
संजय कुमार सिंह
हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, दल्लेवाल के स्वास्थ्य पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सवाल किया, पंजाब की आलोचना की। शीर्ष अदालत ने क्या कहा, शीर्षक के तहत केंद्र सरकार, पंजाब सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा और पंजाब सरकार की ओर से मुख्यमंत्री ने जो कहा वह तीन रंगों में अलग-अलग हाइलाइट किया गया है। लाल रिवर्स में हाईलाइट किया अंश केंद्र सरकार का है, ….. आपके मुवक्किल (केंद्र सरकार) क्यों नहीं यह बयान देते हैं कि आप उनकी वाजिब शिकायतें दूर करेंगे …. यह (ऐसा बयान) स्थिति को ठीक कर सकता है। दूसरा पंजाब सरकार के लिए है, जान-बूझकर यह छवि बनाने की कोशिश की जा रही है कि यह अदालत दल्लेवाल के विरोध का महत्व कम करना चाहती है या उनका अनशन खत्म करना चाहती है…. हमारी चिन्ता उन्हें बचाने भर की है। इस पर मुख्यमंत्री ने जो कहा है, खनौरी में 50 चिकित्सक ड्यूटी पर हैं… महज 500 मीटर दूर हमने अस्थायी अस्पताल बनाया है। हम दल्लेवाल के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं और हम सतर्क हैं…..। इससे आप समझ सकते हैं कि यह मामला क्या है और किस स्थिति में है। कल की खबरों के बाद इसमें सबसे महत्वपूर्ण है केंद्र से सवाल।
आप जानते हैं कि बुधवार एक जनवरी को द ट्रिब्यून की लीड खबर वह थी जो पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था, अगर केंद्र वार्ता की पेशकश करे तो दल्लेवाल चिकित्सा सहायता स्वीकार करेंगे। अगले दिन, गुरुवार, दो जनवरी को द हिन्दू की लीड का शीर्षक था, “दल्लेवाल के आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय स्वीकार होगा : केंद्र”। आज हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश किसानों के मामले में कार्रवाई से संबंधित किसी याचिका पर नहीं है बल्कि किसान नेता दल्लेवाल के स्वास्थ्य और जीवन से संबंधित मामले में है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट केंद्र को कोई आदेश देगा भी तो वह किसान नेता के स्वास्थ्य और इलाज के संबंध में होगा जैसे उन्हें उनके लोगों के बीच से जबरन निकाल कर अस्पताल में दाखिल करना। ऐसा आदेश तब आयेगा जब सुप्रीम कोर्ट को लगेगा कि दल्लेवाल के स्वास्थ्य के लिए ऐसा किया जाना जरूरी है। इसमें वह केंद्र को सहायता के लिए कह सकता है पर मामला पंजाब का है और पंजाब सरकार देख भी रही है। वैसे भी, केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानना ही होता है और आज की खबर से साफ है और सबको पता है कि किसानों का आंदोलन क्यों चल रहा है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के वकील से जो कहा है उससे भी साफ है कि मामला पंजाब सरकार के कारण नहीं केंद्र सरकार के कारण हैं और केंद्र सरकार के एक बयान भर के लिए रुका हुआ (या आंदोलन चल रहा) है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। यहां दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, “एमएसपी पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट : सरकार किसानों से क्यों नहीं कहती कि उसके दरवाजे वार्ता के लिए खुले हैं”। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर मुकदमे के बारे में बताती है और यह भी कि किसने दायर की है और क्या मांग है। इसके अनुसार अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा है कि वह चर्चा के लिए लंबित प्रस्ताव को लागू करने का निर्देश नहीं दे सकती है। दूसरी ओर, वार्ता के लिए दरवाजे खुले हैं कहने के बारे में पूछने पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि केंद्र सरकार देश भर के किसानों के लिए चिन्तित है और उनके एक वर्ग से मुद्दों पर चर्चा नहीं कर सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी इस खबर के साथ छोटी सी खबर छापी है जो दि एशियन एज में तीन कॉलम में है, किसानों की योजनाओं को लेकर शिवराज और अतिशि में टकराव। उपशीर्षक में बताया गया है कि दल्लेवाल के अनशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के अधिकारियों की खिंचाई की। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जो कहा उसे अखबार ने ऐसे छापा है, शीर्ष अदालत ने दल्लेवाल की ओर से दायर एक नई याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। इसमें मांग की गई है कि केंद्र सरकार को अपने वादे पूरे करने के लिए कहा जाये।
इस तरह, आज की खबर यह है कि केंद्र सरकार (प्रधानमंत्री) ने अपना तीन साल पुराना वादा पूरा नहीं किया है। किसान नेता इस मांग पर अनशन पर हैं और खुद को किसान नेता का करीबी बताने वाले दिल्ली की याचिकाकर्ता 64 साल की गुनिनदर कौर गिल ने खुद को किसानों के नेता का मित्र बताया है और मांग की है कि केंद्र से कहा जाये कि वह 9 दिसंबर 2021 के अपने प्रस्ताव को लागू करे। इसमें एमएसपी को लीगल गारंटी बनाने पर वार्ता शामिल है। दैनिक भास्कर ने किसानों के मामले को सबसे ज्यादा जगह दी है पर मुख्य शीर्षक है, “पंजाब सरकार चाहती ही नहीं है कि किई समझौता हो :सुप्रीम कोर्ट”। इसके साथ दो कॉलम का शीर्षक है, “केंद्र क्यों नहीं कहता कि उसके दरवाजे खुले हैं : कोर्ट”। कहने की जरूरत नहीं है कि पंजाब सरकार पर सुप्रीम कोर्ट का आरोप सही भी हो तो किसानों की मांग केंद्र से वार्ता के बगैर नहीं निपटेगी और आज एक नई याचिका की खबर भी है जो इसी के लिए है। इसपर न सिर्फ अदालत की टिप्पणी है, सॉलिसिटर जनरल या भारत सरकार का स्टैंड भी है कि वह देश भर के किसानों की बात किसानों के एक वर्ग से नहीं करेगी। ऐसे में मुझे लगता है कि खबर यह है।
इस पूरे मामले में भाजपा की राजनीति स्पष्ट है लेकिन वह सुर्खियों में नहीं है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने कहा है और वह दैनिक भास्कर में भी प्रमुखता से है कि आप ने रोकी केंद्र की योजनाएं, किसानों को नहीं मिल रहा है लाभ। इससे यही लगता है कि केंद्र सरकार किसानों के लिए एमएसपी लागू करने की मांग से अलग राज्यवार किसानों को लाभ पहुंचाने की व्यवस्था कर रही है और राज्य सरकारों के साथ राजनीति खेल रही है। ऐसी हालत में किसानों के तीन साल पुराने आंदोलन के बाद अब फिर उसी के लिए चल रहे आंदोलन का क्या हाल है या उसपर केंद्र सरकार की क्या प्रतिक्रिया या रुख है वह सब खबर है। लेकिन केंद्र सरकार राज्य सरकारों को बदनाम करके समय काटने में लगी हुई है और खबरें भी वैसे ही छप रही हैं। दैनिक भास्कर की खबरें देखें तो केजरीवाल का आरोप सबसे नीचे है और पंजाब सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी मुख्य शीर्षक है। इस तरह किसानों के मामले में खलनायक, आम आदमी पार्टी बन गई जबकि भाजपा के साथ जो मामला उलझा हुआ है वह कई साल में नहीं निपटा है। सरकार निपटाने की कोशिश कर रही नहीं लगती है। ऐसे में मूल बात वह है जो अरविन्द केंजरीवाल ने कही है और दैनिक भास्कर में सबसे नीचे है। दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर है ही नहीं, किसानों से बात नहीं कर रही सरकार।
अमर उजाला का शीर्षक है, डल्लेवाल के इलाज पर पंजाब सरकार का रवैया सुलह वाला नहीं : शीर्ष कोर्ट। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर से लगता है कि पंजाब सरकार डल्लेवाल के स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रख रही है और यह उसकी राजनीति हो सकती है। भाजपा इसमें फंसी हो सकती है और इसलिए यह कहकर कि हम अदालत का आदेश मानेंगे अपना दामन साफ दिखाना चाह रही हो और इसमें मूल बात खो गई कि केंद्र सरकार ने किसानों के लिए एमएसपी लागू करने और उसे कानूनी गारंटी बनाने पर कुछ नहीं किया है। यह उसका अधिकार हो सकता है और ऐसा है तो उसे चाहिये कि इसकी घोषणा कर दे वह नहीं करेगी किसान दूसरा रास्ता देखेंगे या चुनाव में देख लेंगे। अगर केंद्र सरकार नहीं कह रही है तो अखबारों का काम है कि वह किसानों को बताये कि केंद्र सरकार जो कर रही है उसका मतलब यही है। रोज की खबरों से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने किसानों की मांग पूरी करने के लिए अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट के कहने पर करने का आश्वासन भी है और आज की खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने अपरोक्ष रूप से कह भी दिया है। इसके बावजूद किसानों की मांग मानना तो छोड़िये केंद्र सरकार बातचीत का निमंत्रण और मांगें पूरी करने का आश्वासन नहीं दे रही है।
हो सकता है आपमें से कुछ लोग मानते हों कि केंद्र सरकार सही कर रही है, उसे अधिकार है कि वह ऐसा करे या जो कर रही है वही उसके अनुसार जन हित है आदि आदि। भले सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है लेकिन मैं नहीं कह रहा कि केंद्र सरकार को किसानों की मांग मान लेनी चाहिये – मेरा मुद्दा है कि खबर और शीर्षक यह है कि केंद्र सरकार किसानों की मांग नहीं मान रही है। चूंकि मामला कई साल पुराना है इसलिए आज भी नहीं मानी 37 दिन हो गये आज 38वां दिन है जैसी खबरें होनी चाहिये और जो छप रहा है वह हेडलाइन मैनेजमेंट है। उसमें केंद्र सरकार कभी निशाने पर नहीं होती है। आज अगर हिन्दुस्तान टाइम्स में है तो दूसरे अखबारों में यह खबर ही नहीं है या शीर्षक ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि केंद्र सरकार काम करने की बजाय हेडलाइन मैनेजमेंट कर रही है और अखबार भी उनकी सेवा में हैं। आज मैं यह भी बताना चाहता हूं (क्योंकि ऐसी खबरें हैं) कि भाजपा के खिलाफ आरोप कांग्रेस का हो या ममता बनर्जी का – खबर वैसे नहीं छपती है जैसे प्रधानमंत्री के कहने पर छपती है। हो सकता है आपको लगता हो कि प्रधानमंत्री के कहने से वही बात महत्वपूर्ण हो जाती है और उसे ज्यादा महत्व देना तथा दूसरे नेताओं के लिए उसी बात को कहना कम महत्वपूर्ण हो और उसे कम महत्व देना जायज है। लेकिन यह प्रधानमंत्री के लिए ही होना चाहिये सत्तारूढ़ दल के प्रधानप्रचारक को यह लाभ नहीं दिया जाना चाहिये। वैसे भी चुनावों में सबके लिए लेवल प्लेइंग फील्ड की जरूरत होती है पर हमारे यहां सत्तारूढ़ दल को विशेष सुविधायें उपलब्ध हैं जबकि प्रमुख विपक्षी दल का खाता बंद कर दिया जाता है। प्रमुख विपक्षी दल दान और चंदा अभियान चलाने की घोषणा करता है तो मिलते जुलते नाम के वेबसाइट से नुकसान पहुंचाया जाता है और इसे अपनी तारीफ कहा जाता है और विपक्ष से अपेक्षा की गई कि वह सभी मिलते-जुलते नामों का पंजीकरण कराता।
मेरा मानना है कि सत्तारूढ़ दल जब सामान्य व्यवहार नहीं कर रहा है तो मीडिया को भी उनके साथ सामान्य व्यवहार नहीं करना चाहिये पर हो उल्टा रहा है और उन्हें ज्यादा महत्व मिल रहा है। चुनाव के समय प्रधानमंत्री को झूठे या अनैतिक आरोप नहीं लगाना चाहिये और अगर लगायें तो चुनाव आयोग को देखना चाहिये। आप देख चुके हैं कि चुनाव आयोग ने क्या किया। यह स्थिति लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं के साथ है। जिनकी नियुक्ति सरकार करती है, जिनका वेतन सरकार देती है, जिन्हें सरकार उनके काम का ईनाम देती है और रिटायरमेंट के बाद का बंदोबस्त भी करती है उनसे तो नहीं कहा जा सकता है कि वे सरकारी लाभ छोड़कर सरकार का विरोध करें लेकिन मीडिया से तो उम्मीद की जा सकती है कि वह विज्ञापनों का लालच छोड़े और अपनी योग्यता-गुणवत्ता के दम पर मिलने वाले विज्ञापनों से जीना सीखे या दुकान बंद कर दे। उदाहरण के लिए आज एक खबर है, ममता बनर्जी ने कहा है कि बांग्लादेश से घुसपैठियों को सीमा सुरक्षा बल घुसने दे रहा है। बंगाल सरकार पर प्रधानमंत्री के साथ भाजपा के नेता भी यह आरोप लगाते रहे हैं जबकि घुसपैठियों को रोकना सीमा सुरक्षा बल का काम है जो केंद्रीय गृहमंत्रालय के तहत काम करता है। इसके बावजूद केंद्र सरकार यह आरोप लगाती रही है तो जाहिर है कि घुसपैठ होती है और सीमा सुरक्षा बल की मिलीभगत या कमजोरी से होती है। दोनों स्थितियों में कार्रवाई केंद्र सरकार को करनी है।
स्थिति यह है कि दस साल में किसी कार्रवाई की घोषणा नहीं होने के बावजूद केंद्र सरकार आरोप लगाती रही है और अब यही आरोप ममता बनर्जी ने लगाया है तो यह बड़ी खबर है। उतनी ही बड़ी जितनी प्रधानमंत्री के आरोप की खबर थी। पर आज यह खबर वैसे नहीं छपी है जैसे प्रधानमंत्री आरोप लगाते हैं तो छपती है। कायदे से प्रधानमंत्री को आरोप लगाने की बजाय कार्रवाई करनी चाहिये और जवाब देना उनका काम है तब भी। दि एशियन एज में यह चार कॉलम में है। दो कॉलम में यहां एक और खबर है, केंद्र सरकार महिलाओं के मंगलसूत्र चुरा रही है। यह कांग्रेस का आरोप है। मुझे ये खबरें पहले पन्ने पर नहीं दिखीं जबकि भाजपा (असल में प्रधानमंत्री) ने आरोप लगाये थे कि कांग्रेस सत्ता में आयेगी तो ऐसा होगा और इसे अखबारों ने प्रमुखता से छापा था। अब जब वही आरोप कांग्रेस ने लगाये हैं और वह सत्ता में नहीं आई तो यह आरोप अन्य आरोपों से ज्यादा महत्वपूर्ण है।


