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आज के अखबार : जुकरबर्ग की टिप्पणी से छवि खराब और हरियाणा भाजपा अध्यक्ष पर बलात्कार के आरोप

संजय कुमार सिंह

दिल्ली चुनाव के लिये आम आदमी पार्टी पर लगाये गये भाजपा के आरोप और आम आदमी पार्टी के बचाव तथा जवाबी हमलों में घिरी भाजपा का हेडलाइन मैनेजमेंट अखबारों में भी गड़बड़ाता लग रहा है। खबरों के मामले में भाजपा और केंद्र सरकार की प्राथमिकता अलग रही है और सरकार का प्रचार अखबारों में दिखता रहता है। केंद्र सरकार का प्रचार तो आज भी है लेकिन दिल्ली चुनाव के लिए या उसमें काम आने वाला नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता के लिहाज से वह महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन आज एक दिलचस्प बात नजर आ रही है। अमर उजाला में हरियाणा भाजपा अध्यक्ष के खिलाफ बलात्कार (हिन्दी अखबार दुष्कर्म लिखते हैं) की खबर टॉप पर दो कॉलम में है। खबर के अनुसार आरोपी नेता और सह अभियुक्त कलाकार से पुलिस पूछताछ कर चुकी है। भाजपा अध्यक्ष ने आरोप को बेबुनियाद बताया है वह भी छपा है। मामला पुराना है पर एफआईआर 13 दिसंबर 2024 को छपी थी, खबर आज छपी है। पहले पन्ने पर है मतलब मोटे तौर पर खबर ‘नई’ है। आरोप सही हो या गलत, ‘खबर’ यह भी है कि 13 दिसंबर 2024 को एफआईआर होने, पूछताछ हो जाने के बावजूद अखबारों को पता नहीं चला या संपादकों ने छापने लायक नहीं छपा। कल सोशल मीडिया पर लीक हो गई तो आज छपी है वह भी न के बराबर।

आज अमर उजाला में तो प्रमुखता से है लेकिन बाकी अखबारों में खबर या तो पहले पन्ने पर नहीं है या सिंगल कॉलम में है। कुल मिलाकर, भाजपा की छवि तो इस आरोप और खबर से भी खराब हो रही है और ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं। दूसरी ओर, पार्टी के रूप में भाजपा की नीति ऐसे लोगों के मामले में क्या है, कोई नहीं जानता। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, नारी सम्मान और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं के बावजूद बलात्कारियों का बचाव कोई नया नहीं है। इसमें मीडिया का सहयोग एक अलग अध्याय है। ऐसी भाजपा ने जुकरबर्ग पर भारत की छवि धूमिल करने वाला बयान देने का आरोप लगाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज यह खबर लीड है इसलिए मामला पर्याप्त गंभीर भी है। हालांकि, आज की लीड से लगता है कि खबरें ही नहीं हैं। ऐसे में मुझे आज द हिन्दू मिला नहीं और दि एशियन एज अभी तक इंटरनेट पर नहीं है।

1. इंडियन एक्सप्रेस

पाक अधिकृत कश्मीर पाकिस्तान के लिए विदेशी क्षेत्र है, आतंक के लिए उपयोग किया जाता है : राजनाथ उपशीर्षक है – कहा, पाक अधिकृत कश्मीर के बिना जम्मू और कश्मीर अधूरा है।

2. हिन्दुस्तान टाइम्स

बम की झूठी खबरें दिल्ली में नया मुद्दा बनी

3. टाइम्स ऑफ इंडिया

जुकरबर्ग की टिप्पणी पर मीटा की बुलायेगी संसदीय समिति। इंट्रो है, भारत की छवि खराब करने के लिए माफी मांगनी होगी : भाजपा सांसद दुबे।

4. द टेलीग्राफ

भागवत ने सद्भाव की कोशिशों को अलविदा कहा। फ्लैग शीर्षक है, राम मंदिर को असली स्वतंत्रता से जोड़कर।

5. नवोदय टाइम्स

पीओके भारत के माथे का मुकुट मणि है : राजनाथ।

6. अमर उजाला

आपदायें नियति नहीं, सटीक पूर्वानुमान से घटा नुकसान, अब भूकंप से निपटेंगे : मोदी 

मुझे लगता है कि सत्तारूढ़ दल के पदाधिकारियों, नेताओं पर अक्सर बलात्कार और यौन शोषण के आरोप लगना पार्टी के साथ देश की छवि खराब करने के लिए पर्याप्त है और सत्तारूढ़ पार्टी को अपनी ही नहीं, देश और यहां के लोगों खासकर महिलाओं की छवि ठीक रखने और करने के साथ पूरी व्यवस्था को ठीक रखने के लिए भी काम करते नजर आना चाहिये। उन्हें वेतन-भत्ता भी इसी के लिए मिलता है। मीडिया की भी भूमिका है पर वह अपना काम न करे तो सरकार मनमानी करने के लिए स्वंतत्र नहीं है और अगर उसे अपनी या देश की छवि की चिन्ता है तो पार्टी में बलात्कारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने की शिकायतों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये। कार्रवाई न सिर्फ पुलिस को करनी चाहिये पार्टी को भी करनी चाहिये और ऐसे मामलों में अब उसे अपनी नीति घोषित कर देनी चाहिये। या सिर्फ यही बता देना चाहिये कि पार्टी को सिद्धांत रूप में ऐसे लोगों से दिक्कत है अथवा नहीं। यह पार्टी की महिलाओं को भी जानने-समझने के लिए जरूरी है। जो भी हो, आज खबर और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड है कि संसद की संचार और सूचना प्रौदयोगिकी मामलों की स्थायी समिति फेसबुक के संस्थापक जुकरबर्ग के एक ऐसे बयान को लेकर उन्हें तलब करेगी जिससे भारत की छवि धूमिल हुई है।

खबरों के अनुसार, संसद की संचार और सूचना प्रौदयोगिकी मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष और भजपा सांसद निशिकांत दुबे ने यह जानकारी दी है। निशिकांत दुबे पर भी महिलाओं के लिए आपत्तिजनक शब्दों के उपयोग का आरोप है। यह अलग बात है कि जिस महिला सांसद से निशिकांत दुबे भिड़े उन्होंने दुबे जी की खबर ले ली है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि जुकरबर्ग के खिलाफ ऐसा क्या आरोप है कि निशिकांत दुबे उन्हें तलब करने की सूचना दे रहे हैं। नवोदय टाइम्स में हिन्दी में प्रकाशित खबर में कहा गया है, जुकरबर्ग ने एक पॉडकास्ट में दावा किया था कि 2024 में दुनिया भर के चुनावों में भारत सहित अधिकांश मौजूदा सरकारों को चुनावी हार का सामना करना पड़ा था। खबर के अनुसार, सूचना और प्रसारण मंत्री अश्वनी वैष्णव ने उनपर पलटवार करते हुए सोमवार को कहा था, ‘जुकरबर्ग का यह दावा कि 2024 के चुनावों में भारत सहित अधिकांश मौजूदा सरकारों को कोविड महामारी के बाद हार का सामना करना पड़ा, तथ्यात्मक रूप से गलत है’।

इसे एक्स पर फिर साझा करते हुए दुबे ने कहा, मेरी समिति इस गलत जानकारी के लिए मेटा के प्रमुख को बुलायेगी। किसी भी लोकतांत्रिक देश की गलत जानकारी देश की छवि को धूमिल करती है। इस गलती के लिए भारतीय संसद से तथा यहां की जनता से उस संस्थान को माफी मांगनी पड़ेगी। निशिकांत दुबे सरकार हैं जिसे चाहें माफी मांगने के लिए मजबूर करें जिसे टांग सकते हों टांग दें पर मुद्दा यह है कि क्या भारत सरकार की छवि इतने भर से खराब हो जाती है? क्या भारत सरकार के लोग इतने बेरोजगार हैं? अगर नहीं हैं तो उन्होंने गलत क्या कहा है। सीटें कम होने का क्या मतलब होता है? चुनावी हार अगर पूरे देश में नहीं हुई तो चुने हुए क्षेत्रों में हुई ही है और यह पिछली बार के मुकाबले ज्यादा है। विधानसभा चुनावों में हरियाणा जीत ली तो वह उसके पास था ही और महाराष्ट्र पहले नहीं जीता था तो उसपर कब्जा कर ही चुके थे और यह कब्जा बनाये रखना भी व्यवस्था से जीत है जो पहले ही हो चुकी थी। इसलिए वह भी मुद्दा नहीं है। कुल मिलाकर, 2024 में भाजपा की सीटें कम हुई हैं और भले वह सत्ता में रह पाई, हारी तो है ही या पहले के मुकाबले ज्यादा हारी है। फिर भी ऐसा कहने के लिए जुकरबर्ग को माफी मांगने के लिए कहना अपनी बात मनवाना या ताकत दिखना है। जो भी हो, यह खबर तब होती जब निशिकांत दुबे (या अश्विनी वैष्णव) से पूछा जाता कि वे क्या बोल रहे हैं और क्या इसलिए बोल रहे हैं कि उनके पास कोई काम नहीं है या उनसे अपना काम करने के लिए नहीं कहा जाता है। मीडिया का यही काम है पर वह अपना काम भी नहीं कर रहा है। दिलचस्प यह है कि निशिकांत दुबे ने एक्स पर जो लिखा उसके लिए टाइम्स ऑफ इंडिया ने उनसे बात की और खबर से नहीं लगता है कि उनसे वह पूछा जो पूछा जाना चाहिये था। खबर के साथ एक बात और महत्वपूर्ण है वह यह कि जुकरबर्ग ने जो कहा उसे तो कम लोगों ने सुना होगा, इस मुद्दा बनाकर भाजपा और लोगों को बता रही है। इसमें यह भी बताया जा रहा है कि जुकरबर्ग ने एक पॉडकास्ट में अपनी बात कही और भाजपा को इससे भी एतराज है। अमर उजाला में यह खबर चार कॉलम में है। मूल खबर के साथ बॉक्स में बताया गया है, 20-24 जनवरी के बीच बुलाये जायेंगे मेटा के अधिकारी। इसमें कहा गया है, समिति के पास भारतीय संसद की शक्तियां हैं। संसद संप्रभु है। कोई भी देश हमारी संसद के अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता है। अगर भारतीय संसद चाहे तो वह कोई भी निर्णय ले सकती है। इसके साथ निशिकांत दुबे ने नहीं बताया और ना उनसे पूछा गया कि सेबी प्रमुख के मामले में क्या हुआ या संसद में संसद के ही दूसरे सदस्य को गाली देने और उसपर कोई कार्रवाई नहीं होने जैसे मामलों से संसद और देश की कैसी छवि बनी है। संसद में रंगीन धुंआ छोड़ने वालों को जेल में रखने से सुरक्षा में चूक का जो हश्र हुआ था वह ठीक हो गया?  

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