
प्रधानमंत्री के वायदों, आश्वासनों, झूठ और जुमलों के बावजूद। खबरों से पता चलता है कि अखबार और सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट ही करते हैं वरना माले में क्या हुआ था उसपर दिल्ली चुप है – खबर सिर्फ द टेलीग्राफ में लीड है। यह वाशिंगटन पोस्ट के एक दावे पर आधारित है और भारतीय अखबारों का काम था कि विदेश में हो रही भारत की बदनामी पर सरकार का पक्ष बताते। यह यमन में केरल की नर्स को सहायता देने से विदेश मंत्रालय के काम से ज्यादा बड़ा और जरूरी मामला है। अखबारों में जो खबरें छप रही हैं उससे लगता है कि किसानों का मामला पंजाब सरकार से फंसा हुआ है, सुप्रीम कोर्ट उसे देख रहा है पर सच्चाई कुछ और है। समझना चाहें तो आगे पढ़िये। नये साल की शुभकामनाएं देने में लजाते-डरते अपने अखबारों को जानिये
संजय कुमार सिंह
आज के मेरे अखबारों की लीड हैं, मणिपुर के मुख्यमंत्री ने माफी मांगी (नवोदय टाइम्स), हिंसा बेहद दुर्भाग्यपूर्ण… मुख्यमंत्री ने मणिपुर के लोगों से मांगी माफी (अमर उजाला)। अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है, वीरेन ने माफी मांगी, 2025 में सामान्यीकरण का प्रण लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, मुख्यमंत्री बिरेन ने मणिपुर संघर्ष के पीड़ितों से माफी मांगी। इंडियन एक्सप्रेस की लीड है, आलोचना के शिकार बिरेन ने 2024 का समापन माफीनामे से की : मैं सॉरी कहना चाहता हूं। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, मणिपुर में हिन्सा के लिए विरेन ने ‘अफसोस’ जताया। दि एशियन एज की लीड है, यमन में मौत की सजा भुगत रही केरल की नर्स; सरकार सहायता करेगी। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। शीर्षक है, विदेश मंत्रालय ने कहा, मौत की सजा पाई नर्स की सहायता की जा रही है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड है, केजरीवाल ने पुजारी योजना के लिए पंजीकरण की शुरुआत की। कहने की जरूरत नहीं है कि ये हेडलाइन मैनेजमेंट की खबरें हैं। मणिपुर के मुख्यमंत्री का माफी मांगना अब आपको जितना महत्वपूर्ण लगे, आज के लिए दी गई एक खबर ही है और यह ऐसी बात भी नहीं है कि इसे समझना मुश्किल हो।
आज की दूसरी ‘बड़ी’ खबर, यमन में मौत की सजा पाई केरल की नर्स को सहायता देने की है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसे भी सरकार ने कल जारी किया तो आज छप गई और यह खबर चाहे जैसी हो, सरकार का प्रचार तो है ही। यमन के नागरिक की हत्या के आरोप में अगर सजा मिली है तो भारत का नागरिक होने के नाते उसकी सहायता करना भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का कर्तव्य है और यह एक रूटीन काम है। इसकी सूचना जारी करना और इसे प्रशंसा या सरकार के काम के रूप में प्रकाशित किया जाना ही हेडलाइन मैनेजमेंट है। इसका दूसरा भाग घोषित या अघोषित रूप से यही होगा है कि सरकार विरोधी खबरें रह जायेंगी या उन्हें कम महत्व मिलेगा। इसके लिए यदा कदा ऐसी खबरें दी या लीक की जाती हैं और इन्हें समझना-पहचानना मुश्किल नहीं है। आज अगर अखबारों को यमन की खबर ‘सरकार का काम’ दिखाने और उसे प्रचारित करने के लिए दी गई है तो अखबारों का काम था (अगर रोबोट नहीं हैं) कि उस मामले में सरकार की भूमिका बताते जो इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार मुंबई के किसी बेकरी वाले ने अपने परिचित को फंसाने के लिए दुबई जाते हुए किसी को देने के लिए उसके हाथों ऐसा केक भेजा जिसमें अंदर नशीला पदार्थ छिपा कर रखा था। जाहिर है, जो फंसा वह निर्दोष हो या नहीं, केक बनाने और भेजने वाला तो दोषी है ही। इस मामले में भारत सरकार ने अपना काम किया कि नहीं इसकी कोई खबर नहीं है और कहने की जरूरत नहीं है कि किया होता तो सरकार उसका भी प्रचार करती ही। इसलिये मेरा मानना है कि सरकार वही काम करती है जो करने के लिए मजबूर होती है और उससे भी अपना प्रचार कर लेती है। मीडिया का बड़ा वर्ग इस सेवा में लगा हुआ है।
आप जानते हैं कि सरकार का प्रचार करने वाली इन और ऐसी तमाम खबरों के बीच किसानों का मामला भी है। याद दिलाने के लिए बता दूं कि प्रधानमंत्री ने किसानों की आय दूनी करने का वादा किया था उसका समय निकल गया। किसानों के लिए उनसे पूछे बिना, उनकी मांग के बगैर कानून बना दिये और ये कानून ऐसे थे कि किसानों ने लाठी-डंडे खाकर इनका विरोध किया, बदले में गालियां भी सुनीं। इसके लिए ट्रोल सेना को किसानों पर छोड़ दिया गया था। किसान करीब एक साल मुश्किल स्थिति में धरने पर बैठे और कई किसानों की जान जाने के बाद मजबूरी में प्रधानमंत्री को आश्वासन देकर किसानों का आंदोलन खत्म कराना पड़ा। इसके कई साल हो गये, सरकार ने अपना वादा नहीं निभाया तो किसानों ने फिर आंदोलन किया और उसे उसी क्रूरता से कुचल दिया गया। और यह सब तो छोड़िये, सरकार ने अभी तक किसानों से बात नहीं की है, उसकी जरूरत नहीं समझी है और साल छह महीने बाद भी समय निकालने का कोई आश्वासन नहीं दिया है। यह ‘सरकार’ के एक मुख्य काम की स्थिति है और तब है जब चर्चा है कि विदेश मंत्री को शपथग्रहण का निमंत्रण लाने के लिए अमेरिका भेजा गया है। कुल मिलाकर, सरकार कौन से काम कर रही है और किनपर उसका ध्यान नहीं है उसे बताने की बजाय अखबार सरकारी खबरों को छाप कर अपना काम पूरा मान ले रहे हैं।

दूसरी ओर, ऐसे प्रचारकों की कमी नहीं है जो कहते हैं कि राहुल गांधी को या कांग्रेस पार्टी को ईवीएम के खिलाफ आंदोलन करना चाहिये, सड़क पर उतरना चाहिये या विदेश घूमने नहीं जाना चाहिये। मुझे लगता है कि जिस देश के लोगों को ईवीएम और चुनाव आयोग पर भरोसा है, नतीजों से कोई शंका नहीं है उनका नेता बनना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है और कोई मजबूरी नहीं हो या उसका कोई लाभ नहीं उठाना हो तो कोई क्यों यह सब करे। कायदे से जनता का काम है कि वह चुनाव आयोग से कहे कि चुनाव की विश्वसनीयता स्थापित करे और सभी दलों के लिए समान स्थितियां बहाल करे। सरकार अगर आंदोलन से सुनने वाली है तो अभी तक किसानों का मामला नहीं सुना गया है। आप चाहें तो 2047 तक इंतजार कर सकते हैं आपके सुझाव की जरूरत किसी को नहीं है। इस क्रम में आज द ट्रिब्यून की लीड उल्लेखनीय है। इस खबर के अनुसार, पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि (आमरण अनशन कर रहे किसान नेता) दल्लेवाल चिकित्सा सहायता तभी स्वीकार करेंगे जब केंद्र सरकार वार्ता की पेशकश करेगी। इस एक खबर से पता चलता है कि किसानों की मांगों के मामले में सरकार ने अभी तक क्या-क्या किया है और मांग कहां फंसी हुई है।
इस लोकतंत्र में जब सरकार जनता की है और जनता की सेवा के लिए चुनी जाती और जब कुर्सी चाहिये थी तो प्रधानसेवक होना चाहते थे और अब प्रधानमंत्री के रूप में बातचीत का समय नहीं दे रहे हैं। आमरण अनशन करने पर भी नहीं और 35 दिन बाद भी नहीं। आप जानते हैं कि आमरण अनशन जानलेवा हो सकता है और देश भर में अक्सर ऐसे मामलों में आंदोलनकारी को जबरन उठाकर अस्पताल में दाखिल कर दिया जाता है और फिर अस्पताल में दवाओं व इलाज से आंदोलन खत्म भी कर दिया जाता है। यहां सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पंजाब सरकार से कह रही है कि वह उन्हें अस्पताल में एडमिट कराये पर सरकर करा नहीं पा रही है और केंद्र की सहायता लेने के लिए कहे जाने के बावजूद यह संभव नहीं हुआ है। कानूनन आमरण अनशन को आत्महत्या का प्रयास माना जाता है और पुलिस प्रशासन जब चाहता है उठाकर अस्पताल में बंद कर देता है। इससे आंदोलन भी खत्म हो जाता है। किसानों के मामले में सरकार यह भी नहीं कर पा रही है या कर रही है। जो भी हो, सरकार की योजना और राजनीति (अगर कोई है) तो कितनी घातक और अहंकारी ही समझी जा सकती है। द ट्रिब्यून की यह खबर आज सभी अखबारों में इसी प्रमुखता से होती तो क्या संदेश देती आप समझ सकते हैं और नहीं है तो क्यों – समझना मुश्किल नहीं है।
आइये, देख लें कि आज यह खबर मेरे अखबारों में किस शीर्षक से है। इससे आप समझ सकेंगे कि इसमें खबर का मकसद और भ्रम फैलाने का अंश कितना है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने दल्लेवाल की डेडलाइन (जबरन चिकित्सीय सहायता देने की) बढ़ा दी क्योंकि पंजाब ने कहा कि वार्ता चल रही है। मुझे लगता है कि मामला मरने-जीने का है और इसमें कानून से ज्यादा महत्वपूर्ण चिकित्सीय सलाह है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का विस्तार चिकित्सीय सलाह के आधार पर ही होगा पर वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। हालांकि खबर से इसका पता नहीं चल रहा है। और वह ली जा रही है कि नहीं इसका पता खबर से नहीं लगता है। वैसे भी, मुद्दा दल्लेवाल का अनशन नहीं, किसानों की मांग, सरकार का कर्तव्य और प्रधानमंत्री के आश्वासनों के साथ भ्रष्टाचार मुक्त, काम करने वाली सरकार देने के उनके वादे और उसकी वास्तविकता या पूर्णता का है। मुझे तो यह भी समझना है कि ऐसा सब (मेरे हिसाब से कुछ नहीं) करके भी प्रधानमंत्री चुनाव कैसे जीत जाते हैं, उनकी क्या राय और रणनीति है और क्या इसमें पूर्ण तड़ीपार को नंबर दो बनाने की भी भूमिका है? प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस करते होते तो यह सब अभी तक पूछ लिया गया होता और ईवीएम का मामला भी क्लियर हो चुका होता पर अखबारों को उससे भी मतलब नहीं है।
पुजारी ग्रंथी को वेतन देने की आम आदमी पार्टी की घोषणा पर भाजपा की प्रतिक्रिया आज दूसरे दिन भी हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। मैंने कल भी इस खबर की चर्चा की थी और मेरा मानना है कि आम आदमी पार्टी या केजरीवाल का यह वादा उनकी अपनी चुनावी रणनीति है। और यह भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति के जवाब में ही है। भाजपा इसकी काट खोजे, इससे बेहतर वादा करे, एक वादे की आलोचना का क्या मतलब जब भाजपा अपने वादे को बाकायदा खुद ही कुछ दिनों बाद जुमला घोषित कर चुकी है। मुझे लगता है कि भाजपा को पता है कि अब उसके जुमलों पर कोई यकीन नहीं करने वाला है और इसलिए उसे यह सब करना पड़ रहा है। मेरी दिलचस्पी इसमें है कि अखबार क्यों सहयोग कर रहे हैं और नहीं समझ रहे हैं तो क्यों और समझ कर भी कर रहे हैं तो क्यों? जो भी हो, मीडिया की भूमिका बेहद शर्मनाक और निराशाजनक है।
नवोदय टाइम्स में किसानों की खबर का शीर्षक है, चार जनवरी को किसान महापंचायत। इस खबर का उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने दल्लेवाल को अस्पताल स्थानांतरित करने पर सुनवाई को गुरुवार तक टाला। द हिन्दू में शीर्षक है, किसानों के आंदोलन पर अदालत ने पंजाब को तीन दिन और दिये। इस शीर्षक से लग रहा कि किसानों का मामला पंजाब सरकार से फंसा हुआ है। मुझे भी खबरों से ऐसा ही लगने लगा था और स्थिति स्पष्ट करने के लिए मुझे पूरे मामले को ठीक से पढ़ना और समझना पड़ा। अमर उजाला की खबर का शीर्षक भी ऐसा ही है, डल्लेवाल को भर्ती कराने के लिए पंजाब को तीन दिन मिले। लेकिन उपशीर्षक है, बढ़ी आस….राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, केंद्र वार्ता की हामी भरे तो किसान नेता इलाज को तैयार। उपशीर्षक को मुख्य शीर्षक और इस शीर्षक को लीड बनाना किसानों का साथ देना होता जबकि अभी हेडलाइन मैनेजमेंट का प्रभाव चल रहा है। इस खबर के साथ (पंजाब) के मुख्य सचिव व डीजीपी तलब शीर्षक से एक खबर है। कायदे से केंद्र सरकार के कृषि मंत्री और कृषि सचिव को तलब किया गया होता तो खबर होती अब जो तलब किया गया है वह जैसा मैं शुरू से कह रहा हूं, किसी और मामले में है। इस छोटी सी खबर में कहा गया है कि केंद्र वह हरियाणा सरकार (डबल इंजन वाली) की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मुद्दे पर उनके पास कोई निर्देश नहीं है। मुझे लगता है कि विदेशों में हजारों करोड़ की खेती की तैयारी के आरोपी पूर्व कृषि मंत्री के घोटालों से संबंधित ढेरों वीडियो सार्वजनिक होने के बाद नये कृषि मंत्री के पास इस मामले में करने के लिए कुछ है नहीं और केंद्र सरकार किसानों को दिल्ली नहीं आने देने पर दृढ़ संकल्प है। इसलिए इस बार उन्हें पंजाब में ही रोक दिया गया है और मूल मुद्दा पीछे चला गया तथा किसान व पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार का मुद्दा बड़ा हो गया है।
नवोदय टाइम्स में किसानों की खबर चार कॉलम में है। शीर्षक है, डल्लेवाल चिकित्सा सहायता लेने को सशर्त तैयार। इसके साथ हाईलाइट किया हुआ अंश है, पंजाब सरकार ने कहा, इसके लिए केंद्र को करना होगा बातचीत का प्रस्ताव स्वीकार। जाहिर है, मामला बिल्कुल स्पष्ट है लेकिन ज्यादातर अखबारों की खबरों से और चाहे सब कुछ लगे यह नहीं कहा गया है कि केंद्र सरकार अभी भी बातचीत करने के लिए तैयार नहीं है और इसलिए डल्लेवाल 35 दिन से आमरण अनशन पर हैं और सुप्रीम कोर्ट उन्हें मरने से बचाने के लिए पंजाब सरकार पर यह दबाव डाल रहा है कि वह उन्हें जबरन चिकित्सा सहायता मुहैया कराये पर केंद्र सरकार को बातचीत शुरू करने के लिए तैयार या मजबूर करने का कोई तरीका अभी तक सामने नहीं आया है और केंद्र सरकार दुनिया भर में चाहे जो और जितने अच्छे काम कर रही हो उसे किसानों की चिन्ता नहीं है। प्रधानमंत्री के वायदों, आश्वासनों और झूठ के बावजूद।
जहां तक ट्रिब्यून और उसके पहले पन्ने की खबरों की बात है आज लीड के अलावा उसकी पहले पन्ने की तस्वीर भी उल्लेखनीय है। सिडनी के ओपेरा हाउस और हार्बर ब्रिज पर कल की आतिशबाजी की तस्वीर के साथ पाठकों को नए साल की बधाई दी गई है। नए साल के अवसर पर हार साल होने वाले इस जश्न में दुनिया भर के लोग जाते हैं और रात बारह बजे के इस कार्यक्रम के लिए सुबह 10 बजे से ही जगह तलाश कर जम जाते हैं। जिनके लिए यह संभव नहीं होता है या जो बेहतर नजारा चाहते हैं वो पानी के जहाज से देखते हैं। ऐसे में इस आयोजन का अपना महत्व है और उसकी खबर न होना या होना मायने रखता है। आज जब दूसरे अखबारों में नये साल की शुभकामनाएं तलाशनी पड़ी, सिंगल कॉलम में ही नजर आईं, द ट्रिब्यून ने इस फोटो के साथ प्रमुखता से बधाई भी दी है।


