गुणानंद जखमोला-
मेनस्ट्रीम पत्रकारिता में लगभग ढाई दशक काम किया। देश के तमाम बड़े जर्नलिस्ट मसलन मधुसूदन आनंद, राजेश रपड़िया, बलदेवभाई शर्मा, उर्मिलेश, आलोक मेहता, शशि शेखर, संतोष तिवारी, डा. सुधीश पचौरी, अभय किशोर, गिरजेश वशिष्ठ, रामकृपाल सिंह, दिलीप चौबे जी आदि गुरुओं से पत्रकारिता का ककहरा सीखा। कुछ संपादकों से बनी नहीं, व्यक्तिगत कारण थे। पर, इन सब बड़े पत्रकारों में एक बात समान थी, सभी कारपोरेट जर्नलिज्म के दौर के संपादक थे, लेकिन पत्रकारिता के सिद्धांत भी मानते थे।
मसलन, मुझे सिखाया गया है कि सरकार एक बड़ी विज्ञापनदाता एजेंसी है। उसकी बात सुनो, लेकिन जनहित की खबरों को न दबाओ। यदि सरकार का पक्ष दो कॉलम दे रहे हो तो एक कालम जनपक्षधरिता का भी होना चाहिए, यानी बैलेंस खबर दो।
लेकिन मौजूदा दौर में तो पूरी की पूरी खबर ही दबा दी जा रही है। देहरादून के मुख्यधारा के अखबारों ने तो हद ही कर दी। बजट सत्र के दौरान सदन में लाइव चल रहा था। सब देख रहे थे कि क्या हो रहा है, लेकिन सुबह के अखबार देख माथे पर सलवटें पड़ जाती हैं। खबर का अर्थ ही बदला जा रहा है। संपादक पूरी तरह से गणेश और सरकार वंदना में दंडवत प्रणाम करते जा रहे हैं।
संसदीय कार्यमंत्री प्रेमचंद ने सदन में गाली दी। खबर का संदर्भ बदल दिया गया और उसे विधायक मदन बिष्ट अभद्रता प्रकरण से जोड़ दिया गया। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने दिखाने के लिए बिगड़े बोल के लिए कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल को तलब किया और मीडिया और सोशल मीडिया पर इस घटना को तूल देने पर केस करने के लिए धमकाया तो प्रमुख अखबारों ने इस धमकी को भी दबा दिया और इसे प्रेमचंद को नसीहत के तौर पर कह दिया।
पहाड़ के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे युवाओं के भू कानून मूल निवास आंदोलन में जुटे युवाओं को प्रदेश अध्यक्ष भट्ट दुकान बंद करने का बेतुका बयान दिया तो अखबारों ने उसे तान दिया।
बजट सत्र के दौरान कृषि मंत्री गणेश जोशी को प्राकृतिक खेती को परिभाषित करने में 22 मिनट का समय लगा, तब भी वो परिभाषा नहीं बता सके। लेकिन इसे भी अखबारों ने हलके अंदाज में पेश किया। जबकि यह हास्यापद बात है कि कृषि मंत्री सदन को प्राकृतिक खेती की परिभाषा नहीं बता सके। इसके बाद स्पीकर ने इस सवाल को ही स्थगित कर दिया।
यह अक्सर होता है। राज्य के मुद्दों पर मुख्यधारा के अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया चुप्पी साध जाती है। यह सरकारी विज्ञापनों का खौफ नहीं बल्कि दलाली का मामला है। अधिकांश संपादक अखबारों के मालिकों के लिए लाइजिनिंग का काम करते हैं। यदि जनपक्षधरता को दिखाएंगे तो दलाली क्या खाक कर पाएंगे।
मैंने ऐसे अधिकांश चरणचुंबक संपादक और बिना रीढ़ के पत्रकार पूरे पत्रकारिता जीवन में नहीं देखे। पता नहीं, ये संपादक और वरिष्ठ पत्रकार जब शीशे में अपना चेहरा देखते होंगे तो खुद से या अपने बच्चों से नजरें कैसे मिलाते होंगे? यदि पैसा ही कमाना था तो दलाल या ठेकेदार बन जाते।


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