
शीश महल की खबर कमजोर नहीं पड़ रही है लेकिन अहमदाबाद का हाटकेश्वर ब्रिज 42 करोड़ की लागत से 2017 में बना था और पांच साल में ही जर्जर हो गया। अब 52 करोड़ रुपये खर्च करके उसे तोड़ा जाना था। पता नहीं चला, यह भ्रष्टाचार का मामला है यह बिना डिग्री वाले इंजीनियर का। इसकी चर्चा इतनी नहीं हुई जितनी “शीश महल” की हो रही है। इसके बावजूद आज नवोदय टाइम्स की खबर है, दिल्ली में फिलहाल-आप भाजपा में कड़ी टक्कर। इससे लगता है कि अखबारों के जोर लगाने से भी होता वही है जो सबको पता है।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में बस्तर में सुरक्षा बलों के नौ जवानों के मारे जाने की खबर तो निर्विवाद रूप से है लीड या सेकेंड लीड है लेकिन प्रचार वाली खबरें भी हैं। उससे भी महत्वपूर्ण यह कि आरटीआई से सूचना चाहने वालों को ओटीपी देने में देरी के जरिये परेशान किये जाने की खबर अकेले द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। यही नहीं, भाजपा के गालीबाज पूर्व सांसद और अब विधानसभा के उम्मीदवार रमेश विधूड़ी की गालियों का जिक्र करते दिल्ली की मुख्यमंत्री अतिशी कल सार्वजनिक रूप से रोने लगीं। यह खबर भी पहले पन्ने पर वैसे नहीं है जैसे होनी चाहिये थी। हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज और नवोदय टाइम्स ने इसे फोटो के साथ पहले पन्ने पर छापा है लेकिन अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। वहां तमिलनाडु विधानसभा में राष्ट्रगान पर तकरार, बिना संबोधन के लौटे राज्यपाल फोटो के साथ छपी है। होने को यह खबर द हिन्दू में भी है और अतिशी की खबर यहां भी नहीं है लेकिन आप जानते हैं कि द हिन्दू और अमर उजाला तथा उनके पाठकों में क्या अंतर है।
आज इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर है जो भाजपा शासन में चुनावी व्यवस्था की हाल बताती है। इससे लगता है कि अभी तक जहां भाजपा की जीत हुई है वहां कारण यह या ऐसी व्यवस्थागत चूक भी हो सकती है। आपने यहां पढ़ा होगा कि आम आदमी पार्टी ने भाजपा पर दिल्ली की मतदाता सूची में अपनी जरूरत के अनुसार नाम हटवाने और जुड़वाने का आरोप लगाया है। भाजपा ने बचाव में चाहे जो कहा हो, आम आदमी पार्टी पर भी आरोप लगा दिया और बात आई-गई हो गई। ऐसे में आज टाइम्स ऑफ इंडिया की ये खबर महत्वपूर्ण है कि दिल्ली की मतदाता सूची में नाम शामिल करवाने के लिए आवेदन देने की अंतिम तिथि के बाद 5.1 लाख आवेदन प्राप्त हुए हैं। अखबार ने लिखा है कि यह महिलाओं को नकद सहायता और बुजुर्गों को चिकित्सा सुविधा देने की घोषणा के बाद हुआ है। तथ्य यह भी है कि आम आदमी पार्टी के आरोप के अनुसार भाजपा ने पूर्वांचल के तमाम लोगों के नाम हटाने के लिए आवेदन दिये थे जो अपने पते पर रहते हैं।
यह गंभीर आरोप है और इसपर किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। मैं पहले लिख चुका हूं कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने की निश्चित प्रक्रिया है और किसी राजनीतिक दल का काम नहीं है कि वह लोगों के नाम हटवाये। भले वह अपने पते पर नहीं रहता हो। वास्तविक स्थिति क्या है उसका पता अखबारों की खबरों से नहीं चलता है लेकिन आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया गया है। इसमें कोई शक नहीं है। दूसरी ओर आवेदनों की बड़ी संख्या बताती है कि नए मतदाताओं के नाम दर्ज करने की सरकारी प्रक्रिया (भाजपा अपनी ओर से सक्रिय है यह सबको पता है) नाकाफी रही है और आम आदमी पार्टी के सक्रिय होने पर समय निकलने के बाद भी इतने आवेदन आये हैं। इस लिहाज से इस खबर की प्रमुखता तो है ही।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक वही है जो मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा है, अंतिम तिथि के बाद दिल्ली की मतदाता सूची में होने के लिये बेजोड़ भीड़, ज्यादा अच्छी जांच की जरूरत। इससे असहमत होने का कोई कारण नहीं है पर जांच और सुरक्षा की जरूरत तो नाम हटाने के आवेदनों के साथ भी थी और उन नामों के मामले में भी थी जो भाजपा ने दिये थे और जिनकी बात आम आदमी पार्टी कर रही है। मुझे लगता है कि इस मामले में मतदाता सूची बनाने से संबंधित लोगों की जिम्मेदारी तय करके कार्रवाई की जानी चाहिये पर ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की यह खबर भी सरकारी औपचारिकता ही लग रही है। इसका पता खबर के उपशीर्षक से भी लगता है, मतदाता सूची से नाम हटाने-शामिल करने पर आम आदमी पार्टी बनाम भाजपा। स्पष्ट है कि खबर से दोनों दोषी लग रहे हैं। पहले की खबरों से लगता है कि आम आदमी पार्टी के आरोपों या खुलासों के बाद भाजपा ने उसपर आरोप भर लगाये हैं। फिर भी आम आदमी पार्टी अगर जिम्मेदार हो तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिये और यह वैसे ही जरूरी है जैसे भाजपा के खिलाफ होनी चाहिये। भाजपा के खिलाफ ये आरोप रहे हैं और ऐसे उदाहरण हैं कि भाजपा शिद्दत से चाहे तो पूरी कायनात उसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है। अब जब यह साबित हो सकता है कि भाजपा चुनावी व्यवस्था में उचित या अनुचित हस्तक्षेप करके चुनावी धांधली करती है तो कार्रवाई छोड़िये, जांच की जरूरत या मांग भी नहीं है। अखबारों में भी नहीं। दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की खबर है और वही बताया गया है जो मुख्य चुनाव अधिकारी ने बताया है।
मुझे लगता है कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने और हटवाने की राजनीति अगर सत्तारूढ़ पार्टी करती है (और पकड़ी भी गई है) तो आगे ऐसी गड़बड़ी नहीं हो और ऐसी गड़बड़ी का लाभ कोई नहीं उठा सके इसके लिए आधार कार्ड से वोट देने की व्यवस्था भी की जानी चाहिये। कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाता सूची की कल्पना तब की है जब आधार कार्ड नहीं होते थे और पहचान पत्र नहीं बन सकते थे। इस कारण तब अलग चुनावों के लिए अलग मतदाता सूची होती थी और अभी हाल तक ऐसा था। अब समय के साथ अगर मतपेटियों की जगह ईवीएम आ गये हैं, तो अलग से मतदाता सूची की क्या जरूरत है और अगर अलग सूची होगी तो कोई एनसीआर में रहे दिल्ली का मतदाता होना चाहे (सुविधाओं के लिए ही सही) तो रोक का क्या मतलब और रोक नहीं रहेगी तो व्यवस्था कैसे चलेगी। यही नहीं, अब यह साबित हो चला है कि भाजपा को जब जरूरत हुई उसे ईवीएम का विरोध किया, अब उसका समर्थन करती है और फायदा भी उठाती है। इसी तरह मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और हटवाने का लाभ उठाया जब कार्रवाई का समय आया तो हो नहीं रही है और इस तरह भाजपा ने न सिर्फ तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर नियंत्रण पा लिया है बल्कि टेलीविजन, मीडिया, पुस्तक प्रकाशन, पत्रकारिता, प्रचार आदि को चौपट करने के बाद अब आरटीआई को चौपट किया जा रहा है तथा कहीं कोई कार्रवाई या रोक नहीं है।
अगर समय रहते आवश्यक कार्रवाई नहीं हुई तो भाजपा को सत्ता से हटाना असंभव हो जायेगा जो अभी ही नजर आ रहा है। दूसरी ओर एक परिवार या पार्टी के रूप में भाजपा की मनमानी प्रवृत्ति ना सिर्फ नोटबंदी करवा सकती है, बिना किसी लाभ 370 हटवा सकती है, विरोधियों को जेल में रख सकती और बिना चुनाव कराये समय भी काट सकती है। मनमाने फैसलों में एक फैसले की सूचना आज इंडियन एक्सप्रेस में है। इसके अनुसार, यूजीसी ने ठेके पर शिक्षकों को रखना आसान किया और वीसी का पद उनके लिए भी खोल दिया जो शिक्षा क्षेत्र से नहीं हैं। मैं नहीं कहता कि यह गलत है पर ऐसा निर्णय सोच विचार कर होना चाहिये और जैसे हो रहे हैं उससे और चाह जो हो रहा हो, जनता को कोई लाभ नजर नहीं आता है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, भाजपा ने दावा किया कि शीश महल पर 80 करोड़ रुपये खर्च किये गये। शीर्षक में लिखा है, आप ने पलटवार किया लेकिन आपका पलटवार पहले पन्ने की खबर में नहीं है। आतिशी पर विधूड़ी के हमलेको हिन्दुस्तान टाइम्स ने बदसूरत लड़ाई लिखा है जबकि गाली विधूड़ी ने दी जो भाजपा नेता पहले भी करते रहे हैं और राहुल गांधी को संसद में दी जा चुकी है। गाली तो प्रिय या प्यारी नहीं हो सकती है फिर भी उसे बदसूरत लड़ाई के रूप में पेश करना भाजपा के प्रति उदारता ही है वरना खबर बताती है कि विधूड़ी की गाली की चर्चा करते हुए अतिशी रो पड़ीं। कहने की जरूरत नहीं है कि गाली के जवाब में रोना (या रो पड़ना) लड़ना नहीं है और बदसूरत लड़ाई तो बिल्कुल भी नहीं है। अगर आपने प्रेस कांफ्रेंस का संबंधित हिस्सा देखा हो तो साफ है कि अतिशी गाली पर कुछ कहना चाह रही थीं पर कह नहीं पाई। यह लड़ना नहीं था असल में जवाब भी नहीं दे पाना है। बहुत कमजोर होना है। और यह कमजोरी भाजपा के मुकाबले आप की नहीं गालीबाजी के मुकाबले पीड़ित महिला की है। मुझे लगता है कि यह शीर्षक भाजपा की गालीबाजी का बचाव करता है। और भाजपा के पुराने, बेमतलब आरोपों को दोहराये जाने तथा उसे बराबर में छाप कर जो किया जा सकता है वह यही है।
वैसे तो आज ज्यादातर अखबारों की लीड माओवादियों के हमले में नौ जवानों के मारे जाने की खबर है पर इंडियन एक्सप्रेस और दि एशियन एज अपवाद है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, “भारत में पहली बुलेट ट्रेन जल्दी ही चलेगी : प्रधानमंत्री”। जवानों के मारे जाने की खबर यहां फोल्ड से नीचे चार कलम में है। इंडियन एक्सप्रस में सुरक्षा बल के जवानों के मारे जाने की खबर टॉप पर है और चार कॉलम में छपी है जबकि लीड तीन कॉलम में ही है। लीड का शीर्षक है, परमाणु करार को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका ने प्रतिबंधों में ढील दी, भारत की तीन इकाइयां काली सूची से बाहर हो सकती हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों खबरें प्रचार हैं। दूसरी ओर, माओवादियों के प्रति सरकार का जो रुख रह है उसमें माओवादियों के हमले में नौ जवानों का मारा जाना मतलब रखता है और सरकारी नीतियों की धज्जी उड़ा दिया जाना है। इसमें इस बात का कोई मतलब नहीं है कि सुरक्षा बलों ने कब कितने मारे हैं और इन्हें गिरफ्तार नहीं करके मार दिया जाता रहा है तो पत्रकार की हत्या के आरोपी के साथ वह सब कैसे नहीं हुआ जैसे आम तौर पर डबल इंजन वाले राज्यों में अपराधियों के साथ होता रहा है। जहां तक हमले का सुराग लगने की बात है अभी पुलवामा का कुछ नहीं हुआ है।


