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आज के अखबार : नहीं बताते कि कनाडा से भिड़ंत के पीछे भी लॉरेंस बिश्नोई की बढ़ती ताकत है

संजय कुमार सिंह

बाबा सिद्दीक की हत्या और इसमें लॉरेंस बिश्नोई का हाथ होने का संदेह तथा इसे लेकर कनाडा से संबंध बिगड़ने की खबरों के बीच महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के वरिष्ठ नेता शरद पवार ने आरोप लगाया है, राज्य की चौपट हो चुकी कानून व्यवस्था की स्थिति चिन्ता का कारण हैजो लोग सत्ता में हैं उन्हें चाहिये कि …. जिम्मेदारी स्वीकार करें और पद छोड़ दें। आज टेलीग्राफ का यह कोट है। अगर कनाडा का विवाद नहीं हुआ होता तो संभव है, इस हत्याकांड की रिपोर्ट से विश्नोई को बड़ा गैंगस्टर बनाने में योगदान मिलता। पूरी सरकार जब कमजोरहिन्दुओं की मदद के लिए आमादा है तो बेरोजगार युवा ने सिर्फ हत्यारे बन रहे हैं जहां तहां मार भी दिये जा रहे हैं। कनाडा की खबर के कारण आज लखीमपुर खीरी की चर्चा ही नहीं हो पाई।  

आज के सभी अखबारों में कनाडा से बढ़ते टकराव की खबर लीड है। मोटी बात यही है कि टकराव इतना बढ़ गया कि दोनों देशों ने अपने दूतावासों के अधिकारियों को निकाल दिया है या वापस बुला लिया है। अमर उजाला का पांच कॉलम में दो लाइन का शीर्षक है, भारत ने कनाडा के छह राजनयिक निष्काषित किये, अपने उच्चायुक्त को भी वापस बुलाया। इससे लगता है कि भारत ने ही कार्रवाई की है और इसमें कोई देशहित होगा जबकि सबको पता है कि कितने भारतीय कनाडा में रहते हैं और जो भी अच्छा कमाना चाहता है कनाडा जाने की कोशिश करता है। ऐसे में भारत सरकार अपने स्तर पर स्वेच्छा से ऐसी कार्रवाई क्यों करेगी? जाहिर है उसका कोई कारण होगा जो इस शीर्षक में नहीं बताया गया है। वह उपशीर्षक में है, निज्जर हत्याकांड में आरोपों पर कड़ा रुखसंकीर्ण सियासी लाभ के लिए भारत को बदनाम कर रहे त्रूदो। बेशक यह भारत सरकार का पक्ष है लेकिन यही कारण है या यही सही है – इसे तय (प्रचारित) करना अखबार का काम नहीं है। दूसरा उपशीर्षक है, दो टूक कहासुरक्षा को लेकर कनाडा सरकार पर बिल्कुल भरोसा नहीं। अलगाववादियों को जानबूझकर दे रही है बढ़ावा। इसके साथ छपी कुछ खबरों में एक का शीर्षक है, आज तक एक भी सबूत नहीं आरोप वोट बैंक की राजनीति। दूसरी खबर का शीर्षक है, त्रूदो ने पेशी से पहले लगाये आरोपमहज संयोग नहीं। तीसरा शीर्षक है, त्रूदो की नीयत पर सवाल  इन सबसे अलग, तीन लाइन की तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अवैध गतिविधियों को ठहराया उचित

इस खबर में लिखा है – विदेश मंत्रालय ने कहा, त्रूदो की भारत के प्रति शत्रुता लंबे समय से साफ दिख रही है …. दिसंबर 2020 में भारतीय आंतरिक राजनीति में उनके खुले हस्तक्षेप से पता चला कि वे किस हद तक जाने को तैयार थे। इसके साथ बोल्ड में आरोप हास्यास्पद के तहत एक भारतीय राजनयिक पर आरोप को हास्यास्पद बताया गया है। मुझे लगता है कि बांग्लादेश के मामले में भी भारत हस्तक्षेप कर रहा है और बांग्लादेश अपने तरीके से निपट रहा है। इस पर टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर की चर्चा आगे है। कनाडा का अगर कोई आरोप है तो उससे भी निपटा जाना चाहिये। दूतावास के अधिकारियों पर आरोप लगते रहते हैं। उन्हें निकाला भी जाता है और बदले में संबंधित देश भी ऐसा करता रहा है। पर बांग्लादेश की घटना के साथ-साथ कनाडा में ऐसा होना, देश के विदेश मंत्री का राजनेता न होना (कल मैंने सुषमा स्वराज के विदेश मंत्री के रूप में काम की चर्चा औऱ तुलना की थी) महत्वपूर्ण है और अखबारों को चाहिये कि इन सब बातों का ख्याल रखे और तथ्यों को इस आलोक में रखे। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि इतनी खबरों में वह खबर नहीं है जो इंडियन एक्सप्रेस में है और इंडियन एक्सप्रेस में ये ‘खबरें’ नहीं हैं।    

उस पर आने से पहले नवोदय टाइम्स के शीर्षक की भी चर्चा कर लूं। यहां पांच कॉलम में एक लाइन का शीर्षक है, एक लाइन का फ्लैग शीर्षक, एक उपशीर्षक है। मुख्य शीर्षक है, भारत ने कनाडा से उच्चायुक्त को वापस बुलाया उपशीर्षक है, कनाडा के छह राजनयिकों को देश छोड़ने के लिए कहा। फ्लैग शीर्षक है, निज्जर हत्याकांड की जांच से अधिकारियों को जोड़ने के कनाडा के प्रयासों के जवाब में भारत की कार्रवाई। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी अधिकारी ने कनाडा में कोई अपराध किया है तो कार्रवाई होगी ही और भारत को पूरा हक है कि वह उसमें मकसद देखे। इस आलोक में फैसला जो भी हो, जनहित में होना चाहिये, टकराव बढ़ाने वाला नहीं होना चाहिये और भारत की अच्छी छवि बनाने वाला होना चाहिये। मैं फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं करता लेकिन मानता हूं कि खबर की निष्पक्ष प्रस्तुति ऐसी होनी चाहिये जिससे पाठकों को लगे कि अखबार की राय में यह फैसला कैसा है। इसे संपादकीय औऱ संपादकीय पन्ने के आलेखों से भी बताया जाता रहा है और अब प्रचारकों के लेख छपने और जो नहीं छपे उनकी अलग कहानी है पर वह अलग मुद्दा है। यहां यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि इंडियन एक्सप्रेस ने जो खबर पहले पन्ने पर छापी है वह मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर इस खबर के साथ नहीं है।

यह खबर दो कॉलम में छपी है, शीर्षक है – कनाडा ने एजेंट से बिश्ननोई के संबंध जोड़े; भारत ने कहा बकवास। बकवास आरोप यह है कि, भारत सरकार कनाडा में आतंक फैलाने के लिए लारेंस बिश्नोई गैंग से मिलकर काम कर रही है। मुझे लगता है कि यह आरोप इतना कमजोर नहीं है कि इसे बकवास कह देने भर से खबर ही नहीं माना जाये और छापा ही नहीं जाये। वह भी तक जब यह (या ऐसे) आरोप वाशिंगटन पोस्ट में छप चुके हैं। मामला भारत को बदनाम करने का हो तो वह विदेशों में हो रहा है और भारत में इसे नहीं छापकर सरकार या प्रधानमंत्री या भाजपा या संघ परिवार का बचाव किया जा रहा है जो इस बदनामी का कारण हो सकता है। इसमें सिर्फ इनकार करना पर्याप्त नहीं है। मेरे अखबारों में यह पहले पन्ने पर नहीं है जबकि तृणमूल सांसद साकेत गोखले ने वाशिंगटन पोस्ट के लिंक के साथ आज सुबह 8:20 पर पोस्ट लिखकर बताया है कि, भारत-कनाडा टकराव में लॉरेंस बिश्नोई की भूमिका और संदिग्ध हो गई है। वाशिंगटन पोस्ट के हवाले से उन्होंने लिखा है, कनाडा के अधिकारियों ने पिछले सप्ताह सिंगापुर में एनएसए अजीत डोभाल से मुलाकात की और दस्तावेज दिए, जिसमें दावा किया गया है कि गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई ऊपर के आदेश पर हत्याएं और जबरन वसूली कर रहा है।

आगे उन्होंने अंग्रेजी में लिखा है (पेश है, संपादित कंप्यूटर अनुवाद) “मैं कनाडाई दावों में नहीं पड़ना चाहता। लेकिन कुछ सवाल महत्वपूर्ण हैं:

1. गुजरात की जेल में रहने के बावजूद लॉरेंस बिश्नोई इतना शक्तिशाली कैसे है? 2. मोदी सरकार लॉरेंस बिश्नोई को अन्य मामलों में जांच के लिए गुजरात से बाहर अन्य जेलों में ले जाने के हर प्रयास का विरोध क्यों कर रही है? 3. बिश्नोई जेल में रहते हुए कथित तौर पर भारत और विदेश में हत्याएं और जबरन वसूली कैसे कर सकता है? 4. लॉरेंस बिश्नोई को कौन बचा रहा है और किसके आदेश पर वह काम कर रहा है? कनाडा के दावों का जवाब देने में सबसे सक्षम भारत सरकार ही है। लेकिन सिद्धू मूसेवाला, दिल्ली में जिम मालिक, (मुंबई में) बाबा सिद्दीकी और कई अन्य लोगों की हत्या के लिए बिश्नोई को जिम्मेदार ठहराया गया है। क्या लॉरेंस बिश्नोई जेल में बंद अपराधी है या मोदी सरकार उसे सक्रिय रूप से इस्तेमाल कर रही है? क्या एक गैंगस्टर को जानबूझकर खुली छूट दी जा रही है? कनाडा क्या दावा करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। किन लॉरेंस बिश्नोई की भूमिका और स्थिति ऐसी चीज है जिस पर मोदी सरकार को सफाई देनी चाहिए।” 

इसके बावजूद यह आरोप और ये सवाल अखबारों में (पहले पन्ने पर) नहीं हैं तो सवाल उठता है कि क्या वे अपना काम ठीक से कर रहे हैं? आज टेलीग्राफ में लीड का  शीर्षक है,’कनाडा से टकराव बढ़ा : दूत बाहर’। अनीता जोशुआ की बाईलाइन और नई दिल्ली डेटलाइन से अखबार ने पहले पैरै में बताया है, “भारत और कनाडा ने सोमवार को एक-दूसरे के वरिष्ठतम राजनयिकों को निष्कासित कर दिया। इससे पहले ओटावा ने भारतीय उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा और अन्य राजनयिकों तथा अधिकारियों को कनाडा की धरती पर खालिस्तानी कार्यकर्ता एचएस निज्जर की हत्या की जांच में “रुचि के व्यक्ति” (पर्सन्स ऑफ इंट्रेस्ट) के रूप में नामित किया। द्विपक्षीय संबंधों को अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंचाने वाले दिन भर के घटनाक्रम की शुरुआत शाम को भारत द्वारा यह घोषणा करने से हुई कि वह वर्मा और कनाडा द्वारा नामित अन्य लोगों को वापस बुलाएगा। रात में, नई दिल्ली ने छह कनाडाई राजनयिकों को निष्कासित करने की घोषणा की।

आज की मूल खबर के बारे में हिन्दुस्तान टाइम्स ने तीन कॉलम की एक खबर में बताया है कि कनाडा ने भारत से अपील की थी कि वह छह भारतीय राजनयिकों को उस सुरक्षा से मुक्त करे जो राजनयिकों को मिलती है। अखबार ने लिखा है कि उसकी खबरों के अनुसार, सोमवार को जो सब हुआ उसका कारण कनाडा का यह संदेश हो सकता है। उल्लेखनीय है कि हाल की प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अमेरिका नहीं गये थेबीबीसी की एक खबर के अनुसार आमतौर पर प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे में डोभाल साथ होते हैं. ऐसे में सवाल पूछे जा रहे हैं कि आख़िर डोभाल अमेरिका क्यों नहीं गए? अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ रखने वाले और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू ने ट्वीट किया, ”शायद ये पहली बार है कि जब कोई एनएसए पीएम के साथ अमेरिका ना गया हो। खबर के अनुसार, इसके कई कारणों में एक था, पीएम मोदी के दौरे से ठीक पहले अमेरिका में शीर्ष अधिकारियों ने खालिस्तान समर्थक नेताओं से मुलाक़ात की थी। यह मुलाक़ात व्हाइट हाउस में हुई थी। मोदी के दौरे से पहले अमेरिका के इस रुख़ की आलोचना हो रही है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की (पुरानी) रिपोर्ट के मुताबिक़, 19 सितंबर को शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों ने सिख कार्यकर्ताओं से मुलाकात की थी। 2023 में सिख अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या करवाने की साज़िश में उंगलियां भारत सरकार की तरफ़ भी उठी थीं। अमेरिका इस मामले में भारत से जांच में मदद करने की बातें कहता रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक़, अमेरिका इस मामले में भारत के शामिल होने को लेकर भी जांच कर रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज छपी खबर के अनुसार भारत ने अमेरिका को सूचित किया है कि उसने अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस (डीओजे) के दस्तावेजों में सीसी1 के रूप में चिह्नित व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया है। यह अमेरिका की धरती पर अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश का निर्देश देने वाले व्यक्ति के संबंध में है। खबर में व्यक्ति का नाम नहीं बताया गया है। पन्नू ने अपनी हत्या की साज़िश को लेकर न्यूयॉर्क की एक अदालत में याचिका दाखिल की है। इसी मामले को लेकर हाल ही में न्यूयॉर्क की एक अदालत ने भारत से कई लोगों को समन किया था। इस समन में अजित डोभाल, निखिल गुप्ता और पूर्व रॉ प्रमुख सामंत गोयल जैसे शीर्ष अधिकारियों के नाम हैं।

उधर वाशिंगटन पोस्ट की खबर के अनुसार कनाडा के अधिकारियों ने अजीत डोभाल को दस्तावेज दिये हैं। इसलिए मामला उलझा हुआ लग रहा है पर उम्मीद है जल्दी ही स्पष्ट होगा। बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, माना जाता है कि अभी भारतीय डिप्लोमैसी में तीन अहम लोग हैं। एक ख़ुद पीएम मोदी, दूसरे विदेश मंत्री एस जयशंकर और तीसरे एनएसए अजित डोभाल। मुझे लगता है कि विदेशों से संबंध बिगड़ने के ऐसे मामलों में आम जनता को कारण समझ में आना चाहिये। दूसरे शब्दों में स्पष्ट बताया जाना चाहिये। जो लोग मामले को जानते हैं उनकी बात अलग है लेकिन जो इस गंभीरता के बाद जानना चाहेंगे या जानने के लिए उत्सुक होंगे उनके लिए खबर निष्पक्ष ढंग से लिखी होनी चाहिये। वैसे तो मोदी सरकार हर मामले में देश भक्ति और देश विरोध का मुद्दा ले आती है लेकिन खबरों की प्रस्तुति में निष्पक्षता होनी ही चाहिये ताकि पाठक अपनी राय बना सकें। भारतीय अखबारों में भारत सरकार का ही पक्ष छपे यह उचित नहीं है। यह अलग बात है कि सरकार और उसके समर्थकों का पत्रकारों पर निष्पक्ष होने का खासा दबाव है और इसके लिए सरकार के समर्थक बचकाना तर्क देते हैं कि आप सरकार का विरोध करते हैं तो उसकी अच्छाई भी बताइये। लेकिन मेरा काम सरकार की खराबियां और कमजोरियां बताना ही है। यह काम मैं मुफ्त में जनहित में करता हूं जबकि सरकार अपने काम का प्रचार कई तरीके से कर सकती है। इसके लिए उसके पास अच्छा-खासा बजट है। अब तो मीडिया संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए ईडी-सीबीआई भी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर पांच कॉलम की है और लीड का मुख्य शीर्षक, दो लाइन का है। इस खबर के साथ तीन कॉलम में खास बातें बताई गई हैं। इनका शीर्षक है, दिल्ली ने अपने अधिकारियों की भूमिका से संबंधित दावों को कूड़ा कहा। इसके साथ 10 लाइन की एक छोटी सी खबर है जिसका शीर्षक है, बिश्नोई गैंग भारत सरकार के एजेंट से जुड़ा हुआ है। इसके नीचे लगभग इतनी ही बड़ी एक और खबर का शीर्षक है, (हिन्दुओं पर) हमले के भारत के दावों को बांग्लादेश ने निराधार कहा। यह खबर भी आज किसी और अखबार में प्रमुखता से नहीं दिखी। हिन्दू के शीर्षक में बताया गया है कि राजनयिकों के निष्कासन का संबंध निज्जर मामले में विवाद बढ़ने से हुआ है। अखबार ने हाईलाइट किये हुए अंशों के साथ लिखा है, कनाडा के साथ भारत के संबंध गये साल हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद से खराब रहे हैंदि एशियन एज की खबर के अनुसार भारत ने कहा है कि कनाडा में उसके दूत असुरक्षित हैं।

दि एशियन एज में इस मामले में कांग्रेस का पक्ष प्रमुखता से है। खबर के अनुसार कांग्रेस ने उम्मीद जताई है कि प्रधानमंत्री विपक्ष को भरोसे में लेंगे। इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, पन्नून मामले में भारतीय जांच समिति आज अमेरिका जा रही है। आप समझ सकते हैं कि भारत का विदेश मंत्रालय ऐसे मामलों में व्यस्त है या उलझा हुआ है तो वह आम नागरिकों की समस्याओं को कैसे देख पायेगा और यह नया नहीं है। गुजरात मॉडल में भी अधिकारियों की रक्षा की जाती रही है और आपको याद होगा कि सीबीआई के तबके अधिकारी राकेश अस्थाना को गिरफ्तार किये जाने की स्थिति बनी तो आधी रात की कार्रवाई में सीबीआई के निदेशक को ही हटा दिया गया और उसके बाद से सीबीआई भाजपा के किसी नेता के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाई है। अब लॉरेंस बिश्नोई को सरकारी संरक्षण की बात है तो उसके लिए कनाडा से ही संबंध खराब कर लिया गया है। अखबारों में खबर नहीं छपी यह अलग मुद्दा है पर बिश्नोई बगैर संरक्षण यह सब कर पा रहा है और सरकार समर्थक अखबार बता रहे हैं कि उसने हत्या की जिम्मेदारी ली है तो यह सब यूं ही नहीं हो सकता है। 

दि एशियन एज की खबर से अगर यह पता चलता है कि कांग्रेस को उम्मीद है कि कनाडा के साथ संबंध बिगड़ने पर प्रधानमंत्री विपक्ष को भरोसे में लेंगे तो आज नवोदय टाइम्स ने पांच कॉलम की खबर से बताया है कि वक्फ समिति की बैठक में तीखी नोकझोंक हुई और विपक्ष का बहिष्कार किया गया। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, खरगे पर वक्फ भूमि घोटालों में शामिल होने का आरोप लगाने पर भड़का विपक्ष। आप जानते हैं कि केंद्र सरकार के वक्फ (संशोधन) विधेयक पर विचार करने के लिए संसदीय समिति बनाई गई है। खबर के अनुसार, इसकी बैठक में कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक आयोग और कर्नाटक अल्पसंख्यक विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष अनवर मणिप्पडी ने वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करने में कथित संलिप्तता के लिए मल्लिकार्जुन खरगे और कर्नाटक कांग्रेस के कई नेताओं का नाम लिया। यहां दिलचस्प है कि कर्नाटक में हाल तक कांग्रेस की सरकार थी और आरोप अब लगाया जा रहा है। ऐसा ही आरोप हरियाणा में रॉबर्ट वाड्रा पर लगाया गया था। दस साल भाजपा की सरकार रही कुछ नहीं हुआ औऱ चुनाव से पहले फिर दमाद दलाल का मुद्दा उठ गया। पार्टी चुनाव जीत गई तो मुख्यमंत्री चयन में मुश्किल आ रही है और केंद्रीय गृहमंत्री अपना काम छोड़कर यह विवाद सुलझायेंगे।

दूसरी ओर, यहां गोवा में जमीन का लैंड यूज बदलने और उससे भाजपा नेता को लाभ होने की खबर इंडियन एक्सप्रेस में छपी थी। इसपर भाजपा का कहना था कि यह नियमानुसार नहीं हुआ तो कार्रवाई की जायेगी जबकि यह नियमानुसार फायदा पहुंचाने का लगभग वैसा ही मामला था जैसा आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ बनाया गया था। मुझे लगता है कि भाजपा नेताओं के कारनामे कम छपते हैं, भाजपा उनके खिलाफ कार्रवाई तो करती ही नहीं है जबकि विपक्षी नेताओं के खिलाफ हवा-हवाई आरोप लगाकर उन्हें बदनाम किया जाता है और यह 2014 के चुनाव प्रचार से शुरू हुआ था और कई मामले निराधार साबित हो चुके हैं पर भाजपा और उसके प्रचारक वही कर रहे हैं और मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसा करने दे रहा है। ऐसे मामलों में कांग्रेस पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप के मुकाबले इलेक्टोरल बांड का मामला कई गुना गंभीर है। मनीष सिसोदिया ने कहा है कि हर लेन-देन भ्रष्टाचार की एक कहानी है लेकिन उसपर किसी ने खबर की औऱ की तो कितनी?      

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1 Comment

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  1. Raghav

    October 18, 2024 at 6:20 pm

    मोदी सरकार का विरोध अपनी जगह है। लेकिन कनाडा की तरह निम्न स्तर पर उतरकर एकतरफा विश्लेषण नही करना चाहिए। जेल के भीतर से गैंग चलाने का यह पहला मामला नही है। इस तरह से तो दाऊद के समय हुई हत्याओं और नरसंहार को सरकार प्रायोजित क्यों नही कहा जा सकता? एक संगठित गिरोह के सरगना से निपटने के लिए दूसरा ही सामने आता है। खालिस्तानी आतंकियों की दाई माँ बनी हुई कनाडा सरकार के प्रति इतनी ममता किसलिए उमड़ रही है।तेजी से बदलती दुनिया मे भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का ऐसे संतुलन बना कर चलना प्रशंसा का विषय है। लेकिन घर के भीतर से ऐसे विधवा विलाप करने वालों को तो मौका मिलना चाहिए बस।

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