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आज के अखबार – ईवीएम की गड़बड़ी हो या कनाडा के आरोप, कोई भी जवाब संतोषजनक नहीं हैं 

संजय कुमार सिंह

कनाडा ने भारत पर गंभीर आरोप लगाये हैं पर भारत ने इनका आधिकारिक तौर पर कोई जवाब नहीं दिया है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार सूत्रों ने कहा कि कनाडा के इस दावे में कोई सच्चाई नहीं है कि भारत को ठोस सबूत सौंपे गये हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, कनाडा ने कहा है कि वह पांच आंखों से काम कर रहा है। अन्य आंखों में ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूके और यूएस यानी इंग्लैंड और अमेरिका हैं। नई दिल्ली डेटलाइन से संवाददाता के हवाले से छपी खबर के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग के मैथ्यू मिलर ने इस मुद्दे पर बात की और कहा, कनाडा के आरोप बेहद गंभीर हैं … और हम चाहते थे कि भारत सरकार कनाडा से उसकी जांच में सहयोग करे। जाहिर है, उन्होंने (भारत ने) यह रास्ता नहीं चुना है। कनाडा के आरोपों पर भारत का जवाब हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। शीर्षक है, भारत ने फिर जोर देकर कहा : कनाडा के दावे सही नहीं हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, एनआईए ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि पंजाब में हत्या की साजिश करने वाले कनाडा में छिपे हुए हैं।

ठीक है कि कनाडा ने जो किया उसके जवाब में भारत की ओर से यह सब कहा जा सकता है लेकिन दोनों अलग तरह के मामले हैं। फिर भी कनाडा में रह रहे भारत के लोग जो कर रहे हैं या उनसे जो करवाया जा रहा है वह दिलचस्प है। उदाहरण के लिए पत्रकार मित्र अजीत शाही ने 22-23 सितंबर 2023 के नौ एक जैसे ट्वीट शेयर करते हुए लिखा है, भारत में रहने वाले भारतीयों के लिए अलर्ट। इसके अनुसार कनाडा में रह रहे दसियों हजार भारतीय जल्दी ही कनाडा लौटेंगे। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने ट्वीट का स्क्रीन शॉट साझा किया है। सब अंग्रेजी में हैं और इनमें कई नाम पंजाबी में लिखे हैं। एक ट्वीटर हैंडल है ड्रंक ब्राह्मण। बाकी अंग्रेजी में लिखे बिस्कुट और हेलमैन भी हैं। इन सबका ट्वीट अक्षरशः एक है। हिन्दी में यह इस प्रकार होगा, मैं एक हिन्दू हूं। मैं अपने पूरे जीवन कनाडा में रहा हूं। पहले कभी असुरक्षित नहीं महसूस किया। अब करता हूं। मैं एक राष्ट्रवादी सनातनी हूं और तय किया है कि अपने खूबसूरत भारत के लिए कनाडा छोड़ दूं। वंदे मातरम।

दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक है, “वही पुराने त्रुदेव वही पुरानी चीजें कह रहे हैं : भारत ने कनाडा के प्रधानमंत्री के दावे को खारिज किया”। फ्लैग शीर्षक है, कनाडा के वित्त मंत्री ने कहा : सब कुछ खुले में है (मेज पर है)। इंडियन एक्सप्रेस ने भारत की ओर से वही कहा है जो दूसरे अखबार सूत्रों के हवाले से बता रहे हैं। इस खबर का विस्तार अंदर के पन्ने पर हैं। वहां पता चलता है कि यह भी सूत्रों की ही खबर है। यह दिलचस्प है कि दस साल में एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाले मुखिया की सरकार के सूत्र सभी अखबारों को एक साथ एक समय एक ही सूचना देते हैं और वह सूत्रों के हवाले से छप जाती है। यह सब तब है जब पीआईबी को फैक्ट चेक के काम में लगाया गया है (था) और अच्छी भली खबर को फेक घोषित कर सोशल मीडिया से हटवाने की कोशिश होती रही है और ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश नाकाम हो चुकी है। 

नवोदय टाइम्स ने आज बिश्नोई गिरोह के तार भारतीय एजेंटों से जोड़ने के कनाडा के प्रयास को चार कॉलम में छापा है। शीर्षक है, कनाडा के नये आरोप, भारत ने किये खारिज। कहने की जरूरत नहीं है कि कनाडा के आरोपों में विश्नोई वाला मामला नया है लेकिन सूत्रों के हवाले से आज भारत के अखबारों में खबर छपवाई गई है, … वही त्रुदेव वही आरोप लगा रहे हैं। विश्नोई को विशेष सुविधा की खबरें अपनी जगह हैं ही। सोशल मीडिया पर खबरें हैं जो बताती हैं कि गृहमंत्रालय के आदेश के कारण गुजरात पुलिस उसे मुंबई पुलिस को नहीं सौंप रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि ये खबरें गलत हो सकती हैं। ऐसा है तो सरकार को कार्रवाई करनी चाहिये। अगर कर रही होती तो ऐसी खबरें होती ही नहीं। पर सरकार चाहती है पीआईबी या कोई एजेंसी ऐसी खबरों को फेक घोषित कर दे और संबंधित सोशल मीडिया कंपनी को मजबूर किया जाये कि वह ऐसी फेक खबरों को हटाने के लिए मजबूर हो। अभी ऐसी व्यवस्था हुई नहीं है पर अखबारों में सोशल मी़डिया की ऐसी खबरें नहीं छप रही हैं। और यह निश्चित रूप से रेखांकित करने लायक है। यहां दिलचस्प यह भी है कि कोई भी मीडिया चैनल ऐसी खबर सोशल मीडिया या किसी और के हवाले से क्यों चलाये। ऐसा आदेश अगर है तो वह सार्वजनिक होना चाहिये या सरकार को समय रहते उसका खंडन करना चाहिये। पर दोनों नहीं हो रहा है। यह खबर है, जो मुझे नहीं दिखी।

दि एशियन एज़ में कनाडा के दावे की खबर आज दो कॉलम में छपी है। शीर्षक है, भारत ने कहा कनाडा के दावे बकवास हैं, कोई दमदार सबूत नहीं है। उपशीर्षक आरसीएमपी (रॉयल कनाडियन माउंटेड पुलिस) का आरोप है कि कनाडा में खालिस्तानियों को साधने के लिए बिश्नोई गैंग का उपयोग किया गया था। भारत में बाबा सिद्दीक विपक्ष के नेता हैं और खबरों के अनुसार बिश्नोई ने हत्या का दावा भी किया है। पुलिस की जांच में भी शक की सुई उसी की तरफ है। यह हत्या असाधारण है क्योंकि महाराष्ट्र में चुनाव है और चुनाव से पहले हत्या हुई है जबकि वे सरकारी सुरक्षा में थे और टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की खबर के अनुसार पुलिस ने कहा है कि गए महीने में उनकी हत्या की 10 कोशिशें हुई हैं। मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के कारण 10 कोशिशें नाकाम हुईं यह तो अच्छी बात है लेकिन 10 कोशिशें की गईं और जारी रहीं यह अपने आप में संदिग्ध है। सुरक्षा देने और हत्या करने वालों को मिलने वाले संरक्षण को लेकर भी। अगर यह सब सरकार जान बूझकर नहीं कर रही है और वाकई यह स्थिति है तो जाहिर है उससे सरकार या प्रशासन चल नहीं रहा है। मीडिया अगर पहले से यह सब बता रहा होता तो यह स्थिति नहीं आती और अगर आ ही गई है तो ईवीएम के बावजूद हरियाणा में तीसरी बार सरकार आखिर किसलिये बनी है? 

मेरा मानना है कि गलत तरीके से बार-बार चुनाव जीतना आसान नहीं है और यह संभव नहीं है कि हर बार ईवीएम की सेटिंग हर जगह सफल हो ही जाये। इसके अलावा यह संभव नहीं है कि शत प्रतिशत वोट किसी एक पार्टी को जाये। इसीलिए पिछली बार सीटें कम हुईं तो प्रधानमंत्री ने, मैंने पूछा ईवीएम जिन्दा है कि मर गया की कहानी सुनाकर ईवीएम के विरोधियों का मजाक उड़ा दिया। ईवीएम ने इस बार जिन्दा होने का सबूत दिया है तो सरकार (और चुनाव आयोग) के पास जवाब नहीं है। सरकार समर्थक ऐसा करने का आरोप विपक्ष पर लगाते हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने भी लगभग वही किया है। कल महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव की घोषणा के मौके पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने मतगणना शुरू होने से पहले ही रुझान दिखाने के मामले की चर्चा कर सबकी साख खराब करने का काम किया जबकि यह उनका क्षेत्र ही नहीं है और कर रहे थे तो लोकसभा चुनाव के समय एक्जिट पोल के खेल से शेयर बाजार में कमाई करने के आरोपों की भी चर्चा करनी चाहिये थी। यही नहीं, अपनी बात को दमदार बनाने के लिए उन्होंने यह भी कहा कि मतगणना 8:30 बजे से होती है जबकि पहले की खबरों में कहा गया था (कई इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, छपे हुए अखबार भी मिल जायेंगे) कि मतगणना 8:00 बजे से होगी (होती है)।

यह ‘आदेश मानने की मजबूरी’ का नतीजा हो सकता है वरना किसी की सलाह पर तर्क ढूंढ़ा जा होता तो मतगणना के घोषित समय की जांच की ही जाती और ऐसा दावा नहीं किया जाता। लेकिन यह सब तो हुआ ही, दिलचस्प यह है कि अमर उजाला ने आज इसे पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा है। चुनाव आयुक्त के इस दावे को वहीं उसी समय गूगल करके गलत साबित किया जा सकता था और यह तो पूछा ही जा सकता था कि मतगणना शुरू होने से पहले अगर चैनल (यू ट्यूब चैनल भी) अगर रुझान बता रहे थे तो आपने तभी क्यों नहीं कहा और तब नहीं कहा तो अभी तक चुप क्यों रहे? जो भी हो, देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है तो यह खबर है और संभव है कि अखबारों ने इसे इसलिए छाप दिया हो कि वे उन्हें भी टीएन शेषन की टक्कर का मुख्य चुनाव आयुक्त मानते हों। आपको याद होगा, टीएन शेषन के बाद ही चुनाव आयोग तीन सदस्यों का हुआ और फिर सदस्यों की नियुक्ति का मामला है और इस बार प्रधानमंत्री ने तीन में से दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति खुद लगभग एक साथ की है। एक का इस्तीफा अचानक स्वीकार हो गया और नोटिस पीरियड का क्या हुआ, पता ही नहीं चला।    

लोकतंत्र के चार स्तंभ अगर अलग-अलग अपना काम कर रहे होते तो अखबारों में आज खबर होती कि चुनाव आयुक्त ने मतगणना के रुझान को गलत साबित करने के लिए गलत तथ्य का सहारा लिया। पर कांग्रेस से भाजपा में शामिल कर लिये (या चले गये) गौरव वल्लभ जैसे प्रवक्ता सभी स्तंभों के मिलकर काम करने की जरूरत बताते हैं और प्रधानमंत्री के मुख्य न्यायाधीश के घर जाने का बचाव इसी तर्क से किया था। बेशक बच्चों को यह पढ़ाया जाता है कि अकेले लड़ने (या काम करने) के मुकाबले मिलकर लड़ना बेहतर रहता है। पर मेज या कुर्सी के चार पाये ही होने चाहिये और चारों को मिलाकर एक कर दिया जाये तो कुर्सी नहीं रहेगी स्टूल हो जायेगा यह सब बाद में समझ में आता है और कोई भी शिक्षक (या प्रचारक) जरूरत के अनुसार इसे छिपा या बता सकता है। प्रधानमंत्री तो बीजगणित के फॉर्मूले में भी मिलाकर वर्ग करने से टूएबी एक्सट्रा आने का दावा करते हैं और लोग तालियां बजाते दिखाये जाते रहे हैं पर किसी पुल के सभी पाये मिला दिये जायें तो हादसा ही होगा पर जब पुल वैसे ही बह और गिर जा रहे हों तो हादसे की परवाह किसे होगी?

अमर उजाला में आज यह खबर तीन कॉलम की जगह में दो कॉलम में टॉप पर है। इसका शीर्षक है, “एग्जिट पोल और फटाफट रुझान फर्जीवाड़ा : सीईसी”। उपशीर्षक की चर्चा ऊपर कर चुका हूं और जब तथ्यात्मक रूप से गलत है तो उसकी क्या बात करनी। मुख्य शीर्षक के साथ सिंगल कॉलम की दो खबरें हैं। पहली का शीर्षक है, तय होनी चाहिये जवाबदेही, आत्म चिन्तन करें संस्थाएं। मुझे लगता है कि जवाबदेही तय है और संस्थाओं को अगर आत्म चिन्तन करने की जरूरत है तो चुनाव आयोग अलग नहीं है। कई उदाहरण हैं अभी यहां बताने की जरूत नहीं है। अमर उजाला लिख सकता था कि हम आत्म चिन्तन करते रहे हैं, आप भी कीजिये। पर वह मेरा विषय नहीं है। दूसरी खबर है, पेजर नहीं है ईवीएम। मुझे लगता है इस तर्क में भी दम नहीं है। तकनीकी रूप से यह ठीक हो सकता है और पेजर की जगह अगर बिना सिम के मोबाइल से की जाये तो समझा जा सकता है कि दावा कितना खोखला है। पेजर की बात पेजर में विस्फोट से आई है लेकिन मोबाइल के उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि उसमें सिम नहीं होता है तो वह बहुत कम काम करता है लेकिन उसमें सिम लगा दिया जाये तो क्या हो जाता है। यह आईपैड के साथ भी है और पेजर जब भारत में नहीं के बराबर है तो उससे तुलना क्यों आईपैड या मोबाइल से क्यों नहीं। मेरा कहना है कि सिम लगाने से अगर मरा हुआ मोबाइल जिन्दा हो सकता है तो 25 रुपये खर्च करके ईवीएम को मोबाइल बनाना या हैक करना कितना मुश्किल है?

जो भी हो, ईवीएम से संबंधित सवालों के जवाब कभी भी संतोषजनक नहीं रहे हैं। अभी भी नहीं हैं और आश्चर्य की बात है कि अखबार निराधार दावों को बगैर किसी चुनौती के इतनी प्रमुखता से छापते हैं। बैट्री 99 प्रतिशत चार्ज होने को अगर तकनीक का करामात माना जाये तो क्यों नहीं ऐसी बैट्री मोबाइल या इनवर्टर या पावर बैंक के लिए बन रही है? चुनाव के तारीखों की घोषणा वाली खबर के साथ इससे संबंधित खबर में कहा गया है कि हर चरण में जांच व निगरानी है। शंका की गुंजाइश कहां है। वो इसलिए है कि मतदान केंद्रों की बत्ती चली जाती है, सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिये जाते हैं और ऐसी शिकायतें भी हैं। निगरानी में चूक तो होती ही है और जब धमकी देकर, ब्लैकमेल करके काम कराये जा रहे हैं तो ई मेल से छेड़छाड़ नहीं हो सकती है? आज जब पहचान पत्र सबके पास है और पहचान की पुष्टि अपेक्षाकृत आसान है तो दूसरे का वोट कैसे पड़ जाता है। निगरानी व्यवस्था कहां चली जाती है? क्या ऐसी शिकायतें नहीं हैं? फिर भी चुनाव आयुक्त दावा कर रहे हैं कि ईवीएम दुनिया की सबसे विश्वसनीय प्रणाली है तो यह उनके ‘मन की बात’ ही हो सकती है।    

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