
अदालत के फैसले से सन्नाटे के बीच इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, भाजपा की तीसरी (महिला) नेता ने व्यवस्था से अपनी शिकायत का सार्वजनिक प्रदर्शन किया है
संजय कुमार सिंह
आज लीड के लायक कई खबरें हैं जो मेरे ज्यादातर अखबारों में लीड नहीं हैं। फिलहाल तो देश में जो व्यवस्था बनी है और डबल इंजन वाले राज्यों में नागरिकों का जो हाल है उसकी बात करता हूं। शिवराज सिंह चौहान, भोपाल के सांसद आलोक शर्मा के बारे में आप पढ़ चुके हैं। अब भाजपा की तीसरी नेता (महिला हैं) ने व्यवस्था की शिकायत सार्वजनिक रूप से की है। इससे पता चलता है कि भाजपा राज में जो व्यवस्था (बनी) है उससे शिकायत तो भाजपा के बड़े नेताओं को भी है और अगर आप उम्मीद करते हैं कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिये कि शिकायत करने पर कार्रवाई हो तो ऐसी उम्मीद भाजपा के इन नेताओं को भी नहीं रही होगी तभी सार्वजनिक शिकायत की या कार्रवाई की गई है। शिवराज सिंह चौहान को एयर इंडिया की फ्लाइट में टूटी सीट मिली तो उन्होंने सार्वजनिक शिकायत की। एक फेसबुक पोस्ट के अनुसार भोपाल के सांसद आलोक शर्मा को सीहोर स्टेशन पर गंदगी दिखी तो उन्होंने खुद सफाई कर दी। इसके जरिये कर्मचारियों और आम जनता को स्वच्छता रखने का संदेश दिया। सिद्धांत रूप में यह ठीक हो सकता है लेकिन व्यवस्था ठीक नहीं होने का संकेत भी देता है। और खुद साफ करने का तो मतलब ही है कि उन्हें व्यवस्था से कोई उम्मीद नहीं है। व्यवस्था यह होनी चाहिये थी कि स्टेशन मास्टर या संबंधित अधिकारी को कोई बताता कि सांसद जी को स्टेशन परिसर के फलां कोने में पुल के नीचे या अंतिम वाले खंभे के पास पान की पीक दिखी है, उसे साफ करवाने के लिए कहा है तो न सिर्फ सफाई होती वहां सीसीटीवी भी लग जाता कि आगे भी वहां कोई गंदगी नहीं कर पाये। भारत अभी आस्था की डुबकी लगा कर सुस्ता रहा है तो यह सब अभी दूर है लेकिन मामूली सफाई की भी उम्मीद न हो तो सांसद को स्वयं सफाई करनी पड़ेगी।
आज तीसरा मामला महाराष्ट्र का है जो इंडियन एक्सप्रेस के साथ दि एशियन एज और अमर उजाला में भी प्रमुखता से है। खबर के अनुसार, एक भाजपा नेता (केंद्र में राज्य मंत्री) की बेटी के साथ महाराष्ट्र के जलगांव में छेड़छाड़ की घटना हुई है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार मंत्री ने कहा है, कल्पना कीजिये आम लोग किन स्थितियों से गुजरते हैं। हालांकि, इस मामले में खबर है कि एफआईआर हो गई है। एक को गिरफ्तार कर लिया गया है और सात के खिलाफ पॉक्सो तथा आईटी ऐक्ट में मामला दर्ज किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि आम आदमी के लिए कार्रवाई तो दूर, एफआईआर करवाना भी टेढ़ी खीर है और अपराधी नेताओं के बेटे हों तो मुलायम सिंह का यह बहुप्रचारित कथन कौन नहीं जानता कि लड़के हैं, गलती हो जाती हैं। पर मुद्दा यह है कि कार्रवाई नहीं होती है और पीड़िता मंत्री की बेटी हो तभी कार्रवाई होगी तो जो समाज बनेगा वह कैसा होगा। जहां तक समाज की बात है, गलती करने वाले लड़के (और लड़कियां भी) मौसी-बुआ से भी शादी करने की जिद्द करते हैं। छेड़छाड़ का तो हिसाब ही नहीं है। पितृसत्ता वाले समाज में तो वह मुद्दा भी नहीं है। लेकिन बुलडोजर न्याय दूसरों के लिए ठीक माना जायेगा तो एक न एक दिन आप पर भी लागू होगा। आप बलात्कारियों से सहानुभूति रखेंगे जेल से छूटने पर उन्हें माला पहनाएंगे और मिठाई खिलायेंगे तो समाज कैसा बनेगा। पॉक्सो ऐक्ट जिनपर लगा है वो भी किसी के बेटे हैं और पहले ही सही शिक्षा दी जाती तो इस स्थिति को भी झेलने की नौबत नहीं आती। दिलचस्प यह है कि ऐसे मामलों में वह कुछ नहीं बोलता जो सबका नेता है, बहुतों का आदर्श है। पर आदर्श की बातें कभी नहीं। डिग्री नहीं दिखायेंगे पर ज्ञान जबरन फैलायेंगे। खबर यह भी है कि आरोपी दूसरे दल के नेता के बेटे हैं और मंत्री ने कहा है कि वे केंद्रीय मंत्री के रूप में नहीं, मां के रूप में शिकायत दर्ज करवाने आई हैं।
राजनीति में शामिल लोगों, उनके बच्चों और समाज की दशा बताने वाली इस खबर के बाद आप को बताऊं कि आज की कुछ प्रमुख खबरों में एक का शीर्षक है, एपिक (ईपीआईसी – इलेक्टर्स फोटो आईडेंटिफिकेशन कार्ड) नंबर एक होने का मंतलब यह नहीं है कि वोटर फर्जी है। यह शीर्षक स्टेट्समैन की लीड का है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह चुनाव आयोग की दलील है और इसी से संबंधित दूसरा शीर्षक ईडी की लीड का है। इसके अनुसार, चुनाव आयोग भिन्न राज्यों में एक नंबर वाले वोटर आईडी कार्ड खत्म करेगा। यह द हिन्दू की लीड का शीर्षक है। मुझे लगता है कि खबर यह नहीं है कि चुनाव आयोग एक नंबर वाले कार्ड खत्म करेगा। खबर यह है कि (बंगाल में हरियाणा के नंबर वाले) कार्ड पकड़े गये हैं। सोशल मीडिया पर हंगामा है। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के राज्य महासचिव, आईटी और सोशल मीडिया शाखा निलंजन दास ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा है, … हम बंगाली स्मार्ट लोग हैं तथा मतदाता सूची में महाराष्ट्र और दिल्ली जैसी छेड़-छाड़ नहीं होने देंगे। एक नंबर के दो कार्ड और कइयों का विवरण सार्वजनिक होना और कुछ हो न हो, इसका पकड़ा जाना चुनाव आयोग की अक्षमता और अयोग्यता का खुलासा होना तो है ही। फिर भी आज इस खबर को बचाकर छापा गया है। खबर तो यही है कि एक नंबर के दो कार्ड पकड़े गये तो चुनाव आयोग ने कहा कि इन्हें हटाया जायेगा। कुल मिलाकर, बंगाल के वोटर्स को नया एपिक नंबर दे दिया जायेगा। हो सकता है इससे वोट की संभावित लूट रुक जाये या न भी रुके पर गलती तो गलती है और एक नंबर के दो मतदाता या कार्ड होने का मतलब है, नंबर बेमतलब होना। क्या ऐसा हो सकता है? अगर नंबर बेमतलब हैं तो दिये भी क्यों जाते रहे हैं और अब क्यों कहा जा रहा है कि एक नंबर वाले दूसरे कार्ड हटाये जायेंगें। अगर नंबर बेमतलब है तो नंबर ही क्यों नहीं हटाये जा रहे हैं?
स्पष्ट है कि मामला उतना सीधा नहीं है जितना बनाने या बताने की कोशिश की जा रही है। इसीलिए यह खबर आज मेरे किसी और अखबार में लीड नहीं है। आप जानते हैं कि मोदी राज में चुनाव आयुक्तों को भी परेशान किया गया है। इस्तीफे हुए हैं और फटाफट स्वीकार भी कर लिये गये हैं। नियुक्ति में मनमानी और सुप्रीम कोर्ट में लंबित शिकायत की कहानी भी पुरानी हो चुकी है। ऐसे में चुनाव आयोग के साथ अखबारों की सहानुभूति समझी जा सकती है। प्रधानमंत्री की डिग्री के मामले में देश के सॉलिसिटर जनरल ने दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ से पैरवी की और उस डिग्री को सार्वजनिक नहीं किये जाने के लिए पैरवी की जो प्रेस कांफ्रेंस करके दिखाई और बांटी जा चुकी है। वैसे तो वह प्रेस कांफ्रेंस डिग्री के विवाद को खत्म करने के लिए की गई थी लेकिन कई कारणों से प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर देश की उत्सुकता बढ़ गई। विश्वविद्यालय मूल डिग्री की कॉपी देने के लिए तैयार नहीं है और अखबारों के लिए खबर भी पहले पन्ने लायक नहीं है। पूछा जा रहा है कि प्रधानमंत्री की डिग्री से आम लोगों को क्या मतलब। ऐसे में चुनाव आयोग को मतलब हो सकता है और होना भी चाहिये। वह लोगों की जिज्ञासा शांत कर सकता है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग को दी गई जानकारी की पुष्टि के लिए भी डिग्री की जरूरत है। जब उसकी सत्यता पर संदेह है तो चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह उसकी सत्यता की जांच और (अपने लिये) पुष्टि करे। चुनाव आयोग का काम है कि वह चुनाव लड़ने वालों से कुछ जानकारी ले, दी गई जानकारी गलत हो तो मांगने और देने का क्या मतलब? इसलिये शक होने पर कार्रवाई जरूरी है। चुनाव आयोग कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है, समझना मुश्किल नहीं है। वह तमाम मामलों में नहीं कर रहा है तो इसपर क्यों करने लगे। उधर, आरटीआई के आदेश को तो कोर्ट के आदेश से रोक लिया गया है पर चुनाव आयोग मांग ले तो? संभव है इसीलिए मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति आधी रात को करनी पड़ी हो। जो भी हो, मामला दिलचस्प होता जा रहा है। भले मुख्य धारा के अखबारों के लिए मुद्दा न हो।
आज की सबसे बड़ी खबर अमर उजाला में लीड है। होने को यह नवोदय टाइम्स में भी लीड है, लेकिन दो कॉलम में संक्षिप्त सी। शीर्षक है, पूर्व सेबी प्रमुख बुच पर दर्ज होगी एफआईआर। अमर उजाला में शीर्षक है, शेयर बाजार धोखाधड़ी में पूर्व सेबी प्रमुख माधबी बुच पर एफआईआर का आदेश। दोनों शीर्षक से पाठक पर इनके प्रभाव का अंतर समझा जा सकता है। दिलचस्प यह है कि आज यह खबर मेरे किसी अंग्रेजी अखबार में लीड या सेकेंड लीड नहीं है। आप जानते हैं कि माधवी पुरी बुच के खिलाफ न सिर्फ खुद अवैध ढंग से पैसे कमाने का मामला है बल्कि अदाणी सेठ को बचाने और उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करने की भी शिकायत है। जेपीसी के सामने पेश होने के मामले में भाजपा नेताओं के रवैये से साफ हो चुका है कि माधवी पुरी बुच ना सिर्फ सरकार की पसंदीदा हैं बल्कि अदाणी की सेवा में भी तैनात की गई हो सकती हैं और इसकी पुष्टि के लिए जरूरी है कि मामले की जांच हो पर सरकारी संरक्षण के कारण अभी तक जांच शुरू नहीं हुई है और अब अदालत ने आदेश दिया है और तब एफआईआर हुई है तो निश्चित रूप से बड़ी खबर है और इसके प्रकाशन से न सिर्फ अदालती आदेश की पुष्टि होगी बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों, संरक्षण की शिकायतों को भी दम मिलेगा। खबर को गायब करने का दूसरा कोई कारण नहीं हो सकता है। पर स्थिति यह है कि आज मैं हिन्दी अखबारों के जो भी संस्करण देख पाया उनमें से किसी में यह खबर लीड नहीं है। ये अखबार हैं – 1) नवभारत टाइम्स (लीड) मायावती ने भतीजे से सभी पद छीने (सेकेंड लीड) बेटी से छेड़छाड़, केंद्रीय मंत्री खुद पहुंचीं थाने। 2) दैनिक भास्कर (लीड) यूरोप ने ट्रम्प को दिखाया दम, जेलेंस्की के लिए खोला खजाना 3) जनसत्ता (लीड) बर्फ में दबे चारो मजदूरों के शव मिले। युद्ध विराम पर अमेरिका से बात करेंगे ब्रिटेन व फ्रांस। आज यहां एक और खबर है जो किसी दूसरे अखबार में पहले पन्ने पर नहीं मिली – एमपी के मंत्री के बिगड़े बोल, लोगों को सरकार से भीख मांगने की आदत। आप जानते हैं कि सरकार और उसके लोगों के खिलाफ कोई खबर हो तो अखबारों में उसे प्रमुखता नहीं मिलती है। आज यह खबर भी ऐसी ही है।
प्रसंगवश, टाइम्स ऑफ इंडिया में सेबी वाली खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। और ठीक-ठाक है। हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू में भी है। दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में है पर यह खबर जितनी गंभीर है वैसे हिन्दी में अमर उजाला में तो अंग्रेजी में टाइम्स ऑफ इंडिया में ही है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां जो एक्सक्लूसिव खबरें होती हैं उनके मद्देनजर कई बार रूटीन खबरें पहले पन्ने पर नहीं हो सकती हैं। दूसरी ओर, एक्सक्लूसिव खबरों का मतलब तो है ही। इंडियन एक्सप्रेस की आज की एक्सक्लूसिव खबर बोफर्स दलाली पर पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम की किताब है। इसे ऋतु सरीन ने लिखा है। अपनी किताब में चित्रा ने लिखा है (अफसोस किया है) कि पांच सौ-हजार पन्नों के स्विस दस्तावेज डब्बे (डब्बों) में दिये गये थे जो खोले ही नहीं गये। मुझे लगता है कि केजरीवाल को जब बिना सबूत जेल में रखा जा सकता है, तमाम आरोपी वाशिंग मशीन में धुल चुके हैं, माधवी बुच के खिलाफ एफआईआर कराने के अदालती आदेश पर सेबी को एतराज है तो राजीव गांधी के खिलाफ आरोपों पर कौन एतराज करेगा और जो झूठ बोले गये हैं (जा रहे हैं) उनकी ही कोई पूछ नहीं है तो कोशिश करने में क्या जाता है। हालांकि, इस खबर का फ्लैग शीर्षक अग्रणी जांचकर्ताओं के हवाले से है और इसके अनुसार अदालत में वे डिब्बे खोले गये हैं। कई बार लगता है कि अखबार भाजपा की मीडिया शाखा की तरह काम कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी को समय के साथ चलने का श्रेय दिया जाता है और वे अपने साथ ट्रोल सेना लेकर आये थे जो अभी भी दूसरे दलों के मुकाबले काफी मजबूत है। हर चुनाव के बाद भाजपा के किसी नये चुनावी तरीके क पता चलता ही है।
सेबी प्रमुख के खिलाफ खबर को कुछ लोग बिजनेस की खबर मान सकते हैं। कोलकाता के द टेलीग्राफ में स्थानीय खबर लीड है। सेबी की खबर बिजनेस वाले पन्ने पर है। दूसरे अखबारों में भी ऐसा हो सकता है लेकिन वहां जो खबरें लीड हैं या पहले पन्ने पर हैं उनके मुकाबले यह खबर मेरी राय में ज्यादा जरूरी है। खासकर उनके लिये जो सरकार के खिलाफ खबरें पहले पन्ने पर छापते ही नहीं हैं। माधबी पुरी बुच पूर्व सेबी प्रमुख भी हैं। अदालत के आदेश पर सेबी की प्रतिक्रिया भी है। उनका मामला अदाणी को संरक्षण और भ्रष्टाचार से भी जुड़ा रहा है। ऐसे में खबर तो महत्वपूर्ण है ही। वे भाजपा या नरेन्द्र मोदी की प्रिय रही हैं। दोनों स्थितियों में यह खबर आज की दूसरी खबरों के मद्देनजर पहले पन्ने पर होनी चाहिये थी। होने को तो भारत अमेरिका व्यापार चर्चा के लिए पीयूष गोयल के अमेरिका जाने की खबर कल पहले पन्ने पर थी ही। मैंने कल यहां लिखा था, द हिन्दू ने पहले पन्ने पर दो कॉलम की एक खबर से बताया है कि केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर चर्चा करने अमेरिका जा रहे हैं। आज इसका फॉलो अप इसी समूह के बिजनेस अखबार, द हिन्दू बिजनेस लाइन में लीड है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, “भारत अमेरिका व्यापार वार्ता : गोयल फिलहाल ‘जैसे को तैसा‘ धमकी (देने से) बच सकते हैं”। इससे लगता है कि किसी खबर को पहले पन्ने पर रखने के लिए समूह की ताकत की आवश्यकता होती है। संपादकों की ताकत समझनी हो तो आज ही दो शीर्षक हैं, 1) ‘अमर उजाला’ चेयरमैन राजुल माहेश्वरी की बेटी के वेडिंग रिसेप्शन में पहुंचे उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक! और 2) ‘हिंदुस्तान’ के प्रधान संपादक शशि शेखर के पुत्र की शादी में पहुंचे अमित शाह, राजनाथ सिंह, ब्रजेश पाठक!
मोटा मोटी, आज के अखबारों के पहले पन्ने के लिए दो खबरें जरूरी थीं। एक नंबर के दो मतदाता होने की खबर के साथ चुनाव आयोग का जवाब और आश्वासन तथा दूसरी प्रमुख खबर थी, पूर्व सेबी प्रमुख के खिलाफ एफआईआर का आदेश। लेकिन चुनाव आयोग की खबर जैसे छपी है उसमें उसकी धार कम हो गई है और सेबी प्रमुख की खबर ज्यादातर अखबारों में (पहले पन्ने पर) है ही नहीं। संभव है, अखबारों का मकसद आपको अंतरराष्ट्रीय पाठक बनाना हो या वे चाहते हों कि आप विदेशी खबरों में दिलचस्पी लें। भारतीय खबरों में ध्यान न दें। जो भी हो, जो है वह स्थिति आज पूरी तरह स्पष्ट है। भले अखबारों के संपादकों मालिकों की स्थिति बताने वाली खबर भड़ास4मीडिया की है।


