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आज के अखबारों ने केंद्र से वार्ता की किसानों की मांग पर भाजपा और सरकार को बचाने की कोशिश फिर की

संजय कुमार सिंह

आज द टेलीग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया को छोड़कर सभी अखबारों की लीड किसानों की खबर है। यह कल जो हुआ था उसके बाद की रणनीति या हेडलाइन मैनेजमेंट का नतीजा हो सकता है पर खास बात यह है कि किसानों के आंदोलन के मतलब की बात या लीक से हटकर खबर आज सिर्फ द हिन्दू की है। आज का शीर्षक है, “दल्लेवाल के आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय स्वीकार होगा : केंद्र”। क्या आपने पहले कभी सुना है कि केंद्र सरकार के खिलाफ आबादी का कोई वर्ग आंदोलन करे, उसके समक्ष अपनी मांग रखे, सरकार सालों साल नहीं सुने और जब कोई आमरण अनशन करे तो उसे चिकित्सीय सहयता का मामला सुप्रीम कोर्ट में चला जाये और केंद्र सरकार कहे कि जो सुप्रीम कोर्ट कहेगा वही करेंगे। मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट का कहा करना था तो पहले अध्यादेश लाकर उसके आदेशों की हवा क्यों खराब की गई और इस बार भी किसानों की मांग सुप्रीम कोर्ट से होती तो किसान नेता आमरण अनशन क्यों करते और इन सारी बातों में केंद्र सरकार फंस गई है, कार्रवाई नहीं कर रही है तो अखबार बता नहीं रहे हैं। पूरे मामले को घुमाने की कोशिश चल रही है। कल आपने पढ़ा कि, अखबारों ने यह छिपा लिया कि केंद्र अभी भी किसानों से वार्ता के लिए तैयार नहीं है, कुछ नहीं किया है। जहां तक सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को स्वीकार करने की बात है, आपको याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा था कि दिल्ली में अफसरों की ट्रांसफर, पोस्टिंग का अधिकार चुनी हुई सरकार के पास रहेगा तो केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने वाला अध्यादेश लेकर आई थी।

आज द हिन्दू की लीड का उपशीर्षक है, किसान नेता की भूख हड़ताल 37वें दिन में पहुची; प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे समूह का कहना है कि वे मांगें पूरी हुए बगैर नहीं मानेंगे; संयुक्त किसान मोर्चा ने चर्चा के लिए निमंत्रण को ठुकरा दिया। मांग केंद्र सरकार से है और सरकार कह रही है कि जो सुप्रीम कोर्ट कहेगा उसे मानने के लिए तैयार है। यहां मुद्दा यह है कि करीब एक साल का आंदोलन खत्म होने और प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद तीन साल हो चुके हैं। सरकार ने किसानों के लिए जो किया है उसकी घोषणा आज के अखबारों में है और उसपर आने से पहले बता दूं कि पंजाब और हरियाणा की सीमा पर किसान और खेत मजदूर 13 फरवरी 2024 से जमे हैं। वे अपनी सरकार से बात करना चाहते हैं और एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की मांग कर रहे हैं। कह चुके हैं कि मांग पूरी हुए बगैर वे नहीं हटेंगे। दल्लेवाल की अनशन के तो अभी 37 दिन ही हुए हैं। किसानों की मांग और उनका आंदोलन अब मुद्दा नहीं रह गया है। दि हिन्दू ने आज बताया है कि किसान संगठन अन्य मांगों के अलावा चाहते हैं कि फसलों की खरीद एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर होगी इसकी कानूनी गारंटी दी जाये।

अपनी इस मांग के समर्थन में किसान मजदूर मोर्चा और संयुक्त किसान मोर्चा (गैर राजनीतिक) के बैनर तले किसान पंजाब में आंदोलन कर रहे हैं और डबल इंजन वाले हरियाणा में प्रवेश से रोक दिये जाने के बाद से सीमा पर रह रहे हैं। केंद्र सरकार ने अभी तक वार्ता की कोई पेशकश नहीं की है और संयुक्त किसान मोर्चा ने जिस निमंत्रण को ठुकरा दिया है वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति का था। और अभी तक की खबरों से लग रहा है कि आमरण अनशन कर रहे किसान नेता डल्लेवाल को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए है न कि किसानों की मांग पूरी करने के लिए केंद्र से वार्ता के लिए। फिर भी केंद्र ने कहा है और यह किसी अखबार में लीड नहीं है और ना किसी अखबार ने आज भी यह बताने की जहमत उठाई है कि केंद्र सरकार किसानों की मांग पर ध्यान नहीं दे रहे है। कम से कम 13 फरवरी 2024 से चल रहे आंदोलन के बावजूद। आगे मैं बताउंगा कि कैसे ज्यादातर अखबारों की आज की लीड किसानों की खबर ही है और इसमें सरकार की घोषणा और पेशकश बताकर न सिर्फ किसानों बल्कि आम जनता को भी भ्रमित करने की कोशिश की गई है। जो लोग किसान नहीं हैं, उनकी मांगों से संबंधित नहीं है वे पूरी खबर नहीं पढ़ेंगे तो शीर्षक से यही जानेंगे कि सरकार क्या कुछ कर रही है और किसान नेता मान नहीं रहे हैं जबकि एमएसपी की मांग बिल्कुल अलग है और सरकार उसपर बात करने को भी तैयार नहीं है। 

जो लोग एमएसपी या इसका महत्व नहीं जानते हैं उन्हें बता दूं कि कारखाने के उत्पादों से अलग, खेतों में पैदा होने वाली फसलों में ज्यादातर को तैयार होने के बाद बहुत कम समय तक खुले आसमान में सुरक्षित रख सकते हैं। इस तय अवधि के दौरान फसल बेची नहीं गई, उसकी खपत नहीं हुई या सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं हुई तो फसल खराब हो जायेगी और उसका कोई मूल्य नहीं रह जायेगा। आम तौर पर किसानों के पास ऐसी फसल को रखने की जगह नहीं होती है। जनता को इनकी आवश्यकता पूरे साल होती है पर सरकार की ओर से कोई व्यवस्था नहीं है और इस कारण जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति है और वही कमाता है। सरकार चाहती है कि सारी कमाई उसी की भैंस करे वह अलग मुद्दा है और आप जानते ही हैं। ऐसे में किसान अपनी पैदावार लेकर मंडी में जाता है जो उसके लिए वैसे भी मुश्किल है। वहां उसे अगर भाव नहीं मिले तो बेचना उसकी मजबूरी होती है और इसीलिए सरकार कुछ कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। इसका मतलब होता है कि उस निर्धारित कीमत से कम पर फसल खरीदना गैर कानूनी होगा और जो भी खरीदेगा वह एमएसपी देगा। इस तरह किसान अपनी फसल औने-पाने दाम पर बेचने के लिए मजबूर नहीं होगा और कोई दलाल फसल रखने की सुविधा का दुरुपयोग नहीं कर पायेगा। यही नहीं, एमएसपी नहीं होने से कृषि उत्पाद का उपयोग करने वाले व्यावसायी अगर सस्ते में फसल प्राप्त करेंगे तो अपने उत्पाद का मूल्य कम कर दें यह जरूरी नहीं है। वैसे भी, व्यवस्था सही हो तो ऐसे व्यावसायी किसान से कम मूल्य पर उत्पाद खरीदने की बजाय मंडी से वाजिब मूल्य पर सही तरीके से उत्पाद खरीदना पसंद करेंगे। किसान हित में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी व्यवस्था बनाये जिससे किसानों को उनकी फसल का उचित दाम मिले। यह एमएसपी नहीं हो तो क्या हो, उसपर भी बात करनी होगी। पर सरकार बात ही करने के लिए तैयार नहीं है और अखबारों के लिए यह खबर भी नहीं है। अक्सर खबर वही होती है जो सरकार चाहती है यानी हेडलाइन मैनेजमेंट। 

आज के मेरे अखबारों की लीड का शीर्षक इस प्रकार है 1) हिन्दुस्तान टाइम्स – वर्ष की पहली कैबिनेट बैठक में कृषि क्षेत्र के लिए तेजी 2) दि एशियन एज –  किसानों के फायदे के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दो महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं। 3) इंडियन एक्सप्रेस – सरकार ने डीएपी पर विशेष सब्सिडी दी, कमजोर होते रुपये ने गणना गड़बड़ाई 4) अमर उजाला – पीएम फसल योजना का आवंटन बढ़ा डीपी पुरानी कीमतों पर ही मिलेगा। 5) नवोदय टाइम्स – किसानों को बड़ी राहत, नये साल पर कैबिनेट की पहली बैठक में कई अहम फैसले। द टेलीग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड अलग है तथा द हिन्दू की लीड का जिक्र पहले कर चुका हूं। बाकी खबरों से जाहिर है, सरकार एमएसपी की मांग पर ध्यान नहीं दे रही है और वार्ता के लिए तैयार नहीं है। इससे यह भी समझ में आता है कि सरकार के पास अपने बचाव में कहने के लिए कुछ नहीं है और ये घोषणाएं किसानों के लिए लगभग बेमतलब हैं वरना वार्ता के बाद भी ये घोषणाएं की जा सकती थीं। सरकार वार्ता का दबाव टालने के लिए दल्लेवाल के अनशन से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट के भरोसे है, इसे समझना अब कोई मुश्किल नहीं है।  

टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड बताती है कि 1901 में जबसे मौसम का रिकार्ड रखना शुरू किया गय है तबसे 2024 भारत का सबसे गर्म साल रहा। दूसरे शब्दों में इसका मतलब यह भी है कि इस साल सबसे कम ठंड पड़ी। हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया में आज पहले पन्ने पर छपी एक खबर के अनुसार भारत में सिर्फ 57 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर है और भारत में सिर्फ 54 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट कनेक्शन है। इसका मतलब हुआ कि भारत के तीन प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर तो हैं पर इंटरनेट के बिना। अब आप इसे विकास कहेंगे या कुछ और खुद तय कीजिये। डिजिटल इंडिया का जो हुआ वह तो देख ही रहे हैं। द टेलीग्राफ की आज की लीड अमेरिका के न्यू ऑर्लियंस में आतंकी हमले की खबर है। इसमें 10 व्यक्तियों की मौत हो गई है। इस हमले में 30 से ज्यादा लोग जख्मी हुए हैं। 

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