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आज के अखबार : जज को फंसाने का मामला तो जैसे हो ही नहीं सकता जबकि भ्रष्टाचार के कारण, सबूत नहीं हैं

व्यवस्था का काम अभियुक्त को अपराधी साबित करना नहीं है, अपराधी का पता लगाना, उसे अपराधी साबित करना और सजा दिलाना है। अभी तक हमलोग मीडिया की मदद से किसी को भी अपराधी साबित कर देते हैं बाद में वह जांच में अपराधी पाया जाये या नहीं। कई बार तो जांच में जो अपराधी मिलता है वह भी अदालत में साबित नहीं होता है। पूरी व्यवस्था अंधेर नगरी चौपट राजा जैसी होने का दावा किया गया। जिन लोगों ने नई व्यवस्था में स्थिति सुधरने की उम्मीद की थी वो भी निराश हुए होंगे।

संजय कुमार सिंह

आज मेरे सभी अखबारों में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट किये जाने की खबर लीड या सेकेंड लीड है। उनके घर पर आग लगने के बाद स्टोर में बोरियों में नकदी होने की खबर हफ्ते भर बाद छपने और तब न सिर्फ तबादले से इनकार किये जाने बल्कि नोट बरामद नहीं होने की खबर देने के बाद आग बुझाने का वीडियो सार्वजनिक किये जाने तक मामले को दबाने-छिपाने और वीडियो को सार्वजनिक किये जाने मजबूरी बहुत हद तक स्पष्ट है। इसमें पाप धोने वाले शहर के रूप में प्रचारित प्रयागराज तबादला और वहां के बार एसोसिएशन का विरोध भी असाधारण है। ठीक है, गृहनगर वापस भेजा जाना सजा नहीं है और अपराध के मुकाबले तो बिल्कुल नहीं। ऐसे में क्या यह मान लिया जाये कि अभी दोषी नहीं माना गया है। अगर ऐसा है तो मीडिया अपना काम क्यों नहीं कर रहा है। व्यवस्था भी अपना काम बेखौफ होकर करती नहीं दिख रही है। व्यवस्था पर दबाव के संकेत पहले भी दिखे हैं और अब भी दिख रहे हैं और इसमें मीडिया पर नियंत्रण शामिल है। मेरा मानना है कि आम लोगों के मामले में न्याय हो या नहीं, जज को फंसाये जाने के इस मामले में न्याय होता दिखना चाहिये। इस मामले की ठीक से जांच हो जाये तो पहले के भी बहुत सारे मामले स्पष्ट हो सकते हैं और इसलिए मुझे शक है कि निष्पक्ष जांच होगी। जो स्थितियां हैं उसमें हो ही नहीं सकतीं। पुराने मामले गवाह हैं कि पहले जिन लोगों ने न्याय सुनिश्चित करने के लिए कुछ नहीं किया वे अब भी चुप हैं। हालांकि, आज खबर है कि उपराष्ट्रपति ने न्यायिक जिम्मेदारी के मुद्दे पर विपक्ष के नेता और सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष (जो महीनों से काम चलाऊ हैं और दोहरी भूमिका निभा रहे हैं) से मुलाकात की है। द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है।

वसुधैव कुटुम्बकम में यकीन करने वाले पंच परमेश्वर के हमारे देश में न्याय का सिद्धांत रहा है कि अपराधी छूट जाये तो छूट जाये, निर्दोष को सजा न हो। 2014 के बाद मिली कथित आजादी में निर्दोष के मारे जाने से लेकर अपराधियों को माफी मिलने तक के उदाहरण हैं। हालांकि यह सब आम आदमी के लिए था और किसी जज को अभी तक सजा नहीं हुई है। केंद्र की भाजपा सरकार के शासन में पहली बार मंत्री और मुख्यमंत्री को जेल भेजने के बाद अब हाईकोर्ट के एक जज मुश्किल में हैं और अगर वे कह रहे हैं कि घर के बाहर स्टोर में बोरियों में रखी नकदी उनकी नहीं है तो इसपर यकीन नहीं करने के कारण सार्वजनिक नहीं हैं। उसपर मैं कल लिख चुका हूं कि सीबीआई के जज बीके लोया की संदिग्ध मौत के मामले में ‘ब्रदर जजों’ की बात पर यकीन किया गया था तो यहां जज की सफाई पर यकीन नहीं करने के ठोस कारण होने चाहिये। अभी तक वो मामले सार्वजनिक नहीं हैं जिनके लिए न्यायमूर्ति वर्मा को पैसे मिले हो सकते हैं। इस मामले में ट्रोल सेना और व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी ने एक फर्जी और फूहड़ कोशिश की है। इसलिए जज की बात पर यकीन करना बनता है। वैसे भी यह मौजूदा व्यवस्था की कार्यशैली के अनुकूल है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति वर्मा की जितनी बदनामी हो चुकी है उससे नहीं लगता है कि उनके साथ न्याय होगा। सरकार का काम आरोपी को सजा दिलाना या अभियुक्ति साबित करना नहीं है। सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि साजिश का पता चले, अपराधी अगर कोई हो तो पकड़ा जाये। जज का मामला हो तो निश्चित रूप से अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। इसमें सरकार को स्वयं भी बेदाग साबित होना जरूरी है।

वैसे भी, इस सरकार ने ऐसे नियम बनाये और प्रचारित किये हैं कि बैंकों से ज्यादा नकदी विशेष मामलों में निकाले जा सकते हैं। और उनका पता लगाना मुश्किल नहीं है। 2000 के नोट हाल में खत्म हुए हैं और जले हुए नोटों में 2000 के नोट नहीं थे तो बंद होने के बाद बदले गये कि नहीं और 500 के नोटों में भारी नकदी किन लोगों ने निकाली और उनके न्यायमूर्ति के घर (स्टोर) तक पहुंचने की क्या और कितनी संभावनाएं हैं इसका पता लगाना आसान नहीं है तो मुश्किल भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इसीलिए सुरक्षा कर्मचारियों उनके फोन और उसके रिकार्ड मांगे हैं पर यह काम दिल्ली पुलिस ने खुद क्यों नहीं किया और सरकार ने अपनी ईडी शाखा की जांच क्यों नहीं शुरू कराई। इसके बावजूद, इंडियन एक्सप्रेस में आज प्रचार वाली एक खबर है, जांच में सहायता के लिए आग लगने की जगह पहुंचने वाले 5 पुलिसियों ने अपने फोन जमा किये। यहां गौर करने लायक बाद है कि जब आग लगी तो स्टोर में ताला लगा था और दमकलकर्मियों को ताला तोड़कर घुसना पड़ा। अभी यह सार्वजनिक नहीं है कि ताले की चाभी मिली या नहीं और मिली तो किसके पास थी। सबसे पहले उसके फोन की जांच होनी चाहिये थी लेकिन कई दिनो बाद आज भी उसकी खबर नहीं है।

यहां सवाल उठता है कि, क्या ईडी को वाकई विपक्षी नेताओं के लिए सुरक्षित और विशेष बना कर रखा गया है और अगर ऐसा है तो सरकार की जांच पर कैसे भरोसा होगा और क्या जज ‘भाई जज’ की मौत के मामले की जांच नहीं होने, प्रभावशाली फैसला देने वाले जज को ईनाम मिलने आदि से अनभिज्ञ होंगे कि वे निष्पक्ष न्याय कर पायेंगे। और जज लोया के मामले में अगर आशंका ही है तो धनबाद के जज उत्तम आनंद की हत्या के मामले में दो लोगों को सजा हो चुकी है। इसलिये ऐसा नहीं है कि जज को फंसाया नहीं जा सकता है। धनबाद के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश 28 जुलाई 2021 को मार्निंग वॉक कर रहे थे तभी एक वाहन चालक ने उन्हें पीछे से टक्कर मार दी थी। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई। सरकार ने इसकी सीबीआई जांच का आदेश दिया था। चालक और उसके साथी राहुल वर्मा और लक्ष्मण वर्मा को सीबीआई की एक विशेष अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हाईकोर्ट को सीबीआई ने बताया कि जांच पूरी हो गई है। चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। दोनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा हुई है। सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले को खुद ही उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वो हाईकोर्ट में चल रही इस मामले की सुनवाई में दखल का इरादा नहीं रखती है। 24 अक्तूबर 2024 की एक खबर के अनुसार, आगे जांच की आवश्यकता नहीं है। कुल मिलाकर तीन साल से कुछ ऊपर में जांच पूरी होकर सजा हो गई। हाईकोर्ट औऱ सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान भी लिया। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को भी उनके कार्यकाल के अंतिम दिनों में फंसाया ही गया था। उनपर यौन शोषण का आरोप, फिर आरोप लगाने वाली को नौकरी से निकाल दिया जाना और राम मंदिर मामले में उनके फैसले के बाद शिकायत करने वाली लड़की को फिर नौकरी पर रख लिया जाना। मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा के लिए मनोनीत किये जाने का ईनाम जितना बताता है उससे ज्यादा उलझाता है। यही व्यवस्था है और ऐसा ही होना चाहिये। लेकिन जज लोया के मामले में नहीं हुआ और अब भी मामला वैसे नहीं बढ़ रहा है। इसका कारण अलग स्थितियां हैं और उसे समझना मुश्किल नहीं है। संभव है नतीजे भी कुछ और चाहिये हों।

इस पूरे मामले में इस समय अमेरिका में रह रहे इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संवाददाता और प्रयागराज के निवासी अजीत शाही ने अपने वकील मित्र के हवाले से लिखा है, कोई जज बेईमान होता है तो सबसे पहले वकीलों को मालूम पड़ जाता है। यह मुमकिन नहीं कि किसी जज के रिश्वतख़ोर होने की बात छिपी रहे। उनको हैरत है कि जज वर्मा के घर करोड़ों की रक़म मिली है क्योंकि आजतक किसी वकील ने सोचा न था कि जज वर्मा भ्रष्ट हो सकते हैं। दूसरी बात वकील मित्र ने ये कही कि जज वर्मा ने कई फ़ैसले मोदी सरकार के ख़िलाफ़ दिए हैं। ख़ासतौर से ईडी के ख़िलाफ़। जहाँ दूसरे जज मुक़दमे लटका कर रखते हैं, जज वर्मा जल्द फ़ैसला लेने वाले जजों में गिने जाते हैं। केजरीवाल सरकार के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को भी इसी जज ने राहत दी थी। वकील मित्र ने कहा कि ये भी आश्चर्य की बात है कि कोई जज करोड़ों की अवैध रक़म अपने घर के आउटहाउस में रखेगा। रखना होगा तो घर के भीतर छिपा कर रखेगा। मैंने पहले भी कहा है कि जज वर्मा अगर भ्रष्ट होते तो उनके फैसलों को भी गिनाया जाना चाहिये और जो गिनाया गया है वह उनका नहीं था या उसमें गलती थी। इसलिए मामला इतना सीधा नहीं है और अभी तक न तो जज का भ्रष्ट होना साबित हुआ है न ही उनके इस दावे का खंडन हुआ है कि पैसे उनके नहीं हैं। लेकिन आज इलाहाबाद हाईकोर्ट के बार के विरोध के बावजूद तबादले तथा उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिये जाने की खबर से लगता है कि दाल में कुछ न कुछ तो काला है जबकि जो काला है वह दूध में भी हो सकता है। कल्पना कीजिये कि जिन ताकतों ने जज लोया की हत्या करवाई उन्हीं ताकतों ने न्यायमूर्ति वर्मा को फंसाया हो तो क्या होगा?

जहां तक सरकार और उसके काम का सवाल है, कॉमेडियन कुणाल कामरा के खिलाफ एफआईआर, उनके स्टूडियो में तोड़फोड़ और उनसे माफी मांगने की मांग जैसी खबरों से पता चलता है कि देश में डबल इंजन वाले राज्य कैसे चल रहे हैं। द टेलीग्राफ में आज यह खबर लीड है। इसपर आज के संपादकीय पढ़ने-समझने लायक हैं। इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय का शीर्षक एक ही है, अ जोक। आज की दूसरी बड़ी खबर डबल इंजन वाली सरकार के बुलडोजर न्याय पर है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को फटकार लगाई है और भूखंड पर दावा नहीं करने का शपथपत्र मांगा है। इससे आप समझ सकते हैं कि हिन्दू मुसलमान करके सत्ता में आई पार्टी कर क्या रही है। अमर उजाला और नवोदय टाइम्स दोनों ने सांसदों के वेतन भत्ते में वृद्धि की खबर को पहले पन्ने पर रखा है। कहने की जज के घर नकदी मिलने के मामले में सरकार क्या कर रही है और क्या नहीं – इस बारे में भी भले अखबारों से कुछ पता नहीं चल रहा हो पर सरकार हमेशा की तरह गंभीर मुद्दों को छोड़कर फाललू या कम गंभीर मुद्दों पर गंभीर है। ऐसे मामलों में कॉमेडियन कुणाल कामरा का मामला तो है ही कर्नाटक विधानसभा में कोटा के सवाल पर उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की कही किसी बात को मुद्दा बनाने की खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर है। द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। इसका शीर्षक है, संविधान परिवर्तन – जूता दूसरे पैर पर। खबर के अनुसार, भाजपा ने सोमवार को कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की टिप्पणी को भुनाया कि “संविधान बदला जाएगा”। यह धर्म आधारित आरक्षण को समायोजित करने के संदर्भ में कहा गया है। खबर में कहा गया है, ऐसा लगता है कि भाजपा ने इन टिप्पणियों में न केवल कांग्रेस को घेरने का बल्कि “संविधान परिवर्तन” के मुद्दे को भी पलटने का अवसर सूँघ लिया है। आप जानते हैं कि भाजपा नेताओं के यह कहने पर कि पूर्ण बहुमत मिला तो संविधान बदला जायेगा विपक्ष ने आरोप लगाया था कि भाजपा को चुनाव में बहुमत मिल गया तो वह इसका इस्तेमाल संविधान बदलने और आरक्षण को खत्म करने के लिए करेगी।

आप जानते हैं कि भाजपा हिन्दू राष्ट्र की पक्षधर है और 1947 के बंटवारे का भी विरोध करती रही है। समझने वाली बात है कि उस समय जो सर्वश्रेष्ठ हो सकता था किया गया होगा और अगर कुछ गलत हुआ तो उसे बाद में ठीक किया जा सकता था पर भाजपा और उसके पितृ संगठन तथा अब के उसके लोगों के पूर्वजों तथा पूर्ववर्तियों ने उस समय जो किया या नहीं किया उसे भूलकर भाजपा के लोग विभाजन के लिए कांग्रेस को दोषी मानते हैं और ठहराते हैं। उनके प्रचारतंत्र ने इसके लिए गांधी जी को जिम्मेदार ठहराया और उनकी हत्या तक हो गई। भाजपा के लोग हत्यारे नाथू राम गोडसे के समर्थक हैं और देश के पहले आतंकवादी की करतूत को वध कहते हैं। अपने मुसलिम विरोध को छिपाते नहीं हैं और कांग्रेस को हिन्दू विरोधी प्रचारित करते हैं। कांग्रेस भाजपा की इस घटिया राजनीति का जवाब नहीं देती और अपनी राजनीति करती है। ऐसे में संविधान बदलने का मुद्दा देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिहाज से जितना गंभीर और देश विरोधी है, उसका विरोध करती है और भाजपा संविधान में संशोधन को संविधान बदलने के रूप में पेश करने लगी है। कांग्रेस संविधान संशोधन की बात करती है जो संविधान के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है जबकि धर्मनिरपेक्ष भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए जिस संविधान संशोधन की बात भाजपा करती है वह इससे बहुत अलग है।

भाजपा नहीं चाहती है कि लोग इसे समझें और संभवतः इसीलिए नहीं चाहती है कि लोग शिक्षित हों। इसीलिए उसके पास जो शिक्षित लोग हैं वो अपनी डिग्री छिपाते हैं या किसी लायक नहीं दिखते हैं। मीडिया समझने-बताने का काम करे। इसका लाभ उठाकर भाजपा अपने प्रचारतंत्र से लोगों को भ्रमित करती रहती है और धर्म निरपेक्ष देश के संविधान में यह व्यवस्था है कि दूसरे धर्म के लोगों को उनके धर्म के अनुसार जीने-रहने की आजादी मिले। पर भाजपा एक देश एक टैक्स और एक चुनाव जैसे गैर महत्वपूर्ण मुद्दों के सहारे एक धर्म और एक जीवनशैली को दूसरों पर थोपना चाहती है। और ऐसे ही काम करती है। इस तरह भाजपा ने इस मुद्दे को जान-बूझकर उलझा दिया है और लोगों को भ्रम में रखती है। चूंकि सत्ता में बने रहने के लिए यह आसान तरीका है इसलिए इसका लाभ उठाती है और मीडिया नहीं बताता है तो विपक्ष का काम बढ़ जाता है और विपक्ष अगर उसका मुकाबला करने लगे तो वह अपने दूसरे काम नहीं कर पायेगा। सत्ता में आने के बाद से भाजपा विपक्ष को दूसरे तरीकों से भी कमजोर करने में लगी है।  

लोकसभा चुनाव में भाजपा ने संविधान बदलने के मामले में (अपने नेताओं के पूर्व कथन से) यू-टर्न लिया और इससे इनकार किया, लेकिन उसकी सीटें कम हो गईं। खबर यह भी है कि कई सीटें चुनाव में गड़बड़ी करके जीती गई हैं इसलिए उसकी सरकार भले बन गई पर वह चुनाव में इसे मुद्दा बनायेगी तो नुकसान में रहेगी। इससे निपटने की भाजपा की अपनी तैयारी और योजना है पर फिलहाल माना जा रहा है कि यह आरोप पार्टी के बहुमत से चूकने का एक मुख्य कारण है। इसलिए, इस मुद्दे पर भाजपा ने सोमवार को संसद के दोनों सदनों में गतिरोध पैदा कर दिया। इसमें केंद्रीय मंत्रियों ने कांग्रेस पर “राष्ट्रीय हितों पर तुष्टीकरण को प्राथमिकता देने” का आरोप लगाया और शिवकुमार को बर्खास्त करने की मांग की। तथ्य यह है कि भारत और पाकिस्तान एक समय आजाद हुए। धर्मनरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत ने पाकिस्तान और वहां की तानाशाही के मुकाबले ज्यादा प्रगति की है और ऐसे में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोशिश देश विरोधी हरकत है पर भाजपा अपने प्रचारकों और समर्थकों की मदद से माहौल बनाने में लगी रहती है। आज यह खबर मेरे दूसरे अखबारों में भाजपा के प्रचार और समर्थन में ही छपी है सिर्फ टेलीग्राफ ने शीर्षक में कहा है कि जूता दूसरे पांव पर पड़ गया। खबर के अनुसार, संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस पर हमला बोला। इसमें भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी शामिल हुए। रिजिजू ने लोकसभा में कहा, “कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता, जो एक संवैधानिक पद पर हैं, ने बयान दिया है कि वे मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए संविधान में बदलाव करने जा रहे हैं। यह सदन चुप कैसे रह सकता है?” उन्होंने राज्यसभा में कहा, “हम इस बयान को हल्के में नहीं ले सकते… यह भारत के संविधान पर हमला है।” ऊपर बता चुका हूं कि ऐसा नहीं है फिर भी खबर आगे कहती है, “हम विपक्ष के नेता से स्पष्ट जवाब चाहते हैं कि कांग्रेस मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए संविधान में बदलाव क्यों करना चाहती है।” शिवकुमार ने भाजपा पर उन्हें गलत तरीके से उद्धृत करने का आरोप लगाया। उच्च सदन में कांग्रेस के मुख्य सचेतक जयराम रमेश ने विशेषाधिकार हनन नोटिस पेश कर रिजिजू पर “झूठे दावों” के साथ सदन को गुमराह करने का आरोप लगाया। देखिये, कांग्रेस के ये आरोप आपके अखबार में हैं? 

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