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सुख-दुख

शादी एक अप्राकृतिक नियम है..

सिद्धार्थ ताबिश-

शादी एक अप्राकृतिक नियम है.. और शादी, ब्याह, दहेज, अलाना-फलाना के बनाए कानून और नियम इंसानों के लिए “ट्रैप” हैं. जब आप शादी करते हैं तो आप बेवकूफ़, मूर्छित और इमोशनल बुड्ढों के बनाए “ट्रैप” में फंसते हैं। इन बेवकूफ़ बुड्ढों ने अपनी बेटी को सोचकर तमाम कानून गढ़ के रख दिए.. और ये दिन पर दिन ऐसे कानूनों को सख़्त पर सख्त बनाए जा रहे हैं इस उम्मीद में कि एक लड़का शादी करके फंस जाए और सारी उम्र लड़कियों को ढोता फिरे।

लड़के बस एक टूल बन चुके हैं परिवार और लड़की को पालने के लिए और लड़कियां “परजीवी”.. कानून इनको दिन पर दिन परजीवी जीवन के चरम पर पहुंचाए दे रहा है।

शादी कोई रिश्ता नहीं है.. ये बस कुछ सनकी, पागल और असुरक्षित बुड्ढों का बनाया “जाल” है.. और जैसे जैसे लड़कों को ये समझ आता जायेगा, लड़के पूरी तरह से शादी का बहिष्कार करना शुरू कर देंगे.. ये समय आज नहीं तो कल आयेगा..

मैं अभी लिख रहा हूं और कुछ लड़के इसे समझते नहीं हैं और हंसी उड़ाते हैं, मगर एक समय आएगा जब आप समझेंगे कि आपको कैसे फंसाया जा रहा है और सारा जीवन बस आपको कमाने और घर चलाने की मशीन बना कर रख दिया गया है.. और अगर आप इस मशीनरी वाले जीवन से छुटकारा चाहो तो जो भी आपने कमाया वो सब आपकी पत्नी और बच्चों का हो जाता है, भले आप देना चाहो या न देना चाहो.. आपका कुछ भी नहीं होता है, आप बस एक मशीन मात्र हैं.. इन सनकी और असुरक्षित बुड्ढों ने आपको पूरी तरह से बंधक बना दिया है और आप को जीवन भर ये सिखाते रहते हैं कि “यही तो जीवन का सुख है, यही परिवार तो पूंजी है, यही पत्नी तो सब कुछ है, बच्चे की किलकारी तो असल सुख है, इत्यादि इत्यादि

ये केस थोड़ा हाईलाइट हो गया, क्योंकि इस बेचारे ने हार मान ली और फांसी लगा ली.. जबकि हर दूसरे घर में परिवार और शादी के नाम पर “लड़के” बिना फांसी लगाए ऐसे ही सारी उम्र “फंदे” में लटके झूलते रहते हैं।


अशोक कुमार पांडेय-

सच यह है कि विवाह की संस्था सड़ चुकी है।

सारा सिस्टम इसे बचाने में लगा है, कोई अकेले रहने का फ़ैसला करे, बिना शादी के रहने का फ़ैसला करे तो घर बाहर सब लग जाते हैं किसी भी तरह उसकी शादी करवाने में।

आधे से ज़्यादा घरों में दो दुश्मन एक बिस्तर पर सोते हैं या दो ऐसे लोग जो बस समाज के डर से रिश्ते निभाते चले जाते हैं। ज़रूरी नहीं हत्या/आत्महत्या ही हो, धीरे धीरे व्यक्तित्व का ख़त्म होता जाना भी कम बुरा नहीं होता।

भयावह स्त्री विरोधी समाज में एक घटना के सामने आने पर सारी औरतों को गाली देने, स्त्री अधिकारों पर सवाल खड़े कर देने की बात सामान्य ही है। जितना शोर स्त्रियों और दलितों के क़ानून का ग़लत फ़ायदा उठाने पर होता है, बाक़ी क़ानूनों के दुरुपयोग पर कभी नहीं होता।

आज लड़के के वकील का बयान सुन रहा था, सुभाष के वीडियो से काफ़ी अलग बाते हैं। जितना कुछ पब्लिक स्फीयर में है सब उसी का कहा है। उसे आँख मूँदकर सच माना जा रहा है। संभव है सच भी हो, संभव है दूसरे पक्ष के पास भी कुछ कहने को हो। मीडिया ट्रायल में न्याय की ही बात हो, ज़रूरी नहीं है। हाँ, एक युवा लड़के का जान दे देना हृदय विदारक तो है ही। क्या ज़िंदा रहने की कोई उम्मीद नहीं बची थी? क्या हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में अपीलें नहीं संभव थीं? इनके जवाब कोई नहीं ढूँढेगा।

सबसे ज़रूरी है शादी में परिवार की भूमिका कम होते जाना और तलाक़ की प्रक्रिया आसान होना। संवाद की उम्मीद ख़त्म हो जाने से पहले संवाद ज़रूरी है।

और हाँ एक बात कहनी थी- सिर्फ़ वीर्य से बच्चा सिर्फ़ पुरुष का नहीं हो जाता, माँ का अधिकार कहीं ज़्यादा है जिसने नौ महीने देह में पाला और दूध पिलाया। भारतीय परिवारों में बच्चे पालने में पुरुष कितनी भूमिका निभाते हैं, सब जानते हैं। किसी अंतिम इच्छा के बाद भी किसी

महिला से बच्चा छीनने की बात अन्याय ही है। बच्चा कभी मेरा नहीं हो सकता, बच्चा हमेशा हमारा होता है।

ख़ैर, मैं चाहूँगा कि आप लोग इस पर अपनी राय दें।

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