
संजय कुमार सिंह
बिहार में हिन्दुत्व के प्रचारकों का दौरा बढ़ने की खबर आज सिर्फ दि एशियन एज में चार कॉलम में है लेकिन दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को हिन्दी में मेडिकल और इंजीनियरिंग की शिक्षा देने की अमित शाह की अपील अंग्रेजी अखबारों में भी प्रमुखता से है। इसमें भारत राज्यों का एक समूह है और उसकी भिन्नताओं को भूलकर कर एक जैसा बनाने की कोशिश और कथित रूप से डबल इंजन की सरकार बनाने के प्रयास पर प्रकाश नहीं डाला गया है। इस बीच ट्रम्प ने दावा किया है कि भारत टैरिफ कम करने के लिए तैयार हो गया है – यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया और नवोदय टाइम्स में लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भारी कटौती की बात की है जबकि इंडियन एक्सप्रेस की लीड बताती है कि ट्रम्प ने न सिर्फ टैरिफ कम करने के लिए सहमत होने की बात की है बल्कि ‘भारत का खुलासा’ करने का दावा भी किया है। अखबारों में इसपर भारत की प्रतिक्रिया नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि इससे पहले विदेश मंत्रालय ने कहा था कि दिल्ली एक द्विपक्षीय व्यापार करार से संबंधों को मजबूत करना चाहता है। इन खबरों के बीच यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि चीन ने भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और कहा है कि दोनों देशों को हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है। यह जानकारी अमर उजाला ने लीड के शीर्षक और उपशीर्षक के रूप में दी है। अंग्रेजी में यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। “भारत,चीन को चाहिये कि सीमा विवाद का असर संबंधों पर न पड़ने दें : वांग यी”। वांग यी ने कहा कि दोनों देशों के पास इतनी समझ और क्षमता है कि जब तक सीमा विवाद का सही हल नहीं निकलता, तब तक वे सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रख सकते हैं। इस समय इस खबर के अपने मायने हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के पास एक-दूसरे को नीचा दिखाने की बजाय सपोर्ट करने की वजहें ज्यादा हैं, इसलिए दोनों मिलकर एक-दूसरे की सफलता के लिए सहयोग दें।
तमिल में इंजीनियरिंग-मेडिकल पढ़ाने की चुनौती
द टेलीग्राफ की लीड बांग्लादेश में चुनाव और उससे संबंधित भारत की अपील की खबर है लेकिन दक्षिण भारत में परिसीमन और हिन्दी का विरोध तथा तमिल में इंजीनियरिंग व मेडिकल पढ़ाने की सलाह महत्वपूर्ण है। खासकर तब जब मध्यप्रदेश में हिन्दी में डाक्टरी पढ़ाने के लिए एक किताब के हिन्दी अनुवाद का खासा मजाक उड़ा था और उसके बाद से मामला चर्चा में नहीं है। असल में इंजीनियरिंग-मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेजी में होती रही है, किताबें, अनुसंधान प्रयोग आदि की रिपोर्ट अंग्रेजी में है तो पढ़ना-पढ़ाना आसान है। हिन्दी में पढ़ाने के लिए किताबें पहली जरूरत है और वह तो अनुवाद से हो जायेगा शिक्षक कैसे बनाये जायेंगे? हिन्दी में पढ़ाने के लिए जरूरी है कि शिक्षक ने हिन्दी में पढ़ाई की हो या अनुवाद करने में सक्षम हो। जाहिर है मेडिकल इंजीनियरिंग पढ़ने वालों के लिए अनुवाद आसान नहीं होगा खासकर तब जब हिन्दी में उनकी स्कूली शिक्षा अच्छी नहीं रही हो और वही मेडिकल इंजीनियरिंग कर पाये हों जिनकी अंग्रेजी ठीक थी। मोटे तौर पर कहने का आशय यह है कि हिन्दी में स्कूली शिक्षा अच्छी होती तो हिन्दी में पढ़ा सकने वाले शिक्षक तो होते ही किताबों का अनुवाद भी अच्छा होता। अभी जो अनुवाद है वह असल में लिप्यांतरण है तथा उससे हिन्दी में पढ़ना और मुश्किल होगा। यह सब जानी-समझी बात है और हिन्दी में स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाये बगैर हिन्दी में मेडिकल इंजीनियरिंग पढ़ने से वही होगा जो अंग्रेजी नहीं जानने वाले आईएएस और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों का होता है पर यहां वह मुद्दा नहीं है। ऐसे में स्टालिन अगर तमिल में इंजीनियरिंग-मेडिकल पढ़ाना चाहें तो हिन्दी के मुकाबले आसान होगा हालांकि वहां उन्हें इसकी जरूरत नहीं है। ऐसे में अमित शाह की सलाह का मतलब है।
हिन्दी वालों का हाल
इसीलिए आज यह खबर हिन्दी अखबारों में तो पहले पन्ने पर भी नहीं है जबकि परिसीमन के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई समिति में शामिल होने के लिए सात राज्यों को स्टालिन की चिट्ठी की खबर अंग्रेजी में हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ द हिन्दू में लीड है। द हिन्दू में स्टालिन को अमित शाह की चुनौती तीन कॉलम में अलग से है। इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, दि एशियन एज और द टेलीग्राफ में भी ये खबरें हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि अमित शाह हिन्दी के आदमी नहीं हैं और हिन्दी की राजनीति कर रहे हैं। पास विदाउट इंग्लीश वाले कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न मिल गया पर छात्रों का क्या हुआ सबको पता है और गैर हिन्दी राज्यों में छात्रों को अंग्रेजी पढ़ाकर उनका भला करने के लिए किसी मुख्यमंत्री को भारत रत्न मिला या नहीं वह अलग मुद्दा है। इसलिए संभव है कि अमित शाह को वास्तविकता का पता ही न हो। पर मैंने जनसत्ता की नौकरी समेत बहुत कुछ छोड़कर हिन्दी में काम करना चुना और स्वेच्छा से अनुवाद को अपना पेशा बनाया। अब अनुवाद कंप्यूटर से हो जाता है और हिन्दी वाले उसके संपादन की भी जरूरत नहीं समझते। तब भी नहीं जब अनुवाद के नाम पर लिप्यांतरण करके रख दिया जाता है। ऐसे में हिन्दी और हिन्दी में काम करने वालों की स्थिति यह है कि आप कुछ भी करके पैसे नहीं कमा सकते हैं। हाल में मुझसे अनुवाद का काम मांगने वाले एक युवक ने पूछा कि अनुवाद का काम नहीं है तो और क्या कर सकते हैं, मेरे दिमाग में हिन्दी में फ्रीलांसिंग के लिए ऐसा कोई काम याद नहीं आया जिसके पैसे मिलते हों। मैं ठीक-ठाक पैसे की बात कर रहा हूं पर हिन्दी में वो भी मुद्दा नहीं होता है। कुछ भी मिल जाये। पुरानी बात है, एक मित्र ने दावा किया कि उन्हें अनुवाद से अच्छे पैसे मिल जाते हैं। मैंने उन्हें बताया कि आपको पैसा अच्छा इसलिए लग रहा है कि आपको कॉलेज से नियमित वेतन भत्ता मिलता है। अब पीछे मुड़कर देखिये तो हिन्दी के ज्यादातर सफल लेखक का मूल पेशा पढ़ाना था या वे अंग्रेजी के आदमी थे हिन्दी में शौकिया काम करते थे। यह भी यहां मुद्दा नहीं है लेकिन बात चली तो भाजपा की राजनीति के समर्थकों के लिए बताना जरूरी लगा।
परिसीमन का विरोध
आप जानते हैं कि स्टालिन परिसीमन के खिलाफ हैं और दक्षिण के राज्यों को एकजुट करने के प्रयास कर रहे हैं। इसका संबंध हिन्दी थोपने और तमिल की प्रगति के लिए काम करने के दावे से भी है। उसे समझने के लिए द टेलीग्राफ की खबर पर आने से पहले बता दूं कि आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, “परिसीमन को अपनी जिम्मेदारियां निभाने वाले राज्यों के खिलाफ हथियार बना दिया गया है : स्टालिन”। दि एशियन एज में चेन्नई डेटलाइन से छपी जी बाबू जयकुमार और जी शेखर की बाईलाइन वाली खबर में स्टालिन के हवाले से कहा गया है, इसलिए हमें जनसंख्या वृद्धि में प्रभावशाली नियंत्रण और विकास के राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सजा नहीं दी जानी चाहिये। इस खबर के अनुसार शुक्रवार को सात राज्यों के 29 दलों के नेताओं को पत्र लिखते हुए श्री स्टालिन ने खेद जताया कि केंद्र ने इस मामले में न तो स्पष्टता प्रदान की है और न ही उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए कोई ठोस प्रतिबद्धता दिखाई है। उन्हें डर है कि परिसीमन का काम अगर 2026 के बाद की जनसंख्या पर आधारित होगा तो दक्षिण भारत में संसद की सीटें कम होंगी यानी उनका प्रतिनिधित्व कम होगा। इस बारे में मैंने यहां पहले भी लिखा है। स्टालिन ने जिन सात राज्यों के नेताओं को पत्र लिखा है उनमें केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश,पश्चिम बंगाल और उड़ीशा शामिल हैं।
टेलीग्राफ में जेपी यादव की खबर नई दिल्ली डेटलाइन से इस प्रकार है, “केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को तमिल में मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू करने की चुनौती दी। उन्होंने भाजपा पर “हिंदी थोपने” के डीएमके के आरोप के जवाब में यह चुनौती दी। इससे पहले, दिन में स्टालिन ने भाजपा पर हमला बोला था। उन्होंने तमिलनाडु के स्कूलों में हिंदी पढ़ाने के भाजपा के अभियान को “हास्यास्पद” बताया था और पार्टी को अगले साल विधानसभा चुनाव इसी मुद्दे पर लड़ने की चुनौती दी थी। तमिलनाडु में भाषा और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को लेकर चल रही लड़ाई अब तेज हो गई है। डीएमके का आरोप है कि दक्षिण से लोकसभा सीटें कम करने की साजिश की जा रही है। चुनाव से पहले भाजपा डीएमके के निशाने पर आने से पूरी तरह नाखुश नहीं है। उसका मानना है कि इससे उसे मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में खुद को स्थापित करने और राज्य में राजनीतिक पैठ बनाने में मदद मिलेगी। (उसके बाद हिन्दुत्व का खेल किया जा सकेगा) तमिलनाडु के थक्कोलम में सीआईएसएफ के स्थापना दिवस पर आयोजित समारोह में शाह ने स्टालिन पर कटाक्ष करते हुए कहा, “मैं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से आग्रह करना चाहता हूं कि वे जल्द से जल्द तमिल में मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू करने की दिशा में कदम उठाएं।” इससे कुछ क्षण पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले की सराहना की थी। उन्होंने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की भर्ती परीक्षाएं हिंदी (और अंग्रेजी) के अलावा 13 भारतीय भाषाओं में लिखने की अनुमति दी थी। इसके जरिये तमिल जैसी भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए केंद्र की प्रतिबद्धता को रेखांकित करने की कोशिश की जा रही है। (कहने की जरूरत नहीं है कि राज्य के स्कूली शिक्षा में अंग्रेजी है और पढ़ाई ठीक होती है तो तमिल की जरूरत ही नहीं है। पर वह अलग मुद्दा है।) शाह ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि वह (स्टालिन) जल्द ही तमिल भाषा में मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए कदम उठाएंगे। मैं पिछले दो सालों से उनसे आग्रह कर रहा हूं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है।” जाहिर है, अमित शाह की राजनीति स्टालिन को वही करने के लिए मजबूर करने की है जो वे खुद हिन्दी पट्टी में कर रहे हैं। मीडिया इसके नफा-नुकसान की बात नहीं करता है।
बिहार चुनाव से पहले
बिहार चुनाव से पहले हिन्दुत्व के दिग्गजों के बिहार में होने की खबर आज अकेले दि एशियन एज ने छापी है। नई दिल्ली डेटलाइन से योजना गुसई की इस खबर के अनुसार बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले हिंदुत्व के प्रचारकों और आध्यात्मिक गुरुओं के दौरे में हुई वृद्धि से यह संकेत मिलता है कि आगामी चुनाव में विपक्षी महागठबंधन के खिलाफ एनडीए की रणनीति क्या होगी। बिहार की राजनीतिक लड़ाई में हिंदुत्व का रंग भी होगा। सबसे पहले बागेश्वर धाम के महाराज धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पहुंचे, जो चुनाव वाले राज्य में हिंदुओं को जगाने गये हैं। फिर आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर ने युवा कौशल विकास का मुद्दा उठाया और युवाओं को कौशल प्रदान किया। इसके अलावा, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पहले से ही एनडीए शासित राज्य के पांच दिवसीय दौरे पर हैं। वैसे तो, श्री भागवत के दौरे और कार्यक्रम कई महीने पहले तय हो जाते हैं, लेकिन विपक्षी महागठबंधन धार्मिक और आध्यात्मिक नेताओं के दौरे को राज्य में भाजपानीत एनडीए की चुनावी रणनीति के हिस्से के रूप में देख रहा है। (देखना भी चाहिये। इसमें कुछ गलत नहीं है। बिहार में चुनाव कब हैं यह तो पांच साल पहले ही सबको मालूम हो गया होगा।) … सूत्रों ने बताया कि जेडी(यू) नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौजूदा गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, लेकिन एनडीए की चुनावी रणनीति भगवा रणनीतिकारों द्वारा तैयार की जाएगी। सूत्रों ने बताया कि हिंदुत्व भी चुनावी रणनीति का हिस्सा होगा, लेकिन यह मुद्दा आधारित होगा।
हिन्दुत्व की राजनीति
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, दिल्ली के कानून मंत्री और आम आदमी पार्टी से भाजपा में गये कपिल मिश्रा को अदालत से झटका लगा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उनकी रिवीजन पिटीशन को खारिज कर दिया है। मिश्रा ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें समन किया गया था। यह केस 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में कथित तौर पर आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ा है। कपिल मिश्रा की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि अपने कथित बयानों में उन्होंने नफरत फैलाने के लिए ‘पाकिस्तान’ शब्द का इस्तेमाल बहुत ही कुशलता से किया है।
ये तो हुई चुनावी खबरें। लेकिन भाजपा के 10 साल के शासन से देश में जो स्थिति बनी है उसका हाल बताने वाली कुछ खबरें भी आज छपी हैं। इनमें पहले पन्ने की खबरें हैं 1) बेल्जियम से स्थानांतरित होकर आये अवसाद से पीड़ित, इलाज करा रहे आईएफएस अधिकारी ने चौथी मंजिल से कूदकर आत्म हत्या कर ली (अमर उजाला)। 2) क्रिश्चियन मिशेल ने कहा है, दिल्ली मेरे लिए असुरक्षित है, बेल के मुकाबले जेल पसंद करूंगा। बेल के बदले सजा काटकर भारत छोड़नाचाहूंगा (टाइम्स ऑफ इंडिया)। खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम में है)। 3) अरबों के वारिस और मोदी समूह के वंशज, आर्थिक अपराधी ललित मोदी ने भारत की नागरिकता छोड़ने की इच्छा जताई है (इंडियन एक्सप्रेस)। 4) वायु सेना के दो विमान दुर्घटनाग्रस्त। एक बागडोगरा में और दूसरा अंबाला में। बागडोगरा वाला मालवाहक विमान एएन32 था। चालक दल के सदस्य सुरक्षित हैं। अंबाला में पायलट विमान को आबादी से दूर ले जाकर सुरक्षित कूद गया। (टेलीग्राफ और नवोदय टाइम्स)। 5) प्रधानमंत्री मोदी ने जनऔषधि दिवस पर सस्ती दवाइयों और इलाज का वादा किया (दि एशियन एज)। इसपर कोविड के टीके, मैत्री की राजनीति, बनाने वाले की कमाई, विदेश में घर, लगाने का शुल्क और अलग एमआरपी के साथ ड्रग टेस्ट में फेल फार्मा कंपनियों द्वारा 762 करोड़ का चंदा, इलेक्टोरल बांड और ऐसी न जाने कितनी खबरें याद आ गईं। सबके बावजूद, यह खबर टॉप पर तीन कॉलम में छपी है।


