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सियासत

कट्टर कांग्रेसी और घनघोर सेक्यूलर रहे जगदंबिका पाल भाजपा के बड़े एसेट बन गए

दयानंद पांडेय-

भी कट्टर कांग्रेसी रहे, भाजपा और आर एस एस को दिन-रात गरियाने वाले कुछ घंटे के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे जगदंबिका पाल कांग्रेस के सो काल्ड सेक्यूलरिज्म के ताबूत पर इस तरह कील ठोंकने वाले बन जाएंगे, यह तो जगदंबिका पाल भी नहीं जानते रहे होंगे।

जगदंबिका पाल के जीजा राम प्रताप बहादुर सिंह, एडवोकेट भी कांग्रेसी थे। गोरखपुर शहर कांग्रेस कमेटी के सचिव थे। राम प्रताप बहादुर सिंह के छोटे और चचेरे भाई हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह गुमनामी में सही, आज भी कांग्रेसी हैं।

गोरखपुर के दो बार ग़ैर कांग्रेसी सांसद रहे बेहद सरल-सहज और अतिशय ईमानदार हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह जब उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे तब ही जगदंबिका पाल युवक कांग्रेस में आए। यह संजय गांधी और इमरजेंसी का ज़माना था। क़ानून की पढ़ाई किए पाल बाद में कांग्रेस सेवादल के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष रहे। प्रधान मंत्री राजीव गांधी के क़रीबी हुए।

ठाकुरवादी राजनीति के तहत अर्जुन सिंह के ख़ास बने। तमाम कांग्रेसी नेताओं की तरह जगदंबिका पाल एजूकेशन माफ़िया भी बने। लखनऊ से लगायत सिद्धार्थ नगर तक दर्जनों इंजीनियरिंग कालेज, मैनेजमेंट कालेजों की लंबी श्रृंखला है उन के पास। यह सब तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के आशीर्वाद से संभव बना। उत्तर प्रदेश में विभिन्न सरकारों में कई बार मंत्री रहे जगदंबिका पाल को अर्जुन सिंह के कहने पर ही राज्यपाल रोमेश भंडारी ने फ़रवरी, 1998 में कल्याण सिंह को बर्खास्त कर रातो रात उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बना दिया था। कुछ घंटे के लिए ही सही। अलग बात है कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्रियों की अधिकृत सरकारी सूची में जगदंबिका पाल का नाम दर्ज नहीं है।

जब कांग्रेस का पतन प्रारंभ हुआ और भाजपा का उत्थान तो समय की नज़ाकत देखते हुए ठाकुरवादी संपर्क में राजनाथ सिंह जगदंबिका पाल के काम आए। अपने एजुकेशन माफिया को बचाने की पाल की बड़ी ज़रूरत भी थी यह। भाजपा का टिकट मिला और जीत गए। दुबारा, तिबारा भी जीते। तमाम कोशिशों के बावजूद मंत्री नहीं बन पाए मोदी सरकार में। लेकिन कट्टर कांग्रेसी और घनघोर सेक्यूलर रहे जगदंबिका पाल भाजपा के एसेट बन गए। बड़े एसेट। वक्फ (संशोधन) विधेयक पर विचार करने वाली संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल वक्फ़ बोर्ड के कारण जीते जी इतिहास में दर्ज हो गए हैं।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्य मंत्री हरीश रावत और जगदंबिका पाल लखनऊ विश्वविद्यालय में सहपाठी रहे हैं। दोनों आज भी दोस्त हैं। राज्य सभा में कांग्रेसी सांसद प्रमोद तिवारी से भी दोस्ती टूटी नहीं है, पाल की। नाम भले मोदी का हो पर जानने वाले जानते हैं कि राजनाथ सिंह ने जगदंबिका पाल का ग़ज़ब इस्तेमाल किया है। जगदंबिका पाल पर संघी होने का आरोप लगा कर उन्हें ख़ारिज करने की, निंदा करने का अवसर भी विपक्ष को नहीं मिल सका है। विपक्ष का सारा ज़ोर और रणनीति, नायडू, नीतीश और जयंत चौधरी आदि को मुस्लिम वोट का भय दिखा कर वक्फ़ बिल के ख़िलाफ़ झांसे में लाने का था।

पर विपक्ष का यह ख़ुद को धोखा देना था। मुसलमानों को भड़काना भर था। सी ए ए की तर्ज़ पर भड़काना था। शाहीन बाग़ तो न बना सका विपक्ष पर अपने राजनीतिक तमाशे और स्वार्थ के लिए मीठी ईद पर भी काली पट्टी बंधवा कर मुसलमानों से कड़वी ईद मनवा दिया। जो भी हो संसद में वक्फ़ बिल पास होना अब सिर्फ औपचारिकता ही रह गया है। दो अप्रैल को चर्चा के बाद तीन अप्रैल, 2025 को तीन तलाक़, 370 और सी ए ए की तरह बिना किसी बाधा के इसे संसद में पास हो जाना है।

जनसंख्या नियंत्रण बिल और समान नागरिक संहिता के लिए रास्ता प्रशस्त हो जाना है। यह राजनीतिक सच्चाई है। बाक़ी सब विपक्ष की मोह माया है। मुस्लिम समाज को बरगलाने के लिए, वोट बैंक की लालसा में इस बिल पर बहस के समय मर्सिया गायन, हिंदू-मुस्लिम की खाई को और चौड़ा करना, फिर वोटिंग के समय संसद से वॉकआऊट कर इस बिल पर खीझ मिटाना, मुसलमानों को दंगे की हद तक भड़काना ही लक्ष्य है। संख्या बल के आगे हताश और पराजित विपक्ष के लिए इस डाल से उस डाल पर कूदने वाला यह मंकी एफर्ट भी उचित ही है।

राजनीति सचमुच वेश्या से भी गई गुज़री है। पुराने लोग अगर यह कहते थे, तो ग़लत नहीं कहते थे। अब तो लगता है, यह भी बहुत थोड़ा कहते थे। राजनीति अब इस से भी बहुत-बहुत आगे निकल गई है।

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