मनोज अभिज्ञान-
भारतीय राजनीति में जन आंदोलनों की भूमिका ऐतिहासिक रही है, लेकिन हर आंदोलन के पीछे छिपे वास्तविक मकसद और फंडिंग को समझना भी जरूरी होता है। जब कोई आंदोलन जनता को परिवर्तन के सपने दिखाता है, तब यह देखना आवश्यक हो जाता है कि इसका असली सूत्रधार कौन है और इसके असली लाभार्थी कौन हैं।
हाल ही में एक अफवाह फैलाई गई कि USAID ने भारत में वोटर टर्नआउट बढ़ाने के लिए 21 मिलियन डॉलर भेजे। यह झूठी खबर जनता के ध्यान को भटकाने के लिए फैलाई गई थी। वास्तविकता यह है कि USAID ने यह पैसा बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट करने के लिए इस्तेमाल किया। लोकतंत्र और विदेशी हस्तक्षेप की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। बड़े राष्ट्र अक्सर अपनी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए छोटे देशों में हस्तक्षेप करते रहते हैं।
अब अगर भारत के संदर्भ में इस तरह की फंडिंग की बात करें, तो अन्ना आंदोलन को याद करना जरूरी हो जाता है। जिस आंदोलन को भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश की अभिव्यक्ति बताया गया, उसकी असली कहानी कुछ और ही थी। इस आंदोलन के पीछे किसका फंड था? कौन से हित समूह इसमें शामिल थे? जब इस पर गहराई से विचार किया जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह आंदोलन केवल आम जनता की भावनाओं का दोहन करने के लिए था। इसकी परिणति ऐसी राजनीतिक स्थिति में हुई, जिसने कुछ विशेष लोगों को फायदा पहुंचाया।
इस आंदोलन के सबसे बड़े लाभार्थी नरेंद्र मोदी रहे। जब यह आंदोलन चरम पर था, तब कांग्रेस सरकार बैकफुट पर आ गई और इस राजनीतिक अस्थिरता का सीधा लाभ मोदी को मिला। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था? भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, या किसी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना? जिस छोटे लाभार्थी को तब सत्ता में लाया गया था, उसका कार्यकाल पूरा हो चुका है, और अब बड़ा लाभार्थी सत्ता में अपनी जड़ें और मजबूत कर चुका है।
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