छवि बनाने का एकतरफा अभियान : प्रधानमंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस में ये दावे किये होते तो उनसे कई सवाल पूछे जाते और उसके जवाब ही नहीं चुप्पी से भी कई सवाल निकलते। बहुत कुछ लिखा जा सकता था वैसे ही जैसे करण थापर का इंटरव्यू छोड़कर उठ जाने की घटना का वर्णन करण थापर ने कई साल बाद अपनी किताब, “डेविल्स एडवोकेट – दि अनटोल्ड स्टोरी” के 17वें या अंतिम अध्याय में किया है और यह पृष्ठ संख्या 190 से शुरू होकर 204 पर खत्म हुआ है। इस अध्याय का नाम है, “व्हाई मोदी वाक्ड आउट एंड बीजेपी शन्स मी” [मोदी क्यों उठकर चले गए और भाजपा (वाले) मुझसे क्यों बचते हैं]। नरेन्द्र मोदी अब करण थापर से ही नहीं, पूरी मीडिया से बचते हैं और फिर भी आज जो सब छपा है उससे संबंधित सारे सवालों का जवाब नहीं भी देते तो उनके दावे कुछ और दिखते। जवाब देते तो फंसते, यह उन्हें पता है। इसीलिए प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं और बिना प्रेस कांफ्रेंस अखबार अगर उन्हें प्रचार दे रहे हैं तो क्यों? यह भ्रष्टाचार नहीं है, पद का दुरुपयोग नहीं हुआ? सबसे बड़ी बात अखबार ऐसी सेवा क्यों दे रहे हैं? विज्ञापनों की उम्मीद में?और हमें खबरें खरीद कर पढ़नी पड़ रही है विज्ञापन दिख नहीं रहे।

संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों ने प्रधानमंत्री के पहले पॉडकास्ट की भिन्न बातों को शीर्षक बनाकर प्रधानमंत्री का प्रचार किया है। प्रधानमंत्री को अगर अखबारों में अपना प्रचार करने का हक है तो उनकी यह जिम्मेदारी भी है कि अपने शासन से संबंधित सूचनाएं पत्रकारों को दें। समय-समय पर यह काम सवाल जवाब के रूप में हो ताकि पत्रकारों और अखबारों के जरिये आम जनता को वह सब मालूम हो सके वह जानना चाहती है। सरकार से पूछना चाहती है। निजी मीडिया संस्थानों का मकसद मुनाफा कमाना हो सकता है और यह कितना ठीक है इसे देखना सरकार का ही काम होगा और संभव है कि वह अपना काम न करे, बाद के लिए छोड़ दे या ऐसा ही कुछ लेकिन प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं, मीडिया उनसे इसकी मांग नहीं करता है और मन की बात या पॉडकास्ट में कही बातों को प्रचार के रूप में छापता है तो सिस्टम अपना काम ठीक नहीं कर रहा है। इसमें मीडिया के लिए गलत तरीके से पैसे कमाना और प्रधानमंत्री या सरकार के लिए सरकारी पैसे से प्रचार पाना शामिल है। खासकर इस समय जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं।
आइये आज पहले यही देखें कि प्रधानमंत्री ने जो पॉडकास्ट में कहा है और अखबारों ने उसे खबर बनाया है वह एकतरफा नहीं होता, प्रेस कांफ्रेंस में कहा गया होता तो उनसे क्या पूछा जाता या पूछा जाना चाहिये था। अगर नहीं पूछे गये तो इन्हें खबर के रूप में छापना कितना उचित है और क्यों नहीं माना जाये कि यह सरकारी सुविधाओं के बदले प्राप्त किया गया अनुचित प्रचार है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री ने दावा किया कि दुनिया शांति के लिए भारत पर भरोसा करती है…. मैं रूस और यूक्रेन, इजराइल और फिलिस्तीन से कहता हूं। मेरी टैगलाइन है देश सबसे पहले…पुरानी चीजें छोड़कर नई को स्वीकार करने के लिए तैयार हूं। कहने की जरूरत नहीं है कि सामान्य स्थितियों में ऐसा कहने वाले किसी भी प्रधानमंत्री से कितने सवाल पूछे जाते और तब जाकर उनका यह दावा छपता और भिन्न सवालों के उनके जवाब के साथ इस दावे का सच भी सामने आ जाता। उदाहरण के लिए देश की इतनी चिन्ता है, भ्रष्चाटार के खिलाफ इतने दावे हैं तब अदाणी पर अमेरिका में लगे आरोपों के बावजूद उनके मामले में क्लिन चिट की कोशिश क्यों नहीं हुई। क्या प्रधानमंत्री या सरकार के कह देने भर से अमेरिकी अदालत में चल रहे मामले को खारिज कर दिया जाना चाहिये?
इंडियन एक्सप्रेस में उनका एक और दावा है, अबू धाबी में जब मैंने हिन्दुओं के लिए एक मंदिर चाहा तो मैंने एक क्षण में इसे क्राउन प्रिंस से हासिल कर लिया। करोड़ों हिन्दुओं के लिए यह कितनी ही खुशी का मौका था। लेकिन यह बात प्रेस कांफ्रेंस में कही गई होती तो कोई भी रिपोर्टर पूछता कि आप बांग्लादेश के हिन्दुओं के लिए ऐसा कुछ क्यों नहीं कर रहे हैं। उन्हें मंदिर नहीं तो कम से कम हिन्सा और परेशानी से बचा लिया जाये। खास कर तब जब वहां की पूर्व मुस्लिम प्रधानमंत्री को भारत में शरण मिला हुआ है। एक तो भारत ने बांग्लादेश के हिन्दुओं के लिये कुछ ठोस नहीं किया और वहां के नागरिकों पर घुसपैठ का आरोप लगाते रहते हैं। प्रधानमंत्री से यह सवाल बनाता है कि बांग्लादेश से घुसपैठ कौन करता है? हिन्दू या मुसलमान या दोनों। मुझे तीनों के घुसपैठ का कोई कारण समझ में नहीं आता है। जवाब मिले तो अगला सवाल भी होगा। इससे अलग यह सवाल तो है ही कि भारत सरकार घुसपैठ रोक क्यों नहीं रही है और रोकने के लिए क्या उपाय किये गये हैं।
द टेलीग्राफ में आज छपी एक खबर से तो लग रहा है कि सीमा पर बाड़ लगाने का काम भी सरकारी स्तर पर नहीं हो रहा है और लोग स्वयं यह काम कर रहे हैं। कूचबिहार से मैनुद्दीन चिश्ती की बाईलाइन वाली खबर का शीर्षक है, बाड़ लगाने को लेकर बांग्लादेशी गार्डों में झड़प। एक भारतीय गांव के निवासियों ने शुक्रवार को बांग्लादेशी सीमा रक्षक बल की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए दहाग्राम-अंगारपोता के एकमात्र बांग्लादेशी क्षेत्र की सीमा के कुछ हिस्सों पर बाड़ लगाना शुरू कर दिया। जब सशस्त्र बीजीबी जवानों ने भारतीय ग्रामीणों से बहस की और उन्हें चार फुट ऊंची लोहे की पोल और कांटेदार तार की बाड़ लगाने से रोकने की कोशिश की, तो बीएसएफ ने पहरा दिया और इस प्रक्रिया को सुगम बनाया। मेखलीगंज उप-मंडल के अंदरान-खरखरिया गांव के निवासी अनूप रॉय ने कहा, “बीजीबी जवानों ने हमें बाड़ लगाने से रोकने की कोशिश की। बीएसएफ जवानों की मौजूदगी ने हमें आगे बढ़ने का साहस दिया।” यहां तीन बीघा गलियारा – 178 मीटर लंबी 85 मीटर चौड़ी सड़क है जो दहा-ग्राम-अंगरपोटा को मुख्य भूमि बांग्लादेश से जोड़ती है – दोनों देशों की सीमा पुलिस द्वारा कड़ी सुरक्षा में है, लेकिन यह क्षेत्र बिना बाड़ के है। रॉय ने कहा, “एक बड़ी समस्या यह है कि दहा-ग्राम-अंगरपोटा से मवेशी हमारी कृषि भूमि में घुस आते हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।”
हि्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड है, गोधरा के बाद मुख्यमंत्री के रूप में भावनाओं से ऊपर उठा। अखबार ने 20 साल से ज्यादा पुरानी बात और उसमें भी सिर्फ प्रधानमंत्री का पक्ष हाईलाइट किया है। उन्होंने कहा है, मैं गोधरा पहुंचा…. वहां एक तकलीफदेह दृश्य था…. पर मैं जानता था कि मैं ऐसे पद पर था जहां मुझे अपनी भावनाओं से ऊपर उठना था। मैंने वह सब किया जो मैं कर सकता था…. प्रधानमंत्री ने अपनी तारीफ में इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए भी अब इसे प्रेस कांफ्रेंस में कहा होता तो उनसे पूछा जाता कि यह गुजरात दंगे के पहले की बात लगती है और क्या आपको नहीं लगा कि दूसरे लोग अपनी भावनाएं नहीं रोक पायेंगे और अगर ऐसा हुआ तो बहुत सारे मुसलमान मारे जायेंगे। हो सकता है प्रधानमंत्री कहते कि यह बात उनके दिमाग में नहीं आई। तब उनसे पूछा जाना चाहिये कि वे 1984 का मामला नहीं जानते थे या ऐसा ही था तो राजीव गांधी के बयान की आलोचना क्यों करते हैं और उसके बाद के दंगों को क्यों मुद्दा बनाते हैं और उसे भी गुजरात दंगों की तरह क्यों नहीं भूल जाते हैं? जो भी हो, एक सवाल यह भी है कि उनके मुख्यमंत्री रहते गुजरात दंगा हुआ हजारों लोग मारे गये। वे कह चुके हैं कि पिल्ला भी …. तो क्या गुजरात दंगों की याद नहीं आती? उसका दुख नहीं है, उसकी चरचा क्यू नहच
प्रधानमंत्री ने यह भी बताया है और हिन्दुस्तान टाइम्स ने छापा है कि वे तीन दिन पुराने विधायक थे पर गोधरा जाना चाहते थे और अपने कर्मचारियों के विरोध के बावजूद ओएनजीसी के एक इंजन वाले होलीकॉप्टर से गये। उन्होंने यह भी बताया है कि तब कहा था कि वे वीआईपी नहीं हैं। मुझे नहीं लगता कि ओएनजीसी के एक इंजन वाले विमान में चलना इतना खतरनाक होगा और होता तो एक इंजन वाले हेलीकॉप्टर बनते और ओएनजीसी के जो लोग इस विमान से चलते होंगे वे कम महत्व के आदमी होंगे। कुल मिलाकर मुझे यह सब अब छापने बताने लायक बात नहीं लगती है और इसे पहले पन्ने पर छापना प्रधानमंत्री की (अपेक्षित) इच्छा पूरी करना है जो अगर लालच में किया गया हो या डर से तो अनुचित है और भ्रष्टाचार की श्रेणी में है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सेकेंड लीड बनाया है और शीर्षक है, 2005 में अमेरिकी वीजा देने से इनकार करना निर्वाचित सरकार का अपमान था। कहने की जरूरत नहीं है कि गुजरात दंगे का कारण चाहे जो हो – हुआ यह अपने आप में बड़ी बात है और जिसे इसे रोकना था उसपर रोक नहीं पाने की जिम्मेदारी तो है ही।
सरकार का काम होता है कानून व्यवस्था की स्थिति बनाकर रखना। 1984 में जो हुआ वह गोधरा से अलग था पर उसका अनुमान होना चाहिये था और उसे सफलता पूर्वक रोका जाना चाहिये था। नहीं रोका जा सका या जितना हुआ उसके लिए उस समय के शासन की आलोचना होती है। नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा भी करती है। ऐसे में गुजरात के लिए मुख्यमंत्री की आलोचना क्यों नहीं होनी चाहिये। बाकी जो आरोप और तथाकथित सबूत, परिस्थितजन्य साक्ष्य और बयान आदि हैं वे अपनी जगह हैं। ऐसे में देश हित इसी में था कि अमेरिका का वीजा मांगा ही नहीं जाता (जब सख्ती और उसका कारण मालूम था)। वैसे भी जब कोई इजाजत मांगी जाती ह तो देना नहीं देना – देने वाले का विशेषाधिकर है। आप उसे यह अधिकार नहीं देते तो उससे इजाजत मांगने की जरूरत ही नहीं है और अगर मांग रहे हैं तो वह अपने विवेक से फैसला करेगा। मुझे इसमें अपमान जैसी कोई बात नहीं लगती है। मुझे लगता है कि वीजा मांगना ही अपमान करवाना था। प्रेस कांफ्रेंस में यह बात कही गई होती तो कोई ना कोई इस आलोक में प्रधानमंत्री का पक्ष पूछता ही। वैसे भी प्रधानमंत्री के दावे को समझने के लिए उनका पक्ष जानना जरूरी है और उनके आरोप भर में कुछ नया नहीं है।
यही नहीं, अगर निर्वाचित मुख्य मंत्री को अपने देश में आने से रोकना किसी निर्वाचित सरकार या मुख्यमंत्री का अपमान है और अमेरिका ने कर ही दिया था तो हमने उसका क्या बिगाड़ लिया और अबकी बार ट्रम्प सरकार कहकर ही आये थे। जो भी हो, निर्वाचित मुख्यमंत्री को जेल भेजने और उसके लिए पीएमएलए कानून का उपयोग करने और यह कानून पास करने वाले जज के ईनामी होने तथा बाद में जमानत नहीं देने वाले जज के साथ पूजा करने और उन्हें अपनी छवि को लेकर परेशान करने तथा ईश्वर से पूछकर फैसला करने जैसी बातें सार्वजनिक होना भी तो न्याय व्यवस्था और निर्वाचित मुख्यमंत्री का अपमान है। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने देश में पहली बार दो मुख्यमंत्रियों के साथ ऐसा किया है और दोनों मामले अदालत में नहीं टिके (बहुत सारे मामलों में फैसले नहीं आये या फैसले अपेक्षित नहीं थे तब भी)। इन दो मामलों में कुछ कहे बिना अपना 2005 का मामला अब फिर उठाना क्या है? मुझे नहीं लगता कि यह सेकेंड लीड जैसी खबर है। कुल मिलाकर मेरा मानना है कि नरेन्द्र मोदी के पास कहने के लिए या इंटरव्यू देने के लिए कुछ नहीं है और यह करण थापर के पुराने इंटरव्यू से ही साबित हो चुका है। इसके बावजूद अक्षय कुमारों को इंटरव्यू देना उनका विशेषाधिकार है पर उसके अंश इस तरह छपना सामान्य नहीं है।
इस इंटरव्यू का एक हिस्सा दि एशियन एज ने सिंगल कॉलम में और नवोदय टाइम्स ने चार कॉलम में बॉटम छापा है। शीर्षक है, मनुष्य हूं, देवता नहीं, हो सकती हैं गलतियां। नवोदय टाइम्स में हाइलाइट किया हुआ अंश है, जोखिम उठाने की मेरी क्षमता का अभी तक नहीं हुआ पूरा उपयोग। नवोदय टाइम्स ने गोधरा कांड के दौरान भावनाओं को काबू में रखने के दावे को भी इंट्रो बनाया है। मनुष्य होने की घोणषा पर तो उन्हीं के पिछले दावे को लेकर सवाल किया जाता और यह भी लोकसभा के समय उस दावे से उम्मीद थी तो अब विधानसभा के समय इस दावे या इससे उम्मीद का आधार क्या है। जोखिम उठाने की अपनी क्षमता का दावा प्रधानमंत्री करते रहे हैं और नोटबंदी के समय भी कहा था कि इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं की मैंने कर दी। मैं समझ रहा था कि नोटबंदी से देश को हुए नुकसान और उससे कोई लाभ नहीं होने के बाद प्रधानमंत्री समझ जाएंगे के जोखिम उठाने का उनका दावा देश के लिये बहुत महंगा पड़ रहा है। जोखिम उठाने की क्षमता के कारण ही वे किसानों के मामले में खुद से फैसला कर लेते हैं। एक साल आंदोलन को कुचलने का हर संभव प्रयास करते हैं और बात नहीं बनती है तो माफी मांग लेते हैं आश्वासन देते हैं और उसे पूरा नहीं करने का जोखिम उठाते हैं। फंसे हुए साफ दिख रहे हैं। इसी कारण परमात्मा प्रेषित से आम इनसान बनना पड़ रहा है लेकिन अभी भी कह रहे हैं कि पूरा उपयोग नहीं हुआ है तो यह देश को देखना है। मीडिया का काम था इसे बताना या लोगों को सतर्क करना तो वह भी नहीं हुआ है। मैं यह सोच रहा हूं कि दिल्ली जीत गये तो क्या होगा।
द हिन्दू में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और ट्रंप को सजा… लेकिन न कैद न जुर्माना की खबर लीड का शीर्षक है। यही अमर उजाला में शीर्षक है। पॉडकास्ट की खबर यहां पांच कॉलम में है। शीर्षक है, भारतीय वीजा के लिए कतार में खड़ी होगी दुनिया। मुझे इस दावे का ही कोई मतलब नहीं लगता है। भारत के लोग जब अवैध रूप से कनाडा-अमेरिका जाने के लिए लाखों रुपये देते हैं तब कुछ लोग ताजमहल या कुंभ देखने के लिए या गोवा अथवा राजस्थान घूमने के लिए कतार में खड़े हो जायें तो कौन सी बड़ी बात हो जायेगी। इससे मुख्यमंत्री को वीजा नहीं देने का अपमान भी कम नहीं होने वाला है। फिर भी मोदी यह दावा कर रहे हैं तो पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था जैसा ही है। पर अखबार ने पांच कॉलम में क्यों छापा है यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं। जो भी हो, यह संपादकीय विवेक और आजादी का मामला है और बना हुआ है तो अच्छी बात है। तभी मैं यह सब लिख पा रहा हूं और प्रधानमंत्री कह रहे हैं, गांधी-सावरकर के रास्ते अलग, लक्ष्य एक… स्वतंत्रता। मैं इस स्वतंत्रता को किसी की हत्या करने की स्वतंत्रता नहीं मानता न इस आधार पर किसी हत्यारे का समर्थन करूंगा। आज के लिए मामला यहीं खत्म करता हूं।
सरकार कैसी है या कैसा काम कर रही है – इसे जनता को देखना है और जनता ऐसे नेताओं को चुनाव के समय देखती है। लेकिन निजी और सरकारी मीडिया संस्थान अगर प्रधानमंत्री से सवाल जवाब नहीं करते हैं, प्रधानमंत्री प्रेस फांफ्रेंस नहीं करते हैं तो कोई कारण नहीं है कि वे इधर-उधर जो कुछ भी कहें उसे प्रचारित किया जाये। जनहित की सूचनाओं की बात अलग है लेकिन प्रधानमंत्री का प्रचार मीडिया का काम नहीं है और अगर वह सरकारी विज्ञापनों के लालच में कर रहा है तो सरकारी धन का दुरुपयोग और अगर ऐसे किसी दबाव में कर रहा है तो वह पद का दुरुपयोग है। मुझे नहीं लगता है कि कोई बहुत बड़ी घोषणा न हो, जनहित की बात नहीं हो उसे इस तरह प्रचारित करने की जरूरत है और यह पद व सुविधा का दुरुपयोग नहीं है। मुझे लगता है कि आज का यह प्रचार बिलकुल अनुचित और गैर जरूरी है। प्रधानमंत्री किससे बात करेंगे और किसे इंटरव्यू देंगे – यह उनका विशेषाधिकार हो सकता है लेकिन कोई कारण नहीं है कि उस इंटरव्यू के अंश (खास कर प्रचार वाले) मीडिया के दूसरे हिस्से में फिर से प्रस्तुत किया जाये। यहां उल्लेखनीय है कि अगर सामग्री सरकार के खिलाफ हो या उसका उपयोग सरकार के खिलाफ किया जाये तो सरकार कॉपी राइट कानून के तहत कार्रवाई करती रही है। फिर प्रचार क्यों?
कहने की जरूरत नहीं है कि इस सरकार में ज्यादातर मीडिया संस्थान अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं। प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं और अगर विज्ञापनों के बदले या लालच में उनका ऐसा प्रचार छाप रहे हैं या पॉड कास्ट में कही गई उनकी बातों को प्रचारित कर रहे हैं तो यह भ्रष्टाचार है। पद का दुरुपयोग है। इलेक्टोरल बांड से करोड़ों वसूले जाने के बाद यह और अनुचित है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव के लिए मुद्दा तलाश रही भाजपा ने शीशमहल के मामले में राजमहल के जवाब से मुंह की खाने के बाद ‘पहले’ पॉडकास्ट से मुद्दों की भरमार कर दी है। अखबारों ने उसके भिन्न अंशों को प्रचार दिया है और उसमें शायद कुछ मुद्दा निकल आये। आज जब संभल की जामा मस्जिद के कुंए के मामले में यथास्थिति बनाये रखने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश महत्वपूर्ण है तो महाकुंभ के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का निमंत्रण (अमर उजाला) भी पहले पन्ने की खबर है। योगी के निमंत्रण की खबर के साथ अखबार ने उनके कहे, किसी भी विवादित ढांचे को मस्जिद मत कहिये, यह इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है – को भी सिंगल कॉलम की खबर की तरह छापा है। अमर उजाला ने इस खबर के साथ या पहले पन्ने पर सुप्रीम कोर्ट वाली खबर नही छापी है जो हिन्दुस्तान टाइम्स में चार कॉलम की लीड है।
इंडियन एक्सप्रेस ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कहे को दो कॉलम में टॉप पर छापा है और उसके नीचे दो कॉलम में ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर है। शीर्षक में यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने संभल की मस्जिद के कुंए से संबंधित विवाद पर दो हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है। योगी आदित्य नाथ वाली खबर में शीर्षक में यह नहीं है कि विवादित संरचना को मस्जिद कहना इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है। मुझे लगता है कि इस खबर में पत्रकारिता के सिद्धांतो का जो हुआ वह ज्यादा महत्वपूर्ण है पर अभी वह मुद्दा नहीं है। मुझे यह बताना है कि द टेलीग्राफ ने सुप्रीम कोर्ट की खबर को लीड बनाया है और इसके साथ सिंगल कॉलम की खबर है कि अपनी ही सरकार के वक्फ बोर्ड को भूमाफिया कहा है। दूसरी ओर, खुद को नॉन बायोलॉजिकल, परमात्मा प्रेषित कहने के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री ने कहा है, ‘इंसान हूं, भगवान नहीं, गलतियां मुझसे भी होती हैं’ (जनसत्ता)। इसपर द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर लिखा है कि लोकसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री ने खुद को परमात्मा प्रेषित कह दिया और अब मनुष्य बता रहे हैं। मुझे लगता है कि बात इतनी ही नहीं है। वे प्रचार के लिए बहुत कुछ विवादास्पद कर रहे हैं।
प्रियंका गांधी ने कल द टेलीग्राफ की एक खबर के हवाले से एक्स पर लिखा था, नेशनल टैलेंट सर्च एक्जामिनेशन स्कॉलरशिप (राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा) और इससे जुड़ी छात्रवृत्ति पिछले तीन साल से बंद है, लेकिन प्रधानमंत्री के निजी प्रचार के लिए परीक्षा पर चर्चा जारी है। तीन साल में स्कॉलरशिप पर 40 करोड़ रुपये खर्च होते, जबकि प्रचार पर 62 करोड़ रुपये खर्च किए गए। प्रियंका गांधी ने लिखा है कि यह परीक्ष 1963 में शुरू हुई थी और इसकी छात्रवृ्त्ति से तमाम बच्चों के भविष्य का रास्ता बना, वे देश की प्रगति के भागीदार बने, उनके लिए अच्छी शिक्षा के द्वार खुले। छात्रवृत्ति बंद होने से लाखों युवाओं के उज्जवल भविष्य का रास्ता बंद हो गया, लेकिन प्रधानमंत्री जी का पीआर बंद नहीं हुआ।


