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आज के अखबार : अकेले इंडियन एक्सप्रेस की देसी लीड और अमेरिकी टैरिफ की खबर का सबका अलग अंदाज

दक्षिण भारत में सीटें कम करने की कोशिश के विरोध की खबर के अलावा आज सोने की तस्करी का एक नया मामला छपा है। इससे मुझे 2020 का एक मामला याद आया। पढ़िये और समझिये कि सरकारी एजेंसियां कितनी कुशल और ईमानदार हैं।

संजय कुमार सिंह

आज जब मेरे आठ में से सात अखबारों की लीड अमेरिकी टैरिफ पर है तो उनका शीर्षक देखना दिलचस्प है। उसपर आने से पहले बता दूं कि अकेले इंडियन एक्सप्रेस की लीड देसी जरूरी खबर है। इसका संबंध देश की राजनीति, समाज और हालात से है। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है, द हिन्दू में पहले पन्ने पर दो कॉलम में है, अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन नवोदय टाइम्स में दो कॉलम में है। शीर्षक है, परिसीमन के लिए 1971 की जनगणना को ही आधार बनाया जाये : स्टालिन। इन दो खबरों में चंडीगढ़ के अंग्रेजी दैनिक द ट्रिब्यून की लीड दिल्ली के कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू में यह खबर फोटो के साथ पांच कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, उन (किसानों) की चंडीगढ़ मार्च नाकाम, पंजाब के किसान संगठनों ने मान सरकार के दमन की निन्दा की। द ट्रिब्यून का शीर्षक है, पुलिस ने किसानों के चंडीगढ़ मार्च को नाकाम किया; (जोगिन्दर सिंह) उगराहां (2002 में स्थापित भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के अध्यक्ष) अन्य हिरासत में लिये गये। आज की इन और ऐसी खबरों के बीच टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड संयुक्त अरब अमीरात में दो भारतीयों को हत्या के आरोप में फांसी दिये जाने की खबर है।

पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड का शीर्षक है, टॉप की खबर है, चीन ने रखा खर्च बढ़ाया, संकेत दिया कि वह ट्रम्प के टैरिफ से निपटने के लिए तैयार है। अधपन्ने की सबसे बड़ी खबर उत्तराखंड में वनीकरण के पैसों से आईफोन खरीदने की सीएजी की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल है। दिल्ली में पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी ने दिल्ली विधानसभा में सीएजी की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान कहा था, उन्हें खुशी है कि भाजपा के लोग सीएजी की रिपोर्ट पर बात कर रहे हैं वरना भापा ने तो सीएजी की रिपोर्ट का अपने हित में ही उपयोग किया है और जबसे केंद्र की सत्ता में केंद्र सरकार या किसी भी समर्थक राज्य सरकार से संबंधित सीएजी की रिपोर्ट की चर्चा नहीं हुई है उल्टे अनियमितता का पता लगाने वालों का तबदला कर दिया गया था। दि एशियन एज की सेकेंड लीड प्रधानमंत्री का यह दावा है कि वह दिन दूर नहीं है जब भारत की अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन डॉलर की हो जायेगी। टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड की खासियत यह है कि इसके साथ विदेश मंत्रालय का कहा भी छपा है, उन्हें कानून और दूतावास की पूरी सहायता दी गई। यह (शायद) इसलिए कि कल-परसों ही ऐसी एक और खबर थी, अबू धाबी में बांदा की शहजादी को दे दी गई फांसी, दुबई में ही होगा अंतिम संस्कार।

दि एशियन एज की सेकेंड लीड की विशेषता खबर का उपशीर्षक है। इसके अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा है कि विकास को गति देने के लिए रोजगर के मौके बनाये जायें। आप जानते हैं कि सत्ता में आने से पहले नरेन्द्र मोदी ने हर साल एक करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया था और बाद में पकौड़े बेचने को भी रोजगार कह दिया था। सत्ता में रहकर उनने और उनकी सरकार ने जो काम किये उससे नौकरियां घटती चली गईं जबकि रोजागर बढ़ाने के लिए कुछ कामयाब नहीं कर पाये। नोटबंदी जैसी कार्रवाई जिस उद्देश्य से की वह पूरी नहीं हुई, नुकसान हुआ पर फायदा कोई नहीं। यहां तक की डबल इंजन की सरकारें भी सरकारी नौकरियों के खाली पद नहीं भर पाईं। पूरा मामला लंबी कहानी है लेकिन इस दावे या घोषणा में अब ऐसा कुछ नहीं है कि इसे दोहराया जाये और अगर दोहराया जाये तो इसे प्रचार दिया जाये। हालांकि, खबर छापना प्रचार ही नहीं है। खासकर तब जब सबको पता है कि नरेन्द्र मोदी ने 2024 तक पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने की बात की थी तो पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने कहा था इसमें कोई जादू नहीं है। उन्होंने कहा था कि इसके साथ मैं एक और वादा करता हूं, उस तारीख से पांच साल बाद 2028-29 में अर्थव्यवस्था 10 ट्रिलियन डॉलर की हो जायेगी। और उससे पांच साल बाद 20 ट्रिलियन डॉलर की हो जायेगी। इसमें कोई जादू नहीं है। पैसे कर्ज पर देने वाला कोई भी सूदखोर इसे जानता है (मजबूर लोगों से बहुत ज्यादा लेता है पर वह अलग मुद्दा है)। तथ्य यह है कि जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का विकास 12 प्रतिशत प्रति वर्ष हो तो अर्थव्यवस्था छह साल में दूनी हो जायेगी। पहले बैंकों में पैसा पांच साल में दूना हो जाता था।

नरेन्द्र मोदी के शासन में यह सामान्य विकास भी नहीं हुआ है और 2024 में अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन की नहीं हुई। चिदंबरम ने जून 2022 में ही कहा था कि 2026 तक इसकी उम्मीद है। उसी समय इकनोमिक टाइम्स ने खबर छापी थी कि 2024-25 में पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था आस-पास कहीं भी नहीं हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरण ने जब आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) की भविष्यवाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि 2026-27 तक भारत पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य पार कर लेगा तो चिदंबरम ने कहा था कि यह गोलपोस्ट बदलने का मामला लगता है। यही नहीं, नरेन्द्र मोदी के 10 साल के शासन में विकास दर 5.9 प्रतिशत रही है और यह यूपीए सरकार के 6.7 प्रतिशत के मुकाबले काफी कम है। 25 फरवरी 2024 की एक खबर के अनुसार, मान लीजिए कि भारत की अर्थव्यवस्था 2028-29 में (या पहले) पांच ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुंच जाएगी, तो क्या भारत को एक विकसित देश कहा जा सकता है? 2028-29 में 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर और (करीब) 1.5 बिलियन (अरब) की आबादी पर, प्रति व्यक्ति आय 3333 अमेरिकी डॉलर होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि कुल मिलाकर, मामला प्रति व्यक्ति आय का है न कि देश की कुल अर्थव्यवस्था का क्योंकि आबादी ज्यादा है तो कुल कारोबार ज्यादा होगा ही और उसमें भी समस्या यह है कि गरीब-गरीब हो रहे हैं और अमीर अमीर। सरकार मुद्दे को छोड़कर इधर-उधर की बात करती है। सरकार के  इस पहले लोकलुभावन नारे का तर्कसंगत ढंग से विरोध करने वाले पी चिदंबरम को इस सरकार ने 2019 में ही जेल भेजा था। चिदंबरम और उनकी पत्नी खुद वरिष्ठ अधिवक्ता हैं फिर भी 100 दिन तक जमानत नहीं मिली थी। जज के लोया होने और अधिवक्ता दंपत्ति के चिदंबरम होने के देश में मामले का क्या हुआ पता नहीं है। 

इसीलिए आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड महत्वपूर्ण है। मुख्य शीर्षक है, तमिलनाडु के दलों ने परिसीमन का विरोध किया :30 अन्य वर्षों तक 1971 की जनगणना को आधार माना जाये। दरअसल तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी और इसमें छह बिन्दु वाला प्रस्ताव पास हुआ है। उपशीर्षक है, दक्षिण के अन्य राज्यों के साथ संयुक्त कार्रवाई समिति की अपील। चुनाव करीब हैं, स्टालिन ने भाजपा विरोधी आवाज के रूप में मोर्चा संभाला है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके और मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ज़ोर शोर से ये मुद्दा उठाकर आशंका जता रहे हैं कि 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में दक्षिण भारत के राज्यों के साथ अन्याय हो सकता है। संसद में दक्षिण भारत की सीटें कम हो सकती हैं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बढ़ जायेंगी। इसका सीधा असर संसद में इन राज्यों की राजनीतिक ताकत पर पड़ेगा। स्टालिन ने कहा है और यह आमतौर पर सही लगता है कि परिसीमन हुआ तो दक्षिण भारत के राज्यों को अपनी प्रगतिशील नीतियों के बदले पुरस्कार मिलने के बजाय नुक़सान होगा। उनका दावा सही लगता है कि इन प्रगतिशील नीतियों के कारण दक्षिण भारत के राज्य जनसंख्या वृद्धि दर पर काबू पाने में कामयाब रहे हैं। इसलिए, स्टालिन ने परिसीमन को अन्यायपूर्ण कहा है और लोगों से अपील की है कि वो इसके खिलाफ खड़े हों क्योंकि ये राज्य के हितों को बचाने की लड़ाई है। यही नहीं वो तो राज्य का हित बचाने के लिए तमिलनाडु के लोगों से अपील कर रहे हैं कि वो और बच्चे पैदा करें। मुझे लगता है कि यह देश की राजनीति और उसे भाजपा से बचाने के लिए जरूरी है। इसीलिए यहां के अखबारों में इसकी चर्चा नहीं है।

यह तथ्य है कि दक्षिण के राज्यों में शिक्षा का असर हुआ है, लोग जाति-धर्म के आधार पर वोट नहीं देते हैं, बच्चे कम पैदा करते हैं और हांके नहीं जा सकते हैं। आबादी का घनत्व कम है। यही विकास है या विकास के कारण है। अब राजनीति यह हो सकती है कि जनसख्या के आधार पर परिसीमन हो तो दक्षिण भारत में सीटें कम हो जायेंगी और सिर्फ हिन्दी पट्टी या उत्तर भारत में लोकप्रिय पार्टी केंद्र में सत्ता पाकर दक्षिण भारत पर राज कर सकेगी। यह सही हो या गलत, अभी तक की अच्छी व्यवस्था या अच्छे शासन और विकास का असर होगा कि वहां डबल इंजन की सरकार होने की संभावना कम हो जायेगी और दिल्ली समेत गैर भाजपा शासित राज्यों में जो हुआ, हो रहा है वह दक्षिण भारत में भी होगा और केंद्र की सत्ता से भाजपा को हराना मुश्किल होगा। दूसरे शब्दों में धर्म की राजनीति का असर दक्षिण भारत पर भी पड़ेगा। बेशक यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और उत्तर भारत में भी चर्चा का विषय होना चाहिये। पर आज अखबारों ने जिस ढंग से पहला पन्ना बनाया है उससे नहीं लगता है कि यह मुद्दा है। खासकर हिन्दी अखबारों के लिए। दक्षिण (या गैर हिन्दीभाषी राज्य) की खबर है इसलिए पहले पन्ने पर नहीं रखने का मतलब नहीं है। आज हिन्दी के अखबारों का जो संस्करण मैं देख पाया उनमें से हिन्दुस्तान में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि सेकेंड लीड का शीर्षक है, केदारनाथ और हेमकुंड के लिए रोपवे का निर्माण होगा। दैनिक जागरण में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। हालांकि टॉप पर सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, स्टालिन की बेतुकी मांग, दफ्तरों से हिन्दी हटाये केंद्र सरकार। यहां सेकेंड लीड है, सीबीआई ने बोफोर्स मामले में निजी अमेरिकी जांचकर्ता से मांगी जानकरी। नवभारत टाइम्स में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां केदारनाथ और हेमकुंट साहिब में रोपवे बनने की खबर टॉप पर छह कॉलम में  है। ट्रम्प का झटका लीड है और सेकेंड लीड सुप्रीम कोर्ट की ‘आपत्ति’ है। इसका शीर्षक है, बिल्डर और बैंक के गठजोड़ में घर खरीदकर बंधक। 

आइये अब आज के अखबारों की लीड के शीर्षक देख लें

1.इंडियन एक्सप्रेस (सेकेंड लीड) – भारत और अन्य द्वारा उच्च टैरिफ अनुचित, जवाबी टैरिफ 2 अप्रैल से

2. टाइम्स ऑफ इंडिया – ट्रम्प ने भारत का फिर नाम लिया, अमेरिकी संसद से कहा जवाबी टैरिफ 2 अप्रैल से

3. हिन्दुस्तान टाइम्स – ट्रम्प के टैरिफ 2 अप्रैल से, पर भारत अलग डील पर काम कर रहा है।

4. द हिन्दू – अमेरिका 2 अप्रैल से जवाबी शुल्क (टैरिफ) लागू करेगा : ट्रम्प।

5. द टेलीग्राफ – व्यापार तनाव कम करने की भारत की कोशिश के साथ जैसे को तैसा कार्रवाई की टक्कर (फ्लैग शीर्षक है) ट्रम्प के टैरिफ से अप्रैल में सामना।

6. दि एशियन एज – ट्रम्प ने भारत पर ‘100% लेवी’ का आरोप लगाया, 2 अप्रैल से ‘जवाबी टैरिफ’ लागू होगा। दो बुलेट प्वाइंट फ्लैग शीर्षक हैं (i) वे हमपर जितना टैक्स लगायें, हम उनसे भी वसूलेंगे (ii) चीन, दक्षिण कोरिया, ईयू को भी निशाना बनाया गया।   

7. नवोदय टाइम्स – 2 अप्रैल से भारत पर कठोर टैरिफ : ट्रम्प

8. अमर उजाला – भारत पर 2 अप्रैल से सौ फीसदी तक जवाबी शुल्क लगायेगा अमेरिका : ट्रंप।

9. नवभारत टाइम्स – ट्रम्प का झटका, 2 अप्रैल से भारत पर टैरिफ का ऐलान

10.हिन्दुस्तान – ट्रंप ने भारत पर सौ फीसदी टैरिफ थोपा

11. दैनिक जागरण – दो अप्रैल से भारत पर भी लगाएंगे पारस्परिक शुल्क : ट्रम्प।  

कैसे होती रहती है तस्करी 

आज के अखबारों में एक और खबर है जिसकी चर्चा जरूरी है। अंग्रेजी के मेरे अखबारों में इसे वह प्रमुखता नहीं मिली है जो हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों के साथ नवभारत टाइम्स ने दी है। मेरे दोनों अखबारों में इस खबर का शीर्षक सामान्य है हालांकि अमर उजाला ने उपशीर्षक में कुछ खास बातें बताईं हैं और एक साल में 30 बार गई दुबई जैसी खबरों से इसके खास मामलों को हाईलाइट किया है पर नभाटा का शीर्षक बताता है कि यह अपराध या तस्करी की सामान्य खबर नहीं है। बार-बार दुबई के चक्कर, एक ही कपड़े, डीजीपी की ऐक्ट्रेस बेटी, सोने की तस्करी में गिरफ्तार। रान्या कन्नड फिल्मों की अभिनेत्री है और    सीनियर आईपीएस अधिकारी की बेटी है। हालांकि उन्होंने कहा है कि उसकी शादी हो गई है और वह उनके साथ नहीं रहती है। नभाटा ने बताया है कि वह पिता के पद का फायदा उठाती थी, प्रोटोकल अफसर रिसीव करता था और सरकारी गाड़ी में बैठाकर जांच से बचाया जाता था। अमर उजाला ने सूत्रों के हवाले से उसका यह दावा सार्वजनिक किया है कि उसे ब्लैकमेल कर फंसाया गया और तस्करी के लिए मजबूर किया गया। इन तीन खबरों से यह साफ है कि रान्या एक साल में 30 बार दुबई गई थी। यानी हर 12-15 दिन पर। एक साल से यह चक्कर चल रहा था तो किसी को शक क्यों नहीं हुआ और वह पकड़ी क्यों नहीं गई। इसलिए ब्लैकमेल किये जाने के आरोप में दम लगता है लेकिन आईपीएस की बेटी को ब्लैकमेल करना आसान नहीं है। संभव है मामला मिलीभगत का हो और कुछ बड़े लोग तस्करी करवाते और कमाते हों। यह गिरफ्तारी डीआरआई ने की है और कर्नाटक का मामला है जहां विपक्ष की सरकार है। यह सामान्य नहीं है कि राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) को इसका पता लगने में एक साल लगे। महीने में तीन बार दुबई जाने वाले पर तो वैसे भी नजर रखी जानी चाहिये थी और नहीं रखी गई, कोई एक साल तक अवैध धंधा कर पाया तो काहे का खुफिया निदेशालय? सोने की तस्करी का एक मामला 2020 में केरल में भी पकड़ा गया था। इस संबंध में द हिन्दू में 20 नवंबर 2020 को प्रकाशित खबर के बाद फेसबुक पर, “सोने की तस्करी, प्रचारकों की नालायकी और सुर्खियां” शीर्षक से मैंने जो लिखा था उसका अंश यह रहा :  “द हिन्दू में आज इस मामले में यह खुलासा है कि एक टेलीफोन वार्ता के लीक हुए ऑडियो पर हंगामा चल रहा है। इससे लगता है कि केंद्र सरकार की एजेंसी, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) कोशिश कर रही है कि अभियुक्त ऐसा बयान दे जिससे केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन को फंसाया जा सके। यह रिकार्डिंग बुधवार को सामने आई है। हालांकि, इसमें भाजपा की तरफ से केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री ने मुख्यमंत्री कार्यालय पर आरोप लगाया है। ऐसा ही आरोप केरल प्रदेश कांग्रेस का भी है। लीक हुए वीडियो के अनुसार मुख्य अभियुक्त और शुरू में ही गिरफ्तार स्वप्ना को चारा डाला जा रहा है कि वह सरकारी गवाह बन जाए (और इस तरह छूट जाए) पर यह छूटना सशर्त है कि वह मुख्यमंत्री और उनके पूर्व प्रमुख सचिव एम शिवशंकर (जिन्हें पहले ही पद से हटा दिया गया था) पर आरोप लगाए। इस बातचीत से यह भी लगता है कि ईडी ने सपना के बयान से छेड़छाड़ की है। इससे पहले पूर्व प्रमुख सचिव कह चुके हैं कि विजयन को फंसाने के आदेश को नहीं मानने के कारण ही ईडी ने उन्हें गिरफ्तार किया है। कुल मिलाकर, इस रिकार्डिंग से वामपंथी सरकार को अस्थिर करने के उसके आरोपों को दम मिलता है। मुख्य लक्ष्य चाहे जितनी दूर हो, बदनाम करने का काम जारी है। मामला यह था कि तिरुअनंतपुरम में तैनात संयुक्त अरब के एक राजनयिक के नाम आए एक सामान को शक होने पर रोका गया तो उसमें अवैध सोना निकला। मामले की जांच चल रही थी। द टेलीग्राफ में 17 जुलाई को छपी खबर के अनुसार, केरल सरकार ने इस मामले में आईएसएस अधिकारी एम शिवशंकर को निलंबित कर दिया है। शिवशंकर मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव थे पर इस मामले में नाम आने के बाद उन्हें सचिव पद से हटा दिया गया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जांच का काम एनआईए को सौंप दिया और इस बीच यह ‘सामान’ संयुक्त अरब अमीरात के जिस राजनयिक के लिए था, वह चुप-चाप भारत से निकल गया। इसका पता तब चला जब पत्रकार उसके घर गए।” अब आप सोचिए कि एजेंसियां अपने काम में कितनी कुशल हैं और कितनी ईमानदारी से काम कर रही हैं।  

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