लड़कियों पर फूहड़ कमेंट करने में ही हीरोइज्म हुआ करता था और इसे ही हम अपना हासिल मानते थे! लंपट होने के लिए जितनी निर्लज्जता चाहिए थी शायद हममें उतनी बेहयाई थी नहीं। लेकिन जितनी थी वह भी अधिक थी…

बोधिसत्व-
स्वीकार उक्तियाँ!
किशोर वय और आरंभिक युवा अवस्था में लंठई और फूहड़पन से नष्ट किए समय के लिए मन में घोर पछतावा है! लिखना बहुत पहले आरंभ किया लेकिन ठीक से पढ़ना देर में शुरू किया! उस दौर की लंठई का दायरा तनिक और विस्तार पा जाता तो जीवन छीछालेदर की ओर लुढ़क जाता। लड़कियों पर फूहड़ कमेंट करने में ही हीरोइज्म हुआ करता था और इसे ही हम अपना हासिल मानते थे! लंपट होने के लिए जितनी निर्लज्जता चाहिए थी शायद हममें उतनी बेहयाई थी नहीं। लेकिन जितनी थी वह भी अधिक थी।
उसके बाद निंदा चुगली और बेसिर पैर की आलोचना जो की बकवास होती, में दिन बीतता।
अब उस तरह की बकवास या बकवाद में समय नष्ट होने से भरसक बचाने की कोशिश करता हूँ! लेकिन लंतरानी घेर लेती है!
उन स्थितियों में वे लोग याद आते हैं जिन्होंने पढ़ने के लिए अलग से प्रेरित किया। जिन्होंने बिना बोले अनुशासित किया ऐसे लोगों में उपेन्द्र नाथ अश्क सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने गंभीरता से संस्कृत और अवधी ब्रज मैथिली बंगाली ब्रजबुली आदि के आरंभिक साहित्य को ठीक से पढ़ने के लिए प्रेरित किया। आगे की मुलाकातों में उन्होंने दुनिया भर के साहित्य को किसी भी तरह पढ़ने के सुझाव दिये!
उनका कहना था लेखक कई तरह के होते हैं। एक पूर्ण अनपढ़ व्यक्ति भी लिख सकता है और वह भी लेखक होगा। लेकिन बेहतर है क्या अच्छा और क्या बुरा लिखा गया है यह एक लेखक कवि को पता होना ही चाहिए।
अश्क जी ने ही घर में अच्छे शब्द कोश रखने का सुझाव दिया। इलाहाबाद के वे दिन अच्छे पठन के लिए बहुत सही थे। लेकिन कुछ विचित्र मनोग्रंथि के लोग छात्र जीवन में मिले जो पढ़ने लिखने के अलावा अति संपर्क वादी थे। वे इस दादा के यहाँ से उस दादा के यहाँ और इस सर के यहाँ से उस सर के यहाँ निंदा-परिक्रमा और चुगल-अड्डा जमाने को ही सुफल होना मानते थे! ऐसे ही एक निंदा-परिक्रमा पर आदरणीय नीलकान्त जी ने बहुत बुरा लताड़ा और ठीक से पढ़ने और गंभीरता से लिखने का सुझाव दिया।
आगे आदरणीय लक्ष्मीकान्त जी ने बौद्ध दर्शन और जगदीश गुप्त जी रीति साहित्य पर ध्यान रखने को कहा। जगदीश जी चलते फिरते रीतिकाल थे। इतने सवैये इतने छंद उनको स्मरण थे कि जैसे वे रीतिकाल में ही जन्मे हों। कुछ समय बाद रीति साहित्य के प्रकांड पंडित किशोरी लाल जी ने भी कम लिखने और अधिक पढ़ने पर जोर दिया। किशोरी लाल जी नायक नायिका भेद को समझने पर बहुत बल देते थे। किशोरी लाल जी ने उन अध्यापकों और लेखकों से एक निश्चित दूरी बना कर रहने के लिए कहा जो संध्या के बाद शब्द सान्निध्य की जगह सुरा-सेवन करते हों। उनका कहना था कि ऐसे लोग बड़े भारी प्रेरक होते हैं और एक बार आप प्रेरित हो गये तो गये।
आगे चल कर अध्ययन की एक चुनौती आदरणीय सत्य प्रकाश मिश्र जी से मिली। वे घोर अध्ययन शील और मनन कर्ता थे। मुझे यह याद करना अच्छा लगता है कि वे भी मुझे पढ़ाकू कहने लगे थे! हालांकि तब भी मैं लंतरानी में अधिक उलझा रहता था पढ़ाई में कम। उसका कारण था असंगत संगति! लेकिन तब विवेक नहीं था। इतना विवेक भी नहीं कि जो जीवन हम जी रहे हैं वह कहाँ ले जाएगा!
इसी सब में एक दिन नीलाभ जी मिले। औचक उन्होंने पूछा कभी सोचा है दस साल बाद कहाँ होंगे और क्या कर रहे होंगे! मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने कहा कोई बात नहीं कल मिलेंगे इस पर सोचियेगा। आप सब युवकों को लेकर चिंता होती है। फिर रूम पर लौटा तो यह समझ आया कि हम तो दिन काट रहे हैं। एक तरह से एक वृत्त में परिक्रमा कर रहे हैं। दो तीन दिन बाद उन्होंने एक चार्ट जैसा बना कर दिया जिसमें एक तय टाइम टेबल था। जिसमें कुछ वक्त निरुद्देश्य भटकने का भी समय था। उन्होंने कहा ऐसा कोई गुण हो जिससे आप जी सकें तो बेहतर! असल में नीलाभ जी ने सिनेमा और मुंबई आने का कॉन्सेप्ट दिमाग़ में डाला। क्योंकि मैं नौकरी करने के पक्ष में नहीं था।
अभी न नीलाभ जी हैं न गुरु लोग ही। लेकिन उनकी बातें हैं और रहेंगी। वे सहचर भी जहां तहाँ हैं। लेकिन अक्सर नीलाभ जी की आवाज गूंजती है कहाँ रहेंगे दस साल बाद कभी सोचा है? अब भी सोचता हूँ लेकिन वैसा ही होता है कि कुछ समझ नहीं आता कहाँ रहूँगा दस साल बाद?
एक बात स्वीकार करनी चाहिए मुझ पर अश्क जी और नीलाभ जी का स्नेह सदैव रहा! उन दोनों का ऋणी हूँ! अश्क जी ने मेरी आरंभिक कविताओं पर बहुत काम किया। कविता पर काम करने का गुर सिखाया। यह विचित्र बात भी है कि इलाहाबाद में कम लोग थे जिन पर इन पिता पुत्र दोनों का स्नेह बराबर रहा हो! मेरे कुछ मित्र कहते थे मैं लोगों को पटाना जानता था। ऐसा रहा भी हो तो क्या बुरा। आप कुछ जानते हैं तो किसी और को परेशानी क्या?
बावजूद इस सबके वे नष्ट हुए दिन और समय कुछ सीख दे कर गये लेकिन उस सीख का क्या अर्थ जो व्यर्थ करने से नहीं रोकता हो।
पिछला भाग…
इलाहाबाद के किस्से (पार्ट-4) : मैं अपने को अखिलेश कुमार मिश्र से बोधिसत्व होते देख रहा था!


