
संजय कुमार सिंह
आज की सबसे बड़ी खबर यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती मामले में 25 हजार भर्तियों को रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। हेडलाइन मैनेजमेंट के इस जमाने में आज यह खबर मेरे आठ अखबारों में से सिर्फ एक, द टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। कोलकाता के द टेलीग्राफ में लीड होना खबर नहीं है। पर यह मामला सिर्फ बंगाल या कोलकाता का नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पूरे देश का हो गया है। देश भर के तमाम राज्यों में नियुक्ति (और दूसरी) परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने और दूसरे भ्रष्टाचार के आरोपों तथा संदेह में जब परीक्षाएं नहीं हो पाती हैं, नियुक्तियां नहीं हो पाती हैं तो इतने बड़े पैमाने पर नियुक्ति रद्द कर दिये जाने से देश समाज और व्यवस्था का क्या होगा यह बड़ा मामला है। इसलिए खबर बड़ी है। खासकर तब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले पैनल से संबंधित कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसले का इंतजार है। कानून मेरा विषय नहीं है और मैं खबर के कानूनी पक्ष पर टिप्पणी नहीं कर रहा। मेरा मानना है कि इसका व्यावहारिक पक्ष व्यापक है। इसलिए यह खबर बड़ी है और आज अगर 25,752 नियुक्तियां रद्द की जा सकती हैं तो चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित मामले का क्या हुआ चिन्ता का विषय ही नहीं है। आप जानते हैं कि इससे संबंधित नियम सरकार ने बदल लिये थे और मामला लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। चुनाव आयोग निष्पक्ष और जरूरी कार्रवाई कर रहा होता तो दिये गये शपथ पत्र की पुष्टि के लिए प्रधानमंत्री की डिग्री मांग सकता था जो उनका विश्वविद्यालय सार्वजनिक करने के लिए तैयार नहीं है और विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ सरकारी वकील पैरवी कर चुके हैं।
मैंने ईवीएम और इस नाते चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली पर एक किताब लिखी है इसलिए इस मामले में फैसले का इंतजार कर रहा था ताकि किताब को अंतिम रूप दिया सके। अखबारों में इससे संबंधित खबर नहीं दिखी थी और इस कारण फैसले से संबंधित चर्चा यहां नहीं हो पाई थी। आज पता चला कि सुप्रीम कोर्ट ने एक साल पहले 21 मार्च 2024 को इस मामले में रोक लगाने से इनकार कर दिया था और 19 मार्च 2025 की खबर के अनुसार, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 16 अप्रैल को सुनवाई करेगा। खबरों के अनुसार, अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ के मार्च 2023 के फैसले में कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाले पैनल की सलाह पर की जाएगी, “जब तक कि इस संबंध में कोई कानून नहीं बन जाता”। न्यायालय ने इससे पहले 21 मार्च 2024 को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नए कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और कहा था कि जिस तरह से सरकार नियुक्तियों में तेजी ला रही है, वह “अनावश्यक और टालने योग्य” है , लेकिन वह कानून पर रोक नहीं लगा सकता, क्योंकि इससे केवल अराजकता और अनिश्चितता ही पैदा होगी। लेकिन 25,000 शिक्षकों की नियुक्ति रद्द होने से क्या होगा मैं नहीं जानता।
मैं कानून के बारे में भी नहीं जानता लेकिन मेरी सामान्य समझ कहती है कि सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति करने वाले पैनल (या समूह अथवा टीम) के खिलाफ कार्रवाई करे यह तो ठीक है पर उसके काम को ही खारिज कर दे तो यह काम कौन करेगा? कैसे होगा? सुप्रीम कोर्ट सारे काम खुद नहीं कर सकता है और अगर काम का बंटवारा नहीं हो तो कोई काम समय पर, कायदे से हो ही नहीं पायेगा खासकर तब जब सुप्रीम कोर्ट (और दूसर अदालतों में भी) मामले वर्षों लटके रहते हैं और इस तथ्य के बावजूद लटके रहते हैं कि देर से मिला न्याय, न्याय नहीं है। मुझे लगता है कि चयन में गड़बड़ी थी तो चयन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिये थी, उन्हें चेतावनी दी जानी चाहिये थी लेकिन चयन रद्द किया जाना दूसरी मुश्किलें खड़ी करेगा। वैसे भी, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में अदालत ने कहा है, इससे केवल अराजकता और अनिश्चितता ही पैदा होगी। जो भी हो, आगे जो होगा, खबर वह भी होगी लेकिन आज की खबर तो यही है और यही सबसे बड़ी है कि यह सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। आम तौर पर अदालतों के फैसलों पर उंगली नहीं उठाई जाती है। लेकिन भाजपा के शासन में स्थिति बदली है और नए तर्क व दलीलें आई हैं। वह सब मेरा विषय नहीं है लेकिन जज की संदिग्ध मौत का जांच नहीं होना, अनुकूल फैसले के बाद जज को ईनाम देने-लेने की बेशर्मी, प्रधानमंत्री का जज के घर पूजा करने चले जाना, उसका वीडियो सार्वजनिक करना, जज के स्टोर में रखे नोट में आग लगना, उपराष्ट्रपति का एनजेएसी को लेकर सक्रिय हो जाना और पूर्व में एक जज को फंसाये जाने के मामले का साबित नहीं होना और सीबीआई की आलोचना की खबर को महत्व नहीं मिलना ऐसे मामले हैं जो न्यायपालिका के काम पर निगरानी की जरूरत बताते हैं। इसकी वजह यह भी है कि सार्वजनिक तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले जज के खिलाफ कार्रवाई का मामला लटका हुआ है और एक जज साब चुनाव का टिकट पाकर जनप्रतिनिधि भी बन चुके हैं।
शायद इन्हीं सब कारणों से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है, “मैं इस फैसले को नहीं स्वीकार सकती। हालांकि मैं जजों का सम्मान करती हूं। मैं यह राय मानवीय दृष्टिकोण से व्यक्त कर रही हूं। कृपया भ्रम पैदा न करें।” उन्होंने कहा कि हालांकि उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करेगी और चयन प्रक्रिया को फिर से दोहराएगी, लेकिन उन्होंने विपक्षी दलों भाजपा और माकपा पर बंगाल के शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने की कोशिश का आरोप लगाया। यही नहीं, ममता बनर्जी ने यह भी कहा है कि जिन जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उन्हें केवल ट्रांसफर कर दिया जाता है। वहीं, शिक्षकों को (नियुक्ति प्रक्रिया गलत होने से) बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने कहा, “अगर किसी जज के घर से पैसे बरामद होते हैं, तो उसे केवल ट्रांसफर कर दिया जाता है। फिर इन उम्मीदवारों को क्यों बर्खास्त किया गया?” यही नहीं, भर्ती प्रक्रिया के खिलाफ फैसला देने वाले जज अब भाजपा के सांसद बन गए हैं। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और माकपा पर आरोप लगाया कि वे मिलकर इस फैसले को प्रभावित करने की साजिश कर रहे थे।
उल्लेखनीय है कि बर्खास्त करने का फैसला हाईकोर्ट का था और पश्चिम बंगाल सरकार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट आई थी। इस तरह, कथित, पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 25 हजार शिक्षकों की भर्ती रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन उम्मीदवारों को पहले ही नियुक्त किया जा चुका है, उन्हें अब तक मिली सैलरी वापस करने की जरूरत नहीं है। बेंच ने यह भी आदेश दिया कि तीन महीने के भीतर एक नई चयन प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। अदालत ने कहा, ‘नई चयन प्रक्रिया में बेदाग उम्मीदवारों के लिए छूट भी दी जा सकती है।’ अदालत के फैसले पर टिप्पणी मेरा काम नहीं है मैं सिर्फ यह रेखांकित करना चाहता हूं कि अखबारों ने दिलचस्प और महत्वपूर्ण सूचनाओं को प्रमुखता नहीं दी है जितनी सरकार के इस बयान (दरअसल प्रचार) को कि वक्फ कानून में संशोधन से मुसलमानों को फायदा होगा। वह भी तब जब प्रधानमंत्री तुष्टिकरण के खिलाफ हैं और संतुष्टिकरण का दावा करते हैं, उनका बनाया चुनाव आयोग आंखें मूंदे रहता है। जहां तक सुप्रीम कोर्ट की बात है, उसने गैरकानूनी इलेक्टोरल बांड को तो खारिज कर दिया उससे संबंधित सूचनाएं भी सार्वजनिक करवाईं लेकिन गैर कानूनी कार्य करने वालों को कोई सजा नहीं दी और न ही इलेक्टोरल बांड से संबंधित आशंकाओं की जांच कराने का कोई आदिश दिया। ऐसा ही चंडीगढ़ के एक चुनाव अधिकारी अनिल मसीह के मामले में हुआ था।
शिक्षक भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर का आज नवोदय टाइम्स में आज शीर्षक है, “बंगाल शिक्षक की भर्ती की पूरी प्रक्रिया दागदार”। उपशीर्षक है, 25,753 शिक्षकों कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं। मुझे लगता है कि खबरों से अधिकतम तीन चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाली समिति के मामले में सरकारी निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सुप्रीम कोर्ट उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है जितना गंभीर 25,000 शिक्षकों की नियुक्ति की सरकारी प्रक्रिया को दागदार होने के कारण नियुक्त किये गये शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर है। नियुक्ति प्रक्रिया ठीक नहीं थी तो दोषी नियुक्ति करने वाले और प्रक्रिया बनाने वाले हैं, सजा उन्हें होनी चाहिये पर हुई नियुक्त लोगों को जबकि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मामले में प्रक्रिया ठीक करने के प्रति सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता नजर नहीं आ रही है। अखबारों और खबरों की प्रस्तुति की बात करूं तो कल मैंने लिखा था कि अमेरिकी टैरिफ पर सरकार की प्रतिक्रिया नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने आज सोशल मीडिया पर लिखा है, “बहुत सुनते थे कि दो अप्रैल से सब कुछ थम जाएगा। पर हुआ-गया कुछ नहीं और न कुछ होगा। ट्रम्प भी भड़भड़िया अधिक हैं।” आज द टेलीग्राफ की सेकेंड लीड है, प्रधानमंत्री और वरिष्ठ टैरिफ पर मौन। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, स्तब्ध विश्व नुकसान का आकलन कर रहा है।
नवोदय टाइम्स की खबर के शीर्षक में तीन खास बातें हैं – भारत पर ट्रम्प का टैरिफ 27 प्रतिशत। सरकार प्रभाव का आकलन कर रही है और (3) चीन ने कहा, कड़ी जवाबी कार्रवाई करेंगे। अमर उजाला ने टॉप पर सात कॉलम का शीर्षक लगाया है, नौ से लागू होगा अमेरिका का 27% टैरिफ, चुनौती के बीच भारत के लिए मौके भी। खबर का उपशीर्षक है, केंद्र सरकार ने कहा – प्रभावों का आकलन कर रहे, बदलाव से पैदा होने वाले अवसरों पर नजर। फार्मा, सेमी कंडक्टर और ऊर्जा उत्पादों के निर्यात पर शुल्क से मिली छूट। इस खबर में अधिकारियों का दावा है, अमेरिकी टैरिफ का बहुत असर नहीं होगा, कई सेक्टर में यह भारत के लिए लाभदायक हो सकता है, केंद्र सरकार अमेरिकी टैरिफ के प्रभावों का आकलन कर रही है जैसी बातों के आगे लिखा है, वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है, निहितार्थों की जांच जारी है, अवसरों का अध्ययन किया जा रहा है। इसके साथ वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी का कहना है, पीएम नरेन्द्र मोदी के लिए भारत पहले है। आप समझ सकते हैं कि इन तथ्यों या सूचनाओं को कितनी गंभीरता दी जानी चाहिये और टेलीग्राफ का शीर्षक क्यों कहता है कि सरकार मौन है। जाहिर है, अमेरिकी टैरिफ को लेकर चिन्ता वैसी नहीं है जैसा मामला है और आम लोगों को या तो समझ नहीं है या वे मान बैठे हैं कि सब ठीक ही होगा। इंडियन एक्सप्रेस में आज बैनर शीर्षक है, ट्रम्प ने दुनिया भर पर शुल्क लगाये। द हिन्दू ने अपनी खबर में लिखा है, भारत की प्रतिक्रिया म्यूट कर दी गई है। आगे बताया गया है, द्विपक्षीय व्यापार करार के लिए अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों और भारतीय अधिकारियों के बीच कई हफ्तों की वार्ता के बावजूद ट्रम्प ने शुल्क लगा दिये और दावा किया कि भारत 52 प्रतिशत शुल्क लेता है और वे छूट के बाद 27 प्रतिशत का शुल्क लगा रहे हैं। यह भारत से अमेरिका को किये जाने वाले निर्यात पर लागू होगा। नवोदय टाइम्स के अनुसार ट्रम्प ने कहा है, भारत बहुत-बहुत सख्त है। …. प्रधानमंत्री अभी अभी यहां से गये हैं। मेरे अच्छे दोस्त हैं …. लेकिन हमारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे हैं। हमने उनसे दशकों तक शुल्क के नाम पर कुछ नहीं लिया है। … जब मैं सत्ता में आया तब हमने चीन के साथ इसकी शुरुआत की। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज बंगाल के स्कूली कर्मचारियों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर को लीड बनाया है जबकि दि एशियन एज ने विवादास्पद वक्फ विधेयक के राज्यसभा में पास हो जाने और राष्ट्रपति की सहमति के लिए जाने की खबर को लीड बनाया है।


