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भारी भरकम पत्रिका ‘अन्वेषा’ की हर रचना हाथ पकड़ लेती है!

हरे प्रकाश उपाध्याय-

मैंने अब तक तो हिन्दी में कहीं ऐसी भारी-भरकम पत्रिका नहीं देखी, जिसे उठाने के लिए भी हाथों में कुछ क़ुव्वत चाहिए। हर ऐरा-गैरा तो इसे उठा भी नहीं सकता। ऊपर से एक-एक सामग्री इतनी कसी हुई कि हल्के में देखकर निकल नहीं सकते। हर रचना हाथ पकड़ लेती है।

चौबीस समकालीन फिलिस्तीनी कवियों की कविताएं, एक सौ सात समकालीन हिंदी कवियों की कविताएं, सत्तावन भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाओं के कवियों की कविताएं इसके अलावा बाहर चलें तो एशिया, तुर्की, अफगानिस्तान, ईरान, अरब, लातिन अमेरिका, कैरेबियन देशों, अफ्रीका, रूस, पूर्वी यूरोप, पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, कनाडा के न जाने कितने प्रमुख कवियों की कविताएं, साहित्य सैद्धांतिकी, कथा साहित्य, व्यंग्य और पुस्तक समीक्षाएं, क्या नहीं है।

पूरा महासागर ही समझिए। ऊपर से संपादक का तेजाबी संपादकीय तो है ही। इसकी समीक्षा भी लिखना चाहें तो पहले तो साल भर धैर्य के साथ पढ़िए। खटाखट खटाखट दौर-दौरा वाले तो दूर ही रहें। सचमुच हिंदी में यह अपनी तरह का अत्यंत मूल्यवान और ऐतिहासिक काम है। संग्रहणीय व पठनीय।

संपादक हैं तेजस्वी कवि कविता कृष्णपल्लवी जी

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