
जयपुर | हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार लोढ़ा को निलंबित कर दिया है। सरकार के आदेश के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह कार्रवाई की। निलंबन के दौरान उनका मुख्यालय कुलसचिव कार्यालय रहेगा। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार भंवरलाल मेहरड़ा ने निलंबन का आदेश जारी किया है।
मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा मामला
डॉ. लोढ़ा पर गलत जानकारी देकर नौकरी हासिल करने का आरोप है। मामला जब मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा, तो उच्च शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव डॉ. हरिशंकर मेवाड़ ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र भेजकर उनके खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र को पीएचडी कराने का झूठा दावा
डॉ. मनोज कुमार लोढ़ा ने 2003 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक छात्र को पीएचडी कराने का दावा किया था, जबकि खुद उन्होंने 2006 में पीएचडी पूरी की। इस गड़बड़ी की शिकायत तत्कालीन कुलपति ओम थानवी के कार्यकाल में की गई थी। प्रारंभिक जांच में लोढ़ा दोषी पाए गए थे। बाद में अन्य विश्वविद्यालयों के तीन प्रोफेसरों की कमेटी और प्रबंध बोर्ड की दो सदस्यीय समिति ने भी उनकी नियुक्ति को गलत ठहराया।
एफआईआर पर विचार जारी
उच्च शिक्षा विभाग ने डॉ. लोढ़ा के खिलाफ FIR दर्ज कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन विश्वविद्यालय ने अभी तक ऐसा नहीं किया है। रजिस्ट्रार भंवरलाल मेहरड़ा ने बताया कि प्रबंध बोर्ड की पिछली बैठक में इस मामले की दोबारा जांच का निर्णय हुआ था, जिसके चलते विभाग से मार्गदर्शन मांगा गया है कि एफआईआर दर्ज करवाई जाए या नहीं।
ओम थानवी –
विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्थान है। बार-बार सरकार का हस्तक्षेप स्वयं क्यों आमंत्रित करना?
आज ख़बर है कि दोषी शिक्षक को विवि ने निलंबित कर दिया, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय के एफ़आइआर दर्ज़ करवाने के निर्देश पर उच्च शिक्षा विभाग से “मार्गदर्शन” माँगा है। विवि अभी और जाँच करेगा।

क्या कोई नहीं समझ पा रहा कि तथ्य शीशे की तरह साफ़ और स्वयंपुष्ट हैं? बोर्ड की उप-समिति की जाँच में डॉ लोढा ख़ुद मान चुके हैं कि उन्होंने (आपराधिक) ग़लतबयानी की थी: अपनी पीएच-डी 2006 में की, मगर आवेदन में अमेरिका (हार्वर्ड विश्वविद्यालय!) के छात्र को 2003 में पीएच-डी करवाने का दावा किया।
अधूरे शिक्षण अनुभव के बावजूद अन्य आवेदकों को परे कर केवल उन्हें बुलाया गया, उनका ही इंटरव्यू हुआ, उन्हें ही नियुक्त मिल गई।
आवेदन में “डिक्लेरेशन” होता है कि भरी गई जानकारी में कोई झूठी या असत्य निकले तो नियुक्ति रद्द/बर्खास्तगी कर दी जाए। तीन साल में विवि ने ऐसा नहीं किया। लोढा ख़ुद चले जाते, तब भी इतनी फ़ज़ीहत न होती।
बोर्ड (सिंडिकेट) की अप्रेल, 2022 की बैठक में “सभी सदस्यों का एक मत था कि चूँकि एक अपात्र उम्मीदवार की नियुक्ति की गई है, इसलिए भर्ती किए गए व्यक्ति की सेवाएँ तत्काल प्रभाव से समाप्त/टर्मिनेट कर दी जानी चाहिए”।
32 महीने बीत जाने के बाद, सरकार के साथ सदस्य बदलने के बाद बोर्ड ने नई जाँच का निर्णय कर लिया। क्या बोर्ड अपना मंतव्य इस तरह बदल सकता है? बोर्ड के अध्यक्ष को सोचना/रोकना चाहिए।
जाँच पर जाँच पर जाँच। पारदर्शिता, नैतिकता और ईमानदारी के मूल्यों का पाठ पढ़ाने वाले विवि को अपना विवाद इतनी दूर नहीं ले जाना चाहिए। दोषी बच जाएँगे। लोग विवि में दोष देखने लगेंगे।


