Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

जनसत्ता, नभाटा और अमर उजाला में संपादक रहे अच्युतानंद मिश्र ज्ञान और संस्मरणों के जीवित कोष हैं!

“मैंने वह पत्र खोला तो देखा उसमें झांसी, बुलंद शहर, देहरादून और मुरादाबाद के स्ट्रिंगर्स को हटाने का निर्देश था। मैंने यह निर्देश न मानने का निश्चय किया। और चारों संवाददाताओं की खबरें लगा दीं। झांसी के संवाददाता की तो खबर जान-बूझकर पहले पेज पर लगवा दी, वह भी बाई-लाइन के साथ”…

शंभुनाथ शुक्ला-

नसत्ता, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला में संपादक रहे अच्युतानंद मिश्र ने दो दिसंबर को जीवन के नौ दशक पूरे किए। इस मौके पर इंदिरा गांधी कला केंद्र में ‘अच्युतानंद मिश्र समावेशी शब्द साधक’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ। पुस्तक में मेरा लेख

“अच्युतानंद मिश्र; नाराज हों तो भी कभी नाराज़गी नहीं दिखाई..

जनवरी 1987 की एक कड़कड़ाती सुबह जब दफ़्तर आया तो मुझे एक खरीता मिला। इस पर न भेजने वाले का नाम लिखा था, न पाने वाले का। मैंने टाइपिस्ट यादव से पूछा, किसने दिया तो वह बोला, मिश्रा जी कल दे गए थे। मैंने वह पत्र खोला तो देखा उसमें झांसी, बुलंद शहर, देहरादून और मुरादाबाद के स्ट्रिंगर्स (अंशकालिक संवाददाताओं) को हटाने का निर्देश था। मैंने यह निर्देश न मानने का निश्चय किया। और चारों संवाददाताओं की खबरें लगा दीं। झांसी के संवाददाता की तो खबर जान-बूझकर पहले पेज पर लगवा दी, वह भी बाई-लाइन के साथ।

मिश्रा जी उस दिन लखनऊ गए हुए थे। दो दिन बाद जब वे लौटे तो मैंने कहा, इन संवाददाताओं को क्यों हटाया जाए? वे बोले, प्रभाष जी ने कहा है। मैं यह मानने को राज़ी नहीं था, कि प्रभाष जी बिना किसी कारण के किसी को हटाने के लिए कह सकते हैं। उसी क्षण मैं प्रभाष जी के पास गया और पूछा कि इन्हें क्यों हटाया जाए? उन्होंने कहा, अच्युता बाबू ने तुम्हें बताया नहीं। तब मुझे लगा, मामला सीरियस है।

दरअसल, झांसी के स्ट्रिंगर पर गंभीर आरोप थे। आरोप लगाए थे, झांसी-ललितपुर के उस समय के सांसद सुजान सिंह बुंदेला ने।

मुझे एक-एक कर सारी बातें याद आने लगीं। सांसद महोदय मेरे पास भी पहले ऐसी ही शिकायत ले कर मिल चुके थे। मैं प्रभाष जी के कमरे से बाहर आया और अच्युता बाबू को सारा क़िस्सा सुनाया। यह भी कहा, कि इससे ग़लत मैसेज जाएगा कि चूँकि न्यूज़ एडिटर अच्युतानंद मिश्र पत्रकारों के एक संगठन नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट से जुड़े हैं और झांसी का स्ट्रिंगर उनकी विरोधी यूनियन से, इसलिए उसे हटाया गया। अच्युता जी को यह बात उचित लगी और बोले, मैं प्रभाष जी से बात करूँगा। उनकी यह बात दिल को छू गई। लगा कि उन्हें कट्टर आरएसएस वादी कहा जाता है लेकिन यह सच है कि उनमें न्याय बुद्धि एकतरफा नहीं है।

मिश्रा जी का नाम तो मैंने तब से सुन रखा था, जब कानपुर में पत्रकारिता में कदम रखा था। मगर उन्हें देखा दिल्ली के जनसत्ता में ही। जब वे जनसत्ता में आए तब मैं सीनियर सब एडिटर था और मुझे जनसत्ता के राज्य डेस्क के पन्ने सौंपे गए थे। इस डेस्क में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश की खबरों को देखना होता था। मेरे साथ सात और लोग थे। मेरी डेस्क जनरल डेस्क के बाद सबसे बड़ी थी। असंख्य स्ट्रिंगर और चार राज्यों के स्टाफ़ संवाददाताओं की कॉपी हम लोग ही देखते।

राज्यों के मुख्य संवाददाता (स्टेट हेड) में हेमंत शर्मा (उत्तर प्रदेश), सुरेंद्र किशोर (बिहार), आत्मदीप (राजस्थान) और महेश पांडे (मध्य प्रदेश) थे। इनमें से हर कोई हेमंत शर्मा की कॉपी लेने को तत्पर रहता और जिसे भी महेश पांडे की कॉपी दो तो वह ऐसे भड़कता जैसे उसके हाथ में बिच्छू धर दिया गया हो। अजीब स्थिति हो जाती। चूँकि उत्तर प्रदेश उस समय सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य था इसलिए हेमंत शर्मा की लगभग हर कॉपी पहले पेज़ पर जाती। इसलिए डेस्क प्रमुख होने के नाते उसे मुझे देखना ही पड़ता। उनके बाद बिहार राज्य था।

मध्य प्रदेश में भी उथल-पुथल थी किंतु कोई भी सब एडिटर महेश पांडे की कॉपी न लेता और वह एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के माध्यम से आई भोपाल के एनके सिंह की अंग्रेज़ी कॉपी का अनुवाद कर देता। महेश पांडे रोज प्रभाष जी को कहते और प्रभाष जी अच्युता जी को। एक दिन अच्युता जी ने पूछा, कि महेश जी की कॉपी आप लोग क्यों नहीं एडिट करते। सब लोगों ने एक सुर से मना कर दिया। अंत में उन्होंने महेश पांडे की कॉपी तत्कालीन डिप्टी न्यूज़ एडिटर सत्य प्रकाश त्रिपाठी को देनी शुरू कर दी। वे जनरल डेस्क पर किसी को देते। जहां पर बैठा सब एडिटर एक्सप्रेस की कॉपी का अनुवाद करता और थोड़ा हिस्सा महेश पांडे की कॉपी को ले कर जोड़ देता। बस नाम महेश पांडे का दे देता। महेश पांडे ने फिर पता नहीं प्रभाष जी से कभी शिकायत की या नहीं।

अच्युता जी एक दिन बम्बई जनसत्ता के संपादक हो कर चले गए। फिर उनसे दोबारा मुलाक़ात तब हुई जब वे नव भारत टाइम्स में एडिटर (न्यूज़) के पद पर दिल्ली आ गए। तब वहाँ प्रधान संपादक विद्या निवास मिश्र थे। फिर जनसत्ता में भी फेर-बदल हुआ। प्रभाष जी के बाद राहुल देव जनसत्ता के संपादक बने। मगर कुछ ही महीनों में उन्होंने पद छोड़ दिया और जनसत्ता दिल्ली के संपादक अच्युतानंद मिश्र बने। उन्होंने भी एक वर्ष में इस्तीफ़ा दे दिया। उनके बाद ओम् थानवी जनसत्ता के संपादक बनाये गए। ओम् जी ने मुझे पहले चंडीगढ़ और फिर कलकत्ता में स्थानीय संपादक बना कर भेज दिया।

कलकत्ता में अच्युता जी अक्सर आते। एक दिन उन्हें सूचना मिली कि उन्हें भोपाल स्थित माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्व विद्यालय का कुलपति नियुक्त किया जा रहा है। उस समय अच्युता जी कलकत्ता में ही थे। उन्होंने मुझे बताया और कहा कि फ़ौरन भोपाल जाना है। वे कोलकाता से सीधे भोपाल चले गए। अच्युता जी ने कई अख़बारों में संपादक का दायित्त्व संभाला और हर जगह उनके साथियों ने सदैव उन्हें पसंद किया। वे किसी से नाराज़ भले हों किंतु किसी का बुरा नहीं किया। न ही उन्होंने अपने अधीनस्थों का कभी अपमान किया। यहाँ तक कि अपने चपरासी और ड्राइवर को कभी उन्होंने डाँटा नहीं। इसलिए उनके साथ काम कर चुका हर पत्रकार उनका सम्मान करता है। उनके राजनीतिक संबंध भी बहुत व्यापक थे। उत्तर प्रदेश में तो कोई भी मुख्यमंत्री रहा हो, उन्हीं से ज़मीनी जानकारी माँगता।

अच्युतानंद मिश्र जी ऐसे पत्रकार हैं, जो साहित्य से दूर नहीं रहे। भले उन्होंने कभी कविता-कहानी न लिखी हो लेकिन साहित्य में उनकी दिलचस्पी सदैव रही। वे उन साहित्यकारों के काफ़ी क़रीब रहे जिन्होंने साहित्य के इतर पत्रकारिता को अपनी जीविका का आधार बनाया।

आज़ादी के बाद पहला दौर वही था, जब पत्रकारिता में वही लोग अग्रणी थे जो साहित्य से आए। चाहे वे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हों या रघुवीर सहाय अथवा धर्मवीर भारती। तीनों मूलतः कवि थे मगर हिंदी की पत्रकारिता के वे सिरमौर रहे। मज़े की बाद तीनों टाइम्स ऑफ़ समूह की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के संपादक रहे। अज्ञेय जी के संपादन में निकली साप्ताहिक पत्रिका तो हिंदी में उच्च्कोटि की राजनीतिक और सामाजिक विषयों की पत्रिका बनी। उनके बाद दिनमान के संपादक कवि रघुवीर सहाय बने।

जब 1982 में टाइम्स समूह ने उन्हें दिनमान के संपादक पद से हटा कर अपने दैनिक अख़बार नवभारत टाइम्स में सहायक संपादक बना कर भेजा तो तहलका मच गया था। हिंदी बौद्धिक जगत के कई लोगों ने लिखा हिंदी पत्रकारिता का दिनमान (सूर्य) मध्यान्ह में ही अस्त हो गया। दिनमान में रघुवीर सहाय के बाद कन्हैया लाल नंदन लाए गए फिर सतीश झा और अंततः प्रबंधन ने उसे बंद कर दिया। यह हिंदी की शिखर पत्रिकाओं के अवसान का काल था।

टाइम्स समूह का एक साप्ताहिक धर्मयुग बम्बई से निकलता था। उस समय टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह हिंदी पाठकों के लिए कई-कई साप्ताहिक पत्रिकाएँ निकालता था। और यह सब समूह की मालकिन रमा जैन के अपने प्रयास थे। बम्बई से धर्मयुग, सारिका (कहानी पत्रिका), राजनैतिक पत्रिका दिनमान दिल्ली से और यहीं से बच्चों की पत्रिका पराग भी निकली। बाद में महिलाओं के लिए वामा निकाली गई। मगर धर्मयुग ने प्रसार और विषयों की विविधता में जो झंडे गाड़े वे सबको पीछे छोड़ गए। धर्मवीर भारती इसके संपादक थे और उनका साहित्यिक अवदान भी किसी से छिपा नहीं थी।

इस साप्ताहिक के हर अंक में एक कहानी रहती। भारती जी ने नए लेखकों को खूब प्रोत्साहित किया। जिस किसी भी लेखक की कहानी धर्मयुग में छप जाती, वह खुद को कहानीकार मानने लगता। फ़िल्म, सिनेमा, नाटक की दुनिया में भी भारती जी की प्रतिष्ठा थी। अच्छे-अच्छे फ़िल्म निर्माता कथानक के लिए भारती जी से संबंध साधते। चूँकि धर्मयुग पूरे परिवार की पत्रिका होती और उसमें परिवार के हर सदस्य के लिए कुछ न कुछ अवश्य होता। इसलिए उसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उसकी पांच लाख प्रतियाँ छपती थीं। 1970 के दशक में सूचना-प्रसारण मंत्रालय से यह निर्देश निकला कि हर पत्र या पत्रिका अपनी प्रसार संख्या के आँकड़े प्रकाशित करे, उसमें धर्मयुग सबसे ऊपर होता। यहाँ तक कि टाइम्स समूह की अंग्रेज़ी पत्रिका ‘द इलेस्ट्रेटेड वीकली’ उससे काफ़ी पीछे थी। जबकि उसके संपादक ख़ुशवंत सिंह थे।

अच्युतानंद मिश्र जी ने इन्हीं तीन संपादकों (अज्ञेय, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती) के पत्रकारीय अवदान का उल्लेख किया है। इन बड़े साहित्यकारों के बीच के परस्पर द्वन्द का भी। ख़ासकर अज्ञेय जी और भारती जी के बीच कुछ वर्षों के लिए पनप आई कटुता का भी।

अच्युतानंद मिश्र जी ने अपनी पुस्तक तीन श्रेष्ठ कवियों का हिंदी पत्रकारिता में अवदान में विष्णुकांत शास्त्री के हवाले से लिखा है, कि परिमल की एक गोष्ठी के दौरान कांग्रेस फ़ॉर कल्चर फ़्रीडम की भारतीय शाखा के एक मंत्री पाध्ये जी आए हुए थे। वे चाहते थे कि उस कांग्रेस की एक पुस्तिका सभी साहित्यकारों के मध्य बाँटी जाए। मगर भारती जी ने कहा, वे चाहें तो बाँटें पर परिमल की ओर से पत्रिका नहीं बंटेगी। इसके बाद अज्ञेय जी चाहते थे कि एक प्रस्ताव पारित कर सरकार से कुछ समितियाँ आदि बनाने की माँग की जाए। पर परिमल ने उनके इस आग्रह को नहीं माना। परिमल सम्मेलन के अध्यक्ष तारा शंकर वंद्योपाध्याय ने भी अज्ञेय जी का यह प्रस्ताव नहीं माना। इससे अज्ञेय जी बुरा मान गए। इसके अलावा कुछ और ऐसी घटनाएँ हुईं, जिससे अज्ञेय और भारती के संबंध बिगड़े।

मसलन भारती के अंधा युग का मंचन सत्यदेव दुबे और अलकाजी दोनों ने किया और उसे खूब सफलता मिली। इसके उलट अज्ञेय का उत्तर प्रियदर्शी विफल रहा। अलकाजी ने उत्तर प्रियदर्शी को अनुपयुक्त बता कर इसका मंचन करने से मना कर दिया। ये सब घटनाएँ दोनों के मध्य कटुता का कारण बनीं। धर्मयुग की अपार लोकप्रियता भी अज्ञेय को रास नहीं आई क्योंकि दिनमान का प्रयोग प्रसार की दृष्टि से असफल रहा। अज्ञेय जी ने अपने दिनमान में धर्मयुग पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी की जिसका टाइम्स समूह के प्रबंधन ने बुरा माना।

धर्मवीर भारती ने विष्णुकांत शास्त्री को बताया था, कि काफ़ी लंबे अंतराल के बाद हम लोगों के बीच की ग़लत-फ़हमियाँ दूर हुईं। ऐसे कई निश्छल प्रसंग मिश्र जी की पुस्तकों में मिलते हैं। हिंदी के शीर्षस्थ संपादक विष्णु राव पराड़कर पर उनकी संपादित पुस्तक अद्भुत है। मिश्रा जी ने हिंदी पत्रकारिता का एक युग देखा ही नहीं उसे जिया भी है। उनके हर प्रसंग लाजवाब हैं। अच्युतानंद मिश्र जी को गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा पत्रकार भूषण सम्मान भी मिला है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिष्ठित ‘यश भारती’ पुरस्कार भी वे प्राप्त कर चुके हैं। अच्युतानंद मिश्र जी ज्ञान और संस्मरणों के जीवित कोष हैं।”

ये भी पढ़ें…

90 के अच्युता जी ऐसे संपादक रहे जो न अड़े, न लड़े, पर झुके भी नहीं!

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन