नई दिल्ली | संसद की संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने देश में मीडिया रेगुलेशन को एकीकृत करने के लिए ‘कॉमन मीडिया काउंसिल’ बनाने का सुझाव दिया है। यह काउंसिल प्रिंट, ब्रॉडकास्ट और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को एक ही नियामक छतरी के तहत लाने का काम करेगी।
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, मीडिया रेगुलेशन के मौजूदा ढांचे में एकरूपता की कमी है, जिससे फेक न्यूज़, सनसनीखेज रिपोर्टिंग और नैतिकता के उल्लंघन जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करना मुश्किल हो रहा है। समिति ने सरकार को सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB), इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) और दूरसंचार विभाग को एक संयुक्त नियामक ढांचे में समाहित करने पर विचार करने का भी सुझाव दिया है।
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली इस समिति ने कहा कि मौजूदा समय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) प्रिंट मीडिया को रेगुलेट करती है, जबकि MIB ब्रॉडकास्ट मीडिया को देखती है। दूसरी ओर, डिजिटल मीडिया MeitY के अंतर्गत आता है, जिससे मल्टीपल रेगुलेटरी बॉडीज के कारण समन्वय में बाधा उत्पन्न होती है।
प्रस्तावित मीडिया काउंसिल की संभावनाएं
समिति की रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि MIB ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को एक व्यापक मीडिया काउंसिल में बदलने पर आंतरिक चर्चा की है। इस काउंसिल के विभिन्न वर्टिकल्स होंगे, जो प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया के लिए अलग-अलग निगरानी और प्रवर्तन तंत्र के रूप में कार्य करेंगे।
काउंसिल की मुख्य जिम्मेदारियों में शामिल होंगे :
- नैतिक मानकों को निर्धारित करना
- फर्जी खबरों और भ्रामक सामग्री की जांच करना
- मीडिया संगठनों को वित्तीय रूप से सुदृढ़ बनाना
- क्षेत्रीय और स्थानीय मीडिया का समर्थन करना
नए बिल पर भी चर्चा जारी
इसके अतिरिक्त, ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज (रेगुलेशन) बिल पर भी विचार किया जा रहा है, जो ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल न्यूज़ को MIB के दायरे में लाने की बात करता है। हालांकि, मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान सत्र में इस बिल को पेश करने की योजना नहीं है। समिति ने सरकार को सुझाव दिया है कि वह कॉमन मीडिया काउंसिल जैसे बड़े सुधारों पर ध्यान केंद्रित करे, जिससे मीडिया इंडस्ट्री में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
‘कॉमन मीडिया काउंसिल’ पर मीडिया जगत में चिंता और आलोचना
संसद की संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति द्वारा प्रस्तावित ‘कॉमन मीडिया काउंसिल’ को लेकर मीडिया जगत में चिंताओं और आलोचनाओं का माहौल है। यह काउंसिल प्रिंट, ब्रॉडकास्ट और डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स को एक ही नियामक छतरी के तहत लाने का प्रस्ताव रखती है, लेकिन कई मीडिया विशेषज्ञ और संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है।
स्वतंत्रता पर संभावित खतरा
मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की काउंसिल से मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश लग सकता है। उनका तर्क है कि एक केंद्रीकृत नियामक संस्था सरकार को मीडिया कंटेंट पर अधिक नियंत्रण प्रदान करेगी, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है। यह भी है कि वर्तमान में, कई मीडिया संगठन स्व-नियमन का पालन करते हैं। प्रस्तावित काउंसिल के तहत सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने की संभावना है, जिससे स्व-नियमन की अवधारणा कमजोर हो सकती है। यह मीडिया संगठनों की स्वायत्तता के लिए हानिकारक माना जा रहा है।
कानूनी चुनौतियाँ और अस्पष्टता
प्रस्तावित काउंसिल की संरचना, अधिकार क्षेत्र और कार्यप्रणाली को लेकर कई कानूनी सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना स्पष्ट रूपरेखा के, यह काउंसिल कानूनी विवादों का कारण बन सकती है।


