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आज के अखबार : जज के घर नकदी का ही मुद्दा छाया हुआ है, ‘जांच शुरू’ हो गई है का प्रचार कम नहीं है

संजय कुमार सिंह

आज जज के घर नकदी मिलने का मुद्दा कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। जहां फोटो नहीं छपी थी वहां फोटो भी है लेकिन जो खबर है वह यह कि जज के घर के आस-पास जले हुए नोट मिलना जारी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज इस आशय की खबर है। इससे लगता है कि नोट जब्त नहीं किये गये और दिल्ली के मुख्य अग्निशमन अधिकारी ने न सिर्फ यह कहा है कि नकदी बरामद नहीं हुई बल्कि जो नोट जल गये थे उन्हें राख के रूप में फेंकने भी दिया। ऐसे मामलों में अधिकारी अपने विवेक से काम करते हैं और चूंकि कोई पुराना उदाहरण नहीं होता है इसलिए उनसे किसी खास तरीके से काम करने की अपेक्षा भी नहीं जा सकती है। लेकिन नकदी थी (वीडियो के अनुसार) पर बरामद नहीं हुई, कहना मामले को घुमाने की कोशिश लगता है। ऐसे में आज खबर यह नहीं है कि जांच शुरू हो गई। आज खबर यह है निष्पक्ष जांच के लिए क्या किया जा रहा है या निष्पक्ष जांच की संभावना कितनी है। इसपर जज साब ने कहा है कि नकदी उनकी नहीं थी घर के बाहर एक किनारे पर स्टोर में रखा है (उसमें ताला लगा था) जहां कोई भी आ-जा सकता है।

ऐसे में संभावना है कि पैसे किसी और ने रखे हों और यह जांच का भी मुद्दा है। लेकिन आम आदमी के मामले में पुलिस कहने भर से नहीं मानेगी और घर के नौकर-चौकीदार सबसे पूछताछ होती। जज का मामला अलग है और इस मामले में क्या हो रहा है उसकी खबर नहीं है। जब जांच हो रही है और उसपर भरोसा है तो इंतजार भी किया जा सकता था लेकिन खबरें बता रही हैं कि स्थितियां भरोसा करने लायक नहीं हैं और अगर जज साब की बात मान ली जाये तथा बाद में पता चले कि नोट नकली थे या बाजार में बिकने वाले बच्चों के बैंक के नोट थे तो मामला – खोदा पहाड़ निकली चुहिया का ही होगा। भारतीय न्याय व्यवस्था में अपराध होना और जांच में अपराधी ठहराये गये व्यक्ति का अपराध साबित नहीं होना आम है। इसलिए अपराध होते हैं, हत्याएं और मौतें भी होती हैं – सजा किसी को नहीं होती। इसलिए देश की न्याय व्यवस्था पर चिन्ता जताई जाती रही है और नीचे से लेकर सबसे ऊपर तक की अदालतों से संबंधित लोगों ने किताबें लिखकर अपनी चिन्ता जताई है।

कानून या न्याय मेरा विषय नहीं है फिर भी अदालतों की दशा और उसपर चिन्ता जताने वाली कई किताबें मेरे पास हैं। जाहिर है, लिखी गई किताबों की संख्या बहुत ज्यादा होगी और समस्या पर्याप्त गंभीर है। ऐसे में एक जज की संदिग्ध मौत के मामले की जांच नहीं होने से यह शक बना हुआ है कि (प्रभावशाली व्यक्ति के) अनुकूल फैसले के लिए जज की हत्या करवाई गई। अगर इसकी जांच हो जाती, अनुत्तरित सवालों के जवाब मिल जाते तो शक कम होता या हत्या की पुष्टि होती और व्यवस्था पर विश्वास बनता। लेकिन मामला मौत के बाद अनुकूल फैसला देने वाले जज को ईनाम देने (और स्वीकार किये जाने) का ही नहीं, जांच की मांग को हर बार ठुकरा दिये जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट के भी यही कहने से मामला खत्म भले हो गया हो अनुत्तरित सवालों के मद्दनेजर मौत के कारण पर भरोसा नहीं हुआ। ऐसे में अब इस मामले की भरोसेमंद जांच कौन कर सकता है या किसकी जांच पर भरोसा होगा। खासकर तब जब मामले को दबाने की कोशिश हुई है। सबको पता है लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है। अग्निशमन प्रमुख के बयान का कारण भी बता दिया जाये तो यह माना जा सकेगा कि मामले की जांच सही रास्ते पर है। मित्र विनोद चंद ने आज अपनी फेसबुक पोस्ट में जज लोया की संदिग्ध मौत की जांच नहीं कराने के लिए दिये और स्वीकार किये तर्कों का हवाला देकर पूछा है कि पहले के तर्क इस मामले में क्यों नहीं लागू किये जा रहे हैं।

पोस्ट के अनुसार, जब जज लोया मामले में सीजेआई दीपक मिश्रा ने फैसला सुनाया, तो उन्होंने सभी सबूतों और दलीलों को दरकिनार कर दिया और चार भाई (ब्रदर जजेज) जजों के बयान पर भरोसा किया। इन्होंने एक हलफनामे (शपथ पूर्वक नहीं कहा था) में कहा था कि वे जज लोया के अंतिम क्षणों में उनके साथ थे और जज लोया की मृत्यु वास्तव में दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। सीजेआई दीपक मिश्रा (अब सेवानिवृत्त) ने उनके हलफनामे (शपथ पर नहीं बल्कि सादे कागज पर दिया गया) को स्वीकार कर लिया कि चारों भाई जज संदेह से परे हैं और जज लोया की मौत के बारे में सभी अटकलों को खत्म कर दिया जाना चाहिए और उनकी मौत एक प्राकृतिक मौत है। अदालत ने सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए इस मामले को बंद कर दिया, जिससे सत्तारूढ़ पार्टी के किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता के आरोपों पर से पर्दा हट गया। अब, जस्टिस यशवंत वर्मा ने दावा किया है कि उन्हें नकदी, उसकी उपस्थिति या अनुपस्थिति या उसके ले जाए जाने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा है कि स्टोर रूम में जो कुछ भी था, वह 500 रुपये के नोट नहीं थे। उन्हें नहीं पता कि नोट किसने रखे, अगर वे वाकई वहां थे। उन्होंने कहा कि उनके कर्मचारियों की स्टोर रूम तक पहुंच थी और यह खुला था और उनके सीधे नियंत्रण में नहीं था। एक जज की संदिग्ध मौत के मामले में अगर साथी जजों पर भरोसा किया जाना चाहिये तो जज के अपने मामले में नहीं किये जाने का कोई कारण नहीं है।

इसलिये जांच हो या नहीं, जजों का फैसला तो मालूम है। सीबीआई, ईडी या पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि अंततः उसकी पुष्टि जज को ही करनी है और वे करेंगे कि नहीं। इसलिए यह मान लिया जाना चाहिये कि पैसे बरामद नहीं हुए है और जजों के फैसले हम जानते हैं। और यह भी कि वर्षों से न्याय की देवी की आंखों की पट्टी अब खोल दी गई है। दूसरी ओर, देश में अगर जज की हत्या का अंदेशा रहेगा तो फैसले निष्पक्ष कैसे होंगे? जज भी मनुष्य हैं और इसी समाज में रहते हैं। उन्हें पता है कि हत्या हो गई और जांच भी नहीं हुई तो कौन किसी मामले की जांच ईमानदारी से करेगा औऱ कौन ऐसे मामलों में पड़ेगा। यह अकारण नहीं है कि 14 मार्च को आग लगी और करोड़ों की नकदी जल जाने खबर हफ्ते भर बाद छपी। उसके बाद भी लोगों को भ्रमित करने की स्पष्ट कोशिश हुई। किसने की – सार्वजनिक होने के बाद भी यह जानने-बताने की जरूरत नहीं समझी गई है कि उनने खुद की या किसी के दबाव में किया। ऐसे में मुझे नहीं लगता है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी और संतोषजनक कारण मालूम होगा। जो भी हो, अभी खबर यह नहीं है कि जांच शुरू हो गई। खबर यह है कि जांच निष्पक्ष कैसे होगी या हो भी पायेगी कि नहीं।

मेरे सभी अखबारो में आज सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया और द टेलीग्राफ का शीर्षक ऐसे इशारे कर रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, हाईकोर्ट जज के खिलाफ जांच शीघ्र समाप्त न होने की आशंका। इंट्रो है, कॉल डाटा विश्लेषण के लिए विशेषज्ञ की आवश्यकता हो सकती है। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, कैश बेग्स बर्निंग क्वेश्चंस (नकदी ज्वलंत प्रश्न उठा रही है)। जज के स्टोररूम में आग का (उलझा हुआ) रहस्य। यहां उलझा हुआ को कोष्ठक में रखकर रेखांकित कर दिया गया है और इससे समझ में आ रहा है कि यह उलझा हुआ क्यों है। जाहिर है, जज साब के घर में होने के बावजूद उन्हें इसकी जानकारी न होने के दावे से, वीडियो में अग्निशमन कर्मचारियों के आग बुझाते दिखने के बावजूद अग्नि शमन सेवा प्रमुख का यह बयान कि नकदी बरामद नहीं हुई जबकि उनका काम नहीं था और जब खबर थी कि नकदी मिली है (जलने की खबर तो बाद में आई) तो यह किसलिये कहा गया कि बरामद नहीं हुई है जबकि जल गई थी और यह क्यों नहीं कहा गया कि कुछ नकदी जरूर जली है। इन सबके बाद अगर कहा जाये कि जले नोट नकली थे या फिल्म की सूटिंग के लिए रखे गये थे गलत कैसे साबित होगा। खासकर तब जब जब अपराध स्वीकारने वाले ऐसे एक स्टिंग वीडियो को नाटक की प्रैक्टिस करके अदालत से राहत ली जा चुकी है। नवोदय टाइम्स की लीड थोड़ी हटके है। “जस्टिस कैश कांड : एफआईआर के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका”। द हिन्दू की लीड बताती है कि मुख्य न्यायाधीश ने जस्टिस वर्मा के घर तैनात गार्ड के विवरण मांगे हैं। कुल मिलाकर, मूल खबर का कोई जोरदार फॉलोअप अभी तक नहीं है। कायदे से एक फॉलोअप यह हो सकता है कि जज वर्मा ने कौन से मामले देखे हैं और दूसरा यह कि 14 मार्च को आग लगने के बाद 15 को जब कई लोगों को सूचना थी और खबर नहीं छपी, लोगों से वीडियो डिलीट करवाये गये उस दौरान और क्या हुआ। पर यह सब नहीं है।

आज की दूसरी खबरें बिहार चुनाव के लिहाज से माहौल बनाने वाली हैं। अखबारों का यह काम नहीं है और उन्हें पैसे लेकर भी यह सब नहीं करना चाहिये और जो पैसे लेकर छापा जाये वह विज्ञापन है, बताने का नियम भी है। लेकिन 2014 के बाद मीडिया को जो आजादी मिली है उसमें कुछ भी हो सकता है। धार्मिक ध्रुवीकरण के प्रयास चल रहे हैं। उसका असर दिख रहा है और अब बिहारियों को प्रभावित करने के काम चल रहे हैं। इनमें इस साल बिहार दिवस पर विशेष जोर, प्रवासी बिहारियों का सम्मलेन आदि के बाद आज दि एशियन एज में तीन कॉलम की खबर, बीजेपी के चमके बिहार पर है। चार कॉलम का एक शीर्षक है, “बिल्ड ‘हारमोनियस’ हिन्दू सोसाइटी : आरएसएस”। आज टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड का शीर्षक है, नागपुर दंगे के आरोपी का घर आज गिराया जायेगा। इसके साथ एक खबर है,  नारों के बाद घर, दुकान गिराई गई। सुप्रीम कोर्ट में अपील पर सुनवाई आज। आप जानते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाले पैनल की नियुक्ति से संबंधित मामला अटका हुआ है। सरकार ने नियुक्ति कर दी है, कार्यभार दिला दिया है।

इंडियन एक्सप्रेस की लीड आज अमेरिकी टैरिफ और भारतीय प्रयासों के प्रचार से संबंधित है। अमर उजाला की लीड है, धर्म आधारित आरक्षण असांविधानिक, आक्रांता जैसी मानसिकता वाले देश के लिए खतरा। यहां यह याद दिला दूं कि औरंगजेब मुद्दे पर नागपुर में आग लगवा लेने के बाद आरएसएस का बयान आया था कि औरंगजेब अब प्रासंगिक नहीं है। अखबारों में इसे प्रचारित कर भाजपा को दोषमुक्त करने की कोशिश की गई। भक्तों और प्रचारकों ने सोशल मीडिया पर शेयर करके भी माहौल बनाया लेकिन द टेलीग्राफ के शीर्षक में इस ‘सूचना’ के साथ जोड़ दिया गया था, आरएसएस को देर से आई समझ। कहने की जरूरत नहीं है कि आमतौर पर मीडिया अब ऐसी सामान्य बात नहीं बताता है इसीलिए भाजपा और संघ वाले जो चाहे करते हैं और विरोध नहीं हो पाता है। लोग ताली-थाली भी बजा लेते हैं। अभी बिहार चुनाव के लिए हर तरह के प्रचारक मैदान में उतार दिये गये हैं जो ध्रुवीकरण में लगे हैं। देश में जहां हो सके, चुनाव में कुछ ना कुछ लाभ तो भाजपा को मिलता ही है। 

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