महाराष्ट्र में 42 हजार पॉस्को मामले लंबित हैं, क्योंकि 30 स्वीकृत पदों में सिर्फ एक विशेष अदालत काम कर रही है। डबल इंजन सरकार में पॉस्को मामले का यह हाल है। बलात्कार और यौन शोषण का तो आप जानते ही हैं। महाराष्ट्र और दिल्ली में भाजपा को सत्ता कैसे मिली है, बताने की जरूरत नहीं है।

संजय कुमार सिंह
आज बहुत कम अखबार आये हैं। इसलिए आठ अखबारों का पहले पन्ना नहीं लिख रहा हूं लेकिन इंटरनेट पर खबरें तो पढ़ ही रहा हूं। इनमें टाइम्स ऑफ इंडिया, मुंबई की एक खबर दिखी। इसके अनुसार आयकर विभाग ने एम गुलाटी को अनिवासी भारतीय मानने से इनकार कर दिया था। नियमानुसार उनने 210 दिन विदेश में रहने का दावा किया था और इस दौरान विदेश में जो 1.2 करोड़ रुपये कमाये थे उसपर आयकर देय नहीं था। विभाग का कहना था कि इनमें 28 दिन वहां कमाने में नहीं, नौकरी ढूंढ़ने में लगाये थे इसलिए अनिवासी भारतीय होने का उसका दावा गलत है और उसे टैक्स देना पड़ेगा। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने दावे को मान लिया है और कहा है कि भारत में रहने के दिन ही अनिवासी भारतीय होने या नहीं होने की स्थिति तय करेंगे।
मुझे लगता है कि इस मामले में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। नियम बहुत साफ है और 210 दिन लिखा है। महीना या हफ्ता नहीं कि विवाद हो। विवाद हर बार आने जाने के दिन और समय पर हो सकता है कि रात 12 बजे आया और 12 बजे दिन में चला गया तो एक दिन हुआ या आधा। पर यहां तो भारत में नहीं रहे दिन पर ही विवाद खड़ा किया गया है। जबकि नियम यह नहीं है कि भारत में नहीं रहे तो विदेश में कमाना ही होगा। नियम ऐसा बनाया जा सकता था (और संभव है अब बना दिया जाये) कि अगर कोई भारत में आय योग्य कमाई 210 दिन से कम में कर लेता है और बाकी दिन थाईलैंड या बैंकाक में रहता है अथवा अथवा प्रेमी / प्रेमिका के किसी और देश में रहता है तो उसे भारत में रहना माना जायेगा।
बहुत सारे नियम ऐसे ही हैं और ऐसा सरकारी बाबुओं की कमाई के लिए किया जाता है। इसे लाल फीताशाही भी कहा जा सकता है और रिश्वतखोरी का बड़ा कारण यही है। इस मामले में बहुत संभावना है कि आयकर बाबू ने इस कमाई पर लग सकने वाले टैक्स का हवाला देर रिश्वत की मांग की हो और बात नहीं बनी हो तो मामला अपील में गया हो और यह खबर छपी है। लेकिन नागरिक तो परेशान हुआ ही। ज्यादार लोग रिश्वत देकर ऐसे मामलों से बचना चाहेंगे और नियम यह कि रिश्वत देना भी अपराध है तो कोई उसकी भी शिकायत नहीं कर सकता है। ऐसे मामलों में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है।
शिकायतकर्ता कुछ नहीं कर सकता क्योंकि बगैर अनुमति सरकारी बाबुओं के खिलाफ मुकदमा नहीं हो सकता है और अनुमति वही देता है जो कार्रवाई करने के लिए जिम्मेदार होता है। दूसरे शब्दों में रिश्वत का हिस्सेदार होता है यह व्यवस्था लंबे समय से चली आ रही है। नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वे भ्रष्टाचार खत्म करेंगे तो मैंने समझा था कि वे ऐसे मामले खत्म करेंगे। पर वह तो नहीं ही हुआ। अब खबर आती है कि वसूली हो रही है और वसूली करने वाले मामलों में कार्रवाई नहीं होती है। इलेक्टोरल बांड के बाद लगता है कि यह वसूली सरकारी भी हो सकती है पर कोई सुनवाई नहीं है। जब अदाणी को अमेरिकी समन की खबर नहीं है तो आम आदमी की कौन सुने।
यह मामला वित्त वर्ष 2015-16 का है और अनिवासी भारतीय की परेशानी समझी जा सकती है। आयकर विभाग या सरकार के इस रुख के कारण नागरिकों को अपना काम (और कमाई) छोड़कर फालतू परेशान होना पड़ता है और परेशान करने वाला सरकारी वेतन पाता है। केंद्र सरकार (संघ परिवार या भाजपा की नीति के अनुसार) सरकारी बाबुओं और नियमों के मामले में जनहित तो नहीं ही सोचती है पर विरोध करने वाले, विपक्षी दल के या एनजीओ चलाने वाले समाज सेवी सबको परेशान कर रही है और उसके उदाहरण हैं। हाल में खबर आई थी कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है।
विपक्षी नेताओं का मामला बिल्कुल अलग है उसपर मैं लिख चुका हूं। आयकर और दूसरे विभागों के अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने के लिए क्या आम आदमी को राष्ट्रपति से मंजूरी लेनी चाहिये? देंगी? यहां यह भी उल्लेखनीय है और राष्ट्रपति को पता होना चाहिये कि बहुत सारे अधिकारी समय से पहले नौकरी छोड़ रहे हैं, इस्तीफा तो चुनाव आयुक्त ने ही दे दिया था जो तुरंत स्वीकार भी हो गया और अधिकारी आत्म हत्या भी कर रहे हैं। शिकायतें नहीं सुनने के भी मामले होंगे ही।
आज की दूसरी बड़ी खबर तमिलनाडु का बजट है। आप जानते हैं कि बजट दस्तावेज में रुपये के प्रतीक की जगह तमिल के रू अक्षर का प्रयोग किया गया है जो रुपये के तमिल शब्द, रूबाई का पहला अक्षर है। वैसे ही जैसे हिन्दी अंग्रेजी के रुपये का पहला अक्षर रू या आर है। कहने की जरूरत नहीं है कि रुपये का सिम्बल (या प्रतीक) अंग्रेजी के आर और हिन्दी के रु का मिला-जुला रूप है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने बजट दस्तावेज में इसकी जगह तमिल के रू का उपयोग किये जाने का कोई कारण नहीं बताया। लेकिन चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि राज्य सरकार की पीआर (जनसंपर्क) मशीनरी ने रिपोर्टर्स से कहा था कि वे इसे हिन्दी थोपने जैसा रंग दें। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार रात इसके लिए तमिलनाडु की डीएमके सरकार पर राज्य बजट के प्रचार लोगो में आधिकारिक चिह्न के बजाय रुपये के प्रतीक के रूप में तमिल वर्णमाला “रू” का उपयोग करने पर कहा था, “सभी निर्वाचित प्रतिनिधि और अधिकारी हमारे राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखने के लिए संविधान के तहत शपथ लेते हैं। राज्य बजट दस्तावेजों से, रुपये के राष्ट्रीय प्रतीक को हटाना उसी शपथ के खिलाफ है, जो राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्धता को कमजोर करता है। यह महज प्रतीकात्मकता से कहीं अधिक है – यह एक खतरनाक मानसिकता का संकेत देता है जो भारतीय एकता को कमजोर करता है और क्षेत्रीय गौरव के बहाने अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा देता है।”
फैक्ट-चेक वेबसाइट अल्ट न्यूज के सह-संस्थापक एमडी जुबैर ने उन्हें 2017 में जीएसटी पर तमिल में लिखे उनके ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट के साथ जवाब दिया। इसमें उन्होंने भारतीय मुद्रा के प्रतीक के रूप में तमिल “रू” का इस्तेमाल किया था। आज बजट से संबंधित खबर है कि तमिलनाडु राज्य दो हजार करोड़ का घाटा उठाकर भी त्रिभाषा फॉर्मूला के खिलाफ है। दबाव डालने के लिए केंद्र ने समग्र शिक्षा के 2152 करोड़ रुपये नहीं दिये हैं। राज्य सरकार ने इतने पैसे अपनी ओर से दिये हैं। राज्य के वित्त मंत्री थंगम थेन्नरासु ने कहा है, द्विभाषा नीति पर चलकर तमिलनाडु ने न सिर्फ तमिल संस्कृति का संरक्षण किया बल्कि अपने युवाओं को अंग्रेजी में कुशल बनाकर उनका सशक्तिकरण भी किया है।


