प्रभाकर मणि तिवारी-
पूर्वांचल प्रहरी शुरू होने में देरी हो रही थी. इस बीच, सेंटिनल नाम से नया हिंदी अखबार शुरू हो गया. पूर्वांचल से कई लोग वहां चले गए. एक दिन सेंटिनल के संपादक से बातचीत के बाद हम यानी मैं और मेरे मित्र सत्यानंद पाठक (अब स्वर्गीय) भी नए अखबार में नौकरी के लिए पहुंच गए. उसके मालिक को क्या चाहिए था. तुरंत हमारा नियुक्ति पत्र थमा दिया गया. वेतन पूर्वांचल प्रहरी के मुकाबले साढ़े तीन सौ रुपए ज्यादा था, जो उस समय बड़ी बात थी. बाद में और बढ़ाने की भी बात हुई थी.
उस समूह के मालिक असमिया थे. उन्होंने हमें किराए के एक नए मकान में शिफ्ट कर दिया. गर्मी के दिन थे. उन्होंने वादा किया कि अगले दिन फ्लैट में पंखे लगा दिए जाएंगे. हमने किसी तरह रात काटी. अगले दिन दफ्तर पहुंच कर जब पंखों के बारे में याद दिलाया तो मालिक का कहना था कि कैसे पंखे? वह आप लोग खुद लगवा लेना.
यहीं से माथा ठनका. हमने सोचा कि अभी यह हाल है तो आगे क्या होगा? इससे तो बेहतर है कि कम पैसों में ही चैन से नौकरी की जाए. हमने पूर्वांचल प्रहरी के जीएम पुरकायस्थ को फोन किया और रातों-रात पूर्वांचल प्रहरी लौट आए. इस बार हमें अखबार के पीछे लाचित नगर के एक मकान में रखा गया था. बाद में रामदत्त त्रिपाठी से लेकर बद्रीनाथ तिवारी तक हमारे पड़ोसी बने. यह पूरा घटनाक्रम दो दिनों में ही पूरा हो गया.
खैर, कुछ ही दिनों में अपना अखबार भी शुरू हो गया.
उस समय अखबार में कुछ युवतियां भी अलग-अलग विभाग में आई थी. अखबार का काम आगे बढ़ने के साथ राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए कुछ युवा लोगों और उन लड़कियों के बीच प्रेम की कोपलें फूटने लगी. सबने अपने-अपने हिसाब से जोड़ियां बना ली थी. अक्सर शर्मा जी की कैंटीन में कोई न कोई जोड़ा दिख जाता था. यह जरूर है कि कुछ लड़कियां ऐसी थी जिन्होंने आखिर तक इस राह पर कदम नहीं रखा.
अपने मजाकिया स्वभाव की वजह से मेरी सबसे बनती थी. लेकिन यही मेरे लिए मुसीबत की जड़ भी बनने लगा. बहुत साल बाद सलमान खान और गोविंदा की फिल्म पार्टनर देखी तो मुझे अपनी भूमिका के लिए नाम मिल गया.
दरअसल, उन दिनों चाहे-अनचाहे मैं लवगुरू की भूमिका में आ गया था. किसी भी प्रेमी जोड़े को कोई समस्या हो तो वह समाधान के लिए मेरे पास आता था. अब मैं तो प्रेम की राहों से हमेशा अनजान था. अपनी नई-नई शादी हो गई थी. शक्ल-सूरत भी कोई हीरो जैसी नहीं थी कि कोई घास डालता. बावजूद इसके खासकर युवतियां अपनी प्रेम प्रसंगों की समस्याएं लेकर मेरे पास आती रहीं और मैं अपनी बुद्धि के मुताबिक उनको सुलझाने का प्रयास करता रहा.
दो-एक मामले में कामयाबी मिलने के बाद तो रेपुटेशन ऐसी हो गई कि किसी भी समस्या के समाधान के लिए लोग मुझे तलाशते थे. अब टेलीफोन या मोबाइल तो था नहीं. इसलिए समस्या से मारे लोग सुबह 10 बजे से ही शर्मा जी की कैंटीन में मेरा बेसब्री से इंतजार करते नजर आते थे. वहां पहुंचने के बाद चाय-समोसे पर समस्याएं सुनी और सुलझाई जाती थीं.
कुछ महीनों बाद पत्नी के गुवाहाटी आ जाने के बाद उन तमाम लड़कियों की मेरे घर भी आवाजाही शुरू हो गई. हम भी उनके घर खाने पर गए. इसी तरह जीवन कटता रहा.
यहां किसी का नाम नहीं लिख रहा. लेकिन उस दौर में साथ काम करने वाले या प्रेम की राह पर चलने वाले लोग समझ ही जाएंगे. इसकी वजह यह है कि वो तमाम लड़कियां अपने-अपने जीवन में खुश होंगी और अब तक शायद दादी-नानी भी बन चुकी होंगी. हो सकता है कुछ विदेशों में भी बस गई हों.
आमतौर पर कुछ आशिक मिजाज शायर किस्म के लोग हर दफ्तर में मिल जाते हैं. पूर्वांचल प्रहरी में भी एक उप-संपादक सज्जन इसी मिजाज के थे. किसी भी लड़की को देखते ही उनकी शान में कसीदे पढ़ने और शायरी लिखने लगते थे. उनकी शादी हो गई थी और तीन-चार बच्चे भी थे, गांव में. लेकिन लड़कियों की सहानुभूति हासिल करने के लिए उन्होंने देवदास किस्म की एक कहानी बना रखी थी कि किस तरह पत्नी ने उनको धोखा दिया है.
यहां दिलचस्प बात यह है कि जितने भी जोड़े बने थे उनमें से किसी का प्रेम परवान नहीं चढ़ सका. यानी किसी की भी शादी नहीं हो सकी. शायद कच्ची उम्र के प्रेम का असर और मजबूत सामाजिक जंजीरों का नतीजा था.
कोई साल भर बाद धीरे-धीरे उन युवतियों की शादी होने लगी. माता-पिता की ओर से तय रिश्तों में उनके बंधने के बाद हताश प्रेमियों को समझाने का काम भी करना पड़ा.
एक प्रेमी ने तो अपनी प्रेमिका की शादी का उपहार भी हमारे हाथों ही भिजवाया था. खैर, उस एक प्रेमी को छोड़ दें तो बाकी लोग धीरे-धीरे सामान्य हो गए और उसके बाद धीरे-धीरे ज्यादातर लोग गुवाहाटी से नए आशियाने की तलाश में निकल गए. उनमें से एकाध से तो बात होती है लेकिन इन करीब 35 वर्षों में उन लड़कियों में से किसी से दोबारा मुलाकात नहीं हुई.
पिछला भाग…
जनसत्ता से रिटायर एक मीडियाकर्मी का पत्रकारनामा (पार्ट-3) : उन दिनों ‘अल्फा’ के खिलाफ लिखना चुनौती भरा था


