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आज के अखबारों में अंधे सिस्टम से लड़ाई और ‘इमरजेंसी जैसी’ कार्रवाई पर छोटी सी खबर

संजय कुमार सिंह

छपने के बाद आपत्तिजनक करार दिये गये एक कार्टून के लिए पूरी पत्रिका को प्रतिबंधित कर दिये जाने के मामले में हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश दिया है कि कार्टून को अस्थायी तौर पर हटा लेने के बाद केंद्र सरकार आनंद विकटन के साइट को अनब्लॉक करे। 16 फरवरी के अंक के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय का यह आदेश 25 फरवरी का है और हाईकोर्ट का अंतरिम फैसला कल आया। आप समझ सकते हैं कि अंतिम फैसला होने तक पत्रिका या संबंधित कार्टून का कोई मतलब रह जायेगा और यह स्थिति इमरजेंसी और उस समय के सेंसर से बुरी हो या नहीं खबर तो बड़ी है। खासकर इसलिये कि इमरजेंसी का विरोध करने वाली सरकार के इस कार्यकाल को अघोषित इमरजेंसी कहा जाता है और इसमें सरकारी मनमानी पर हाईकोर्ट के फैसले को वह महत्व नहीं मिला है जो इमरजेंसी के मुकाबले अघोषित इमरजेंसी में मिलना चाहिये था। कहने की जरूरत नहीं है कि कार्टून जैसी चीज पर विवाद हो जाये तो उसकी चर्चा ज्यादा होती है, उसका प्रकाशन ज्यादा होता है। यह कार्टून है भी वैसा ही और इसपर एतराज का मायने नहीं है। अमेरिका ने जिस तरह भारतीयों को बेड़ियों में जकड़ कर वापस भेजा यह उसी का प्रतीक है। अपने इस दावे के समर्थन में मुझे यहां कार्टून भी देना पड़ेगा इसलिए मैं यहां उसकी चर्चा छोड़ रहा हूं। इमरजेंसी विरोधी सरकार के शासन में जो होता रहा है उसमें सरकार ऐसे जोखिम लेती रही है। पर मैं नहीं ले रहा और किसी अन्य अखबार ने भी नहीं लिया है। मेरे लिये यही खबर है कि आज भी किसी अखबार ने खबर के साथ कार्टून नहीं छापा है जबकि रिवाज है, मौका था और दस्तूर भी है। यही अमृतकाल और अच्छे दिन हैं।

वैसे भी कार्टून आपत्तिजनक था या नहीं, पूरी पत्रिका अकारण नहीं रोकी जानी थी और शिकायत, चेतावनी या विरोध के साथ इसे देखने देने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये थी। सैकड़ों लोग झेल चुके थे, देख लेते तो आसमान नहीं गिर जाता है। वैसे भी यह कार्टून खबर के रूप में कई जगह है। आसानी से देखा और शेयर किया जा सकता है। ऐसे में पूरी पत्रिका ब्लॉक की गई तो अदालत का यह आदेश न्यूनतम है और उसमें इतना समय लग गया। सामान्य स्थिति में अदालत की ऐसी कार्रवाई या इतना समय लगना भले खबर न हो इमरजेंसी का विरोध करने वाली सरकार, पार्टी और संगठन के शासन में इमरजेंसी जैसी कार्रवाई और उसपर अदालत का यह फैसला खबर तो है ही। इस खबर को आज कई अखबारों ने सिंगल कॉलम में निपटा दिया है या फिर पहले पन्ने पर वह भी नहीं है। कार्टून तो नहीं ही है। हिन्दू ने इसे पहले पन्ने पर दो कॉलम में टॉप पर छापा है। यह दिलचस्प है कि एक तरफ तो बेड़ियों में जकड़े मोदी को ट्रम्प के साथ दिखाने पर सरकार और उसके समर्थकों को परेशानी है तो दूसरी ओर भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़े जाने पर एतराज का पता नहीं है। सरकार समर्थकों ने तो इसे नजरअंदाज किया ही है। आज विदेश मंत्री जयशंकर का कहा छपा है कि ट्रम्प की कई प्राथमिकतायें भारत के हित में हैं। अकले हिन्दू ने आज इसे लीड बनाया है।

आज की दूसरी खबरें कुछ कहने लायक नहीं हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में शिवम श्रीवास्तव की एक खबर जरूर उल्लेखनीय है। मुझे याद आया कि प्रधानमंत्री ने विकलांगों को दिव्यांग कहा था और यह तब की बात है जब अंधों को नेत्रहीन या दृष्टिहीन कहा जाता था। इसकी जगह दिव्यांग कहने से आपको जो उम्मीद बनी हो उसका सच यह है कि शिवम श्रीवास्तव नेत्रहीन होने के बावजूद खुद को पूर्ण दृष्टि वालों से ज्यादा सक्षम मानते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज एक अंधे सिस्टम से उनकी लड़ाई और जीत की कहानी छापी है। यह लड़ाई 15 साल चली। और सरकार के चुप रहने या जवाब नहीं देने की कहानी भी है। पेश है, संदीप राय की खबर के शुरुआती अंश का हिन्दी अनुवाद, टाइम्स ऑफ इंडिया से साभार।

15 साल तक शिवम कुमार श्रीवास्तव ने न सिर्फ़ नौकरी के लिए, बल्कि खुद को देखे जाने के अपने अधिकार के लिए भी लड़ाई लड़ी। उन्होंने 2008 में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। चयन के लिए इसमें उनका रैंक काफ़ी ऊंचा था। लेकिन जब अंतिम सूची आई, तो उनका नाम नहीं था। कोई स्पष्टीकरण नहीं। कोई अस्वीकृति पत्र नहीं। बस चुप्पी – एक शांत, पर मिटा देने की एक ऐसी कार्रवाई जो जानबूझकर की गई थी। इस विडंबना को नज़रअंदाज़ करना असंभव था। शिवम ने अपनी दृष्टि खो दी थी, लेकिन सिस्टम उसे देखने से तैयार ही नहीं था। 1995 के एक अधिनियम दृष्टिबाधित उम्मीदवारों को सिविल सेवाओं में उचित अवसर की गारंटी है लेकिन कानून को लागू करने वाले ही मुंह घुमा लें तो कानून का कोई मतलब नहीं रह जाता है। जिस नौकरशाही से निष्पक्षता बनाए रखने की उम्मीद की जाती है उसने एक दशक से भी ज़्यादा समय तक अपने अलग तरह के अंधेपन के कारण शिवम को उसके अधिकार से वंचित रखा। यह ऐसा मामला था जिसका दृष्टि से कोई लेना-देना नहीं था। रिक्तियाँ खाली छोड़ दी गईं। कानूनी सुरक्षा को नज़रअंदाज़ किया गया। नियमानुसार हुआ चयन कागज़ातों में दब गया। न्याय में देरी सिर्फ़ न्याय से वंचित करना नहीं था – यह एक ऐसा करियर था जो शुरू होने से पहले ही नष्ट कर दिया गया था।

वे इस लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट ले गए। आखिरकार जुलाई 2024 में केंद्र सरकार को उन्हें नियुक्त करने का आदेश दिया गया। तब तक उनके बैच के साथी 15 साल नौकरी कर चुके थे। वेतन भत्ते के साथ रैंक भी बढ़ गया था। कुछ संयुक्त सचिव हो चुके थे। 46 साल के शिवम ने अभी शुरुआत की थी। दिल्ली के रोहिणी में तीसरी मंजिल के अपने अपार्टमेंट से उन्होंने कहा, “आदेश सात महीने पहले आया था, लेकिन मैंने अभी तक जश्न नहीं मनाया है। मैंने अपने रिश्तेदारों को भी नहीं बताया है।” सालों से, हर छोटी जीत के बाद एक और झटका लगा है। अब, जब भारतीय सूचना सेवा (आईआईएस) में उनका पद आखिरकार सुरक्षित हो गया है, तब भी वे सतर्क हैं। उन्होंने कहा, “यह लड़ाई कभी सिर्फ मेरे बारे में नहीं थी। मुझे  साबित करना था कि मेरे जैसे लोग इस व्यवस्था में जगह पाने के हकदार हैं – तब भी जब व्यवस्था हमें देखने से इनकार कर दे।” पता नहीं शिवम अपने लक्ष्य में कामयाब हुए हैं कि नहीं।

नवोदय टाइम्स में आज पहले पन्ने पर एक खबर है, बुलडोजर एक्शन पर यूपी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार। उपशीर्षक है, गिराए गए मकानों को दोबारा बनवाने का दिया जा सकता है आदेश। मुझे लगता है कि इस सरकार की कार्यशैली के लिहाज से अघोषित इमरजेंसी जैसी स्थिति में यह बड़ी खबर है लेकिन आज किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। विज्ञापन के कारण अमर उजाला में दो पहले पन्ने हैं। यह खबर दोनों में से किसी में नहीं है। दूसरी ओर, द हिन्दू में एक खबर है जो बताती है कि उज्जैन में इस हफ्ते के शुरू में गोहत्या के आरोप में पकड़े गया दो लोगों को गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने पीटा और उनकी परेड कराई। विश्व हिन्दू परिषद ने अधिकारियों का सम्मान किया। इसके साथ इंडियन एक्सप्रेस की खबर है, दुनिया की सबसे महंगी गाय ब्राजील में  खूब हैं पर भारत में कम हो रही हैं। खबर में एक सरकारी फार्म की चर्चा है जो पशुओं की देसी प्रजाति के संरक्षण के लिए काम करने वाले कुछ केंद्रों में से एक हैं और यहां आईवीएफ एमब्रायो ट्रांसफर टेक्नालॉजी से एक बछड़े का जन्म कराया  गया है। आज दि एशियन एज की लीड दिलचस्प है। वनतारा के बाद प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड में पूरे साल पर्यटन का प्रचार किया।     

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