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आज के अखबार : विदेशी पॉडकास्टर को प्रधानमंत्री के इंटरव्यू में ट्रम्प और उनकी प्रशंसा, टैरिफ पर सब मौन

संजय कुमार सिंह

देश का मीडिया नरेन्द्र मोदी (सरकार) से मुश्किल सवाल नहीं पूछता। वे प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते। आज तक एक भी नहीं किया है। फिर भी मीडिया उनकी तारीफ करते नहीं अघाता। और मामला इतना ही नहीं है। आज मेरे आठ अखबारों में चार की लीड एक विदेशी पॉडकास्टर को दिये इंटरव्यू से बनी है। इनमें इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और दि एशियन एज शामिल है। अकेले अमर उजाला में यह इंटरव्यू पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू और द टेलीग्राफ में यह सेकेंड लीड है। नवोदय टाइम्स में यह टॉप पर चार कॉलम में है। इन सभी अखबारों में अकेले द टेलीग्राफ के अपने शीर्षक – “टफ, टच्ड : ट्रम्प यूलॉजी मम ऑन अदर टी” से बताया है कि इंटरव्यू में मोदी ने ट्रम्प की तारीफ की है उन्हें सख्त कहा है और बताया है कि उनके व्यवहार से वे प्रभावित हुए और ट्रम्प की। ट्रम्प की इस प्रशंसा में दूसरे टी (टैरिफ, आयात/निर्यात पर शुल्क जो इस समय चर्चा में है) पर मौन हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने अगर किसी को लंबा इंटटरव्यू दिया है तो उसमें कुछ न कुछ का काम या खास होगा ही और उसे खबर बनाना, खबर के अनुसार महत्व देना गलत नहीं है और यह पहले भी होता रहा है। तब एक अखबार को दिये इंटरव्यू की खास बातें अगले दिन या अखबार अथवा टीवी चैनल समय से जारी करें तो उसी दिन छपते रहे हैं। इसलिये, सिद्धांत रूप में विदेशी पॉडकास्टर या चैनल या पत्रकार या प्रचारक को भी दिये इंटरव्यू की सूचना खबर तो है ही। जो लोग इंटरव्यू नहीं देख पाये, पूरा नहीं देख पाये उनके लिए खास बातें तो प्रस्तुत की ही जा सकती हैं। इंटरव्यू अंग्रेजी में हो तो दूसरी भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद भी पठनीय होगा और लोग इंतजार कर रहे हो सकते हैं। पर उस इंटरव्यू में से क्या कैसे छापा जाता है वह इस अघोषित इमरजेंसी या अमृत कल में महत्वपूर्ण और रेखांकित करने लायक है। खासकर इसलिए कि प्रचारक अभी भी इमरजेंसी और उसकी कथित ज्यादतियों को याद करते हैं।

आइये देखें आज इस इंटरव्यू से बनाई और परोसी गई खबरों के शीर्षक क्या हैं। सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस“ट्रम्प के पास स्पष्ट रोडमैप (नक्शा) है, हमलोग चीन के साथ काम कर रहे हैं ताकि 2020 से पहले की स्थिति बहाल कर सकें : प्रधानमंत्री”। इसका फ्लैग शीर्षक है, प्रस्ताव (समाधान) तभी जब रूस, यूक्रेन मेज पर होंटाइम्स ऑफ इंडिया“हम दोनों यानी ट्रम्प और  मैं देश को पहले रखते हैं, यही हमारा कनेक्ट (जोड़ने वाला) है : प्रधानमंत्री”दि एशियन एज में यह खबर लीड है और चार कॉलम का शीर्षक एजेंसी की सूचना के साथ छपी खबर का है। शीर्षक है, पाकिस्तान के साथ शांति के हर प्रयास का जवाब शत्रुता से मिला : मोदी”द हिन्दू ने इस महान खबर के लिए अपने रिपोर्ट को नहीं लगाया या उसके किसी विशेष संवाददाता ने इंटरव्यू देख-सुन कर नहीं लिखा है और यहां पीटीआई की खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, पाकिस्तान के साथ शांति के हर प्रभावशाली प्रयास का जवाब शत्रुता, विश्वासघात से मिला : मोदी”। तीन कॉलम की इस खबर का शीर्षक तीन लाइन में है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक सबसे अलग है, “प्रधानमंत्री ने कहा, गरीबी, हिमालय, आरएसएस ने मेरे जीवन को आकार दिया”। नवोदय टाइम्स में यह खबर टॉप पर चार कॉलम में है। शीर्षक है, शांति के प्रयासों का शत्रुता से जवाब दिया पाक ने मोदी। उपशीर्षक है, लेक्स फ्रीडमैन के साथ पॉडकास्ट में प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई कि शांति का मार्ग अपनायेगा पड़ोसी देश

मूल रूप से किसी विदेशी द्वारा अंग्रेजी में किये गये इंटरव्यू (का मौका प्राप्त कर पाने वाला कहना चाहिये) का नाम मैंने अब तक नहीं लिखा था और उधेड़बुन में था कि सिर्फ नाम से बात बनेगी कि नहीं और परिचय की कितनी जरूरत है। खास कर इसलिए कि किसी भारतीय पेशेवर पत्रकार से नरेन्द्र मोदी का अंतिम ज्ञात इंटरव्यू करण थापर के साथ है। और यह वैसे ही बहुत मशहूर व चर्चित है। बाद में उन्होंने अपनी किताब, डेविल्स एडवोकेट – दि अनटोल्ड स्टोरी” के एक अध्याय, “व्हाई मोदी वाक्ड आउट एंड बीजेपी शन्स मी” [मोदी क्यों उठकर चले गए और भाजपा (वाले) मुझसे क्यों बचते हैं] में इसका विस्तार से वर्णन किया है। मुझे नहीं पता हिन्दी में कितने प्रकाशनों ने अब तक इसकी चर्चा की है। पर अंग्रेजी में कल जारी किया गया इंटरव्यू आज अगर इस उम्मीद के साथ जारी किया गया है कि पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे के दावे और उसे स्वयं छोड़ देना चाहिये जैसे विचार जताने और चुनाव प्रचार के बाद पाकिस्तान शांति का मार्ग अपनायेगा तो यह भी याद दिलाया जाना चाहिये कि इंटरव्यू में और उसके बाद क्या हुआ। बाद का अंदाजा ऊपर दिये गये विवरण और इस तथ्य से लग जायेगा कि मोदी तो छोड़िये भाजपा के नेता भी करण थापर से बात (इंटरव्यू) नहीं करते। इस संबंध में करण थापर ने अपनी किताब में लिखा है,  …. उस समय मुझे पता नहीं था कि आधुनिक समय के नीरो वाली टिप्पणी जिसका मैंने उल्लेख किया था वह मौखिक नहीं है बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए औपचारिक लिखित फैसले का भाग है। तीन मिनट के उस इंटरव्यू को देखने के बाद तीस्ता सेतलवाड ने मुझे विवरण दिया। …… अफसोस उस दिन मैं इससे वाकिफ नहीं था इसलिए मेरा सवाल जैसा हो सकता था उससे कमजोर था। पर जो मैंने पूछा वह भी उन्हें चिढ़ाने के लिए पर्याप्त था। हालांकि दो-तीन मिनट की बातचीत के बाद वे उठ गए। …. उनके शब्द थे, मुझे आराम करना है। मुझे पानी चाहिए और फिर माइक्रोफोन निकालने लगे।  ….. इसके बावजूद मोदी ने कोई नाराजगी (नैस्टीनेस गंदगी, असल में अनुचित व्यवहार) नहीं दिखाई। आगे का विवरण है। अगले दिन सीएनएन-आईबीएन ने तीन मिनट के इस टेप को बार-बार दिखाया जिसमें वे कहते हैं, अपनी दोस्ती बनी रहे। बस। मैं खुश रहूंगा। आप यहां आए। मैं खुश हूं और आपका शुक्रगुजार हूं। मैं यह इंटरव्यू नहीं कर सकता हूं …. आपके आईडियाज हैं, आप बोलते रहिए, आप करते रहिए … देखो मैं दोस्ताना संबंध बनाना चाहता हूं। ….. गड़बड़ यह है कि इसके बाद मैं उनके साथ कम से कम एक घंटा रहा। वे इंटरव्यू करने के लिए तैयार नहीं हुए। यही कहते रहे कि उनका मूड बदल गया है। … फिर कभी इंटरव्यू करेंगे …. दोस्ती बनी रहे। जिसे बार-बार दिखाया गया। … हमलोग हाथ मिलाकर विदा हुए। 

कहने की जरूरत नहीं है कि आज ज्यादातर अखबारों ने इंटरव्यू देने (और नहीं देने) के मामले में मोदी के निर्णय में खुलकर सहयोग किया है और बिना इंटरव्यू उन्हें आवश्यक प्रचार देने के लिए अपना मंच उपलब्ध कराया है। शीर्षक आदि से स्पष्ट है कि इंटरव्यू के उन्हीं हिस्सों को प्रचारित किया गया है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के प्रचार में है। अकेले द टेलीग्राफ ने बताया है कि इंटरव्यू टैरिफ जैसे मुद्दे पर मौन है। इंटरव्यू का दूसरा पक्ष समझने के लिए पेश है, द टेलीग्राफ में जो छपा है उसका हिन्दी अनुवाद पेश है। यह गूगल के अनुवाद का संपादित रूप है। नई दिल्ली डेटलाइन से जेपी यादव की बाइलाइन के बाद खबर इस प्रकार है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप की जोरदार प्रशंसा की है। इसके लिए जोर देकर कहा है, “उस व्यक्ति में साहस है” और “अपने निर्णय स्वयं लेते हैं”। यह सब ऐसे समय में कहा गया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर दंडात्मक शुल्क लगाए हैं। अमेरिकी पॉडकास्टर लेक्स फ्रिडमैन के साथ तीन घंटे की पॉडकास्ट बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा, ट्रंप “कृपालू और विनम्र” व्यक्ति हैं और उनका “अमेरिका सबसे पहले” का दृष्टिकोण (नरेन्द्र मोदी) की अपनी “भारत सबसे पहले” नीति की तरह ही है। प्रधानमंत्री ने रविवार शाम को जारी इस पॉडकास्ट में कहा है। 2002 के गुजरात दंगों के लिए हुई आलोचना के बारे में पूछे जाने पर, उन्होंने दावा किया कि वह आलोचना का स्वागत करते हैं क्योंकि “आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है”। उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था और राजनेताओं व न्यायाधीशों की जासूसी करने के आरोपों का सामना कर रही है। (इस इंटरव्यू में) मोदी ने ट्रंप की प्रशंसा की है और दोनों के बीच समानताओं को रेखांकित किया है और यही इसमें सबसे अलग है।

फ्रिडमैन ने उनसे पूछा कि एक मित्र और नेता के रूप में डोनाल्ड ट्रंप में  उन्हें “क्या पसंद है”? मोदी ने ह्यूस्टन में आयोजित “हाउडी मोदी” कार्यक्रम को याद करते हुए शुरुआत की। यह आयोजन तब हुआ था जब ट्रम्प पहली बार राष्ट्रपति बने थे और मोदी 2019 में अमेरिका के दौरे पर थे। कार्यक्रम में जब वे प्रवासी भारतीयों को संबोधित कर रहे थे तब ट्रम्प उनके बीच बैठे थे। मोदी ने उनकी इस विनम्रता के लिए उनकी सराहना की। मोदी ने कहा, “अब, यह उनकी विनम्रता है। जब मैं मंच से बोल रहा था, तब अमेरिका के राष्ट्रपति दर्शकों में बैठे थे, यह उनकी ओर से एक उल्लेखनीय सद्भावना प्रदर्शन था।” उन्होंने बताया कि कैसे ट्रंप ने मोदी के भाषण के बाद भीड़ में चलने के लिए उनके अनुरोध पर सहमति व्यक्त की थी, उन्होंने कहा कि यह अनुभव “दिल को छू लेने वाला” था। मोदी ने कहा, “क्षण भर के लिए भी बिना किसी हिचकिचाहट के, उन्होंने सहमति व्यक्त की और मेरे साथ चलना शुरू कर दिया। उनकी पूरी सुरक्षा व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई थी।” मोदी ने कहा, “मेरे लिए, वह क्षण वास्तव में दिल को छू लेने वाला था, इसने मुझे दिखाया कि इस व्यक्ति में साहस है। वह अपने निर्णय खुद लेता है, लेकिन साथ ही, उन्होंने उस क्षण मुझ पर और मेरे नेतृत्व पर इतना भरोसा किया कि वह भीड़ में मेरे साथ चला गया। यह आपसी विश्वास की भावना थी, हमारे बीच एक मजबूत बंधन था, जिसे मैंने उस दिन वास्तव में देखा।” मोदी ने फरवरी 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे के लिए अहमदाबाद में “नमस्ते ट्रम्प” कार्यक्रम के साथ जवाब दिया था। ट्रम्प ने अमेरिकी उत्पादों पर उनके भारी शुल्क को “बहुत अनुचित” करार देते हुए भारत जैसे देशों पर दो अप्रैल से जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की है। इस बात के संकेत कि मोदी सरकार को कोई आपत्ति नहीं है, या वह अमेरिकी राष्ट्रपति को नाराज़ करने से हिचक रहे हैं, हाल ही में तब मिले जब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि ट्रम्प का “बहु-ध्रुवीयता की ओर बढ़ना… कुछ ऐसा है जो भारत के अनुकूल है”। पॉडकास्ट में, मोदी ने पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव के लिए प्रचार करते समय गोली लगने पर ट्रम्प की “लचीली” प्रतिक्रिया की प्रशंसा की। तब ट्रम्प के कान में चोट लगी थी, लेकिन दर्शकों में से एक की मौत हो गई।

चुनाव आयोग की सक्रियता का प्रचार

मुझे लगता है कि आज इस एक खबर से ही देश की मीडिया के काम झुकाव, भक्ति और समर्थन को आसानी से समझा जा सकता है। बाकी खबरें ऐसी ही होती है। इसमें रिपोर्टिंग खत्म है और इसलिये फॉलो अप भी नहीं होता है। पता नहीं, यह संयोग है या प्रयोग कि प्रधानमंत्री ने जिस दिन पाकिस्तान को उसकी शत्रुता के लिए याद किया है उसी दिन अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, पाकिस्तानी सेना पर फिर बीएलए हमला, 90 सैनिकों की मौत का दावा। झूठ और जुमलों की बुनियाद पर आपदा में अवसर जैसी राजनीति कहां कैसे काम कर रही उसे समझना आसान नहीं है। चुनाव आयोग की संभावित बैठक पर यहां मेरी टिप्पणी पढ़ी होगी। सबको पता है कि बैठक कल होनी है और मुझे लग रहा है कि इसका प्रचार यह दिखाने-बताने के लिए है कि चुनाव आयोग ठीक काम कर रहा है। इस क्रम में आज मर उजाला की खबर है, अब किसी मतदान केंद्र पर 1200 से अधिक मतदाता नहीं। अखबार ने इसे चुनाव आयोग का अहम फैसला बताया है और लिखा है, अभी तक एक मतदान केंद्र पर 1500 मतदाता होते थे। अगर मेरी याद्दाश्त सही है तो मतदाता 1200 ही होते थे जिसे बाद में बढ़ा दिया गया और मुद्दा यही है कि 1200 को 1500 किसने, किससे पूछ कर किया। पर अखबार बता रहा है कि अब अहम फैसला हुआ है। जब 1200 से 1500 किया गया था तो खबर कैसी थी मुझे याद नहीं है। आजतक डॉट इन की 02 दिसंबर 2024 की एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें प्रत्येक मतदान केंद्र पर मतदाताओं की अधिकतम संख्या 1200 से बढ़ाकर 1500 करने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी गई है। इस पर अदालत ने अब आयोग से जवाब मांगा है। सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह को इस फैसले के पीछे के तर्क को स्पष्ट करते हुए हलफनामा दायर करने को कहा है। ऐसे में आज इस खबर का मतलब समझा ज सकता है। अमर उजाला ब्यूरो की यह चार कॉलम की खबर सूत्रों के हवाले से है और कल चुनाव आयोग की जिस बैठक की खबर थी वह बैठक कल होनी है।    

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