
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में जली हुई नकदी के बहाने जजों की नियुक्ति वाले कॉलेजियम पर प्रहार की खबर के साथ सरकार का प्रचार भी जारी है। कहने की जरूरत नहीं है कि अभी तक सरकार का रुख यही रहता है कि अदालत सर्वोपरि है लेकिन जब अदालत का फैसला अनुकूल न हो सरकार मनमानी भी करती है और यह बहुमत के बुलडोजर के रूप में तो होता ही है अदालती फैसले का इंतजार किये बगैर मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और उनके पदभार ग्रहण के के रूप में भी सामने आया है। दिलचस्प यह है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई नहीं हो पाई क्योंकि सोलिसीटर जनरल दूसरे मामले में व्यस्त थे। बाद में वे आरटीआई मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय और पूर्व सेबी प्रमुख के मामले में सेबी की ओर से पेश हुए। यह सब तब जब सरकार के वकील वे अकेले नहीं हैं और यह भी अदालत में कहा गया। हालांकि, अभी वह सब मुद्दा नहीं है। द हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड से लगता है कि सरकार इस मौके का फायदा उठाकर कालेजियम सिस्टम की आलोचना करना चाहती है। सरकार 2014 के अपने एनजेएसी ऐक्ट के पक्ष में है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस संबंध में एक्स पर लिखा है, सरकार न्यायपालिका में नियुक्तियों पर अधिक नियंत्रण पाने के लिए न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा मामले का उपयोग करने की कोशिश कर रही है। यह विनाशकारी होगा। आज न्यायपालिका के साथ सबसे गंभीर समस्या इसकी मज़बूत स्वतंत्रता की कमी है, जिसके परिणामस्वरूप सरकार को आमतौर पर हमारे अधिकारों और संविधान का हनन करने से नहीं रोका जाता है। न्यायिक नियुक्तियों पर सरकार का नियंत्रण हमारे संविधान की मृत्यु की घंटी बजा देगा। उन्होंने यह भी लिखा है, वैसे, पारदर्शिता और चयन की उचित प्रणाली न होने के कारण अक्सर भाई-भतीजावाद होता है। नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली में समस्याएं हैं, लेकिन कॉलेजियम सरकार द्वारा चुने जाने वाले न्यायाधीशों की तुलना में अधिक स्वतंत्र न्यायाधीशों का चयन करता है। हमें एक पूर्णकालिक न्यायिक नियुक्ति आयोग की आवश्यकता है जो सरकार से स्वतंत्र हो और पूरी पारदर्शिता के साथ न्यायाधीशों का चयन करे।
जहां तक जजों के भ्रष्टाचार की बात है, यह व्यवस्था की जानकारी और मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। अगर सरकारी एजेंसियों को इस स्तर पर कमाई की जानकारी नहीं मिली और आग नहीं लगी होती तो इसका पता चलने की कोई संभावना नहीं थी और कार्रवाई दिल्ली पुलिस की सूचना से नहीं, खबर छपने से हुई है तो जाहिर है कि भ्रष्टाचार को बहाना नहीं बनाया जा सकता है और भ्रष्टाचार सरकारी एजेंसियों की नालायकी (या मिलीभगत) के बिना संभव नहीं है। इक्का दुक्का मामले अलग हैं और उनकी शिकायत तथा उनपर कार्रवाई पहले होती ही थी। वैसे भी भ्रष्टाचार के मामलों में इस सरकार की कार्रवाई का रिकार्ड संतोषजनक नहीं है। फिर भी सरकार की ओर से कोशिशें हो रही हैं और जैसा मैंने कल लिखा था, आज खबर है कि उपराष्ट्रपति ने न्यायिक जिम्मेदारी के मुद्दे पर विपक्ष के नेता और सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष (जो महीनों से काम चलाऊ हैं और दोहरी भूमिका निभा रहे हैं) से मुलाकात की है। द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है।
आज द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, “सरकार, विपक्ष ने कॉलेजियम सिस्टम में बदलाव की अपील की”। जेपी नड्डा राज्यसभा के फ्लोर लीडर्स से आमने-सामने की बात करेंगे और किसी समाधान पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। खरगे ने सरकार से अपील की है कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिये गये एनजेएसी ऐक्ट पर अपना रुख स्पष्ट करे। अखबार ने लिखा है कि न्यायमूर्ति वर्मा के घर पर अधजली नकदी बरामद होने के संदर्भ में हुई बैठक के जरिये न्यायिक नियुक्तियों में संसद के एक अन्य हस्तक्षेप का आधार बनाया जा रहा है। इससे पहले राज्यसभा अध्यक्ष ने सदन में कहा था कि अधजले नोट बरामद होना बेशक गंभीर है और बेहद अहम मसला है जो शासन की भिन्न शाखाओं को परेशान कर रहा है। इसके साथ उन्होंने एनजेएसी विधेयक 2014 की भी चर्चा की जिसे उस समय के विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 11 अगस्त 2014 को संसद में पेश किया था। इंडियन एक्सप्रेस की खबर से मामला और स्पष्ट है। फ्लैग शीर्षक है, नकद बरामदगी से संबंधित विवाद पर (राज्य सभा के) फ्लोर लीडर्स की बैठक। सुप्रीम कोर्ट का पैनल जब जांच कर रहा है तब उपराष्ट्रपति (ने कहा) : स्थिति कुछ और हो सकती थी तथा एनजेएसी पर चर्चा फिर से शुरू की। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, धनखड़ ने कहा है, “चौराहों पर हमें विचार करने की जरूरत होती है। यह असाधारण रूप से तकलीफदेह है।” मेरे लिये तकलीफदेह यह है कि इलेक्टोरल बांड जैसे घोटाले पर उन्हें तकलीफ नहीं हुई और उससे संबंधित जांच की जरूरत नहीं समझी गई।
कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा सरकार को न्यायिक नियु्क्तियों के लिए एनजेएसी जरूरी लग रहा है और अधजली नकदी का पता चलने के बाद इसे बहाने के रूप में उपयोग किया जा रहा है लेकिन इलेक्टोरल बांड का मामला भी वसूली और भ्रष्टाचार को अधिकृत रूप देने का लगा था तो उसकी जांच क्यों नहीं करवाई गई समझना मुश्किल नहीं है। एनजेएसी का समर्थन वैसे ही है जैसे कालाधन खत्म करने के लिए नोटबंदी का समर्थन किया गया क्योंकि उसे रामबाण औषधि बताया गया था औऱ नाकाम रहने पर उसकी चर्चा भी नहीं की जाती है। इसी तरह देश में भ्रष्टाचार के लिए विदेशों में रिश्वत, उन्हें स्विस बैंक में रखा जाना और फिर शेल कंपनियों के जरिये उनका भारत में निवेश कर दिया जाना बताया गया। इसे रोकने के लिए लाखों शेल कंपनियां बंद की गईं पर निवेश नहीं रुके और उसकी जांच नहीं की गई। उल्टे इसकी मांग करने वालों को परेशान किया गया। कुल मिलाकर, साफ दिख रहा है कि सरकार अपने अनुकूल व्यवस्था करना चाहती है जिसमें न वह कभी चुनाव हारेगी ना उसकी मनमानी पर कोई नजर रखेगा। मीडिया ने यह काम पहले छोड़ दिया है। अदालतों का हाल हम जानते हैं और सुप्रीम कोर्ट में अगर भाजपा कभी-कभी हारती है तो उसका इंतजाम करना चाहती है। तय जनता को करना है लेकिन वह मुफ्त राशन से संतुष्ट है या कर दी गई है।
ऐसे में इस सरकार के खिलाफ अमेरिकी टैरिफ मुद्दा बन रहा था तो आज उससे संबंधित खबर कई अखबारों में है। अमर उजाला में आज दो पहला पन्ना है। पहले पर दिल्ली सरकार का बजट है और दूसरे की लीड का शीर्षक है, ट्रम्प से मिली राहत तो वस्तुओं के 55 फीसदी आयात पर भारत भी टैरिफ घटा सकता है। सरकार की उदारता और मजबूरी बताने वाली अमर उजाला की इस खबर का आधार टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर लगती है, ट्रम्प ने कहा कि कुछ देश शुल्क में छूट प्राप्त कर सकते हैं। मामला यह लगता है कि ट्रम्प ने आंख मूंदकर शुल्क लगाये। भारत ने सिर झुकाकर स्वीकार किया और उसकी मांग पर शुल्क कम भी करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, सोच विचार करने पर ट्रम्प को भी समझ में आया होगा कि कुछ देशों को कुछ मामलों में छूट अमेरिका के हित में जरूरी है। अब वे छूट की घोषणा कर सकते हैं जो उनके लिए जरूरी है लेकिन बदले में जिन्हें छूट देंगे उनसे छूट मांगेंगे और तब दी जाने वाली छूट की आलोचना न हो इसलिए यह सरकार के समर्थन में उदार खबर है। लेकिन होगा यह कि अमेरिका उन मामलों में शुल्क की कमी करेगा जिनकी उसे जरूरत है। बदले में भारत उन मामलों में शुल्क की कमी करेगा जिसकी अमेरिका को जरूरत है। जैसे महंगी मोटरसाइकिल। अब भारत में इसकी कोई जरूरत नहीं है। जिसे शौक है वह पैसे दे सकता है लेकिन (आयात) शुल्क कम हो जाये तो अमेरिका की महंगी मोटर साइकिलें (और ऐसी दूसरी चीजें) भारत में ज्यादा बिकेंगी। इस तरह सरकार जो काम दबाव में करेगी उसे उसका मास्टर स्ट्रोक कहा जायेगा। देखते रहिये।
इसका अंदाजा हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर से लगता है। यहां शीर्षक है, भारत अमेरिका व्यापार वार्ता टैरिफ से आगे तक जा सकती है। इस खबर की शुरुआत इस प्रकार होती है, इस सप्ताह होने वाली महत्वपूर्ण वार्ता से पहले अमेरिका भारत पर सभी अमेरिकी वस्तुओं के लिए उच्च टैरिफ बाधाओं को एक व्यापक कदम के रूप में कम करने का दबाव बना रहा है, न कि एक-एक करके। इन लोगों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि वाशिंगटन भारतीय किसानों और छोटे उद्योगों की रक्षा के लिए प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते में कोटा प्रतिबंध जैसे अंतर्निहित तंत्रों के माध्यम से नई दिल्ली की चिंताओं को दूर करने के लिए तैयार है। आप कह सकते हैं कि सरकार के लिए यह समय हेडलाइन मैनेजमेंट के लिहाज से मुश्किल है। उसमें उसे और उसक प्रचारकों को कार्टून और कॉमेडियन से निपटना पड़ रहा है। पत्रकार कॉमेडियन को कमीडियन कहकर सहयोग दे रहे हैं या गुस्सा निकाल रहे हैं। ऐसे समय में केंद्रीय गृहमंत्री ने यह दावा किया है कि जम्मू कश्मीर से अलगाववाद को खत्म कर दिया गया है (अमर उजाला)। नवोदय टाइम्स आज दिल्ली के बजट में ही डूब गया है। दो पहले पन्ने और बीच का तीसरा पन्ना भी बजटमय है। मैंने दूसरी खबर ढूंढ़ने की कोशिश ही नहीं की बल्कि उसे किनारे रख दिया। इस खबर का शीर्षक है, हुर्रियत कांफ्रेंस के तीन घटकों का अलगाववाद से किनारा। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, हुर्रियत से वास्ता नहीं, मैं भारत का वफादार नागरिक : सलीम। खबर के अनुसार, जेकेपीएम के अध्यक्ष शाहिद सलीम ने कहा है, मुझे और मेरे संगठन को अलगाववादी विचार धारा से कोई सहानुभूति नहीं है। यह जम्मू कश्मीर के लोगों की वैध आकांक्षाओं को संबोधित करने में सक्षम नहीं है। मूल ‘खबर’ के अनुसार अन्य संगठनों के साथ जेकेपीएम ने भी अलगाववाद से सभी रिश्ते खत्म कर मुख्यधारा में लौटने की घोषणा की है।
हेडलाइन मैनजेंमेंट
इससे आप दावा और दावे की सच्चाई समझ सकते हैं। मैं इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कहता हूं और इसका पता आज द टेलीग्राफ की लीड से चलता है। फ्लैग शीर्षक है, जम्मू और कश्मीर पर अमित शाह का दावा नामों को लेकर गलती कर गया। मुख्य शीर्षक है, अलगाववाद (खत्म होने) की खबर पहचान के संकट में। श्रीनगर डेटलाइन से मुजफ्फर रैना की खबर बताती है कि वे मामले को केंद्रीय गृहमंत्री से बेहतर समझते हैं। संभव है कि यह वास्तविकता नहीं हो और इसका कारण उनका लिखना भर हो जो जाहिर है, हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए लिखा गया है। इस लिहाज से मैं कहूंगा कि सरकार यह काम भी अब ठीक से नहीं कर रही है या कर पा रही है। खबर के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को घोषणा की कि कश्मीर में अलगाववाद अब “इतिहास” बन चुका है, दो समूहों ने इस विचारधारा से नाता तोड़ने का फैसला किया है। इस तरह उन्होंने सचमुच में दशकों पुराने आंदोलन का मृत्युलेख लिख दिया। शाह ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) और जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक पॉलिटिकल मूवमेंट (जेकेडीपीएम) का नाम लिया, जिन्होंने अलगाववाद से सभी संबंध खत्म कर लिए हैं। हालांकि, जल्द ही उन्होंने नाम हटाने के लिए पोस्ट को संपादित कर दिया। दरअसल, जेकेपीएम अब अस्तित्व में नहीं है और कभी अलगाववादी पार्टी नहीं रही, लेकिन जेकेडीपीएम एक महत्वहीन संगठन है।
इस तरह, केंद्र सरकार की ओर से इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि किन पार्टियों ने अलगाववाद का त्याग किया है। अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट किया, “कश्मीर में अलगाववाद इतिहास बन चुका है। मोदी सरकार की एकीकरण नीतियों ने अलगाववाद को जम्मू-कश्मीर से बाहर कर दिया है। हुर्रियत से जुड़े दो संगठनों ने अलगाववाद से सभी संबंध तोड़ने की घोषणा की है।” गृह मंत्री ने अन्य समूहों से अलगाववाद से दूर रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “मैं भारत की एकता को मजबूत करने की दिशा में इस कदम का स्वागत करता हूं और ऐसे सभी समूहों से आग्रह करता हूं कि वे आगे आएं और हमेशा के लिए अलगाववाद को खत्म करें। यह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के विकसित, शांतिपूर्ण और एकीकृत भारत के निर्माण के दृष्टिकोण की एक बड़ी जीत है।” 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद अलगाववादी राजनीति को भारी झटका लगा। हालांकि प्रतिबंधित नहीं किया गया है, लेकिन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों गुट केवल नाम के लिए ही मौजूद हैं। उदारवादी हुर्रियत के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक हाल ही में सक्रिय हुए हैं, लेकिन उन्होंने कभी खुद को हुर्रियत प्रमुख नहीं कहा। अधिकांश वरिष्ठ अलगाववादी जेल में हैं और जो रिहा हैं, वे चुप हैं। यहां तक कि उनके बच्चों को भी यात्रा प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। यह कश्मीर में गृहमंत्री या भाजपा की राजनीति और हेडलाइन मैनेंजमेंट का हिस्सा है।
इसे अगर आप सरकार के काम करने का तरीका या उदाहरण मानें तो आज की कुछ और खबरें उल्लेखनीय हैं। मोटे तौर पर आप जानते हैं कि देश के जो हालात हैं उसमें दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर के स्टोर में लाखों रुपये जल जाने की घोषणा (का वीडियो) है और इससे संबंधित खबर एक हफ्ते बाद छपी। इसमें कहा गया था कि रुपये मिलने के बाद संबंधित जज का इलाहाबाद हाईकोर्ट तबादला कर दिया गया है और इसका विरोध चल रहा है। खबर सार्वजनिक होने के बाद विरोध की खबर प्रयागराज से आई। हालांकि, तबादले का विरोध किये जाने और इससे इनकार करने (दरअसल तबादले को इससे संबंधित नहीं कहने) के बाद फिर तबादला कर दिया गया है जबकि संबंधित जज ने कहा है कि घर के बाहर स्टोर में रखा पैसा उनका नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तीन जजों की कमेटी इसकी जांच कर रही है और आज अखबारों में फोटो के साथ इसका पूरा प्रचार है लेकिन दिल्ली पुलिस और मीडिया ने अभी तक ऐसे तथ्य नहीं दिये हैं जिससे यकीन हो कि यह बाहरी साजिश नहीं है या नहीं हो सकती है। जांच होने तक आरोपी को बदनाम करने से बचने का काम कम से कम जज के मामले में तो किया ही जाना चाहिए। लेकिन इस बहाने सरकार और उपराष्ट्रपति की कोशिशें आप ऊपर पढ़ चुके हैं।
सरकार, सरकारी एजेंसियां और मीडिया जब अपना जरूरी काम नहीं कर रहे हैं तब आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर छपी एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अपोलो अस्पताल ने मुफ्त में जमीन पाने की शर्त के अनुसार गरीबों का इलाज मुफ्त किया है कि नहीं उसकी जांच की जाये। दरअसल लीज की मियाद पूरी हो चुकी है और नवीकरण से पहले यह जांच हो रही है और वह भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर। सरकारी नियम है कि ऐसे निजी अस्पतालों को उपलब्ध सरकारी सुविधा के बदले गरीबों की एक निश्चित संख्या का मुफ्त इलाज करना है। यह बहुत अच्छा नियम है और बहुत सारे निजी अस्पतालों के लिये है। बहुत पहले एक प्रेस कांफ्रेंस में मैंने एक निजी अस्पताल के संस्थापकों से सार्वजनिक रूप से पूछा था कि ऐसे मरीजों का फैसला कैसे होता है तो जवाब मिला था कि आप जिसका कहेंगे उसका इलाज किया जायेगा। वैसे तो यह जवाब संतोषजनक और सही नहीं था लेकिन मुझे एक आश्वासन की तरह लगा कि मैं जिस गरीब का चाहूंगा उसका इलाज करा सकूंगा। हालांकि, इसकी जरूरत नहीं पड़ी और मैंने पत्रकारिता छोड़ दी। पर अस्पताल अगर मुफ्त इलाज कर रहे होते और जानने वाले इसका लाभ उठा रहे होते तो कितने ही गरीबों का फायदा हुआ होता। इसका अनुपालन सुनिश्चित करने वालों को चाहिये था कि वे इसे प्रचारित करते और हर महीने मुफ्त इलाज पाने वालों का नाम सार्वजनिक कर दिया जाता तो सरकारी सुविधा से वंचित बहुत सरे लोगों का भला होता। अब अगर सुप्रीम कोर्ट के कहने पर जांच होगी तो आप समझ सकते हैं कि इलाज भले हुआ हो या भले साबित हो जाये पर वह ईमानदारी से जरूरतमंदों का नहीं हुआ होगा और हो रहा होता तो इस आदेश की जरूरत ही नहीं होती। ठीक है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी। लेकिन स्वास्थ्यमंत्री जेल में थे और बाकी मंत्रियों को भी जेल का डर सताता रहा ऐसे में मैं यह अपेक्षा सरकार से तो नहीं करूंगा, उपराज्यपाल का कार्यालय जो पहले जबरन और फिर साधिकार दिल्ली सरकार को काम नहीं करने देता था वह क्या करता रहा?
सरकार के जनहित में काम नहीं करने के इस एक उदाहरण के अलावा दूसरा उदाहरण भी टाइम्स ऑफ इंडिया में ही है। इस खबर के अनुसार केंद्रीय प्रदूषण योजना के 858 करोड़ रुपये में से एक प्रतिशत भी खर्च नहीं हुआ है। इससे आप समझ सकते हैं कि सरकार के काम और उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं। सरकार जनहित वाले काम करने की बजाय सिर्फ चुनाव जीतने के लिए काम करती है और उसमें जनहित के काम शामिल नहीं हैं। सरकार की मनमानी के तहत जो काम हो रहे हैं उससे जनहित का जितना नुकसान हो सरकार को मतलब नहीं है और यह हम 10 साल से देख रहे हैं। आज द हिन्दू में खबर है कि सरकार ने सैमसंग को 601 मिलियन अमेरिकी डॉलर का टैक्स नोटिस भेजा है। यह कंपनी के मुनाफे का बड़ा हिस्सा है और अपनी प्रकृति से ही वसूली का प्रयास लगता है। संभव है कंपनी को यह राशि देनी भी पड़े। लेकिन ऐसे में क्या कंपनी देश में एक भी पैसा खर्च करेगी जो गैर जरूरी हो। और टैक्स का इतना बकाया भी कैसे इकट्ठा होता गया। समय-समय पर वसूला क्यों नहीं गया। अगर कंपनी भारत में काम करने, या रोजगार देने, देश में उपयोगी उपभोक्ता सामग्री बेचने के बदले कुछ टैक्स राहत चाहती है तो देकर क्यों नहीं मामला खत्म किया जा रही है चोरी का मामला है तो सजा होनी चाहिये, मांग क्यों? सरकार इतनी राशि वसूलने पर लगी है जो किसी कंपनी के मुनाफे का बड़ा हिस्सा है। अगर उसे यह राशि देनी ही पड़े तो मुनाफा खत्म हो जायेगा और ऐसी कोई कंपनी भारत में क्यों कारोबार करना चाहेगी?


