचार और वर्चस्व को स्वीकारने में असमर्थ है…. मैं कुछ चीजों को स्वीकार नहीं कर सकता, जैसे भ्रष्ट अधिकारियों (या डॉक्टर्स) को प्रमुख और शीर्ष पद मिलना। उन्होंने आगे लिखा है, इतने वर्षों में, मैंने सरकार के खिलाफ इस तरह का गुस्सा और पूर्ण अविश्वास नहीं देखा है, तब भी जब वह कुछ सही या तथ्यात्मक कहती है। आरजी कर अस्पताल में हुई भयानक घटना के बाद से मैं एक महीने तक धैर्यपूर्वक पीड़ा सही है और ममता बनर्जी की पुरानी शैली में आंदोलनकारी जूनियर डॉक्टरों के साथ आपके सीधे हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहा था। ऐसा नहीं हुआ है…।”
आइये, अब देखें कि इस खबर को मेरे बाकी पांच अखबारों ने कैसे छापा है। नवोदय टाइम्स में यह दो कॉलम की खबर है। शीर्षक है, तृणमूल के जवाहर सरकार ने की राज्य सभा से इस्तीफे की घोषणा। उपशीर्षक है, डॉक्टर हत्याकांड में राज्य के कदम को अपर्याप्त देर से उठाया गया बताया। इंडियन एक्सप्रेस में यह दो कॉलम की लीड है। शीर्षक है, टीएमसी के जवाहर सरकार राज्यसभा की सदस्यता छोड़ेंगे। (बलात्कार और हत्या मामले की) बंगाल सरकार की दोषपूर्ण हैंडलिंग और रिश्वत खोरी को मुद्दा बनाया। उपशीर्षक है, प्रसार भारती के पूर्व सीईओ ने ममता से कहा, सरकार की कार्रवाई बहुत कम, देर से हुई …. भ्रष्ट अफसरों, डॉक्टर्स को स्वीकार नहीं कर सकता। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर लीड है। शीर्षक है, सरकार सांसद का पद छोड़ेंगे, आरजी कर मामले में ममता की निष्क्रियता को मुद्दा बनाया। नेताओं की रिश्वतखोरी और वसूली के खिलाफ भी बोले। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार जवाहर सरकार ने यह भी कहा है कि तत्काल सुधार किये जाने की आवश्यकता है वरना सामप्रदायिक ताकतें राज्य पर कब्जा कर लेंगी।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। शीर्षक है, तृणमूल सांसद जवाहर सरकार ने कहा, राजनीति छोड़ रहा हूं। द हिन्दू में यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, डॉक्टर से बलात्कार और हत्या मामले में तृणमूल सांसद ने इस्तीफा दिया। यहां एक ऐसी खबर है जो किसी और अखबार में नहीं दिखी है। इस खबर के अनुसार, केंद्र सरकार ने जनगणना में देरी के बीच स्टैटिस्किटस और सर्वेक्षण से संबंधित पैनल को भंग कर दिया है। खबर के अनुसार 14 सदस्यों की स्थायी समिति का नेतृत्व अर्थशास्त्री और देश के पूर्व प्रमुख स्टैटिसटिशियन प्रणब सेन ने आरोप लगाया कि जनगणना में देरी पर सवाल उठाने के बाद यह समिति भंग कर दी गई और उन्हें इसका कोई कारण नहीं बताया गया है। खबर के अनुसार सरकार ने हाल में स्टीयरिंग कमेटी फॉर नेशनल सैम्पल सर्वे बनाया है और कहा गया है कि भंग की गई समिति का काम वही है जो इस स्टीयरिंग कमेटी का। आज के अखबारों की दूसरी प्रमुख खबर मणिपुर की है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, मणिपुर के मुख्यमंत्री ने कहा : एकीकृत कमांड हमें सौंपा जाये। तकनीकी तौर पर इसका चाहे जो मतलब और प्रभाव हो अभी अगर यह अधिकार राज्यपाल के पास है और राज्यपाल भाजपा के ही हैं तो इससे क्या फर्क पड़ना है और मुख्यमंत्री व राज्यपाल को मिलकर वैसे ही काम करना चाहिये जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी से उपराज्यपाल के साथ मिलकर काम करने की अपेक्षा की जाती है। पर भाजपा के मुख्यमंत्री साल भर से ज्यादा से हिंसा नहीं रोक पा रहे हैं और अब चाहते हैं कि दोनों इंजन उन्हीं के नियंत्रण में हो। दिलचस्प यह है कि केंद्र की भाजपा सरकार इसपर भी निर्णय नहीं कर पा रही है। द हिन्दू में इस खबर का शीर्षक है, बिरेन ने आंतकवादियों के शिविरों पर लक्षित कदम की मांग की।
हरियाणा चुनाव के लिए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठजोड़ से संबंधित द हिन्दू की खबर से पता चलता है कि आज इसकी घोषणा की उम्मीद है। यही इस खबर का शीर्षक है। टाइम्स ऑफ इंडिया में इसी खबर का शीर्षक है, “आम आदमी पार्टी को कांग्रेस की पेशकश, हरियाणा की 4-6 सीटें लीजिये या छोड़ दीजिये; स्वीकार किये जाने की संभावना”। नवोदय टाइम्स ने इस सूचना के साथ एक अलग खबर में राघव चड्ढा के हवाले से कहा है, निजी आकांक्षाओं को दरकिनार कर गठबंधन के प्रयास।
कश्मीर चुनाव
कश्मीर चुनाव लड़ने जीतने की भाजपाई कोशिश आज अखबारों में दिख रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने 2016 के सर्वदलीय प्रतनिधिमंडल के जम्मू और कश्मीर दौरे को याद किया है। असल में अखबार ने राजनाथ सिंह के कहे को प्रमुखता से छापा है जो दूसरे अखबारों में भी है। यहां, राजनाथ सिंह ने यह कहा बताते हैं कि विपक्षी सांसदों को हुर्रियत से बात करने और यह बताने के लिए भेजा कि हम शांति की बात करने के लिए तैयार हैं। उपशीर्षक है, शांति बहाल करने के लिए सब कुछ किया पर अलगाववादियों ने जवाब नहीं दिया। आज की इन और ऐसी खबरों के बीच नवोदय टाइम्स की लीड सबसे अलग है, “पीओके निवासी बनें भारत का हिस्सा : राजनाथ सिंह”। खबर का इंट्रो है, “बोले, पीओके के लोगों को हम अपना मानते हैं”। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, राजनाथ सिंह ने पीओके के लोगों से कहा, पाकिस्तान आपको विदेशी मानता है, हमारे साथ आइये। हिन्दुस्तान टाइम्स में दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, पीओके के लोग हमारे अपने हैं, वे भारत में शामिल होना चाहते हैं :राजनाथ।
हि्दुस्तान टाइम्स ने अपनी इस खबर के साथ सिंगल कॉलम की एक छोटी सी खबर छापी है, जम्मू और कश्मीर चुनाव के लिए भाजपा ने उम्मीदवारों की छठी सूची जारी की। कहने की जरूरत नहीं है कि पीओके के लोगों की ओर भाजपा का ध्यान तब गया है जब कश्मीर में चुनाव हैं। भाजपा शासन में देश में क्या चल रहा है इसका पता भी अब पहले पन्ने की खबरों से चलता है। उदाहरण के लिए हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार शीर्ष अदालत से कहा गया है, वन क्षेत्र में 75 प्रतिशत प्रोजेक्ट शर्तों का उल्लंघन कर रहे हैं। ऐसी ही एक खबर, इंडियन एक्सप्रेस में है। इसके शीर्षक के अनुसार, देखिये, ग्रीन जोन के लिए खतरनाक राज्य के भूमि प्रयोग कानून में बदलाव से किसे फायदा हुआ – गोवा के दो मंत्री, स्थानीय भाजपा और कांग्रेस नेता को। उपशीर्षक है, रिकार्ड बताते हैं कि नियमन और मंजूरी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण टाउन एंड कंट्री प्लानिंग मंत्री और पर्यावरण मंत्री लाभार्थियों में हैं। दोनों मंत्रियों का कहना है कि सारे बदलाव कानून सम्मत हैं। केंद्रीय मंत्री श्रीपद नायक ने भी जमीन का उपयोग बदलवाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया मे्ं तीन कॉलम की एक खबर है, सीबीआई ने सीजीएसटी के अधिकारी को 60 लाख की घूस मांगने पर नाटकीय ढंग से पीछा कर गिरफ्तार किया। इन सब खबरों के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया में पटना डेटलाइन से आरएसएस के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार का कहा छपा है जो उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में कहा है। शीर्षक है, गोहत्या और मनुष्यों की लिन्चिंग दोनों रोकी जाये ताकि सब सद्भावना के साथ रह सकें। कहने की जरूरत नहीं है कि यह 2016 में ही कहा जाना चाहिये था। अब कहा जा रहा है तो इसे देर आयद दुरुस्त आयद नहीं माना जा सकता है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस और जवाहर सरकार का उदाहरण सामने है।
नरेन्द्र मोदी की घोषणाओं और जुमलों के मुकाबले 10 साल में जो काम हुए और नहीं हुए हैं उनके मद्देनजर भाजपा या आरएसएस में कहीं किसी ने विरोध किया हो तो याद कीजिये। आज व अब जो विरोध कर रहे है वह औपचारिकता से अलग कुछ नहीं है और पिछले 10 साल के समर्थन के बाद अब तो बेमतलब भी है। लेकिन अस्तित्व बचाने के लिए सब चल रहा है और यह वैसे ही है जैसे नरेन्द्र मोदी तथा उनकी टीम चुनाव जीतने के लिए जहां जो कर सकती है कर ही रही है उसमें बृजभूषण सिंह जैसों का योगदान और पार्टी अध्यक्ष का प्रयास भी गौरतलब है। इन सबके बीच बंगाल पर कब्जा करने की कोशिश, वहां की जनता का समर्थन और जवाहर सरकार जैसों का विरोध हिन्दी पट्टी में होता तो भाजपा यहां तक नहीं पहुंचती। भ्रष्टाचार के आज के मामले कोई नये और अनोखे नहीं हैं लेकिन कार्रवाई किसके खिलाफ हो रही है और मीडिया क्या करता रहा है? इसके मुकाबले इलेक्टोरल बांड और द टेलीग्राफ को देखिये। कहने की जरूरत नहीं है कि मैं बांग्ला नहीं पढ़ता लेकिन जानता हूं कि उनकी पत्रकारिता राजा का बाजा बजाने वाली नहीं होती है ना वहां के आम लोग सिर्फ अपना लाभ देखने वाले होते हैं। जय श्रीराम।


