रंगनाथ सिंह-
रेडिकल साम्प्रदायिकता का दूसरा पहलू-
जरा सोचिए कि अगर पहलगाम की पीड़िता का वहाँ मौजूद व्यक्ति द्वारा बनाया गया वीडियो न होता, अगर एक प्रोफेसर इस्लामी कलमा सुनाकर जिन्दा न बचा होता, अगर मारे गये लोगों के साथ खड़ी महिलाओं के बयान न होते तो कथित डॉक्टर मुकेश कुमार क्या बोल रहे होते और भड़ास4मीडिया क्या छाप रहा होता!
इस्लामी आतंकवादियों के कुकृत्यों को डिफेंड-जस्टिफाई-सुगरकोट इत्यादि करने वाला वर्ग भी ऐसे हर आतंकी कार्रवाई का हिस्सेदार माना जाना चाहिए। यह सच है कि आतंकी हमलों की वजह से समूचे समुदाय को अपराधी घोषित करना घनघोर साम्प्रदायिकता है मगर यह भी सच है कि समुदाय के सामान्य लोगों का इस्तेमाल करके रेडिकल तत्वों का बचाव करना उतनी ही घनघोर साम्प्रदायिकता है।
अगर घटनास्थल से बचकर लौटे एक व्यक्ति ने बयान दिया है कि उसे वहाँ से निकलने में स्थानीय नागरिकों ने पूरी मदद की। मारे गये लोगों में एक घोड़े वाला भी है। इससे यह नहीं साबित होता है कि सचमुच आतंकियों के शिकार बने पीड़ितों के घटना के तत्काल बाद दिए गए बयान झूठे हैं! इससे इतना ही पता चलता है कि कश्मीर में जब कुछ लोग धर्म पूछकर गोली मार रहे थे, तभी कुछ अन्य लोग पर्यटकों के बचाव का प्रयास कर रहे थे। यानी वहाँ दोनों तरह के लोग मौजूद थे और ये दोनों तरह के लोग मुसलमान थे।
बर्बर हमले के बाद एक वर्ग ने आतंकियों के कुकृत्य के आधार पर एक समुदाय के खिलाफ कैंपेन चलाना शुरू कर दिया। उसकी आलोचना करना या उसे आईना दिखाना जरूरी है मगर उसके लिए आतंकियों के कुकृत्य को छिपाना जरूरी नहीं है। मगर एक वर्ग वहाँ के मददगार लोगों के क्रियाकलापों का इस्तेमाल बर्बर आतंकियों को बचाने के लिए कर रहा है। पहले वर्ग की आलोचना में करोड़ों लेख लिखे जा चुके हैं मगर इस दूसरे वर्ग की आलोचना बहुत कम होती है। क्या इन दोनों प्रवृत्तियों में कोई फर्क है? क्या ये दोनों प्रवृत्तियाँ देश और समाज के लिए समान रूप से खतरनाक नहीं हैं!
भड़ास का हाल ये है कि अगर कहीं हजार हिन्दुओं को गोली मार दी जाए और कोई झोलाछाप डॉक्टर यह लिख दे कि गोलियाँ सैर पर जा रही थीं और ये लोग बीच में आ गये इसलिए मारे गये तो भड़ास उस पर हेडिंग लगाएगा कि हजार हिन्दुओं ने कुछ मासूम बन्दूकों से निकली गोलियों को रास्ता रोकने के लिए दे दी जान!
झोलाछाप डॉक्टर मुकेश कुमार डिनायल मोड में जीने वाले अकेले जीव नहीं हैं। उनके जैसे कई झोलाछाप डॉक्टर इसी कीच में रेंगते नजर आ रहे हैं। भारत का लेफ्टविंग अक्सर इस्लामी कट्टरपंथियों के लगभग सभी कुकृत्यों को डायल्यूट या सुगरकोट करता नजर आता है। हमास के आतंकियों ने 1200 बच्चों-महिलाओं-बुजुर्गों को बेरहमी से कत्ल कर दिया तो ये भारत में ट्रेंड कराने लगे कि ये रेजिसटेंस है! ये चाहते हैं कि दुनिया मान ले कि महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों पर बर्बर हमला रेजिसटेंस होता है! अगर इसे रेजिसटेंस मान लिया जाए तो फिर इसके काउंटर-रेजिसटेंस को किस मुँह से खारिज किया जाएगा!
हमास के हमले की योजना बनाने वालों को पता था कि जवाबी हमला भी होगा मगर उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि रेडिकल मुस्लिम लीडरों के लिए आम मुसलमान भेड़-बकरी से ज्यादा महत्व नहीं रखते, जिनकी बलि चढ़ाकर लीडरान अपने राजनीतिक मंसूबे पूरे करते हैं! सच कहूँ तो मुसलमानों के पास हर देश में उनके अपने-अपने जिन्ना और सोहरावर्दी मौजूद हैं। जिनकी सोच होती है कि पाँच-दस लाख आम मुसलमान मरते हैं तो मरें, हम कायदे आजम बनकर रहेंगे!
इस्लामी राइटविंग की इस प्रवृत्ति पर सवाल उठाने वालों को संघी कहकर चुप कराने को कुछ लोग बौद्धिकता समझते हैं मगर बीआर आम्बेडकर तो हिन्दुत्ववादी नहीं थे! मुसलमान या इस्लाम से विद्वेष का उनका कोई इतिहास नहीं था मगर उन्होंने भी एक असाइनमेंट के तौर पर जब विचार किया तो इस्लाम के अन्दर मौजूद इन तत्वों की पहचान की थी। मैं उनके निष्कर्षों से सहमत नहीं हूँ मगर उन्होंने जो प्रवृत्ति और लक्षण देखे थे, उससे असहमत होना किसी भी रैशनल व्यक्ति के लिए मुश्किल है।
इस्लामी राइटविंग की यह प्रवृत्ति भारत तक सीमित नहीं है। रेडिकल इस्लाम/पोलिटिकल इस्लाम/इस्लामी राइटविंग आप इसे जो चाहें नाम दें, इस जमात से इस समय दुनिया के ज्यादातर डेमोक्रेटिक देश परेशान हैं। इन सभी देशों का लेफ्टविंग और स्वघोषित लिबरल तबका इस्लामी राइटविंग का अन्धभक्त बना हुआ है और उसके नतीजे में कहीं हिन्दू राइटविंग, कहीं बौद्ध राइटविंग, कहीं ईसाई राइटविंग इत्यादि तेजी से मजबूत होते जा रहे हैं। मॉडर्ननिटी और रिलीजन के बीच जद्दोजहद में अगर आधुनिकता आज बैकफुट पर है तो इसलिए क्योंकि उसने खुद एक रेडिकल रिलीजियस राइटविंग से हाथ मिला लिया है। और इस वजह से वह अन्य रिलीजियस राइटविंग की आलोचना का नैतिक और सामाजिक अधिकार खो बैठी है।
सच कहा जाए तो कई मुस्लिम बहुल देश भी इनसे तंग हैं। अभी कल ही जार्डन ने मुस्लिम ब्रदरहुड को अपने यहाँ बैन किया। याद रखें कि जार्डन के मौजूदा राजा को इस्लाम के पैगंबर का सीधा वंशज माना जाता है! यानी मोहम्मद के वंशज भी नहीं चाहते हैं कि उनके राज्य में मुस्लिम ब्रदरहुड फैले! यह कौन सा भाईचारा है जिससे पैगंबर के वंशजों को भी परहेज है!
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात इत्यादि में मुस्लिम ब्रदरहुड पहले से बैन है। जरा सोचिए, कितना सिंपल हार्मलेस नाम है- मुस्लिम ब्रदरहुड! मगर इस्लामी देश भी इससे खौफ खाए हुए हैं! मुस्लिम ब्रदरहुड की सबसे बड़ी ताकत ये है कि यह मॉडर्न जगत में रहने वाले एजुकेटेड नौजवानों को भी ग्रूम करके आतंक की राह पर ले जाता है! और इंटरनेट इसका सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
इतना पढ़कर किसी को यह लग सकता है कि यह मुसलमानों को होने वाली कोई बीमारी है। आंकड़े इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। एक दशक पहले फ्रांस की एक केस स्टडी में पाया गया कि रेडिकलाइज होकर आतंकी वारदात करने वालों में करीब 40 प्रतिशत नौजवान पिछले कुछ सालों में कनवर्ट हुए थे! भारत में भी अभी कुछ साल पहले पकड़े गये दो आतंकियों में से एक दो-तीन साल पहले ही कनवर्ट हुआ था! यानी यह एक बीमारी है और वो जिसे लग जाएगी वह उसी अंजाम को पहुँचेगा! यानी रेडिकल इस्लामी ट्रोप की चपेट में आने के बाद मुसलमान और गैर-मुसलमान दोनों आतंकवाद को जायज समझने लगते हैं!
अगर हिन्दू राइटविंग के अपराधों के लिए उन लोगों को नैतिक रूप से जिम्मेदार माना जाता है जो उनका सार्जवनिक बचाव करते हैं तो जो लोग इस्लामी राइटविंग और मुस्लिम ब्रदरहुड के कुकृत्यों को बचाते या छिपाते हैं वे भी उन सभी अपराधों के नैतिक भागीदार हैं जो इन जैसे रेडिकल द्वारा किये जाते हैं।
कायदे से ऐसा लेख किसी प्रगतिशील मुस्लिम को लिखना चाहिए था मगर हमारा देश अब सेकुलरिज्म की उस सीमा पर पहुँच चुका है, जहाँ कोई मुस्लिम भी अपने रिलीजन से जुड़ी किसी परिघटना पर प्रोग्रेसिव मॉडर्न नजरिए से कुछ लिख दे तो उसे तत्काल संघी घोषित कर दिया जाता है। यही नहीं, लिबरल हिन्दु इस डर के साये में जीता है कि अगर उसने इस्लामी रेडिकल के बारे में कुछ अवांछित कह दिया तो उसे संघी समझ लिया जाएगा!
अभी कल-परसों ही अरुंधति राय के कश्मीरी आतंकियों को क्रान्तिकारी बताने पर कवि-संपादक आलोक श्रीवास्तव द्वारा एक लाइन का कटाक्ष करने के बाद उनकी भरपूर लानत-मलानत की गयी और भावावेश उतरने के बाद आलोक जी खुद इतना साहस नहीं जुटा सकें कि उन बौद्धिक हमलावरों को पलटकर जवाब दे सकें! जाहिर है कि किसी कमजोर क्षण में वे वही लिख बैठे जो अन्दर महसूस करते हैं। होश में आने के बाद वो चुपा गये। कहना न होगा, सार्वजनिक गालीगलौज से आप किसी की जबान को चुप करा सकते हैं, मगर उसका दिल जो महसूस करता है, उसे मिटा नहीं सकते। सभी जानते हैं कि झोलाछाप डॉक्टर अक्सर गम्भीर बीमारियों को जानलेवा बना देते हैं। इसलिए वक्त पर संभल जाइए ऐसा न हो कि इतनी देर हो जाए कि आप कुछ कर ही न सकें। जिस दिन सचमुच भेड़िया आए उस दिन आपकी मदद की पुकार पर कोई यकीन ही न करे।
मूल पोस्ट…
धर्म पूछकर गोली मारने वाली बात झूठी है!



Khushdeep Sehgal
April 24, 2025 at 3:04 pm
अभी भी शेष है?
Atul Gupta.
April 24, 2025 at 11:08 pm
Aadarniya Rangnath Singh Ji , Aapane 100 Taka Satya Kaha Hai. Aapko Bahut Bahut Shaadhubaad.
Atul Yadav
April 25, 2025 at 8:04 am
Dr. Mukesh kumar… Seculari bhang pee chuke he, aapne sahi likha ‘Jholachhap Dr’…