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आज के अखबार : उत्तर-दक्षिण का विवाद बढ़ने के बाद भी सरकार को नहीं बता रहे कि वह आग से खेल रही है

संजय कुमार सिंह

आज कई खबरों में एक खबर यह भी है कि भारत सरकार की रीति-नीति से देश में उत्तर-दक्षिण का झगड़ा बढ़ रहा है। पर अखबारों में यह शीर्षक तो नहीं ही है अखबारों ने केंद्र सरकार के पक्ष में या दक्षिण के राज्य के खिलाफ मोर्चा भी नहीं संभाला है। मामला उत्तर दक्षिण का होता लग रहा है और अगर ऐसा हुआ तो केंद्र सरकार का समर्थन करने वाले चंद्रबाबू नायडू किधर जायेंगे? बिहार चुनाव के कारण नीतिश कुमार का मामला पहले से संकट में है। दि एशियन एज की खबर के अनुसार भाजपा प्रवासी बिहारियों के जरिये बिहार को साधने की कोशिश में है। दूसरी ओर, उत्तर दक्षिण का मामला बढ़ रहा है तो कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार (या भाजपा) आग से खेल रही है। हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए अब सरकार की मजबूरी है कि कुछ नया करे। मुझे लग रहा है कि कम से कम आज के अखबार आंख बंद करके न तो केंद्र के साथ हैं और ना दक्षिण के खिलाफ।

इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड उत्तर-दक्षिण के संभावित टकराव में तमिलनाडु की चाल है। मेरे हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स में यह चार कॉलम में लीड है जबकि इंडियन एक्सप्रेस में यह छह कॉलम में है। बाकी अखबारों में भी पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक है, तमिलनाडु सरकार ने बजट दस्तावेज में रुपये के निशान की जगह तमिल के रुबाई का रु तमिल में लिखा है। ऐसा करके उसने केंद्र की नाराजगी मोल ली है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार रुपये को तमिल में रुबाई कहते हैं और सरकार ने बजट दस्तावेजों में रुपये के निशान की जगह रुबाई का रु तमिल में लिखा है। आप जानते हैं कि रुपये का यह लोगो 2010 में अपनाया गया था और इसमें अंग्रेजी के आर के साथ हिन्दी के रु का मेल है और प्रतीक तो वैसे भी प्रतीक है। इसे बदलना राजनीति या नाराजगी हो सकती है पर इसका कारण या परिणाम उत्तर दक्षिण की लड़ाई होगी और इसके दूसरे कारण भी मौजूद हैं।

अखबारों ने इसपर कायदे से नहीं लिखा है और केंद्र सरकार की आलोचना तो नहीं ही की है। दक्षिण भारत खासकर तमिलनाडु के नेताओं ने केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली की जो आलोचना की है उसकी भी चर्चा पहले पन्ने पर नहीं हुई है। वह भी तब जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तमिलनाडु के सांसदों (संभवतः नागरिकों के लिए भी) जो शब्द कहा उसे संसद की कार्यवाही से निकाल दिया गया है। दैनिक जागरण के अनुसार शिक्षा मंत्री ने संसदीय चर्चा के दौरान तमिलनाडु के सांसदों को ‘असभ्य’ कहा था। इस विवाद को भी अखबारों में अपेक्षित प्रमुखता नहीं मिली। आज राज्य के बजट दस्तावेज में रुपये का लोगो हटाने का मामला पहले पन्ने पर है। इससे, जाहिर है कि मामला बढ़ रहा है जबकि इसे रोकने और खत्म करने की जरूरत है। यहां उल्लेखनीय है कि रुपये के जिस चिन्ह का प्रयोग नहीं करने की खबर आज कई अखबारों में लीड बनी है उसे हिन्दुस्तान के अनुसार द्रमुक नेता, विधायक एन धर्मलिंगम के बेटे डी उदय कुमार ने बनाया था। प्रो कुमार आईआईटी गुवाहाटी में हैं और विवाद के संबंध में पूछने पर उन्होंने कहा कि वे भाषा विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं।

हिन्दुस्तान में यह खबर लीड है और खास बातों के इसके बॉक्स का शीर्षक है, स्टालिन सरकार के कदम से विवाद। इसी में एक खबर है, द्वि भाषा नीति पर कायम। इसके अनुसार, स्टालिन सरकार का तर्क है कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति में  त्रिभाषा फार्मूले को लागू कर तमिलनाडु में हिन्दी को बढ़ावा देना चाहती है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु सरकार तमिल-अंग्रेजी की अपनी दशकों पुरानी द्विभाषा नीति पर कायम रहेगी। मेरा मानना है कि उत्तर भारत में जब दक्षिण की भाषायें पढ़ना जरूरी नहीं है, पास विदाउट इंग्लीश वाले नेता इस बार भारत रत्न हो गये हैं तो दक्षिण में हिन्दी थोपने की जरूरत नहीं है। हिन्दी नहीं जानने का नुकसान अगर कुछ होना होता तो अब तक हो रहा होता और वहां के नेताओं को पता होता। धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक या शैक्षिक कद इतना बड़ा नहीं है कि वे इसपर वहां के नेताओं को ज्ञान दें या वहां के बच्चों के भविष्य के ठेकेदार बनें। खासकर तब जब मोदी सरकार को जब कई देसी-विदेशी मोर्चे पर मुंह की खानी पड़ रही है।

पूर्व मंत्रियों पर मुकदमा चलाने की राष्ट्रपति की अनुमति

आज की दूसरी बड़ी खबर मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन पर 2000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में केस दर्ज होने की खबर है। अमर उजाला में यह खबर लीड है और इसके अनुसार राष्ट्रपति ने मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। मुझे लगता है कि यह चुनाव आयोग के बाद राष्ट्रपति कार्यालय पर भी केंद्र सरकार के प्रभाव का लक्षण है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की हार और भाजपा की जीत को पहले भी सुप्रीम कोर्ट के परोक्ष सहयोग से होना माना गया है। इससे संबंधित तथ्य और तर्क बताने वाले आलेख सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं। ऐसे में पहले ही महीनों जेल रह एक जनप्रतिनिधि पर मुकदमा चलाने की अनुमति देना वैसे ही अटपटा है। मनीष सिसोदिया के खिलाफ न तो भ्रष्टाचार के सबूत हैं और ना कोई धन बरामद हुआ है। फिर भी उन्हें जेल में रखकर भ्रष्ट साबित किया जा चुका है। उल्टे वे ऐसे और इतने काम कर चुके हैं जिसका श्रेय आजाद भारत में शायद ही किसी जनप्रतिनिधि को है। इसके बावजूद वे पहले ही जेल काट चुके हैं और आजाद भारत के गिनती के ऐसे नेताओं में हैं। अब कदमा चलाने की अनुमति देने का मतलब यही है कि राष्ट्रपति भवन का सूचना तंत्र स्वतंत्र और निष्पक्ष काम नहीं कर रहा है। राजभवनों का तो लोगों को पता चल गया था। मनीष सिसोदिया ने अपराध किया हो तो उन्हें उचित सजा होनी चाहिये लेकिन जो सजा हो चुकी उसका भी हिसाब होना चाहिये और यह समझना मुश्किल नहीं है कि जो सजा हुई वह क्यों और कैसे हुई है। एक अच्छे नेता को बदनाम करके चुनाव हरा देना वैसे भी देश या देश की राजनीति के हित में नहीं है। राष्ट्रपति से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि उनका फैसला सब-कुछ जान-समझ कर लिया गया होगा।

इस फैसले से ही आम आदमी पार्टी को नुकसान होगा। इसीलिए इस खबर को महत्व दिया गया है और इसके साथ जो बिन्दु हाईलाइट किये गये हैं वो भी वैसे ही हैं। मैं अभी यहां सब की चर्चा नहीं करूंगा पर एक की चर्चा किये बिना रह भी नहीं सकता। शीर्षक है, बिना निविदा के 500 करोड़। खबर के अनुसार, सतर्कता आयोग ने जांच में पाया कि दिल्ली सरकार ने बिना निविदा के ही प्रोजेक्ट के लिए 500 रुपये की बढ़ोत्तरी मंजूर कर दी थी। यही नहीं, बेहतर सुविधाओं के नाम पर निर्माण लागत 90 फीसदी तक बढ़ाई गई, हालांकि काम घटिया दर्जे का हुआ। जीएफआर, सीपीडब्ल्यूडी के मानदंडों का जमकर उल्लंघन हुआ। स्पष्ट है कि फैसला मनीष सिसोदिया ने नहीं, सरकार ने लिया था। सरकार का यह काम और अधिकार है (कम से कम सामूहिक तौर) कि वह जो ठीक और जरूरी समझे करे। यह वैसे ही है जैसे केंद्र सरकार को नोटबंदी का अधिकार था लेकिन कोर्ट को कागजात सौंपने और फैसला लेने में कितने दिन लगे और क्यों लगे या समय क्यों दिया गया – समझना मुश्किल नहीं है। इसतरह फैसला सही है या गलत सरकार का है या नरेन्द्र मोदी का यह सब मुद्दा ही नहीं बना और देर से जब सुनवाई हुई तो यह दलील दी गई क अब उसका कोई मतलब नहीं है। हालांकि क्लीन चिट भी कुछ होता है। पर वह अलग मुद्दा है।  

ऐसे में मुझे नहीं लगता कि सरकार के किसी काम के लिए मुख्यमंत्री या मंत्री को दोषी ठहराया जा सकता है और सजा देना उचित है। वह भी तब जब आम आदमी के प्रभावित होने, सैकड़ों लोगों की जान जाने के मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वैसे भी, सरकार को अपने विवेक और सुविधा से काम करने के लिए जनादेश मिला हुआ है और उसके मातहत काम करने वाले कोई विभाग या आयोग उसकी जांच या कार्रवाई क्या करेगा? इसीलिए मंत्रियों ही नहीं सरकारी अधिकारियों के मामले में भी नियम है कि कार्रवाई संबंधित अधिकारी की अनुमति के बाद ही होगी। सरकारें अधिकारियों को ऐसे फंसाती और बचाती रही हैं और भ्रष्टाचार इसीलिए खत्म नहीं हो रहा है। नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार खत्म करने का दिखावा करके आये थे और जो कर रहे हैं वह अगर (मीडिया समेत) किसी को दिख नहीं रहा है तो समझा जा सकता है कि वाशिंग मशीन पार्टी क्या कर रही है। अब जब राष्ट्रपति ने इन सब तथ्यों की उपेक्षा करके कार्रवाई की अनुमति दे दी है तो मामला चिन्ताजनक है। खासकर इसलिए कि सरकार के अधिकार और कार्रवाई मुक्त होने का पता भाजपा के कई कामों से चलता है। इसमें अदाणी के खिलाफ जांच नहीं कराना और जांच नहीं कराने के कारणों का खुलासा हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट में किये जाने तथा उसके लगभग सार्वजनिक तौर पर साबित होने के बावजूद सेबी प्रमुख की जांच नहीं होना और एक मामले में एफआईआर कराने का आदेश होने पर ऊपर की अदालत में सेबी की ओर से सोलीसीटर जनरल का उपस्थित होना बहुत कुछ कहता है और यह सब ऐसा है कि कुछ छिपाया भी नहीं गया है। जेपीसी के सामने उपस्थित होने के मामले में भाजपा के लोगों ने जो बचाव किया उसे कौन भूल सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि डिग्री मामले में सोलीसीटर जनरल, तुषार मेहता का दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ से उपस्थित होना और पूर्व सेबी प्रमुख के खिलाफ एफआईआर के आदेश को रुकवाने के लिए सेबी की ओर से उपस्थित होना ऐसा मामला है जो पता हो तो केंद्र सरकार के काम या ईमानदार या पक्षपात या अनैतिकता के बारे में जानने के लिए किसी जेम्सबांड की जरूरत ही नहीं है। राष्ट्रपति ने अनजाने में आदेश दिया है तब और जानबूझकर दिया है तब भी यह देश पर बड़े संकट का संकेत है।

विदेशी सहेलियों को चालू समझने वालों के हित में

द हिन्दू की आज की लीड मणिपुर की खबर है। मणिपुर का मामला दिल्ली के अखबारों में बहुत कम छपता है और इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। द हिन्दू ने लीड के साथ टॉप पर दो कॉलम की एक खबर छापी है जिसके अनुसार महिपालपुर के एक होटल में ब्रिटिश महिला से बलात्कार की शिकायत पर उसके सोशल मीडिया फ्रेंड को गिरफ्तार किया गया है। यह खबर द टेलीग्राफ में दो कॉलम में और टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में है। खबर पढ़कर मुझे लगा कि किसी ब्रिटिश महिला के लिए अपने मित्र के बुलावे पर भारत आना सामान्य हो सकता है पर भारत में उसका मित्र (और संभवतः उसका परिवार भी) यह मान ले कि महिला ‘चालू’ है तो कोई खास बात नहीं है भले इसकी अंग्रेजी में इसका मतलब महिला के माता पिता यह समझें कि किसी अनजान मित्र से मिलने जाना वूमन ऑफ ईजी वर्च्यू ही है। यहां पुरुषों से समान रूप से मिलने वाली महिला व्यभिचारी ही मानी जाती है। मुझे लगता है कि पितृ सत्ता वाले भारतीय समाज में पुत्रों और कभी-कभी गलती करने वाले लड़कों तथा विदेशी महिलाओं के भी हित में यह जरूरी है कि विदेशी महिलाओं को भारतीय मित्रों से सतर्क किया जाये और यह बताया जाये कि वे होटल के कमरे में मिलने से पहले इसे स्पष्ट कर लें वरना हमारे यहां गलती करने वाले लड़के तो छोड़िये उनके बाप भी यही समझते हैं जो संभव है उसने सपने में भी सोचा न हो। संचार क्रांति के बाद के इस युग में भारत का पुरुष प्रधान समाज अपने पुरुषों की इस सोच या ‘चालू’ महिलाओं पर अपने इस अधिकार के बारे में विदेशियों को नहीं बतायेगा तो यह काम महिलाओं को भी करना चाहिये। राष्ट्रपति भी इस नेक काम की शुरुआत कर सकती हैं।

आंकड़ों में मेल न हो तो पुनर्गणना एक अधिकार है

द टेलीग्राफ की आज की लीड सुप्रीम कोर्ट की खबर है पर दिल्ली के मेरे अखबारों में आज पहले पन्ने पर यह नहीं है। नई दिल्ली डेटलाइन से अखबार के ब्यूरो की खबर इस प्रकार है, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को अगर आधिकारिक तौर पर दिए गए वोटिंग के आंकड़े मेल नहीं खाते हैं या चुनाव अधिकारी द्वारा घोषित अंतिम संख्या अलग है तो चुनाव उम्मीदवारों को पुनर्गणना की मांग करने का वैधानिक अधिकार है। यह तब भी लागू होता है, जब बेमेल आंकड़े से जीत प्रभावित नहीं हो और जीत का अंतर बहुत ज्यादा हो। न्यायमूर्ति संजय करोल और एनके सिंह की पीठ ने कहा, “प्रत्येक वोट का अपना मूल्य होता है, भले इसका चुनाव के अंतिम परिणाम पर कोई प्रभाव न हो। इसकी पवित्रता की रक्षा की जानी चाहिए।” जस्टिस करोल के लिखे फैसले में कहा गया है, “…इस अदालत की चिंता इस बात से अलग है कि सत्ता में कौन है, बल्कि इस बात से है कि कोई व्यक्ति सत्ता में कैसे आया। यह प्रक्रिया संवैधानिक सिद्धांतों और स्थापित मानदंडों के अनुसार होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं है, तो ऐसे व्यक्ति को सत्ता से वंचित किया जाना चाहिए, और लोगों द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया फिर से शुरू होनी चाहिए।” पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को खारिज कर दिया और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के चाका गांव के लिए ग्राम प्रधान के चुनाव के दौरान तीन विशेष बूथों पर डाले गए वोटों की फिर से गिनती करने का निर्देश दिया। पीड़ित उम्मीदवार विजय बहादुर के अनुसार, पीठासीन अधिकारी ने उन्हें दिए गए बयान में कहा कि मतदान केंद्र 43, 44 और 45 में कुल 1,194 वैध वोट डाले गए थे। हालांकि, फॉर्म 46 पर अंतिम मिलान से पता चला कि इन तीन बूथों पर 1,213 वोट डाले गए थे। बहादुर ने कहा कि उनसे पूछताछ करने पर सहायक चुनाव अधिकारी ने 11 अगस्त, 2022 के आदेश में इस आधार पर कोई और विवरण देने से इनकार कर दिया कि संबंधित दस्तावेज नहीं मिल पाए।

चुनाव जीतने के लिए प्रवासी बिहारी

दि एशियन एज की आज की लीड का शीर्षक है, अक्तूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर, भाजपा देश भर में प्रवासी भारतीयों तक पहुंचने की योजना बना रही है। इसमें हाईलाइट किया हुआ अंश है, भगवा पार्टी ने अपने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और दुष्यंत गौतम को यह जिम्मा सौंपा है कि वे बिहार और अन्य राज्य इकाइयों से तालमेल भिड़ायें। भाजपा (खासकर प्रधानमंत्री और उनके चाणक्य कहे जाने वाले गृहमंत्री) के बारे में कहा जाता है कि वह चुनाव जीतने के लिए हर संभव उपाय करती है। बिहार के लिये यह नया तरीका है और प्रधानमंत्री बनने का नेहरू का रिकार्ड तोड़ने के बाद अपनाया जा रहा है इसलिए खबर है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यहां मतदाता सूची या ईवीएम पर ध्यान नहीं दिया जायेगा या हिन्दू-मुसलमान नहीं किया जायेगा। इसमें बिहार का सम्मान भी है और ऐसा लगता है जैसे भाजपा को ही बिहार के सम्मान की चिन्ता है।

परिवार के खास लोगों की खबरें

इंडियन एक्सप्रेस में आज दो और खास खबरें हैं। एक तो यह कि कई विश्वविद्यालयों के पूर्व वीसी (यानी भाजपा और / या संघ परिवार के करीबी) को ओमान का उच्चायुक्त होने के झूठे दावे में पकड़ा गया। दिलचस्प यह कि भाई साब पहले ऐसा सफलतापूर्वक कर चुके हैं। खबर के अनुसार डॉ. (प्रो) केएस राणा 2018 से 2024 तक भिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे हैं। पुलिस ने दूतावासों के फर्जी नंबर वाली इनकी मर्सिडीज जीएल 350 भी जब्त की है और यह सूचना गाजियाबाद में प्रेस कांफ्रेंस करके दी गई। यह खबर अमर उजाला में भी है। यह आज दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं तो कारण आप समझ सकते हैं। दूसरी खबर कठुआ में हुई तीन लोगों की मौत से संबंधित है। इस बारे में मैंने पहले यहां लिखा है जब इसे आतंकवादियों की करतूत कहा गया था। मैंने लिखा था कि सरकार आतंकवाद और आतंकवादी खत्म करने का दावा करती रही है और जब जरूरत पड़ती है तो मामला आतकंवादियों के सिर थोपकर अपना हाथ झाड़ लेती है। इस मामले में भी यही किया गया था। आज खबर है कि पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के अनुसार जख्मों से संकेत मिलता है कि तीनों लोग गहरे नाले में गिर गये होंगे।

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