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आज के अखबार : हिन्दी अखबारों ने फिर अपना हिन्दू रूप दिखाया, अंग्रेजी वालों के लिये ऐसे संदेश फोन पर!

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों की खबर पहलगाम की घटना ही होनी थी वही है। आज के अखबारों  से पता चलता है कि हिन्दी के अखबारों के मुकाबले अंग्रेजी वाले काफी संयमित हैं और हिन्दी वाले अपना हिन्दू रूप नहीं छिपा पाते हैं। इसे दक्षिण में हिन्दी थोपने के आरोपों और कोशिशों से जोड़कर देखिये तो समझ में आता है कि इसका मकसद क्या हो सकता है और जो समाज हिन्दी नहीं जानता है या पढ़ता है वह क्यों हिन्दी वालों से अलग है। बेशक यह घटना और उसकी खबर महत्वपूर्ण है। इसलिए उसकी प्रस्तुति जैसी भी हो मुख्य सूचना या शीर्षक महत्वपूर्ण है। हिन्दी के बेहतर और कई संस्करणों वाले दैनिक भास्कर का बैनर शीर्षक है, धर्म पूछकर नरसंहार; 26 पर्यटक मारे। अंग्रेजी के मेरे छह अखबारों में किसी का शीर्षक इसके आस-पास भी नहीं है। धर्म (या नाम) पूछकर गोली मारने की बात हाईलाइट भी नहीं की गई है। अगर अंग्रेजी में नहीं है तो क्या हिन्दी में गलत जानकारी है? जाहिर है नहीं, इसी को मैं संयम या संपादन कह रहा हूं। हो सकता है पत्रकारिता के किसी स्कूल में ऐसी ही पत्रकारिता सिखाई जाती हो और इसमें कुछ भी अनुचित न लगे पर यह महत्वपूर्ण है कि अंग्रेजी अखबारों में न तो ऐसा शीर्षक है और न इस तथ्य को हाईलाइट किया गया है।  

इसके मुकाबले इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, आतंकियों ने कश्मीर में पर्यटकों की हत्या की। मुझे नहीं लगता कि किसी पर्यटक को उसका धर्म जानकर छोड़ा गया होगा। अगर ऐसा होता तो इसे भी प्रमुखता से लिखा जाना चाहिये था और तब इस शीर्षक की सार्थकता होती कि धर्म पूछकर मारा। अगर मैं एक ही अखबार पढ़ रहा होता तो इस तथ्य की पुष्टि के लिये ढूंढ़ता कि किस मुसलमान या धर्म के पर्यटक को उसके धर्म के कारण छोड़ दिया गया। अगर ऐसा नहीं है तो रिपोर्टिंग के ख्याल से, धर्म पूछकर मारा गया का बहुत मतलब नहीं है। मुझे किसी भी अखबार में यह सूचना या ऐसे किसी मामले की खबर नहीं दिखी कि जहां वारदात हुई, जिन पर्यटकों को मारा गया उनमें किसी को उनके धर्म के कारण छोड़ दिया गया। टाइम्स ने इंडिया ने जो मामला हाईलाइट किया है वह हिन्दी में कुछ इस प्रकार होगा, हमलावर ने पीड़ित की पत्नी से कहा : तुम्हे नहीं मारूंगा। जाओ मोदी से कहो। जाहिर है, इसे धर्म के आधार पर नहीं छोड़ा गया है, मोदी से कहने के लिए छोड़ा गया है और जो कहना था वह (भी) खबर है। समझना मुश्किल नहीं है कि यह क्यों कहा गया और इसका गैर जिम्मेदार जवाब या बचाव है कि नाम पूछकर मारा। ऐसा लगता है कि हिन्दी अखबारों ने रिपोर्टिंग नहीं की है, आतंकवादियों को सरकार की तरफ से जवाब दिया है जो जाहिर है सरकार का घोषित या अधिकृत जवाब नहीं है। इस तरह अखबार सरकार की तरफ से राजनीति कर रहे हैं। नागरिकों की मौत के मामले में किसी का भी राजनीति करना देश भक्ति नहीं है भले ही यह वारदात राजनीतिक कारणों से हुई हो।

मेरे हिसाब से आज दैनिक भास्कर के मुकाबले दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग और प्रस्तुति ज्यादा संयमित है। राष्ट्रीय संस्करण में अखबार ने नाम पूछकर गोली मारी जैसी खबर या शीर्षक या हाइलाइट किया हुआ अंश नहीं है। लेकिन एक संस्करण में उपशीर्षक है, …. घूम-घूम कर नाम व धर्म पूछा और करीब से मारी गोली। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जिसे हाईलाइट किया है वह राष्ट्रीय संस्करण में तीन कॉलम की खबर है और शीर्षक है, हमलावर आतंकवादी बोला… जाओ तुम्हें नहीं मारता, जाकर मोदी को बता देना। उपशीर्षक से आप मामला समझ जायेंगे, कर्नाटक से घूमने आई पल्लवी के पति को आतंकियों ने गोली मारी। कहने की जरूरत नहीं है कि आतंकियों की अपनी समस्या है और उन्होंने निर्दोष पर्यटकों को निशाना बनाया। उनके पास इसके कारण होंगे और संभव है इसका राजनीतिक समाधान हो (या नहीं हो) मीडिया आतंकवादियों के खिलाफ ना मोर्चा खोल सकता है ना सरकारी हमलावर बन सकता है। और वे धर्म विशेष के थे या धर्म विशेष के लोगों को ही मार रहे थे, बताकर आप उनका नुकसान नहीं कर रहे हैं समाज में धार्मिक वैमनस्यता फैलाने का काम कर रहे हैं। फिर भी आज हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों ने प्रमुखता से बताया है, दहशतगर्दों ने पहले धर्म पूछा…. परिचय पत्र देखे और फिर गोली मार दी (अमर उजाला)।  नवोदय टाइम्स में तो लीड का शीर्षक ही है, नाम पूछा और मार दी गोली। इसमें एक और शीर्षक है, आतंकी बोला – जाओ मोदी से कह देना।

इससे साफ है कि आतंकी क्या चाहते हैं और जो चाहते हैं। वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बताया जाये पर वह अखबार का शीर्षक क्यों होना चाहिये? मेरा मानना है कि जाओ मोदी से कह देना – कहना और इसके लिए किसी को बख्स देना बताता है कि उनके लिए मोदी से कहना कितना महत्वपूर्ण था (या है) पर उसे भूलकर हिन्दी अखबारों ने जो बताया है वह यही कि एक धर्म के आतंकियों ने दूसरे धर्म के पर्यटकों को मार डाला। पुलवामा का हमला भी आतंकी हमला था और उसे वैसे ही देखा जाना चाहिये। तब धर्म की बात नहीं हुई थी जबकि हमलावरों को तो पता ही था और नहीं भी पता हो तो फर्क क्या था। पयर्टकों के मामले में भी ऐसा ही है और वे नाम या धर्म पूछे बिना भी मारते तो अपराध कम या ज्यादा नहीं होता। खबर भी छोटी या बड़ी नहीं होनी थी। धर्म पूछकर मारा गया है तो जैसा मैंने पहले कहा, वह पीड़ितों को चुनने के लिए नहीं था बताने के लिये था कि वे किस धर्म का विरोध कर रहे हैं और उनका विरोध इस तथ्य के साथ छप गया तो उनका मकसद पूरा हुआ। आंतंकियों का संदेश यह भी है कि मोदी का समर्थन करने वाले ऐसे ही मारे जायेंगे। भले सभी हिन्दू मोदी के समर्थक न हो और यह उसी तरह है जैसे सभी मुसलिम पर्यटकों की हत्या के समर्थन नहीं होंगे पर शीर्षक से संदेश यही दिया जा रहा है।

टेलीग्राफ ने अपने उपशीर्षक में बताया है कि आतंकियों ने इस वारदात से सब चंगा सी (ऑल इज़ वेल) की नैरिटिव या कहानी में छूरा भोंका है। हिन्दी अखबारों ने बताया है कि उन्होंने नाम पूछकर मारा मतलब एक धर्म के लोगों को मारा जबकि मोदी को बता देना या ऑल इज वेल की कहानी पिटी का मतलब है कि विरोध नरेन्द्र मोदी की राजनीति का है। नाम पूछकर मारा में यह मामला पिट गया है। जबकि खबर यह भी है।  हालांकि, यह मामला महत्वपूर्ण नहीं है। खबर तो यह है कि कश्मीर में पर्यटकों को मारा गया, पहली बार ऐसा हुआ है आदि आदि। लेकिन हिन्दी (जनसत्ता) में खबर (उपशीर्षक) है, एक प्रत्यक्षदर्शी महिला ने बताया; पहले नाम पूछा फिर गोली मार दी। यह सूचना आबादी के एक बड़े वर्ग के लिये इतनी महत्वपूर्ण है कि व्हाट्सऐप्प पर घूम रही है। पर वही अखबारों में यह अमृतकाल का विकास है जिसे नामुमकिन मुमकिन है कहा गया था। हालांकि विकास यह भी है। 2014 के पहले जनसत्ता में प्रत्यक्षदर्शी शायद ही छपा हो। शीर्षक में तो चश्मदीद ही होना था। अमर उजाला की खबरों में आज एक शीर्षक है, पीड़िता बोली – लोगों के कपड़े उतरवाकर धार्मिक पहचान की। व्हाट्सऐप्प पर यह अंग्रेजी में भी है और स्पष्ट है, Terrorists checked tourists’ IDs, pulled down pants to confirm religion in Pahalgam. मैं यहां जान बूझकर लिंक नहीं दे रहा हूं। इसके लिये गालियां पड़ सकती हैं। लेकिन वो सब अलग मुद्दा है।

अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स ने बताया है कि पीड़ितों में दो विदेशी भी हैं और इस घटना की वैश्विक स्तर पर निन्दा की गई है। आज के कई अखबारों में यह खबर प्रमुखता से है, दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा। इसे उन सभी अखबारों ने प्रमुखता से छापा है जो अभी तक यह नहीं बता पाये हैं कि पुलवामा का क्या हुआ। दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की खबर है। इसके साथ बताया गया है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह श्रीनगर रवाना। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर प्रधानमंत्री के हवाले से छपी है। सउदी दौरा छोड़कर लौटे, हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई होगी। अखबार ने यह भी लिखा है कि पुलवामा के बाद यह सबसे बड़ा हमला है।

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